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महर्षि अगस्त्य के आश्रम की ओर श्रीराम की यात्रा
महर्षि अगस्त्य के भाई के आश्रम में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के पहुँचने के बाद उन्हें उस महान् ऋषि के अद्भुत पराक्रम और तपोबल से जुड़ी एक पुरानी घटना का पता चलता है। अगस्त्य मुनि ने ब्राह्मणों की रक्षा के लिए एक अत्यंत दुष्ट राक्षस का अंत किया था। इस प्रसंग के माध्यम से श्रीराम आगे चलकर अगस्त्य मुनि के महान् आश्रम की ओर बढ़ते हैं।
अगस्त्य मुनि और राक्षसों का अंत
प्राचीन समय में इल्वल नाम का एक अत्यंत मायावी और क्रूर असुर था। उसका भाई वातापि भी राक्षस था। दोनों मिलकर ब्राह्मणों को छलने का भयंकर कार्य करते थे। वे अपनी मायावी शक्तियों से ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलाते और फिर उन्हें हानि पहुँचाने का प्रयास करते थे।
एक बार देवताओं और ब्राह्मणों की प्रार्थना पर महर्षि अगस्त्य ने इस दुष्ट राक्षसों की माया को समाप्त करने का निश्चय किया। वातापि ने शाकरूप धारण कर लिया और उसी रूप में अगस्त्य मुनि के भोजन का भाग बन गया। महर्षि अगस्त्य ने उसे पहचानते हुए भी निर्भय होकर उसका भक्षण कर लिया और अपने तपोबल से उसे पचा लिया।
भोजन और श्राद्ध का कर्म पूरा होने के बाद इल्वल ने परंपरा के अनुसार हाथ में जल लेकर अपने भाई वातापि को बाहर आने के लिए पुकारा। उसे विश्वास था कि उसकी माया के अनुसार वातापि उसके पेट को चीरकर बाहर निकल आएगा।
लेकिन इस बार सब कुछ बदल चुका था।
अगस्त्य मुनि शांत भाव से मुस्कराए। उन्होंने इल्वल से कहा कि जिस राक्षस ने जीव का रूप धारण करके उन्हें धोखा देने का प्रयास किया था, वह उनके द्वारा पचाया जा चुका है। अब वह यमलोक पहुँच चुका है और उसके लिए बाहर निकलना संभव नहीं है।
अपने भाई की मृत्यु का समाचार सुनकर इल्वल अत्यंत क्रोधित हो उठा। उसके भीतर बदले की आग भड़क उठी। वह महर्षि अगस्त्य पर आक्रमण करने के लिए तेजी से दौड़ा। किंतु वह यह भूल गया था कि जिसके सामने वह खड़ा है, वह कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि महान् तपस्वी अगस्त्य हैं।
जैसे ही वह मुनि पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ा, अगस्त्य मुनि ने अपनी अग्नि के समान तेजस्वी दृष्टि से उसकी ओर देखा। उनके तपोबल के सामने इल्वल का सारा पराक्रम समाप्त हो गया और वह उसी क्षण भस्म हो गया।संध्या होते ही श्रीराम ने लक्ष्मण के साथ विधिपूर्वक सायं-संध्योपासना की। इसके बाद वे आश्रम में प्रवेश कर महर्षि अगस्त्य के भाई के चरणों में श्रद्धापूर्वक सिर झुकाकर प्रणाम करने लगे।
मुनि ने भी श्रीराम, सीता और लक्ष्मण का अत्यंत प्रेम और सम्मान से स्वागत किया। वनवासी जीवन की सरलता के अनुरूप उन्हें फल और मूल अर्पित किए गए। श्रीराम ने सीता और लक्ष्मण के साथ वही फल-मूल ग्रहण किए और उस शांत आश्रम में एक रात विश्राम किया।
उस रात वन का वातावरण अत्यंत शांत था। चारों ओर तपस्वियों की पवित्र उपस्थिति, वृक्षों की शीतल छाया और आश्रम की सात्त्विक शांति थी। कठिन वनयात्रा के बीच यह स्थान उन्हें कुछ समय के लिए विश्राम और शांति प्रदान कर रहा था।
अगस्त्य मुनि से मिलने की आज्ञा
प्रातःकाल जब सूर्य की किरणें वन को प्रकाशित करने लगीं, तब श्रीराम ने आगे की यात्रा का निश्चय किया। वे महर्षि अगस्त्य के दर्शन के लिए अत्यंत उत्सुक थे।
उन्होंने अगस्त्य के भाई के सामने विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर कहा कि उन्होंने यहाँ रातभर बड़े सुख से निवास किया है और अब वे उनके बड़े भाई, महान् मुनि अगस्त्य के दर्शन के लिए आगे जाना चाहते हैं। इसलिए वे उनसे आगे बढ़ने की अनुमति माँगते हैं।
मुनि ने प्रसन्न होकर कहा—“बहुत अच्छा, जाइए।”
आशीर्वाद और आज्ञा प्राप्त करके श्रीराम सीता और लक्ष्मण के साथ आगे चल पड़े। वे सुतीक्ष्ण मुनि द्वारा बताए गए मार्ग पर आगे बढ़ते हुए वन की अद्भुत सुंदरता को निहार रहे थे।
वन की अद्भुत शोभा
मार्ग में श्रीराम ने असंख्य प्रकार के वनवृक्ष देखे। कहीं नीवार, कहीं कटहल, साखू, अशोक, तिनिश, चिरिबिल्व, महुआ, बेल और तेंदू के वृक्ष दिखाई दे रहे थे। अनेक वृक्ष रंग-बिरंगे फूलों से लदे हुए थे।
लताएँ उन वृक्षों से लिपटी हुई थीं और ऐसा लगता था मानो प्रकृति ने स्वयं उन वृक्षों को सुंदर आभूषणों से सजा दिया हो।
कहीं हाथियों ने अपनी विशाल सूँड़ों से वृक्षों की डालियाँ तोड़कर उन्हें मसल दिया था। कहीं वृक्षों की शाखाओं पर बैठे वानर वन की शोभा बढ़ा रहे थे। सैकड़ों प्रकार के पक्षी वृक्षों की डालियों पर बैठकर मधुर कलरव कर रहे थे।
श्रीराम इस मनोहारी प्राकृतिक दृश्य को देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। उनके साथ चल रहे लक्ष्मण भी उस सुंदर वन को देखकर प्रसन्न हो रहे थे।
अगस्त्य आश्रम की निकटता का अनुभव
कुछ दूर चलने के बाद श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि इस वन का वातावरण साधारण नहीं लगता। यहाँ के वृक्षों के पत्ते वैसे ही चिकने और सुंदर दिखाई दे रहे हैं, जैसे उन्होंने पहले सुने थे।
वन के पशु और पक्षी भी अत्यंत शांत और निडर दिखाई दे रहे थे। कहीं किसी प्रकार की हिंसा या भय का वातावरण नहीं था।
श्रीराम ने अनुभव किया कि यह निश्चित रूप से किसी महान् तपस्वी के तप का प्रभाव है। उन्हें लगा कि अब महर्षि अगस्त्य का आश्रम अधिक दूर नहीं है।
उनके मन में अगस्त्य मुनि के प्रति श्रद्धा और बढ़ गई।
उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि संसार में जो महर्षि अपने महान् कर्मों के कारण अगस्त्य नाम से प्रसिद्ध हुए हैं, उनका आश्रम अब दिखाई दे रहा है। यह ऐसा पवित्र स्थान है जहाँ आने वाले थके हुए यात्रियों की थकान भी दूर हो जाती है।
तप और यज्ञ से पवित्र हुआ आश्रम
जैसे-जैसे श्रीराम आश्रम के निकट पहुँचे, उन्हें वातावरण में एक विशेष पवित्रता अनुभव होने लगी।
आश्रम के चारों ओर यज्ञ और हवन का धुआँ दिखाई देता था। तपस्वियों के चीर-वस्त्र आश्रम की शोभा बढ़ा रहे थे। हिरणों के झुंड अत्यंत शांत होकर घूम रहे थे। अनेक प्रकार के पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को और भी सुंदर बना रहा था।
यह ऐसा स्थान था जहाँ प्रकृति और तपस्या एक-दूसरे में घुली हुई प्रतीत होती थीं।
श्रीराम ने लक्ष्मण को बताया कि यह केवल एक साधारण वनाश्रम नहीं है। यह उस महर्षि की तपोभूमि है, जिन्होंने अपने तप और पराक्रम से दक्षिण दिशा को राक्षसों के भय से मुक्त किया था।
अगस्त्य मुनि का दक्षिण दिशा पर प्रभाव
श्रीराम ने अगस्त्य मुनि की महानता बताते हुए कहा कि उन्होंने लोककल्याण की भावना से उन राक्षसों का दमन किया, जो मृत्यु के समान भयंकर थे।
महर्षि के दक्षिण दिशा में आने के बाद राक्षस उनसे भयभीत रहने लगे। वे इस क्षेत्र का स्वतंत्र रूप से उपभोग करने तक का साहस नहीं करते थे।
अगस्त्य मुनि के तप और प्रभाव के कारण इस दिशा का वातावरण ही बदल गया था। जहाँ पहले राक्षसों का भय था, वहाँ अब ऋषि-मुनि निर्भय होकर तपस्या कर सकते थे।
जब से अगस्त्य मुनि ने इस दिशा में पदार्पण किया था, तब से यहाँ रहने वाले निशाचर भी शांत और वैररहित हो गए थे।
इसी कारण दक्षिण दिशा को अगस्त्य की दिशा भी कहा जाने लगा। उनके तपोबल ने इस पूरे प्रदेश को मानो एक सुरक्षित आश्रय बना दिया था।
विन्ध्य पर्वत को रोकने वाले अगस्त्य
श्रीराम ने लक्ष्मण को अगस्त्य मुनि की एक और अद्भुत शक्ति के बारे में बताया।
एक समय विन्ध्य पर्वत इतना ऊँचा उठने लगा था कि वह सूर्य के मार्ग में बाधा डालने की स्थिति में पहुँच गया। उसका विस्तार लगातार बढ़ता जा रहा था।
तब महर्षि अगस्त्य ने उसे आदेश दिया कि वह झुक जाए और उनके लौटकर आने तक उसी स्थिति में रहे।
महर्षि की आज्ञा के सामने विन्ध्य पर्वत भी नम्र हो गया। उसने अपना विस्तार रोक दिया और आज तक अगस्त्य के आदेश का पालन करता हुआ उसी प्रकार विनीत बना हुआ है।
यह प्रसंग अगस्त्य मुनि के तपोबल और उनके प्रभाव की महानता को दर्शाता है।
समुद्र को सुखाने वाले महान् तपस्वी
श्रीराम ने आगे बताया कि अगस्त्य मुनि अत्यंत दीर्घायु और महान् महात्मा हैं। उनके असाधारण कर्मों की प्रसिद्धि तीनों लोकों में फैली हुई है।
उनके अनेक महान् कार्यों में समुद्र से संबंधित उनका अद्भुत पराक्रम भी प्रसिद्ध है। उनका जीवन केवल व्यक्तिगत तपस्या तक सीमित नहीं था; उनके कर्मों का उद्देश्य व्यापक लोककल्याण था।
इसी महान् ऋषि का यह सुंदर आश्रम अब उनके सामने था, जहाँ शांत और विनीत हिरण स्वतंत्र रूप से विचरण करते थे।
अगस्त्य मुनि से मिलने की श्रीराम की इच्छा
श्रीराम के हृदय में अगस्त्य मुनि के प्रति अत्यंत श्रद्धा थी। उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि वे ऐसे महात्मा हैं जिन्हें तीनों लोकों के लोग सम्मान देते हैं और जो सदैव सज्जनों के हित में लगे रहते हैं।
श्रीराम को विश्वास था कि जब वे उनके सामने पहुँचेंगे, तो अगस्त्य मुनि उन्हें आशीर्वाद देंगे और उनका कल्याण करेंगे।
वनवास के कठिन जीवन के बीच श्रीराम के मन में एक विशेष इच्छा भी थी। उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि वे महर्षि अगस्त्य की सेवा करना चाहते हैं और वनवास के बचे हुए दिन उनके आश्रम में रहकर बिताना चाहते हैं।
उनके शब्दों में एक ओर महान् ऋषि के प्रति श्रद्धा थी और दूसरी ओर उनके सान्निध्य में रहने की गहरी आध्यात्मिक आकांक्षा।
देवताओं और सिद्धों की पवित्र भूमि
श्रीराम ने बताया कि अगस्त्य का आश्रम इतना पवित्र और प्रभावशाली है कि देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि भी यहाँ आकर उनकी उपासना करते हैं।
यहाँ देवता, यक्ष, नाग और पक्षी भी धर्म की आराधना के लिए निवास करते हैं। आश्रम का वातावरण इतना सात्त्विक था कि यहाँ आने वाला व्यक्ति स्वयं को आध्यात्मिक शांति से घिरा हुआ अनुभव करता था।
कहा जाता था कि अनेक सिद्ध पुरुष, महात्मा और महर्षि इस आश्रम में अपने शरीर का त्याग करके दिव्य शरीर प्राप्त करते हुए सूर्य के समान तेजस्वी विमानों से स्वर्गलोक को गए थे।
यह स्थान केवल तपस्या का केंद्र ही नहीं, बल्कि पुण्य और आध्यात्मिक उन्नति की भूमि भी था।
यहाँ सत्कर्म करने वाले लोगों पर प्रसन्न होकर देवता उन्हें यक्षत्व, अमरत्व और विभिन्न प्रकार के राज्य तक प्रदान करते थे।
श्रीराम का आश्रम में प्रवेश
आखिरकार श्रीराम ने अनुभव किया कि वे अगस्त्य मुनि के आश्रम तक पहुँच चुके हैं।
उन्होंने अपने प्रिय छोटे भाई लक्ष्मण से अत्यंत स्नेहपूर्वक कहा—“सुमित्रानन्दन! अब हम आश्रम पर पहुँच गए हैं। तुम पहले भीतर जाओ और महर्षियों को सूचित करो कि सीता सहित मैं यहाँ आया हूँ।”
यह कहते हुए श्रीराम के मन में महान् तपस्वी अगस्त्य के दर्शन की उत्सुकता और श्रद्धा और भी बढ़ गई।
वन की लंबी यात्रा के बाद अब वे उस महान् ऋषि की तपोभूमि के द्वार पर खड़े थे, जिनके तपोबल ने दक्षिण दिशा को भयमुक्त किया था और जिनकी कीर्ति तीनों लोकों में फैली हुई थी।
इस प्रकार श्रीराम, सीता और लक्ष्मण की यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने की यात्रा नहीं थी; यह उन्हें एक महान् तपस्वी के सान्निध्य तक ले जाने वाली आध्यात्मिक यात्रा भी थी। महर्षि अगस्त्य के आश्रम की पवित्रता, प्रकृति की शांति और उनके अद्भुत तपोबल का वर्णन सुनकर श्रीराम के हृदय में उनके दर्शन की उत्कंठा और श्रद्धा दोनों चरम पर पहुँच गईं।
प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. महर्षि अगस्त्य ने वातापि नामक राक्षस का अंत किस प्रकार किया?
उत्तर: महर्षि अगस्त्य ने वातापि की माया पहचानकर उसे भक्षण किया और अपने तपोबल से पचा लिया, जिससे वह जीवित होकर बाहर नहीं निकल सका।
प्रश्न 2. अपने भाई की मृत्यु जानकर इल्वल ने क्या किया?
उत्तर: अपने भाई वातापि की मृत्यु सुनकर इल्वल क्रोधित हो गया और महर्षि अगस्त्य पर आक्रमण करने के लिए तेजी से उनकी ओर बढ़ा।
प्रश्न 3. महर्षि अगस्त्य ने इल्वल का अंत किस प्रकार किया?
उत्तर: जब इल्वल ने अगस्त्य मुनि पर आक्रमण किया, तब मुनि ने अपनी अग्नि के समान तेजस्वी दृष्टि से उसे दग्ध कर दिया।
प्रश्न 4. श्रीराम ने अगस्त्य के भाई के आश्रम में एक रात कैसे बिताई?
उत्तर: श्रीराम ने संध्या उपासना के बाद आश्रम में प्रवेश किया, मुनि का सम्मान पाया और सीता तथा लक्ष्मण के साथ फल-मूल खाकर रात बिताई।
प्रश्न 5. प्रातःकाल श्रीराम ने अगस्त्य के भाई से क्या अनुमति माँगी?
उत्तर: श्रीराम ने उनके चरणों में प्रणाम करके महर्षि अगस्त्य के दर्शन हेतु आगे जाने की अनुमति माँगी और बताया कि उन्होंने रात सुखपूर्वक बिताई।
प्रश्न 6. अगस्त्य के भाई से आज्ञा मिलने के बाद श्रीराम किस मार्ग से आगे बढ़े?
उत्तर: आज्ञा प्राप्त करने के बाद श्रीराम सीता और लक्ष्मण के साथ सुतीक्ष्ण मुनि द्वारा बताए गए मार्ग से वन की शोभा देखते हुए आगे बढ़े।
प्रश्न 7. अगस्त्य आश्रम की ओर जाते समय श्रीराम ने वन में क्या-क्या देखा?
उत्तर: श्रीराम ने अनेक फूलों से लदे वृक्ष, लताओं, हाथियों द्वारा तोड़ी डालियाँ, वृक्षों पर बैठे वानर और चहकते हुए सैकड़ों पक्षी देखे।
प्रश्न 8. श्रीराम ने वन के शांत वातावरण को देखकर क्या अनुमान लगाया?
उत्तर: शांत पशु-पक्षियों और सुंदर, चिकने पत्तों को देखकर श्रीराम ने अनुमान लगाया कि महर्षि अगस्त्य का आश्रम अब अधिक दूर नहीं है।
प्रश्न 9. महर्षि अगस्त्य के आश्रम की प्राकृतिक और आध्यात्मिक विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर: आश्रम यज्ञ के धुएँ, चीर-वस्त्रों, शांत मृगों और पक्षियों के कलरव से सुशोभित था तथा वहाँ पवित्र और सात्त्विक वातावरण था।
प्रश्न 10. महर्षि अगस्त्य ने दक्षिण दिशा को किस प्रकार राक्षसों के भय से मुक्त किया?
उत्तर: अगस्त्य मुनि ने अपने तपोबल से दक्षिण दिशा में रहने वाले क्रूर राक्षसों का दमन किया, जिससे वे उस क्षेत्र में आने से भयभीत रहने लगे।
प्रश्न 11. दक्षिण दिशा को ‘अगस्त्य की दिशा’ क्यों कहा जाने लगा?
उत्तर: अगस्त्य मुनि के प्रभाव से दक्षिण दिशा राक्षसों के भय से मुक्त और शांत हुई, इसलिए वह तीनों लोकों में अगस्त्य की दिशा कहलाने लगी।
प्रश्न 12. विन्ध्य पर्वत से संबंधित महर्षि अगस्त्य की कौन-सी घटना प्रसिद्ध है?
उत्तर: विन्ध्य पर्वत सूर्य का मार्ग रोकने के लिए ऊँचा हो रहा था। अगस्त्य के कहने पर वह झुक गया और फिर आगे नहीं बढ़ा।
प्रश्न 13. श्रीराम ने महर्षि अगस्त्य की किन महान् विशेषताओं का वर्णन किया?
उत्तर: श्रीराम ने अगस्त्य को दीर्घायु, लोकपूजित, सज्जनों के हितैषी, महान् तपस्वी और तीनों लोकों में प्रसिद्ध असाधारण कर्म करने वाला बताया।
प्रश्न 14. अगस्त्य के आश्रम को सिद्धों और महात्माओं के लिए विशेष क्यों माना जाता था?
उत्तर: अनेक सिद्ध, महात्मा और महर्षि वहाँ शरीर त्यागकर दिव्य शरीर प्राप्त करते हुए तेजस्वी विमानों से स्वर्गलोक को प्राप्त हुए थे।
प्रश्न 15. अगस्त्य मुनि के आश्रम में कौन-कौन उनकी उपासना करते थे?
उत्तर: देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि नियमित आहार करते हुए अगस्त्य मुनि की उपासना करते थे तथा देवता, यक्ष, नाग और पक्षी भी वहाँ रहते थे।
प्रश्न 16. श्रीराम वनवास के शेष दिन कहाँ बिताना चाहते थे और क्यों?
उत्तर: श्रीराम महर्षि अगस्त्य की आराधना करते हुए उनके आश्रम में वनवास के शेष दिन बिताना चाहते थे, क्योंकि वे उनके प्रति अत्यंत श्रद्धावान थे।
प्रश्न 17. अगस्त्य के आश्रम में पापाचारी मनुष्यों के संबंध में क्या कहा गया है?
उत्तर: कहा गया है कि अगस्त्य के प्रभावशाली आश्रम में झूठ बोलने वाला, क्रूर, शठ, नृशंस अथवा पापाचारी मनुष्य जीवित नहीं रह सकता।
प्रश्न 18. श्रीराम ने आश्रम पहुँचकर लक्ष्मण को क्या निर्देश दिया?
उत्तर: आश्रम पहुँचने पर श्रीराम ने लक्ष्मण से पहले प्रवेश करके महर्षियों को सीता सहित अपने आगमन की सूचना देने के लिए कहा।