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(10)
🌿 ऋषियों की रक्षा का श्रीराम का अटूट संकल्प
दण्डकारण्य के घने और रहस्यमय वन में श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण तपस्वी ऋषियों के आश्रमों में जाते हुए अपना वनवास व्यतीत कर रहे थे। वन का जीवन कठिन था, परंतु तीनों के लिए वह धर्म, सेवा और कर्तव्य का मार्ग बन गया था।
एक दिन माता सीता ने श्रीराम से ऐसी बात कही, जिसमें उनके पति के प्रति प्रेम भी था और उनके हित की चिंता भी। सीता जानती थीं कि श्रीराम क्षत्रिय हैं और उनके हाथ में धनुष है, लेकिन वह नहीं चाहती थीं कि वन में रहते हुए श्रीराम अनावश्यक रूप से किसी संघर्ष में पड़ें।
सीता की बात सुनकर श्रीराम के हृदय में उनके प्रति प्रेम और सम्मान और भी बढ़ गया। उन्होंने बड़े स्नेह से सीता की ओर देखा और कहा—
“देवि! तुमने मेरे प्रति प्रेम और मेरे हित की भावना से ही यह बात कही है। तुम्हारी बात बिल्कुल उचित है। तुमने क्षत्रिय कुल के धर्म की ही याद दिलाई है। वास्तव में, तुम्हारा ऐसा कहना तुम्हारे ज्ञान, प्रेम और तुम्हारे कुल की मर्यादा के अनुरूप है।”
श्रीराम जानते थे कि सीता ने उन्हें रोकने के लिए नहीं, बल्कि उनके कल्याण के लिए यह बात कही है। इसलिए उनके शब्दों में नाराज़गी नहीं, बल्कि पत्नी के स्नेह के प्रति कृतज्ञता थी।
फिर श्रीराम ने सीता को उस परिस्थिति का कारण समझाया।
उन्होंने कहा—
“सीते! तुमने स्वयं कहा है कि क्षत्रिय धनुष इसलिए धारण करते हैं कि किसी पीड़ित व्यक्ति को दुःख में सहायता के लिए पुकारना न पड़े। यदि कोई असहाय होकर रक्षा की गुहार लगाए, तो क्षत्रिय का धर्म है कि वह उसकी रक्षा करे।”
श्रीराम की आवाज़ में अब गंभीरता आ गई थी।
दण्डकारण्य में अनेक महान ऋषि-मुनि तपस्या कर रहे थे। वे संसार के सुखों से दूर, फल-मूल खाकर और कठोर व्रतों का पालन करते हुए अपना जीवन बिता रहे थे। लेकिन राक्षसों के अत्याचार ने उनका जीवन अत्यंत कष्टमय बना दिया था।
श्रीराम ने सीता से कहा—
“दण्डकारण्य में रहने वाले वे तपस्वी मुनि बहुत दुःखी हैं। वे मुझे शरण देने योग्य और शरणागतों की रक्षा करने वाला समझकर स्वयं मेरे पास आए हैं। उन्होंने मुझसे अपनी रक्षा की प्रार्थना की है। अब जब कोई भयभीत होकर मेरी शरण में आया है, तो मैं उसकी रक्षा कैसे न करूँ?”
उन ऋषियों का जीवन कितना कठिन था, यह बताते हुए श्रीराम ने कहा कि वे दिन-रात वन में रहते थे। फल और मूल खाकर अपना जीवन चलाते थे। उनका उद्देश्य किसी को कष्ट देना नहीं था। वे यज्ञ, तपस्या और साधना में अपना समय बिताते थे।
लेकिन राक्षस उन्हें चैन से तपस्या भी नहीं करने देते थे।
वे भयानक राक्षस कभी भी आश्रमों में आ जाते, ऋषियों को परेशान करते और उनके धार्मिक कार्यों में बाधा डालते। उनके भय के कारण तपस्वियों का जीवन निरंतर संकट में रहता था।
श्रीराम ने सीता से कहा—
“वे मुनि इन क्रूर राक्षसों के कारण कभी सुखी नहीं रह पाते। राक्षस उन्हें मारकर अपना भोजन बना लेते हैं। जब ऐसे असहाय ऋषि हमारे पास आकर सहायता माँगते हैं, तब उनका दुःख देखकर मेरा हृदय कैसे शांत रह सकता है?”
फिर श्रीराम को वह समय याद आया जब वे ऋषियों के सामने उपस्थित हुए थे।
कई तपस्वी मुनि उनके पास आए थे। उनके शरीर तपस्या से दुर्बल थे, लेकिन उनके मुख पर तेज था। वे संसार के किसी भौतिक सुख की इच्छा लेकर श्रीराम के पास नहीं आए थे। वे केवल अपनी रक्षा चाहते थे, ताकि वे बिना भय के अपनी तपस्या पूरी कर सकें।
उन्होंने श्रीराम से विनम्र होकर कहा था—
“प्रभो! हम पर कृपा कीजिए और हमारी रक्षा कीजिए।”
ऋषियों की वह पुकार श्रीराम के हृदय को छू गई थी।
श्रीराम ने सोचा कि जिन्हें स्वयं उनकी सेवा करनी चाहिए थी, वे ऋषि अपनी रक्षा के लिए उनके पास आए हैं। उन्हें यह बात अपने लिए गौरव नहीं, बल्कि लज्जा की लग रही थी।
उन्होंने ऋषियों से कहा था—
“महर्षियो! आप जैसे ब्राह्मणों और तपस्वियों की सेवा करना तो मेरा अपना कर्तव्य है। वास्तव में मुझे स्वयं आपके पास आकर आपकी सेवा और रक्षा करनी चाहिए थी। लेकिन आप स्वयं अपनी रक्षा के लिए मेरे पास आए हैं—यह मेरे लिए बहुत बड़ी लज्जा की बात है। आप प्रसन्न हों और बताइए कि मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ।”
श्रीराम के इन शब्दों में उनके चरित्र की महानता दिखाई देती थी। वे स्वयं अयोध्या के राजकुमार थे, फिर भी तपस्वियों के सामने स्वयं को सेवक के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे।
ऋषियों ने तब अपने हृदय का दुःख श्रीराम के सामने रखा।
उन्होंने कहा—
“रघुनन्दन! इस दण्डकारण्य में अनेक ऐसे राक्षस रहते हैं जो अपनी इच्छा के अनुसार कोई भी रूप धारण कर सकते हैं। वे हमें बहुत परेशान करते हैं। उनके भय के कारण हम अपनी तपस्या भी शांति से नहीं कर पाते। इसलिए आप ही हमारी रक्षा कीजिए।”
ऋषियों का सबसे कठिन समय तब आता था जब वे अग्निहोत्र और यज्ञ जैसे धार्मिक कार्य करते थे।
जैसे ही अग्निहोत्र का समय आता या कोई विशेष पर्व होता, राक्षस अचानक आकर उन्हें परेशान करने लगते। उनका उद्देश्य ही ऋषियों की तपस्या और धार्मिक अनुष्ठानों को नष्ट करना था।
ऋषियों ने कहा—
“हे निष्पाप रघुनन्दन! जब अग्निहोत्र का समय आता है और जब पर्व के अवसर पर हम धार्मिक कार्य करते हैं, तब ये अत्यंत शक्तिशाली मांसभोजी राक्षस हमें आ घेरते हैं। हम अपने धार्मिक कार्य भी भयमुक्त होकर नहीं कर पाते।”
उनका दुःख केवल शारीरिक भय का नहीं था। वे चाहते थे कि उनका तप नष्ट न हो, उनका धर्म बाधित न हो और वे शांतिपूर्वक अपने साधना-पथ पर आगे बढ़ सकें।
इसलिए उन्होंने श्रीराम से कहा—
“हम हमेशा ऐसे आश्रय की खोज करते रहते हैं जहाँ हमें इन राक्षसों से भय न हो। रघुनन्दन! अब आप ही हमारे सबसे बड़े आश्रय हैं। हमें विश्वास है कि आपकी शरण में आने के बाद हमें सुरक्षा मिलेगी।”
इसके बाद ऋषियों ने श्रीराम को एक बहुत महत्वपूर्ण बात बताई।
उन्होंने कहा कि वे अपनी तपस्या के बल से इतने शक्तिशाली थे कि चाहें तो स्वयं भी उन राक्षसों का नाश कर सकते थे।
लेकिन वे ऐसा नहीं करना चाहते थे।
क्यों?
क्योंकि उनका जीवन तपस्या के लिए समर्पित था। वर्षों और वर्षों की कठिन साधना से उन्होंने जो तप अर्जित किया था, वे उसे क्रोध और हिंसा में लगाकर नष्ट नहीं करना चाहते थे।
उन्होंने कहा—
“रघुनन्दन! हम अपनी तपस्या के प्रभाव से इन राक्षसों का वध करने में समर्थ हैं। लेकिन हम अपने लंबे समय से अर्जित तप को नष्ट नहीं करना चाहते। तपस्या करना अत्यंत कठिन है और उसमें पहले से ही अनेक विघ्न आते हैं। इसलिए हम अपने तप की शक्ति को क्रोध और संघर्ष में लगाना नहीं चाहते।”
यही कारण था कि राक्षसों द्वारा बार-बार परेशान किए जाने पर भी ऋषि उन्हें शाप नहीं देते थे।
उनके सामने एक ओर अपनी रक्षा का प्रश्न था और दूसरी ओर उनकी तपस्या की रक्षा का।
इसलिए उन्होंने श्रीराम से अंतिम प्रार्थना की—
“हम पर अत्याचार करने वाले इन राक्षसों से हमारी रक्षा कीजिए। हम आपको अपना रक्षक मानते हैं। आप लक्ष्मण सहित हमारी रक्षा करें, क्योंकि अब इस वन में आपके अतिरिक्त हमारा कोई ऐसा आश्रय नहीं है जिस पर हम पूर्ण विश्वास कर सकें।”
ऋषियों की यह करुण पुकार सुनकर श्रीराम का हृदय द्रवित हो गया।
उन्होंने उन तपस्वियों के सामने एक दृढ़ प्रतिज्ञा कर ली—
“मैं आपकी रक्षा करूँगा।”
यह केवल एक साधारण वचन नहीं था। श्रीराम के लिए वचन उनके प्राणों से भी अधिक मूल्यवान था।
उन्होंने सीता से कहा—
“जनकनन्दिनि! जब मैंने इन ऋषियों की बात सुनी, तब मैंने उनकी पूर्ण रक्षा करने की प्रतिज्ञा की। अब मैं अपने जीवन रहते इस प्रतिज्ञा को झूठा नहीं होने दे सकता। सत्य का पालन करना मुझे सदा प्रिय रहा है।”
श्रीराम के शब्द सुनकर उनकी दृढ़ता स्पष्ट हो रही थी।
उन्होंने आगे कहा—
“सीते! मनुष्य अपने प्राणों का त्याग कर सकता है, अपने प्रियजनों से भी अलग हो सकता है, लेकिन अपने दिए हुए वचन को नहीं छोड़ना चाहिए। मैं अपने प्राणों का त्याग कर सकता हूँ, तुम्हारा और लक्ष्मण का भी त्याग कर सकता हूँ, परंतु अपनी प्रतिज्ञा को कभी नहीं तोड़ सकता। विशेषकर जब यह प्रतिज्ञा ब्राह्मणों और ऋषियों की रक्षा के लिए की गई हो।”
यह सुनकर समझ आता है कि श्रीराम के लिए सत्य और वचनपालन केवल शब्द नहीं थे, बल्कि उनके जीवन का आधार थे।
उन्होंने आगे कहा—
“ऋषियों की रक्षा करना अब मेरा आवश्यक कर्तव्य है। वास्तव में, उन्हें मेरे पास आकर अपनी रक्षा माँगने की आवश्यकता ही नहीं होनी चाहिए थी। मुझे स्वयं उनके दुःख को समझकर उनकी रक्षा करनी चाहिए थी। लेकिन अब जब उन्होंने स्वयं आकर अपनी पीड़ा बताई और मैंने उनकी रक्षा का वचन भी दे दिया, तब मैं उनसे मुँह कैसे मोड़ सकता हूँ?”
श्रीराम के मन में सीता के प्रति कोई नाराज़गी नहीं थी। वे जानते थे कि सीता ने जो कुछ कहा था, वह उनके प्रति प्रेम के कारण कहा था।
इसलिए उन्होंने अत्यंत कोमल भाव से सीता से कहा—
“सीते! तुमने स्नेह और मेरे प्रति प्रेम के कारण मुझे यह हितकारी बात समझाई। इससे मैं तुमसे और भी संतुष्ट हूँ। जो व्यक्ति किसी को अपना नहीं मानता, वह उसके हित की बात नहीं करता। तुम्हारे शब्दों में मेरे लिए चिंता और प्रेम है।”
फिर उन्होंने सीता की प्रशंसा करते हुए कहा—
“शोभने! तुम्हारा ऐसा कहना तुम्हारे स्वभाव के बिल्कुल अनुरूप है। यह तुम्हारे कुल की मर्यादा के भी अनुकूल है। तुम मेरी सहधर्मिणी हो और मुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय हो।”
इस प्रकार श्रीराम ने सीता की बात को अस्वीकार नहीं किया, बल्कि उनके प्रेम को समझा और सम्मान दिया। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि एक बार शरण में आए ऋषियों की रक्षा का वचन देने के बाद वे अपने धर्म और सत्य से पीछे नहीं हट सकते।
सीता के प्रति प्रेम और ऋषियों के प्रति कर्तव्य—दोनों को हृदय में धारण किए हुए श्रीराम ने अपना धनुष हाथ में लिया।
लक्ष्मण भी उनके साथ चल पड़े।
तीनों फिर उन सुंदर तपोवनों की ओर आगे बढ़ने लगे। वन शांत था, चारों ओर वृक्षों की हरियाली थी, लेकिन उस शांति के पीछे राक्षसों का भय भी छिपा हुआ था।
श्रीराम के हाथ में धनुष था और मन में एक अटल संकल्प—
ऋषियों की रक्षा करनी है, सत्य की रक्षा करनी है और अपने दिए हुए वचन को किसी भी परिस्थिति में निभाना है।
यही श्रीराम के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता थी—प्रेम में कोमल, धर्म में गंभीर और अपने वचन के प्रति अडिग।
प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. माता सीता ने श्रीराम को क्या समझाया और उनकी बात के पीछे कौन-सी भावना थी?
उत्तर: माता सीता ने श्रीराम को अनावश्यक संघर्ष से बचने की सलाह दी। उनकी बात के पीछे श्रीराम के प्रति गहरा प्रेम, स्नेह और हित की भावना थी।
प्रश्न 2. श्रीराम ने सीता की बात सुनकर उनकी प्रशंसा क्यों की?
उत्तर: श्रीराम ने सीता की प्रशंसा इसलिए की क्योंकि उन्होंने प्रेमपूर्वक उनके हित की बात कही और क्षत्रिय धर्म तथा कुलमर्यादा के अनुरूप उचित उपदेश दिया।
प्रश्न 3. क्षत्रिय धनुष क्यों धारण करते हैं?
उत्तर: क्षत्रिय धनुष इसलिए धारण करते हैं ताकि संकट में पड़े और दुःखी लोगों की रक्षा कर सकें तथा किसी असहाय को सहायता के लिए पुकारना न पड़े।
प्रश्न 4. दण्डकारण्य के ऋषि श्रीराम की शरण में क्यों आए?
उत्तर: दण्डकारण्य के ऋषि क्रूर राक्षसों के अत्याचार से अत्यंत पीड़ित थे। इसलिए उन्होंने श्रीराम को शरणागतवत्सल और अपना रक्षक मानकर उनकी शरण ली।
प्रश्न 5. राक्षस ऋषियों को किस प्रकार कष्ट पहुँचाते थे?
उत्तर: राक्षस ऋषियों की तपस्या में बाधा डालते, अग्निहोत्र और पर्व के अवसरों पर उन्हें परेशान करते तथा कई बार उनका वध करके उन्हें खा जाते थे।
प्रश्न 6. ऋषियों ने अपनी रक्षा के लिए स्वयं राक्षसों का वध क्यों नहीं किया?
उत्तर: ऋषि तपस्या के बल से राक्षसों का वध कर सकते थे, लेकिन वे क्रोध में अपने वर्षों से अर्जित तप को नष्ट नहीं करना चाहते थे।
प्रश्न 7. ऋषियों ने श्रीराम से अपनी रक्षा के लिए क्या प्रार्थना की?
उत्तर: ऋषियों ने श्रीराम से प्रार्थना की कि वे दण्डकारण्य के भयानक राक्षसों से उनकी रक्षा करें और लक्ष्मण सहित उनके परम आश्रय तथा रक्षक बनें।
प्रश्न 8. श्रीराम को ऋषियों की सहायता के लिए स्वयं उनके पास न जा पाने पर लज्जा क्यों हुई?
उत्तर: श्रीराम के अनुसार ब्राह्मणों और तपस्वियों की सेवा करना उनका कर्तव्य था। ऋषियों का स्वयं रक्षा माँगने आना उन्हें अपने लिए लज्जाजनक लगा।
प्रश्न 9. श्रीराम ने ऋषियों की रक्षा करने की प्रतिज्ञा क्यों की?
उत्तर: ऋषियों ने राक्षसों के अत्याचार से पीड़ित होकर श्रीराम से सहायता माँगी। उनकी करुण पुकार सुनकर श्रीराम ने उनकी पूर्ण रक्षा का वचन दिया।
प्रश्न 10. श्रीराम अपनी प्रतिज्ञा को प्राणों से भी अधिक महत्वपूर्ण क्यों मानते थे?
उत्तर: श्रीराम के लिए सत्य और वचनपालन जीवन का आधार था। वे प्राण, सीता और लक्ष्मण का त्याग कर सकते थे, पर अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकते थे।
प्रश्न 11. सीता के प्रति श्रीराम के मन में कौन-सी भावना थी?
उत्तर: श्रीराम सीता के प्रेम और हितचिंता से अत्यंत संतुष्ट थे। वे उन्हें अपनी सहधर्मिणी और प्राणों से भी अधिक प्रिय मानते थे।
प्रश्न 12. श्रीराम ने सीता की सलाह को अस्वीकार करते हुए भी उनसे प्रेमपूर्वक बात क्यों की?
उत्तर: श्रीराम समझते थे कि सीता ने उनके कल्याण और सुरक्षा की चिंता से सलाह दी थी। इसलिए उन्होंने उनकी भावना का सम्मान करते हुए अपना धर्म समझाया।
प्रश्न 13. श्रीराम ने ऋषियों की रक्षा को अपना कर्तव्य क्यों माना?
उत्तर: ऋषि उनकी शरण में आए थे और उन्होंने उनकी रक्षा का वचन दिया था। सत्यप्रिय श्रीराम के लिए शरणागत की रक्षा करना अनिवार्य कर्तव्य था।
प्रश्न 14. श्रीराम ने अंत में क्या किया और उनके साथ कौन था?
उत्तर: सीता से धर्म और कर्तव्य की बात कहने के बाद श्रीराम ने हाथ में धनुष लिया और लक्ष्मण के साथ सुंदर तपोवनों में विचरण करने लगे।