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(11A) ​पञ्चाप्सर सरोवर से अगस्त्य मुनि के दर्शन की अभिलाषा तक

(11A)
पञ्चाप्सर सरोवर से अगस्त्य मुनि के दर्शन की अभिलाषा तक

वनवास के दिनों में श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण निरंतर वन के भीतर यात्रा करते हुए ऋषि-मुनियों के आश्रमों में जाते थे। उनका जीवन अब राजमहलों के सुख-सुविधाओं से बहुत दूर था, लेकिन प्रकृति की गोद में उन्हें एक अलग ही शांति और आनंद प्राप्त होता था।

एक दिन की यात्रा में श्रीराम सबसे आगे चल रहे थे। उनके पीछे परम सुंदरी सीता माता शांत भाव से चल रही थीं और सबसे पीछे हाथ में धनुष धारण किए लक्ष्मण अपने बड़े भाई और भाभी की रक्षा के लिए सावधानीपूर्वक चल रहे थे। तीनों के मन में वनवास की कठिनाइयों का कोई भय नहीं था। श्रीराम के लिए सीता और लक्ष्मण का साथ ही सबसे बड़ा संबल था और लक्ष्मण के लिए श्रीराम की सेवा ही उनके जीवन का उद्देश्य बन चुकी थी।

चलते-चलते उन्हें पर्वतों की ऊँची-नीची चोटियाँ दिखाई देतीं। कहीं घने वन थे, तो कहीं निर्मल जल से बहती हुई सुंदर नदियाँ। प्रकृति का प्रत्येक दृश्य मानो उनका स्वागत कर रहा था। सीता माता उन रमणीय दृश्यों को देखकर मुग्ध हो उठतीं। श्रीराम भी कभी किसी पर्वत की ओर देखते, कभी नदी की ओर और कभी वन में विचरते पशु-पक्षियों को देखकर लक्ष्मण से उनके विषय में चर्चा करते।

नदियों के किनारे कहीं सारस और चक्रवाक पक्षी घूमते दिखाई देते थे। कहीं जल में खिले हुए लाल और सफेद कमल अपनी सुंदरता बिखेर रहे थे। कमलों के बीच जलचर पक्षियों का कलरव वातावरण को और भी मनमोहक बना देता था। ऐसा लगता था मानो वन स्वयं अपने सौंदर्य से सीता माता का मन प्रसन्न करने का प्रयास कर रहा हो।

आगे बढ़ने पर उन्हें अनेक प्रकार के वन्य पशु भी दिखाई दिए। कहीं चितकबरे मृग झुंड बनाकर दौड़ते हुए दिखाई देते, तो कहीं बड़े-बड़े सींगों वाले मदमत्त भैंसे वन में विचरते थे। कहीं विशाल हाथी अपने बड़े दाँतों के साथ पेड़ों के बीच से निकलते दिखाई देते और कहीं जंगली सूअर घूमते हुए नजर आते। वन भले ही कठिन और रहस्यमय था, फिर भी उसके भीतर जीवन की अनगिनत छवियाँ बिखरी हुई थीं।

लंबी यात्रा करते-करते धीरे-धीरे दिन ढलने लगा। सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था। आकाश पर संध्या की लालिमा फैलने लगी थी। तभी तीनों की दृष्टि सामने पड़े एक अत्यंत सुंदर तालाब पर पड़ी। वह इतना विशाल था कि उसकी लंबाई और चौड़ाई लगभग एक-एक योजन के समान प्रतीत होती थी।

उस सरोवर का दृश्य अद्भुत था। जल लाल और श्वेत कमलों से भरा हुआ था। कमलों के बीच हाथियों के झुंड जल में क्रीड़ा कर रहे थे। कहीं सारस थे, कहीं राजहंस और कलहंस अपने मधुर स्वर से वातावरण को गुंजायमान कर रहे थे। जल के भीतर अनेक प्रकार की मछलियाँ और अन्य जलचर जीव भी विचर रहे थे।

लेकिन इस सुंदर दृश्य के बीच एक बात श्रीराम और लक्ष्मण के मन में कौतूहल उत्पन्न करने लगी।

उन्हें सरोवर के भीतर से गाने-बजाने की मधुर ध्वनि सुनाई दे रही थी। वाद्यों की आवाज के साथ जैसे किसी के मधुर गीत की ध्वनि भी मिल रही थी। किंतु चारों ओर दृष्टि दौड़ाने पर कोई मनुष्य दिखाई नहीं देता था।

श्रीराम और लक्ष्मण आश्चर्य से एक-दूसरे की ओर देखने लगे। आखिर इस निर्जन वन में इस सुंदर संगीत का रहस्य क्या था?

उनके साथ धर्मभृत् नामक एक मुनि भी थे। श्रीराम ने विनम्रता और जिज्ञासा के साथ उनसे पूछा, “महामुने! इस अद्भुत संगीत की ध्वनि को सुनकर हमारे मन में बड़ा कौतूहल उत्पन्न हो रहा है। कृपया बताइए कि यह मधुर संगीत कहाँ से आ रहा है और इसके पीछे क्या रहस्य है?”

धर्मभृत् मुनि मुस्कुराए। वे जानते थे कि इस सरोवर के पीछे एक अत्यंत अद्भुत कथा छिपी हुई है। उन्होंने श्रीराम को उस सरोवर का रहस्य बताना आरंभ किया।

उन्होंने कहा कि यह पञ्चाप्सर सरोवर है। इसका जल अत्यंत गहरा और कभी न सूखने वाला है। बहुत समय पहले माण्डकर्णि नामक एक महान् मुनि ने अपने कठोर तप के प्रभाव से इस सरोवर का निर्माण किया था।

माण्डकर्णि मुनि अत्यंत दृढ़ संकल्प वाले तपस्वी थे। उन्होंने एक जलाशय में रहकर केवल वायु को अपना आहार बनाया और दस हजार वर्षों तक घोर तपस्या की। इतनी लंबी और कठोर तपस्या से उनका तेज अत्यंत प्रबल हो गया था।

उनके तप से देवताओं को चिंता होने लगी। उन्हें भय हुआ कि कहीं माण्डकर्णि मुनि अपनी तपस्या के बल पर देवताओं के किसी महत्वपूर्ण स्थान को प्राप्त करने की इच्छा तो नहीं रखते। इस आशंका के कारण देवता भीतर से व्याकुल हो उठे।

उन्होंने मुनि की तपस्या भंग करने का उपाय सोचा। अंततः उन्होंने पाँच श्रेष्ठ अप्सराओं को चुना। वे अप्सराएँ अत्यंत सुंदर थीं और उनकी अंगकांति बिजली की चमक के समान आकर्षक थी। देवताओं ने उन्हें माण्डकर्णि मुनि की तपस्या में विघ्न डालने के लिए भेजा।

उन अप्सराओं ने अपने सौंदर्य और कलाओं के माध्यम से मुनि के मन को अपनी ओर आकर्षित कर लिया। धीरे-धीरे उनकी कठोर तपस्या समाप्त हुई और वे उन पाँचों अप्सराओं के साथ रहने लगे।

वे पाँचों अप्सराएँ ही बाद में मुनि की पत्नियाँ बन गईं। उनके रहने के लिए सरोवर के भीतर एक सुंदर और रहस्यमय भवन बनाया गया था। वह भवन जल के अंदर छिपा हुआ था, इसलिए बाहर से किसी को उसके अस्तित्व का पता नहीं चलता था।

वे सभी वहाँ सुखपूर्वक रहती थीं और माण्डकर्णि मुनि की सेवा करती थीं। मुनि अपनी तपस्या के प्रभाव से युवावस्था को प्राप्त हो चुके थे। सरोवर के भीतर रहने वाली उन अप्सराओं के वाद्ययंत्रों की ध्वनि ही बाहर तक सुनाई देती थी। उनके आभूषणों की झंकार और मधुर गीतों की आवाज जब संगीत के साथ मिलती, तो पूरा सरोवर किसी अदृश्य संगीत-लोक जैसा प्रतीत होता।

अब श्रीराम और लक्ष्मण को उस रहस्यमय संगीत का पूरा रहस्य समझ में आ गया। वे आश्चर्य से उस सरोवर की ओर देखते रहे। श्रीराम ने धर्मभृत् मुनि की बात सुनकर आश्चर्यपूर्वक उस अद्भुत घटना को स्वीकार किया।

यात्रा आगे बढ़ी और कुछ समय बाद श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को एक सुंदर आश्रम दिखाई दिया। चारों ओर कुश बिछे हुए थे और ऋषियों के वल्कल वस्त्र दिखाई दे रहे थे। पूरा आश्रम तपस्या और ब्रह्मतेज से प्रकाशित हो रहा था। वहाँ पहुँचते ही तीनों ने स्वयं को एक शांत, पवित्र और आध्यात्मिक वातावरण में पाया।

श्रीराम ने सीता और लक्ष्मण के साथ उस आश्रम में प्रवेश किया। वहाँ के महर्षियों ने उनका अत्यंत प्रेम और सम्मान के साथ स्वागत किया। राजकुमार होते हुए भी श्रीराम स्वयं को ऋषियों के बीच अत्यंत विनम्र रखते थे। उनके लिए तपस्वियों का सम्मान करना राजसी वैभव से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था।

इसके बाद श्रीराम ने उन सभी तपस्वी मुनियों के आश्रमों में जाना आरंभ किया, जहाँ वे पहले भी रह चुके थे। जिन ऋषियों ने पहले उन्हें प्रेम दिया था, श्रीराम उनके पास दोबारा जाकर उनका स्नेह स्वीकार करते। इस प्रकार उनका जीवन एक आश्रम से दूसरे आश्रम तक चलता रहा।

कहीं वे दस महीने रहे, कहीं एक वर्ष, कहीं चार महीने और कहीं पाँच या छह महीने। कुछ आश्रमों में वे सात या आठ महीने तक ठहरे। कहीं साढ़े आठ महीने रहे, तो कहीं तीन महीने और कहीं ग्यारह महीने तक निवास किया। इस प्रकार अलग-अलग आश्रमों में रहते हुए वे ऋषियों के साथ धर्म, तपस्या और जीवन के विभिन्न विषयों पर समय बिताते रहे।

देखते-देखते ऐसे ही मुनियों के आश्रमों में घूमते और उनके स्नेह का अनुभव करते हुए श्रीराम के वनवास के दस वर्ष बीत गए।

दस वर्षों का समय बीत जाने के बाद श्रीराम फिर से सीता और लक्ष्मण के साथ सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में लौट आए। वहाँ रहने वाले मुनियों ने उनका प्रेमपूर्वक स्वागत किया और उनका सम्मान किया। श्रीराम भी कुछ समय तक वहीं रहने लगे।

एक दिन श्रीराम सुतीक्ष्ण मुनि के पास विनम्रतापूर्वक बैठ गए। उनके मन में कई दिनों से एक इच्छा उठ रही थी। वे इस वन में रहने वाले महान् ऋषि अगस्त्य के दर्शन करना चाहते थे।

श्रीराम ने सुतीक्ष्ण मुनि से कहा कि उन्होंने लोगों से सुना है कि इस विशाल वन में कहीं मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य निवास करते हैं, लेकिन वन की विशालता के कारण उन्हें उनके आश्रम का स्थान ज्ञात नहीं है।

उनकी वाणी में केवल जिज्ञासा नहीं, बल्कि महान् ऋषि के प्रति गहरी श्रद्धा थी। उन्होंने कहा कि वे सीता और लक्ष्मण के साथ अगस्त्य मुनि के दर्शन करना चाहते हैं। उनके मन में यह इच्छा बार-बार उठ रही थी कि वे उस महान् तपस्वी के आश्रम में जाएँ, उन्हें प्रणाम करें और उनकी सेवा प्राप्त करें।

श्रीराम ने अत्यंत विनम्रता से अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए कहा कि वे स्वयं भी मुनिवर अगस्त्य की सेवा करना चाहते हैं।

श्रीराम के मुख से यह बात सुनकर सुतीक्ष्ण मुनि अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्हें आनंद हुआ कि धर्म के साक्षात् स्वरूप श्रीराम के हृदय में महान् ऋषि के दर्शन और सेवा की इतनी गहरी अभिलाषा है।

सुतीक्ष्ण मुनि ने प्रसन्न होकर दशरथनंदन श्रीराम की ओर देखा। अब वे उन्हें अगस्त्य मुनि के आश्रम का मार्ग बताने वाले थे। इस प्रकार पञ्चाप्सर सरोवर के अद्भुत रहस्य से शुरू हुई यह यात्रा एक नए आध्यात्मिक पड़ाव—महर्षि अगस्त्य के दर्शन—की ओर बढ़ने लगी।

 

प्रश्न–उत्तर

प्रश्न 1. वन में यात्रा करते समय श्रीराम, सीता और लक्ष्मण किस क्रम में चल रहे थे?
उत्तर: श्रीराम सबसे आगे चल रहे थे, सीता बीच में थीं और धनुष धारण किए लक्ष्मण उनके पीछे-पीछे चल रहे थे।

प्रश्न 2. यात्रा के दौरान श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने प्रकृति के कौन-कौन से दृश्य देखे?
उत्तर: उन्होंने पर्वतीय शिखर, घने वन, रमणीय नदियाँ, कमलों से भरे सरोवर तथा अनेक प्रकार के पशु-पक्षी देखे।

प्रश्न 3. तीनों यात्रियों ने नदियों और सरोवरों के किनारे कौन-कौन से पक्षी देखे?
उत्तर: उन्होंने नदियों के किनारे सारस और चक्रवाक तथा सरोवरों में सारस, राजहंस और कलहंस जैसे पक्षी देखे।

प्रश्न 4. वन में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को कौन-कौन से वन्य पशु दिखाई दिए?
उत्तर: उन्हें चितकबरे मृग, बड़े सींगों वाले मदमत्त भैंसे, जंगली सूअर और बड़े दाँतों वाले हाथी दिखाई दिए।

प्रश्न 5. सूर्यास्त के समय तीनों को सामने क्या दिखाई दिया?
उत्तर: सूर्यास्त के समय उन्हें सामने एक अत्यंत सुंदर और विशाल तालाब दिखाई दिया, जिसकी लंबाई और चौड़ाई लगभग एक-एक योजन थी।

प्रश्न 6. पञ्चाप्सर सरोवर की सुंदरता का वर्णन कीजिए।
उत्तर: पञ्चाप्सर सरोवर लाल और श्वेत कमलों से भरा था तथा हाथी, सारस, राजहंस, कलहंस और जलचर जीव उसकी शोभा बढ़ाते थे।

प्रश्न 7. पञ्चाप्सर सरोवर के पास श्रीराम और लक्ष्मण को किस बात पर आश्चर्य हुआ?
उत्तर: उन्हें स्वच्छ जल से भरे सरोवर से मधुर संगीत और वाद्यों की ध्वनि सुनाई दी, लेकिन संगीत करने वाला कोई दिखाई नहीं दिया।

प्रश्न 8. श्रीराम ने धर्मभृत् मुनि से क्या जानना चाहा?
उत्तर: श्रीराम ने धर्मभृत् मुनि से सरोवर से सुनाई देने वाले अद्भुत संगीत का रहस्य और उसके कारण के बारे में पूछा।

प्रश्न 9. पञ्चाप्सर सरोवर का निर्माण किसने और किस प्रकार किया था?
उत्तर: माण्डकर्णि मुनि ने अपनी कठोर तपस्या के प्रभाव से पञ्चाप्सर सरोवर का निर्माण किया था, जो सदैव अगाध जल से भरा रहता था।

प्रश्न 10. माण्डकर्णि मुनि ने कितने वर्षों तक कठोर तपस्या की थी?
उत्तर: माण्डकर्णि मुनि ने एक जलाशय में रहकर केवल वायु का आहार करते हुए दस हजार वर्षों तक अत्यंत कठोर तपस्या की थी।

प्रश्न 11. देवता माण्डकर्णि मुनि की तपस्या से क्यों चिंतित हो गए थे?
उत्तर: देवताओं को भय था कि माण्डकर्णि मुनि अपनी कठोर तपस्या के बल पर उनमें से किसी का स्थान प्राप्त करना चाहते हैं।

प्रश्न 12. देवताओं ने माण्डकर्णि मुनि की तपस्या भंग करने के लिए क्या उपाय किया?
उत्तर: देवताओं ने मुनि की तपस्या में विघ्न डालने के लिए पाँच प्रधान अप्सराओं को नियुक्त किया, जिनकी सुंदरता अत्यंत आकर्षक थी।

प्रश्न 13. पाँचों अप्सराओं ने माण्डकर्णि मुनि के साथ क्या किया?
उत्तर: पाँचों अप्सराओं ने अपने सौंदर्य और आकर्षण से मुनि की तपस्या भंग कर दी और बाद में उनकी पत्नियाँ बनकर रहने लगीं।

प्रश्न 14. पाँचों अप्सराएँ कहाँ रहती थीं और उनकी संगीत-ध्वनि बाहर कैसे सुनाई देती थी?
उत्तर: पाँचों अप्सराएँ सरोवर के भीतर बने गुप्त भवन में रहती थीं। उनके वाद्यों, आभूषणों और गीतों की ध्वनि बाहर सुनाई देती थी।

प्रश्न 15. श्रीराम ने माण्डकर्णि मुनि और पाँच अप्सराओं की कथा सुनकर कैसी प्रतिक्रिया दी?
उत्तर: श्रीराम ने धर्मभृत् मुनि की बात सुनकर उस अद्भुत घटना पर आश्चर्य व्यक्त किया और उसे स्वीकार किया।

प्रश्न 16. श्रीराम, सीता और लक्ष्मण जिस आश्रम में पहुँचे, वहाँ का वातावरण कैसा था?
उत्तर: आश्रम कुश और वल्कल वस्त्रों से सुशोभित था तथा ब्रह्मतेज से प्रकाशित होकर अत्यंत शांत, पवित्र और आध्यात्मिक दिखाई देता था।

प्रश्न 17. श्रीराम ने विभिन्न ऋषियों के आश्रमों में कितने समय तक निवास किया?
उत्तर: श्रीराम ने अलग-अलग आश्रमों में तीन महीने से लेकर एक वर्ष या उससे अधिक समय तक रहकर मुनियों का स्नेह प्राप्त किया।

प्रश्न 18. मुनियों के आश्रमों में रहते हुए श्रीराम के वनवास के कितने वर्ष बीत गए?
उत्तर: मुनियों के आश्रमों में रहते, उनसे मिलते और उनके स्नेह का अनुभव करते हुए श्रीराम के वनवास के दस वर्ष बीत गए।

प्रश्न 19. दस वर्ष बाद श्रीराम कहाँ लौटकर आए?
उत्तर: दस वर्ष तक विभिन्न मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम सीता और लक्ष्मण के साथ फिर सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम लौट आए।

प्रश्न 20. श्रीराम ने सुतीक्ष्ण मुनि के सामने अपनी कौन-सी इच्छा प्रकट की?
उत्तर: श्रीराम ने महर्षि अगस्त्य के दर्शन करने, उन्हें प्रणाम करने और स्वयं उनकी सेवा करने की अपनी गहरी इच्छा सुतीक्ष्ण मुनि के सामने प्रकट की।