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(14)
पञ्चवटी की ओर श्रीराम की यात्रा और जटायु से भेंट
दण्डकारण्य के घने और दुर्गम वन से होकर श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण पञ्चवटी की ओर आगे बढ़ रहे थे। चारों ओर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष, लताओं से घिरे वन-पथ और तरह-तरह के वन्य जीव दिखाई दे रहे थे। वन का वातावरण एक ओर शांत और मनोहर था, तो दूसरी ओर राक्षसों के भय के कारण उसमें एक अनजाना संकट भी छिपा हुआ था।
श्रीराम आगे-आगे चल रहे थे, उनके पीछे माता सीता और उनकी रक्षा के लिए लक्ष्मण धनुष-बाण सँभाले हुए चल रहे थे। इसी यात्रा के दौरान उन्हें वन में एक अत्यन्त विशाल पक्षी दिखाई दिया। उसका शरीर इतना बड़ा और प्रभावशाली था कि पहली दृष्टि में श्रीराम और लक्ष्मण को लगा कि कहीं यह कोई शक्तिशाली राक्षस तो नहीं है।
लक्ष्मण के मन में सावधानी जाग उठी। दोनों भाइयों ने उस विशाल पक्षी के समीप जाकर उससे पूछा, “आप कौन हैं? इस निर्जन वन में आपका परिचय क्या है?”
उनके प्रश्न सुनकर उस पक्षी ने अत्यन्त मधुर, कोमल और स्नेहपूर्ण वाणी में उत्तर दिया। उसके स्वर में ऐसी आत्मीयता थी कि श्रीराम और लक्ष्मण का संदेह धीरे-धीरे दूर होने लगा। उसने कहा, “बेटा! मुझे अपने पिता दशरथ का मित्र समझो।”
पिता का नाम सुनते ही श्रीराम के हृदय में उस पक्षी के प्रति आदर उमड़ आया। उन्हें लगा कि यह कोई साधारण पक्षी नहीं, बल्कि उनके पिता का प्रिय मित्र और परिवार का शुभचिन्तक है। श्रीराम ने बड़े विनम्र भाव से उसका सम्मान किया और शांत स्वर में पूछा कि वह किस कुल से है और उसका नाम क्या है।
श्रीराम के इस प्रेमपूर्ण प्रश्न से वह विशाल पक्षी प्रसन्न हुआ। उसने अपने परिचय के साथ-साथ संसार में विभिन्न प्राणियों की उत्पत्ति का विस्तृत इतिहास सुनाना आरम्भ किया।
उसने बताया कि प्राचीन काल में अनेक महान् प्रजापति हुए, जिन्होंने सृष्टि के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सबसे पहले कर्दम प्रजापति हुए। उनके बाद विकृत, शेष, संश्रय और बहुपुत्र जैसे प्रजापति हुए। फिर स्थाणु, मरीचि, अत्रि, क्रतु, पुलस्त्य, अङ्गिरा, प्रचेता अर्थात् वरुण और पुलह हुए। इनके बाद दक्ष, विवस्वान् और अरिष्टनेमि हुए। इन सभी के पश्चात् महातेजस्वी कश्यप प्रजापति हुए, जिन्हें उस वंश-परम्परा का अन्तिम प्रजापति कहा गया।
जटायु श्रीराम को बता रहा था कि प्रजापति दक्ष की अनेक यशस्विनी कन्याएँ थीं। उनमें से आठ कन्याओं को महर्षि कश्यप ने अपनी पत्नियों के रूप में स्वीकार किया। उनके नाम थे—अदिति, दिति, दनु, कालका, ताम्रा, क्रोधवशा, मनु और अनला।
महर्षि कश्यप ने अपनी पत्नियों से प्रसन्न होकर कहा था कि वे ऐसे तेजस्वी और सामर्थ्यवान पुत्रों को जन्म देंगी, जो तीनों लोकों का पालन करने में समर्थ होंगे। इनमें अदिति, दिति, दनु और कालका ने इस इच्छा को मन से स्वीकार किया, जबकि अन्य पत्नियों के मन में उस समय ऐसा कोई विशेष मनोरथ उत्पन्न नहीं हुआ।
अदिति के गर्भ से तैंतीस देवताओं का जन्म हुआ। इनमें बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार शामिल थे। इस प्रकार देवताओं की एक महान् परम्परा अदिति से आगे बढ़ी।
दिति से शक्तिशाली दैत्य उत्पन्न हुए। एक समय वन और समुद्रों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी पर उन्हीं का अधिकार था। दनु ने अश्वग्रीव नामक पुत्र को जन्म दिया, जबकि कालका से नरक और कालक नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए।
इसके बाद जटायु ने ताम्रा की संतानों का वर्णन किया। ताम्रा की पाँच प्रसिद्ध कन्याएँ थीं—क्रौञ्ची, भासी, श्येनी, धृतराष्ट्री और शुकी। इनसे पक्षियों की अनेक जातियों का विस्तार हुआ।
क्रौञ्ची से उल्लू उत्पन्न हुए। भासी से भास नामक पक्षियों की उत्पत्ति हुई। श्येनी से शक्तिशाली बाज और गीध उत्पन्न हुए। धृतराष्ट्री से विभिन्न प्रकार के हंस और कलहंस उत्पन्न हुए। इसी धृतराष्ट्री ने चक्रवाक पक्षियों को भी जन्म दिया था।
ताम्रा की सबसे छोटी पुत्री शुकी की वंश-परम्परा में नता और फिर विनता का जन्म हुआ। आगे चलकर यही विनता महान् गरुड़ और अरुण की माता बनीं।
इसके बाद जटायु ने क्रोधवशा की संतानों का वर्णन किया। क्रोधवशा ने दस कन्याओं को जन्म दिया—मृगी, मृगमन्दा, हरी, भद्रमदा, मातङ्गी, शार्दूली, श्वेता, सुरभी, सुरसा और कद्रू।
मृगी की संतानों से विभिन्न प्रकार के मृग उत्पन्न हुए। मृगमन्दा से ऋक्ष, सृमर और चमर जैसे वन्य प्राणियों की उत्पत्ति हुई। भद्रमदा की पुत्री इरावती हुई, जिसका पुत्र ऐरावत बना—वह महान् गजराज, जिसे देवताओं और समस्त लोकों में अत्यन्त सम्मान प्राप्त था।
हरी की संतानों में सिंह, वानर और गोलांगूल अर्थात् लंगूर बताए गए। शार्दूली ने व्याघ्रों को जन्म दिया। मातङ्गी की संतान हाथी कहलाए। श्वेता ने एक महान् दिग्गज को जन्म दिया, जो दिशाओं की रक्षा करने वाले विशाल हाथियों की परम्परा से जुड़ा था।
सुरभी ने रोहिणी और यशस्विनी गन्धर्वी नामक दो कन्याओं को जन्म दिया। रोहिणी से गौओं की उत्पत्ति हुई और गन्धर्वी से घोड़ों की। सुरसा ने नागों को जन्म दिया और कद्रू ने पन्नगों को।
फिर जटायु ने मनु के विषय में बताया। कश्यप की पत्नी मनु से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चार प्रकार के मनुष्यों की उत्पत्ति मानी गई। परम्परा के अनुसार ब्राह्मण मुख से, क्षत्रिय हृदय से, वैश्य दोनों ऊरुओं से और शूद्र दोनों पैरों से उत्पन्न हुए बताए जाते हैं।
अनला ने पवित्र फल देने वाले विभिन्न वृक्षों को जन्म दिया। इस प्रकार जटायु ने श्रीराम को समझाया कि संसार के असंख्य जीव-जंतु, पक्षी, पशु, नाग, देवता और मनुष्य किस प्रकार अलग-अलग वंश-परम्पराओं से उत्पन्न हुए माने जाते हैं।
अब जटायु के वर्णन का सबसे महत्वपूर्ण भाग सामने आने वाला था।
उसने बताया कि कद्रू ने एक हजार नागों को जन्म दिया, जिन्हें पृथ्वी को धारण करने वाला माना जाता है। दूसरी ओर विनता के दो महान् पुत्र हुए—गरुड़ और अरुण।
अरुण के ही वंश से जटायु और उसके बड़े भाई सम्पाति का जन्म हुआ था।
यह कहते हुए उस विशाल पक्षी ने अत्यन्त आत्मीयता से श्रीराम की ओर देखा और अपना परिचय दिया—
“तात! शत्रुओं का दमन करने वाले रघुवीर! आप मुझे जटायु के नाम से जानें। मैं श्येनी के वंश से उत्पन्न हूँ और आपके पिता महाराज दशरथ का मित्र हूँ।”
अब श्रीराम के हृदय में जटायु के प्रति और भी अधिक स्नेह उत्पन्न हो गया। उन्हें अपने पिता की याद आने लगी। वन की कठिन परिस्थितियों में पिता के एक प्रिय मित्र का इस प्रकार मिलना उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं था।
जटायु ने आगे अत्यन्त प्रेमपूर्वक कहा कि यह वन बहुत ही दुर्गम है। यहाँ भयंकर वन्य जीवों के साथ-साथ राक्षस भी घूमते रहते हैं। इसलिए यदि कभी श्रीराम और लक्ष्मण अपनी पर्णशाला से बाहर जाएँ, तो वह माता सीता की रक्षा करेगा।
जटायु के इन शब्दों में केवल औपचारिकता नहीं थी। उसमें एक वृद्ध, अनुभवी और स्नेही मित्र का अपनापन था। वह मानो श्रीराम से कह रहा था कि “तुम वन में अकेले नहीं हो। तुम्हारे पिता का मित्र तुम्हारे साथ है और तुम्हारी अनुपस्थिति में सीता की रक्षा करना अपना कर्तव्य समझेगा।”
जटायु की यह बात सुनकर श्रीराम अत्यन्त प्रसन्न हुए। उनके मन में उसके प्रति सम्मान और स्नेह और भी बढ़ गया। उन्होंने उस महान् पक्षी का आदर किया और प्रेम से उसे गले लगा लिया। फिर उसके सामने विनम्रतापूर्वक नतमस्तक हुए।
श्रीराम ने जटायु से यह भी पूछा कि उसकी और महाराज दशरथ की मित्रता कैसे हुई थी। जटायु ने उस पुराने सम्बन्ध की बातें उन्हें बार-बार सुनाईं। पिता के प्रिय मित्र से पिता की स्मृतियाँ सुनकर श्रीराम के हृदय में भावनाओं का ज्वार उमड़ आया होगा। वनवास की कठिन परिस्थितियों में अपने पिता से जुड़ी कोई भी स्मृति उनके लिए अत्यन्त मूल्यवान थी।
अब श्रीराम को विश्वास हो गया कि माता सीता की रक्षा के लिए उन्हें एक समर्थ और विश्वसनीय रक्षक मिल गया है।
उन्होंने माता सीता को जटायु के संरक्षण में सौंप दिया। फिर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के साथ-साथ वह अत्यन्त बलशाली पक्षी जटायु भी पञ्चवटी की ओर चल पड़ा।
पञ्चवटी अब उनके जीवन का नया पड़ाव बनने वाली थी। वहाँ श्रीराम को वन की सुंदरता के साथ-साथ राक्षसों के बढ़ते अत्याचार का भी सामना करना था। श्रीराम मुनियों को कष्ट देने वाले राक्षसों को अपना शत्रु मानते थे। उनके हृदय में धर्म की रक्षा और निर्दोष ऋषियों की सुरक्षा का दृढ़ संकल्प था।
उनका क्रोध व्यक्तिगत वैर का नहीं, बल्कि अधर्म के विरुद्ध धर्म की रक्षा का संकल्प था। वे चाहते थे कि जिन राक्षसों ने तपस्वियों और मुनियों को पीड़ित किया है, उनका अंत उसी प्रकार हो जैसे अग्नि के समीप पहुँचने वाले पतंगे स्वयं अग्नि में जलकर समाप्त हो जाते हैं।
इस प्रकार पञ्चवटी की ओर बढ़ती श्रीराम की यात्रा केवल एक स्थान की यात्रा नहीं थी। यह उस महान् प्रसंग की भूमिका थी जिसमें श्रीराम को अपने पिता के प्रिय मित्र जटायु का स्नेह मिला, सृष्टि की वंश-परम्पराओं का ज्ञान प्राप्त हुआ और आगे आने वाले संकटों के बीच माता सीता की रक्षा के लिए एक निष्ठावान सहयोगी भी मिल गया।
जटायु की उपस्थिति से वनवास की उस कठिन यात्रा में श्रीराम को मानो अपने पिता के स्नेह की एक झलक मिल गई थी। और किसी को क्या पता था कि यही महान् पक्षी आगे चलकर श्रीराम के जीवन में अपने अद्वितीय त्याग और निष्ठा से अमर स्थान प्राप्त करने वाला है।
प्रश्न 1. पञ्चवटी जाते समय श्रीराम और लक्ष्मण को वन में कौन मिला?
उत्तर: पञ्चवटी जाते समय श्रीराम और लक्ष्मण को वन में एक विशालकाय और अत्यन्त पराक्रमी पक्षी मिला, जिसका नाम जटायु था।
प्रश्न 2. श्रीराम और लक्ष्मण ने जटायु को पहले राक्षस क्यों समझा?
उत्तर: जटायु का शरीर अत्यन्त विशाल और उसका रूप प्रभावशाली था। इसलिए उसे देखकर श्रीराम और लक्ष्मण ने पहले उसे राक्षस समझ लिया।
प्रश्न 3. जटायु ने श्रीराम को अपना परिचय किस प्रकार दिया?
उत्तर: जटायु ने मधुर और कोमल वाणी में श्रीराम से कहा कि वे उसे अपने पिता दशरथ का मित्र समझें।
प्रश्न 4. जटायु का परिचय जानकर श्रीराम ने उसके साथ कैसा व्यवहार किया?
उत्तर: जटायु को पिता का मित्र जानकर श्रीराम ने उसका आदर किया, विनम्रता से उसका कुल और नाम पूछा तथा सम्मानपूर्वक बातें कीं।
प्रश्न 5. जटायु ने श्रीराम को किनके बारे में विस्तृत जानकारी दी?
उत्तर: जटायु ने श्रीराम को प्रजापतियों, कश्यप की पत्नियों तथा उनसे उत्पन्न देवताओं, मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों और अन्य जीवों की जानकारी दी।
प्रश्न 6. कश्यप प्रजापति की प्रमुख पत्नियों के नाम क्या थे?
उत्तर: कश्यप की प्रमुख पत्नियों के नाम अदिति, दिति, दनु, कालका, ताम्रा, क्रोधवशा, मनु और अनला थे।
प्रश्न 7. अदिति के गर्भ से कितने देवताओं की उत्पत्ति हुई?
उत्तर: अदिति के गर्भ से तैंतीस देवताओं की उत्पत्ति हुई, जिनमें बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार थे।
प्रश्न 8. दिति और दनु से कौन-कौन उत्पन्न हुए?
उत्तर: दिति ने प्रसिद्ध दैत्यों को जन्म दिया, जबकि दनु ने अश्वग्रीव नामक पुत्र को जन्म दिया, जो अत्यन्त शक्तिशाली माना गया।
प्रश्न 9. ताम्रा की पाँच पुत्रियों के नाम क्या थे?
उत्तर: ताम्रा की पाँच प्रसिद्ध पुत्रियाँ क्रौञ्ची, भासी, श्येनी, धृतराष्ट्री और शुकी थीं, जिनसे विभिन्न पक्षी-जातियों का विस्तार हुआ।
प्रश्न 10. श्येनी की संतानों में कौन-कौन से पक्षी उत्पन्न हुए?
उत्तर: श्येनी की संतानों में अत्यन्त तेजस्वी श्येन अर्थात् बाज और गीध उत्पन्न हुए, जिनसे पक्षियों की एक महत्वपूर्ण परम्परा आगे बढ़ी।
प्रश्न 11. धृतराष्ट्री की संतानों में कौन-कौन से पक्षी थे?
उत्तर: धृतराष्ट्री ने विभिन्न प्रकार के हंस और कलहंसों को जन्म दिया तथा उसी वंश से चक्रवाक पक्षियों की भी उत्पत्ति हुई।
प्रश्न 12. क्रोधवशा की कितनी पुत्रियाँ थीं?
उत्तर: क्रोधवशा ने दस पुत्रियों को जन्म दिया था। उनके नाम मृगी, मृगमन्दा, हरी, भद्रमदा, मातङ्गी, शार्दूली, श्वेता, सुरभी, सुरसा और कद्रू थे।
प्रश्न 13. मृगी और मृगमन्दा की संतानों में कौन-कौन से जीव उत्पन्न हुए?
उत्तर: मृगी की संतानें विभिन्न प्रकार के मृग थे, जबकि मृगमन्दा से ऋक्ष, सृमर और चमर जैसे वन्य जीव उत्पन्न हुए।
प्रश्न 14. भद्रमदा की पुत्री इरावती का पुत्र कौन था?
उत्तर: भद्रमदा की पुत्री इरावती थी और उसका पुत्र ऐरावत नामक महान् गजराज था, जिसे समस्त लोकों में सम्मान प्राप्त था।
प्रश्न 15. हरी की संतानों में कौन-कौन शामिल थे?
उत्तर: हरी की संतानों में सिंह, तपस्वी वानर तथा गोलांगूल अर्थात् लंगूर शामिल थे, जिनसे इन जीवों की वंश-परम्परा आगे बढ़ी।
प्रश्न 16. सुरभी की पुत्रियों रोहिणी और गन्धर्वी की संतानों में क्या उत्पन्न हुआ?
उत्तर: रोहिणी ने गौओं को जन्म दिया, जबकि यशस्विनी गन्धर्वी ने घोड़ों को पुत्ररूप में प्रकट किया।
प्रश्न 17. सुरसा और कद्रू की संतानों में क्या अंतर था?
उत्तर: सुरसा ने नागों को जन्म दिया, जबकि कद्रू ने पन्नगों को जन्म दिया। कद्रू से एक हजार नाग उत्पन्न हुए थे।
प्रश्न 18. मनु ने किन जातियों के मनुष्यों को जन्म दिया?
उत्तर: कश्यप की पत्नी मनु से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चार जातियों के मनुष्यों की उत्पत्ति मानी गई है।
प्रश्न 19. विनता के पुत्र कौन थे?
उत्तर: विनता के दो महान् पुत्र गरुड़ और अरुण थे। अरुण से आगे चलकर जटायु और उसके बड़े भाई सम्पाति उत्पन्न हुए।
प्रश्न 20. जटायु ने श्रीराम की सहायता करने का क्या वचन दिया?
उत्तर: जटायु ने वचन दिया कि श्रीराम और लक्ष्मण के बाहर जाने पर वह पर्णशाला में रहकर माता सीता की रक्षा करेगा।
प्रश्न 21. जटायु की बात सुनकर श्रीराम ने उसके प्रति क्या भाव प्रकट किया?
उत्तर: जटायु की बात सुनकर श्रीराम अत्यन्त प्रसन्न हुए, उन्होंने उसे सम्मानपूर्वक गले लगाया और उसके सामने विनम्रतापूर्वक नतमस्तक हुए।
प्रश्न 22. श्रीराम ने जटायु से अपने पिता के विषय में क्या सुना?
उत्तर: श्रीराम ने जटायु के मुख से उसके और महाराज दशरथ के बीच हुई पुरानी मित्रता तथा उनके पारस्परिक सम्बन्धों का प्रसंग सुना।
प्रश्न 23. श्रीराम ने माता सीता की सुरक्षा का दायित्व किसे सौंपा?
उत्तर: पञ्चवटी की ओर जाते समय श्रीराम ने माता सीता की सुरक्षा का दायित्व अपने पिता के मित्र और शक्तिशाली जटायु को सौंपा।
प्रश्न 24. श्रीराम राक्षसों के प्रति किस प्रकार का संकल्प रखते थे?
उत्तर: श्रीराम मुनियों को कष्ट देने वाले राक्षसों को अपना शत्रु मानते थे और धर्म तथा ऋषियों की रक्षा के लिए उनका विनाश करना चाहते थे।
प्रश्न 25. जटायु से भेंट श्रीराम के लिए भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण क्यों थी?
उत्तर: जटायु उनके पिता दशरथ का मित्र था। इसलिए उससे मिलकर श्रीराम को पिता की स्मृतियों और उनके स्नेह का अनुभव हुआ।