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(16) हेमन्त की शीतल सुबह और भरत-स्मरण में डूबे श्रीराम

(16)
हेमन्त की शीतल सुबह और भरत-स्मरण में डूबे श्रीराम

पञ्चवटी के रमणीय वन में रहते हुए महात्मा श्रीराम का शरद् ऋतु का समय धीरे-धीरे बीत गया। वन के वृक्षों, लताओं और सरिताओं ने ऋतु-परिवर्तन का संदेश देना आरम्भ कर दिया। अब प्रिय हेमन्त ऋतु का आगमन हो चुका था। वातावरण में एक विशेष प्रकार की शीतलता उतर आई थी। प्रातःकाल की हवा ठंडी हो गई थी और वनभूमि पर ओस की बूँदें मोतियों की तरह चमकने लगी थीं।

एक दिन प्रातःकाल रघुकुल के आनन्द श्रीराम स्नान करने के लिए अत्यन्त रमणीय गोदावरी नदी के तट की ओर चले। उनके साथ माता सीता और छोटे भाई लक्ष्मण भी थे। लक्ष्मण अत्यन्त विनम्र, सेवाभावी और पराक्रमी थे। हाथ में जल से भरने के लिए घड़ा लिये वे सीता के साथ श्रीराम के पीछे-पीछे चल रहे थे।

चलते हुए लक्ष्मण ने अपने प्रिय बड़े भाई से कहा—

“भैया! हेमन्त ऋतु आ गई है। यह वही ऋतु है जो आपको बहुत प्रिय है। इसके आगमन से मानो पूरा वर्ष ही सुशोभित हो उठा है।”

लक्ष्मण प्रकृति में आए परिवर्तन को बड़ी सूक्ष्मता से देख रहे थे। उन्होंने बताया कि हेमन्त में ठंड और पाले के कारण मनुष्यों का शरीर रूखा होने लगता है। खेतों में रबी की फसलें लहलहाने लगती हैं। नदियों और सरोवरों का जल अत्यन्त ठंडा हो जाता है, इसलिए लोग जल की अपेक्षा अग्नि की गर्मी को अधिक सुखद अनुभव करते हैं।

नए अन्न के आगमन का भी यह समय था। लोग विधिपूर्वक नवसस्येष्टि और आग्रयण जैसे धार्मिक कर्म करते, देवताओं और पितरों को नए अन्न का अर्पण करके उन्हें प्रसन्न करते और फिर स्वयं उस अन्न का सेवन करते। इस प्रकार धार्मिक भावना और प्रकृति का उत्सव एक साथ दिखाई देता था।

हेमन्त ऋतु केवल ठंड लेकर नहीं आई थी। किसानों के लिए यह प्रसन्नता का समय भी था। अधिकांश जनपदों में अन्न की प्राप्ति भरपूर होने लगी थी। गोशालाओं में दूध और अन्य गोरस की भी प्रचुरता थी। दूसरी ओर विजय की इच्छा रखने वाले राजा इस अनुकूल ऋतु में अपनी सेनाओं के साथ युद्ध-यात्राओं पर निकलने लगे थे।

लक्ष्मण ने आकाश और दिशाओं की ओर देखते हुए ऋतु के एक और अद्भुत परिवर्तन का वर्णन किया। सूर्यदेव दक्षिण दिशा की ओर अधिक समय बिताने लगे थे। इसलिए उत्तर दिशा पहले जैसी चमकीली नहीं दिखाई देती थी। लक्ष्मण ने इसकी तुलना ऐसी स्त्री से की, जिसके मस्तक का सिंदूर मिट गया हो और जिसकी शोभा कुछ फीकी पड़ गई हो।

उन्होंने हिमालय की ओर संकेत करते हुए कहा कि हिमालय तो स्वभाव से ही बर्फ का विशाल भण्डार है, लेकिन इस समय सूर्य के दक्षिणायन में चले जाने से उसकी ऊष्मा और भी कम पहुँच रही है। इसलिए पर्वत पर बर्फ का संचय बढ़ता जा रहा है और हिमवान् पर्वत सचमुच अपने नाम को सार्थक कर रहा है।

हेमन्त के दिन अपने भीतर एक विचित्र सुख समेटे हुए थे। दोपहर के समय सूर्य की कोमल किरणें शरीर को सुखद गर्माहट देती थीं। इसीलिए दिन में धूप बहुत प्रिय लगती थी, जबकि छाया और ठंडा जल अब सुख देने के बजाय कष्टदायक प्रतीत होते थे। मानो प्रकृति ने अपनी सारी ऊष्मा सूर्य की किरणों में समेट दी हो।

सुबह की धूप बहुत हल्की होती, लेकिन जैसे-जैसे दिन चढ़ता, सूर्य का स्पर्श सुखद लगने लगता। कुहासा बढ़ गया था, ठंडी हवाएँ चल रही थीं और पाला पड़ने के कारण पेड़ों के पत्ते झड़ने लगे थे। कभी हरे-भरे दिखाई देने वाले वन अब कहीं-कहीं सूने और उदास लगते थे। हिम के स्पर्श से कमल भी मुरझाकर गलने लगे थे।

रातें भी अब लम्बी हो गई थीं। ठंड इतनी बढ़ जाती कि खुले आकाश के नीचे सोना कठिन हो जाता। पौष मास की रातें कुहासे और हिमपात से धूसर दिखाई देतीं। चारों ओर जैसे शीत की एक चादर बिछ जाती।

लक्ष्मण ने चन्द्रमा की ओर देखते हुए कहा कि हेमन्त में मानो चन्द्रमा का सौभाग्य सूर्य के पास चला गया है। चन्द्रमा की किरणें अब उतनी सुखद नहीं लगतीं और उसका मण्डल हिमकणों से ढका हुआ धूमिल दिखाई देता है। वह ऐसा प्रतीत होता है, जैसे किसी के निःश्वास से धुँधला हुआ दर्पण अपनी चमक खो बैठा हो।

पूर्णिमा की रात भी अब पहले जैसी उज्ज्वल नहीं रहती थी। चन्द्रमा की चाँदनी पर ओस की बूँदों और कुहासे की परत-सी छा जाती थी। लक्ष्मण ने इसकी तुलना सीता से करते हुए कहा कि जैसे अधिक धूप के कारण सीता की स्वाभाविक कान्ति कुछ साँवली दिखाई देने लगती है, उसी प्रकार शीत के कारण चन्द्रमा की चाँदनी भी अपनी पूर्व शोभा खो देती है।

ठंडी पछुआ हवा भी अब और अधिक तीव्र हो गई थी। उसका स्वभाव ही शीतल था, ऊपर से उसमें हिमकण घुल गए थे। इसलिए वह दुगुनी ठंड लेकर तेज गति से बह रही थी।

फिर भी प्रकृति की इस कठोरता के बीच उसका सौन्दर्य अद्भुत था। जौ और गेहूँ के खेतों से घिरे वन कुहासे और भाप से ढके हुए दिखाई देते थे। क्रौञ्च और सारस पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण में गूँजता था। सूर्योदय के समय जब सूर्य की हल्की किरणें कुहासे को चीरकर आतीं, तब पूरा वन एक अलौकिक सौन्दर्य से भर उठता।

धान की सुनहरी बालियाँ पककर झुक गई थीं। उनके भीतर भरे हुए दानों का भार उन्हें नीचे की ओर झुका रहा था। वे बालियाँ मानो प्रकृति के हाथों में पकड़े हुए सुनहरे दीपक हों। दूर क्षितिज पर कुहासे में से निकलता हुआ सूर्य भी चन्द्रमा के समान फीका और धुँधला दिखाई देता था।

धरती पर फैली सूर्य की किरणों में हल्का लाल, पीला और श्वेत रंग मिल गया था। प्रातःकाल उनका प्रभाव बहुत कम होता, लेकिन मध्याह्न होते-होते वही धूप शरीर में सुखद गर्माहट भर देती।

ओस से भीगी वनभूमि पर जब नवोदित सूर्य की किरणें पड़तीं, तो घास की बूँदें चमकने लगतीं। ऐसा लगता मानो धरती ने असंख्य छोटे-छोटे रत्न धारण कर लिये हों।

उसी समय लक्ष्मण की दृष्टि एक जंगली हाथी पर पड़ी। वह अत्यन्त प्यासा था। उसने ठंडे जल को पीने की इच्छा से अपनी सूँड़ पानी में डाली, लेकिन जल की असहनीय ठंडक से तुरंत अपनी सूँड़ पीछे खींच ली। प्यास और ठंड के बीच वह विवश दिखाई देता था।

नदी के किनारे बैठे जलचर पक्षियों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। वे पानी के बिल्कुल पास बैठे थे, लेकिन इतनी ठंड में जल में उतरने का साहस नहीं कर रहे थे। लक्ष्मण ने उनकी तुलना उन डरपोक मनुष्यों से की जो युद्धभूमि के सामने पहुँचकर भी उसमें प्रवेश करने से घबरा जाते हैं।

रात में ओस और अन्धकार से ढकी हुई तथा प्रातःकाल कुहासे से घिरी हुई पुष्पहीन वनश्रेणियाँ ऐसी प्रतीत होती थीं, मानो प्रकृति स्वयं गहरी नींद में सो रही हो।

नदियों का जल भी भाप और कुहासे से ढक गया था। पानी में विचरने वाले सारस दिखाई नहीं देते थे; केवल उनके मधुर स्वर सुनाई देते थे। नदी की पहचान भी उसके जल से कम और ओस से भीगी हुई बालू के तट से अधिक होती थी।

पर्वतों पर ठंड इतनी अधिक थी कि वहाँ जमा हुआ जल भी अत्यन्त शीतल होकर एक अलग ही स्वाद वाला प्रतीत होता। दूसरी ओर पाले से पुराने कमल नष्ट हो चुके थे। उनके फूल और पत्तियाँ गल गई थीं और केवल डंठल शेष रह गए थे। कभी जिन कमलों से जलाशय की शोभा बढ़ती थी, वे अब प्रकृति की कठोरता के सामने अपनी सारी सुन्दरता खो चुके थे।

लेकिन प्रकृति का वर्णन करते-करते लक्ष्मण का मन अचानक अपने भाई भरत की ओर चला गया।

उनकी वाणी में अचानक गहरा स्नेह और करुणा उतर आई।

उन्होंने कहा—

“पुरुषसिंह श्रीराम! इस समय धर्मात्मा भरत आपके वियोग में अत्यन्त दुःखी होंगे। वे नगर में रहते हुए भी तपस्वी का जीवन जी रहे होंगे।”

श्रीराम चुपचाप सुनते रहे।

लक्ष्मण ने आगे कहा कि भरत ने राज्य, सम्मान और असंख्य राजसी सुखों का त्याग कर दिया है। वे तपस्या में लगे रहते हैं, नियमित और अल्प भोजन करते हैं तथा इस ठंडी धरती पर बिना किसी सुखद बिछौने के सोते हैं।

लक्ष्मण के मन में भरत का चित्र स्पष्ट हो उठा।

“भैया! निश्चय ही भरत भी इसी समय स्नान करने के लिए अपने मन्त्रियों और प्रजाजनों के साथ प्रतिदिन सरयू के तट पर जाते होंगे। इतने सुखों में पले हुए कोमल स्वभाव के भरत इस भयंकर ठंड को कैसे सहते होंगे? रात के अंतिम पहर में जब सरयू का जल बर्फ के समान ठंडा होता होगा, तब वे उसमें कैसे डुबकी लगाते होंगे?”

लक्ष्मण की आँखों में अपने भाई भरत के प्रति प्रेम उमड़ आया।

उन्होंने भरत के स्वरूप और गुणों का स्मरण करते हुए कहा कि उनके नेत्र कमल के समान सुन्दर हैं, शरीर श्याम वर्ण का है और वे अत्यन्त धर्मज्ञ, सत्यवादी, लज्जाशील, जितेन्द्रिय, मधुरभाषी और कोमल हृदय वाले हैं। ऐसे महाबली भरत ने सभी प्रकार के राजसी सुखों को त्यागकर केवल श्रीराम का आश्रय स्वीकार किया है।

लक्ष्मण के हृदय में भरत के लिए इतना सम्मान था कि वे भावविभोर होकर बोले—

“भैया! भरत ने तो मानो स्वर्ग पर भी विजय प्राप्त कर ली है। वे आपके वनवासी जीवन का अनुसरण करते हुए स्वयं भी तपस्या में स्थित हैं।”

फिर लक्ष्मण ने भरत के चरित्र की महानता का वर्णन किया। संसार में प्रायः यह कहा जाता है कि संतान अपने पिता से अधिक माता के गुणों का अनुसरण करती है। लेकिन भरत ने अपने आचरण से इस लोक-उक्ति को ही गलत सिद्ध कर दिया है।

फिर उनके मन में कैकेयी का प्रसंग आया। भावावेश में उन्होंने कहा—

“जब महाराज दशरथ जैसे महान् पुरुष उनके पति हैं और भरत जैसे साधु उनके पुत्र हैं, तो माता कैकेयी इतनी कठोर कैसे हो गईं?”

यह सुनते ही श्रीराम का हृदय बदल गया।

भरत के प्रति लक्ष्मण का प्रेम उन्हें अच्छा लगा, लेकिन उन्हें अपनी माता कैकेयी की निन्दा सुनना बिल्कुल सहन नहीं हुआ।

श्रीराम ने अत्यन्त शांत किन्तु दृढ़ स्वर में लक्ष्मण से कहा—

“तात! तुम्हें मेरी मझली माता कैकेयी की कभी निन्दा नहीं करनी चाहिए। यदि तुम कुछ कहना चाहते हो, तो पहले की तरह भरत की ही चर्चा करो।”

राम के स्वर में अपनी माता के प्रति सम्मान और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा थी। वे किसी भी परिस्थिति में माता कैकेयी के प्रति कटु वचन सुनना नहीं चाहते थे।

लेकिन भरत का नाम सुनते ही श्रीराम का अपना हृदय भी भर आया।

उन्होंने कहा—

“लक्ष्मण! मैंने वनवास में रहने का दृढ़ निश्चय कर लिया है। मेरा मन इस व्रत से विचलित नहीं होता। फिर भी भरत के प्रेम की याद आते ही मेरा हृदय व्याकुल हो उठता है।”

अब श्रीराम की आँखों के सामने भरत का चेहरा मानो सजीव हो उठा।

उन्हें भरत की मधुर वाणी याद आने लगी—उनके वे प्रेम से भरे शब्द, जिनमें भाई के लिए असीम श्रद्धा और अपनापन था। उन स्मृतियों ने श्रीराम के कठोर वनवासी जीवन के भीतर छिपे भाई के कोमल हृदय को स्पर्श कर दिया।

श्रीराम ने भावुक होकर लक्ष्मण से कहा—

“रघुकुलनन्दन! पता नहीं वह दिन कब आएगा, जब मैं तुम्हारे साथ चलकर अपने प्रिय भरत और वीर शत्रुघ्न से फिर मिल सकूँगा।”

इतना कहते-कहते श्रीराम का हृदय भर आया। वन में रहने का उनका संकल्प अटल था, लेकिन भाई के प्रेम के सामने स्मृतियाँ उन्हें भीतर तक स्पर्श कर रही थीं।

इस प्रकार भरत को याद करते हुए श्रीराम कुछ समय तक भाव-विह्वल रहे। फिर वे सीता और लक्ष्मण के साथ गोदावरी नदी के तट पर पहुँचे।

तीनों ने नदी में स्नान किया। शीतल गोदावरी का जल हेमन्त की ठंड को और अधिक तीव्र कर रहा था, फिर भी श्रीराम ने विधिपूर्वक स्नान किया। स्नान के पश्चात उन्होंने गोदावरी के पवित्र जल से देवताओं और पितरों का तर्पण किया।

सूर्य धीरे-धीरे क्षितिज से ऊपर उठ चुका था। प्रातःकाल की लालिमा अब फैलने लगी थी। श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने सूर्यदेव का उपस्थान किया और अन्य देवताओं की भी श्रद्धापूर्वक स्तुति की।

उस क्षण गोदावरी का तट अत्यन्त दिव्य दिखाई दे रहा था। एक ओर हेमन्त की ठंडी हवा थी, कुहासे से ढकी प्रकृति थी और ओस से भीगी वनभूमि थी; दूसरी ओर सूर्य की कोमल किरणें धीरे-धीरे धरती को गर्म कर रही थीं।

सीता और लक्ष्मण के साथ स्नान करके श्रीराम की शोभा अद्भुत लग रही थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो हिमालय की पुत्री माता उमा और नन्दी के साथ गंगाजी में स्नान करने के बाद भगवान रुद्र जिस प्रकार दिव्य और मनोहर दिखाई देते हैं, उसी प्रकार सीता और लक्ष्मण के साथ श्रीराम भी उस पवित्र गोदावरी तट पर अलौकिक तेज से प्रकाशित हो रहे हों।

हेमन्त की वह सुबह केवल ऋतु का वर्णन नहीं थी। उसमें प्रकृति की शीतलता, वनजीवन की सरलता, भाइयों का निर्मल प्रेम, माता के प्रति सम्मान, त्याग और धर्मनिष्ठा—सब कुछ एक साथ समाया हुआ था। और उस ठंडी सुबह में सबसे अधिक गर्माहट यदि किसी चीज़ से थी, तो वह थी श्रीराम और भरत के बीच का निष्कलंक भाई-प्रेम।


 

प्रश्न–उत्तर

प्रश्न 1. श्रीराम पञ्चवटी में किस ऋतु के आगमन का अनुभव कर रहे थे?
उत्तर: श्रीराम पञ्चवटी में शरद् ऋतु के बीतने के बाद प्रिय हेमन्त ऋतु के आगमन का अनुभव कर रहे थे।

प्रश्न 2. श्रीराम स्नान करने के लिए कहाँ गए?
उत्तर: श्रीराम प्रातःकाल स्नान करने के लिए अत्यन्त रमणीय और पवित्र गोदावरी नदी के तट पर गए।

प्रश्न 3. श्रीराम के साथ गोदावरी तट पर कौन-कौन गए?
उत्तर: श्रीराम के साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण और माता सीता भी हाथ में घड़ा लेकर गोदावरी नदी के तट पर गए।

प्रश्न 4. हेमन्त ऋतु में पृथ्वी और जल की क्या स्थिति हो जाती है?
उत्तर: हेमन्त ऋतु में ठंड और पाले से शरीर रूखा हो जाता है, रबी की फसलें लहलहाती हैं और जल अत्यन्त शीतल हो जाता है।

प्रश्न 5. हेमन्त ऋतु में लोग अग्नि को अधिक प्रिय क्यों मानते हैं?
उत्तर: हेमन्त ऋतु में अत्यधिक ठंड पड़ने के कारण शरीर को गर्माहट चाहिए होती है, इसलिए लोगों को अग्नि अत्यन्त प्रिय लगती है।

प्रश्न 6. हेमन्त ऋतु किसानों के लिए प्रसन्नता का समय क्यों होती है?
उत्तर: हेमन्त ऋतु में खेतों में रबी की फसलें लहलहाती हैं और अधिकांश जनपदों में लोगों की अन्नप्राप्ति की कामनाएँ प्रचुर मात्रा में पूर्ण होती हैं।

प्रश्न 7. हेमन्त ऋतु में राजाओं की क्या गतिविधि रहती थी?
उत्तर: हेमन्त ऋतु में विजय की इच्छा रखने वाले राजा अनुकूल मौसम का लाभ उठाकर अपनी सेनाओं के साथ युद्ध-यात्रा पर निकलते थे।

प्रश्न 8. हेमन्त ऋतु में हिमालय की स्थिति कैसी हो जाती है?
उत्तर: दक्षिणायन के कारण सूर्य हिमालय से दूर हो जाता है, जिससे वहाँ बर्फ का संचय बढ़ता है और हिमालय अपने नाम को सार्थक करता है।

प्रश्न 9. हेमन्त ऋतु में सूर्य की किरणों और छाया में क्या अंतर होता है?
उत्तर: हेमन्त में मध्याह्न की सूर्य-किरणें सुखद और सेवन योग्य लगती हैं, जबकि छाया तथा ठंडा जल अत्यधिक शीतल होने से अप्रिय लगते हैं।

प्रश्न 10. हेमन्त ऋतु में वन की स्थिति कैसी दिखाई देती है?
उत्तर: पाला पड़ने से पत्ते झड़ जाते हैं, कुहासा छा जाता है और हिम के स्पर्श से कमल मुरझाने लगते हैं, जिससे वन सूने दिखाई देते हैं।

प्रश्न 11. हेमन्त ऋतु की रातों की क्या विशेषता बताई गई है?
उत्तर: हेमन्त ऋतु में रातें लम्बी और अत्यधिक ठंडी हो जाती हैं तथा पौष मास की रातें हिमपात और कुहासे से धूसर दिखाई देती हैं।

प्रश्न 12. हेमन्त ऋतु में चन्द्रमा की शोभा क्यों कम हो जाती है?
उत्तर: हिमकणों से ढका चन्द्रमण्डल धूमिल दिखाई देता है और अत्यधिक ठंड के कारण चन्द्रमा पहले जैसी उज्ज्वल और आकर्षक शोभा नहीं देता।

प्रश्न 13. हेमन्त ऋतु में पछुआ हवा कैसी हो जाती है?
उत्तर: हिमकणों से युक्त होने के कारण स्वभावतः शीतल पछुआ हवा हेमन्त में अत्यधिक ठंडी और तीव्र गति से बहती है।

प्रश्न 14. हेमन्त ऋतु में धान की बालियों की क्या विशेषता थी?
उत्तर: सुनहरे रंग के पके हुए धान की बालियाँ चावल के दानों से भरकर भार के कारण झुक गई थीं और अत्यन्त सुन्दर दिखाई देती थीं।

प्रश्न 15. हेमन्त ऋतु में जंगली हाथी की क्या स्थिति थी?
उत्तर: प्यासा जंगली हाथी ठंडा जल पीना चाहता था, लेकिन जल की असहनीय ठंडक के कारण अपनी सूँड़ तुरंत पीछे खींच लेता था।

प्रश्न 16. जलचर पक्षी पानी में क्यों नहीं उतर रहे थे?
उत्तर: अत्यधिक ठंड के कारण जलचर पक्षी नदी के किनारे बैठे रहते थे और पानी में उतरने से उसी प्रकार बचते थे जैसे डरपोक लोग युद्ध से बचते हैं।

प्रश्न 17. हेमन्त ऋतु में नदियों की स्थिति कैसी थी?
उत्तर: नदियों का जल भाप और कुहासे से ढका रहता था तथा सारस पक्षी दिखाई न देकर केवल अपने मधुर कलरव से पहचाने जाते थे।

प्रश्न 18. हेमन्त ऋतु में कमलों की क्या दशा हो गई थी?
उत्तर: पाले के कारण पुराने कमल गल गए थे और उनकी पंखुड़ियाँ तथा केसर नष्ट हो चुके थे; केवल उनके डंठल शेष रह गए थे।

प्रश्न 19. भरत वनवास के समय किस प्रकार का जीवन जी रहे थे?
उत्तर: भरत ने राज्य और राजसी सुखों का त्याग कर तपस्वी जीवन अपनाया, नियमित आहार किया और ठंडी धरती पर बिना बिस्तर के सोते थे।

प्रश्न 20. भरत प्रतिदिन स्नान करने कहाँ जाते होंगे?
उत्तर: लक्ष्मण के अनुसार भरत मन्त्रियों और प्रजाजनों के साथ प्रतिदिन स्नान करने के लिए सरयू नदी के तट पर जाते होंगे।

प्रश्न 21. लक्ष्मण को भरत के प्रति इतनी करुणा क्यों हुई?
उत्तर: लक्ष्मण जानते थे कि सुखों में पले भरत श्रीराम के वियोग में कठोर तपस्या कर रहे हैं और ठंडे सरयू जल में स्नान करते हैं।

प्रश्न 22. भरत के प्रमुख गुण कौन-कौन से बताए गए हैं?
उत्तर: भरत धर्मज्ञ, सत्यवादी, लज्जाशील, जितेन्द्रिय, मधुरभाषी, मृदुल स्वभाव वाले, पराक्रमी और श्रीराम के प्रति अत्यन्त भक्तिभाव रखने वाले थे।

प्रश्न 23. भरत ने कौन-कौन से सुख त्याग दिए थे?
उत्तर: भरत ने राज्य, सम्मान और अनेक प्रकार के राजसी भोगों का त्याग करके तपस्या और श्रीराम की सेवा के भाव को अपनाया था।

प्रश्न 24. लक्ष्मण ने कैकेयी के विषय में क्या कहा?
उत्तर: लक्ष्मण ने आश्चर्य व्यक्त किया कि दशरथ जैसी महान् व्यक्ति की पत्नी और भरत जैसे साधु की माता कैकेयी इतनी कठोर कैसे हो गईं।

प्रश्न 25. श्रीराम ने कैकेयी की निन्दा सुनकर लक्ष्मण से क्या कहा?
उत्तर: श्रीराम ने लक्ष्मण को कैकेयी की निन्दा करने से रोका और कहा कि यदि कुछ कहना हो तो भरत के गुणों की चर्चा करें।

प्रश्न 26. भरत की स्मृति से श्रीराम का मन क्यों व्याकुल हो उठता था?
उत्तर: वनवास का दृढ़ संकल्प होने पर भी भरत के प्रेम, मधुर वचनों और आत्मीय स्मृतियों को याद करके श्रीराम का हृदय भावुक हो उठता था।

प्रश्न 27. श्रीराम ने भरत और शत्रुघ्न से मिलने की इच्छा कैसे व्यक्त की?
उत्तर: श्रीराम ने भावुक होकर कहा कि वे उस दिन की प्रतीक्षा कर रहे हैं जब लक्ष्मण के साथ भरत और शत्रुघ्न से फिर मिल सकेंगे।

प्रश्न 28. गोदावरी में स्नान करने के बाद श्रीराम ने कौन-से धार्मिक कार्य किए?
उत्तर: स्नान के बाद श्रीराम ने गोदावरी के जल से देवताओं और पितरों का तर्पण किया तथा सूर्यदेव और अन्य देवताओं की स्तुति की।

प्रश्न 29. गोदावरी तट पर श्रीराम की शोभा की तुलना किससे की गई है?
उत्तर: सीता और लक्ष्मण के साथ स्नान करते श्रीराम की तुलना उमा और नन्दी के साथ गंगाजी में स्नान करते भगवान रुद्र से की गई है।

प्रश्न 30. इस प्रसंग का सबसे भावपूर्ण पक्ष क्या है?
उत्तर: इस प्रसंग का सबसे भावपूर्ण पक्ष श्रीराम और भरत का निष्कलंक भाई-प्रेम है, जिसमें त्याग, सम्मान, करुणा और एक-दूसरे के प्रति गहरा स्नेह दिखाई देता है।