श्री गणपति को ध्यान धर, हनुमत वीर मनाय।
सार रूप में सती की, बरणूं कथा बणाय॥
जन्म लियो माँ डोकवे, गुरसामल घर जाय।
शक्ति रूप में परगटी, नगर झुंझनूं आय॥
गुरसामल घर बँटे बधाई, बड़े भाग जन्मी है बाई।
रिद्धि सिद्धि ने सागे ल्याई, दिन-दिन लक्ष्मी बधै सवाई।
मात-पिता निज भाग सरावैं, इसङी सुता पुण्य सूं पावै।
ब्यावण जोग हुई जद बाई, गुरसामलजी करी सगाई।
नगर हिसार भेजियो टीको, तनधन दास बण्यो बर नीको।
जालीराम जनेत सजाई, गाँव डोकवे चालर आई।
चढ़ घोड़ी पर बनङो आयो, घणै उछावा ब्याव रचायो।
मंगल गीत लुगायां गावै, पंडितजी फेरा करवावै।
गुरसामलजी जान की, भोत करी मनुहार।
समधीजी ने दायजै, दीन्यू दरव अपार॥
पाछी जान नगर निज आई, जाय नेवगी देई बधाई।
रथ सूं सास उतारण धाई, भैनङ मांगै बाङ रुकाई।
पीवरियै सूं लाड़ सवायो, नारायणी सासरियै पायो।
आय मिली मायड़ सूं पाछी, जैयां गाय लुआरी बाछी।
सासु-सुसरा करे बङाई, इसङी बहु भाग्य
सूं पाई।
बेटे नै चढ़ने के तांई, सुघड़ एक घोड़ी मंगवाई।
चढ़कर तनधन घूमण जावै, नवाबजादो मन ललचावै।
आय बाप ने बोल्यो बातां, नींद न आवै सारी रातां।
तनधन की घोड़ी लियो, म्हारै मन नै मोय,
बा घोड़ी पाया बिना, मन में चैन ना होय॥
चट भूपत दीवान बुलायो, हुकम साथ वो महला आयो।
माँगी घोड़ी सुत के तांई, नटग्यो मंत्री हाथ न आई।
अनवर मन में मतो उपायो, घोड़ी ने चोरण हित धायो।
तुरी बोल सुण तनधन जाग्यो, चट पट चोर बठै सूं भाग्यो।
तनधन लारै सांग बगाई, निसाणी नागन सी धाई।
मार्या पाछे चोर पिचाण्यो, काल आपको आयो जाण्यो।
जालीराम डरै मन माहीं, घर छोड़्या बिन रिच्छा नाहीं।
चाल्यो संग कुटुंब सुत नारी, घर छोड़न को दुख हो भारी।
बेरो पड़्यो नवाब ने, दिन उगताँ ही साथ।
बै जा पूँच्या झुंझुनूं, पड़्या न अरी कै हाथ॥
सुण भूपत कै भई कटारी, क्रोध कर्यों तनधन पर भारी।
सुत ने मार कठे ल्युख जासी, मुकलावे खातर तो आसी।
जद ले लेस्यूँ बदलो सारो, प्या देस्यूँ सगला कै क्यारो।
मन में गांठ नवाब लगाई, बीत गया दिन यूँ कितणाई।
मुकलावै को म्हूरत आयो, गुरसामल कासीद पठायो।
तनधन सासरियै चढ़ चाल्यो, पछलो बैर नवाब संभाल्यो।
नाराणी तनधन कै साथे, चाली चूनङ ओढ्या माथे।
जद लश्कर जंगल में आयो, साँझ पड़ी अंधेरो छायो।
चाणचक हमलो हुयो, टूट पड़्यो ज्यूँ काल।
तनधन अर साथी लिया, निज हथियार संभाल॥
बाजण लाग्या जुद्ध का डंका, छिण भर में भिङग्या रणबंका।
साथी तनधन साथ निभायो, बैरीङाँ ने मजो चखायो।
एक-एक कर सुरग सिधार्या, मरता भी अनगिणती मार्या।
इकलो जुद्ध करै रण बंको, नहीं मौत को मानै शंको।
कितणाई नै मार गिराया, कितणां भाजर प्राण बचाया।
आई मूर्च्छा सिर चकरायो, पङ्यो आप भी कर मन चायो।
भू पर पड़तो लख नाराणी, भागी रथ सूँ पति के कानी।
उड़ग्यो पंछी पिंजरो खाली, माँग सिन्दूरी पुँछगी लाली।
इक छण तो बिलखी घणी, दूजे छण विकराल।
धर्यो चण्डी को रूप वा, नैण हो गया लाल॥
खड़ग हाथ ले सामै धाई, भाग्या अरि तज मान बङाई।
चुग चुग बैरीङाँ नै मारे, क्रोध भरी रण में किलकारे।
जो चण्डी के निजरां आयो, बचकर पाछो जाण न पायो।
रण आँगन सूनो कर दीन्यो, पति को बदलो चौकस लीन्यो।
शांत हुई अब मात भवानी, देख्यो सेवक राणै कानी।
आज्ञा दीनी लकङी ल्यादे, बेगो सो तू चिता बणादे।
विरह ताप अब सह नहीं पाऊँ, पति के साथ सुरग में जाऊँ।
इण तन सूँ तो मिल नहीं पाई, पण रहस्यूं अब साथ सदा ही।
राणो लकङी ल्याय कर, दीनी चिता बणाय।
पति को सिर ले गोद में, बैठ गई सिर नाय॥
पति के चरणां चित्त लगायो, राणा ने आदेश सुनायो।
पीवरियै सासरियै म्हारै, समाचार पूँचाज्यो सारै।
बाबुल ने सब कहज्यो क्हाणी, हुई सती थारी नाराणी।
ऊँचो नाम कर्यो म्हे थारो, गुण थारा गासी जग सारो।
सासु सुसरा ने समझा ज्यो, वीर पुत्र की गाथा गाज्यो।
दुख अर शोक न मन में मानै, इण दिन ने शुभ दिन कर जाणै।
दुनियाँ को दुख मेटण तांई, दरसास्यूँ मैं निज प्रभुताई।
रूप भगवती को धारूँगी, भगतां का कारज सारूँगी।
तूरी पीठ पर धर भस्म, तू हो ज्यायै लार।
जित थम ज्यावै तूरी उत, लीज्यो भस्म उतार॥
बणसी उत ही मंदिर मेरो, तेरो बंस बणैगो चेरो।
सासरिये में सब सुख पासी, म्हारे मंदिर धोक दिरासी।
मौन हुई इतनी कह बाणी, पावक न बिनवै नाराणी।
प्रगट हुई बिण-छिण हो आगी, लपट चिता सूँ निसरण लागी।
हाथ जोड़ राणो सिर नांयो, बड़भागण को दरशन पायो।
पाछै भस्मी भेली कीनी, तूरी पीठ सादर धर
दीनी।
चाली घोड़ी लारै राणो, थमगी चोखो पाय ठिकाणो।
भसम उतार खबर पहुँचाई, बिलखता सब बात बताई।
सुनता ही आयो तुरंत, स्वागत हित परिवार।
गूँजे राणीसती की, च्यारूँ दिसि जयकार॥
साँचे मन सूँ सती को, पाठ करै जो कोय।
मनस्या पूरण होय सब, नित नव मंगल होय॥
॥मात श्री राणीसतीजी की जय शरणम्॥
॥माता जगदम्बे सती की जय॥