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🌿 पंचवटी में शूर्पणखा का आगमन — श्रीराम और राक्षसी का संवाद
गोदावरी नदी का तट उस समय अत्यन्त शांत और मनोहर था। स्नान करके श्रीराम, लक्ष्मण और सीता अपने आश्रम की ओर लौट आए। वन की शीतल हवा, पक्षियों का मधुर कलरव और नदी की निर्मल धारा उस वनवास के जीवन को एक अद्भुत शांति प्रदान कर रहे थे।
आश्रम में लौटकर श्रीराम और लक्ष्मण ने पूर्वाह्न के समय किए जाने वाले होम, पूजन और अन्य धार्मिक कार्य विधिपूर्वक पूर्ण किए। इसके बाद दोनों भाई पर्णशाला में आकर बैठ गए। सीता भी उनके साथ थीं। वन का जीवन भले ही राजमहल से दूर था, लेकिन उन तीनों के लिए वह स्थान प्रेम, संतोष और आत्मीयता से भरा हुआ था।
कुछ समय बाद बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी वहाँ आते और श्रीराम का आदर-सत्कार करते। सीता के साथ पर्णशाला में बैठे श्रीराम ऐसे शोभायमान हो रहे थे, मानो आकाश में चित्रा के साथ चन्द्रमा विराजमान हों। श्रीराम और लक्ष्मण आपस में विभिन्न विषयों पर बातचीत कर रहे थे। वातावरण में अपनापन और शांति थी।
लेकिन उसी शांत वातावरण में अचानक एक विचित्र घटना घटने वाली थी।
एक राक्षसी वहाँ आ पहुँची।
वह कोई साधारण राक्षसी नहीं थी। वह लंकाधिपति रावण की बहन शूर्पणखा थी। उसकी दृष्टि अचानक श्रीराम पर पड़ी और वह कुछ क्षणों के लिए उन्हें देखती ही रह गई।
श्रीराम का व्यक्तित्व असाधारण था। उनका मुख तेज से दमक रहा था। उनकी विशाल भुजाएँ बल और पराक्रम की प्रतीक थीं। उनके बड़े-बड़े नेत्र खिले हुए कमल के समान सुंदर थे। उनकी चाल गंभीर और शांत थी, मानो कोई विशाल हाथी सहज गति से आगे बढ़ रहा हो। सिर पर जटाओं का मुकुट उनके तपस्वी रूप को और भी प्रभावशाली बना रहा था।
वे अत्यन्त कोमल और सुंदर दिखाई देते थे, लेकिन उसी के साथ उनके शरीर से अपार शक्ति और वीरता भी प्रकट होती थी। उनका वर्ण नील कमल के समान श्यामल और आकर्षक था। राजकुमार के योग्य तेज उनके व्यक्तित्व में स्पष्ट दिखाई देता था। उनका सौन्दर्य ऐसा था कि कामदेव भी उसके सामने फीके पड़ जाएँ और उनका तेज इन्द्र के समान प्रभावशाली प्रतीत होता था।
शूर्पणखा की दृष्टि जैसे ही श्रीराम पर पड़ी, वह उनके रूप से मोहित हो गई। उसके मन में अचानक तीव्र आकर्षण उत्पन्न हुआ और वह अपने वास्तविक राक्षसी रूप को बदलकर मनोहर रूप धारण करके श्रीराम के पास पहुँची।
वाल्मीकि द्वारा वर्णित इस प्रसंग में श्रीराम और शूर्पणखा के रूपों का अत्यन्त तीखा विरोध दिखाई देता है। श्रीराम का चेहरा सुंदर, शांत और आकर्षक था, जबकि शूर्पणखा का वास्तविक रूप विकराल और कुरूप बताया गया है। श्रीराम का शरीर सुडौल था, जबकि उसका शरीर बेडौल था। श्रीराम के नेत्र विशाल और मनोहर थे, जबकि उसके नेत्र डरावने थे। श्रीराम के केश सुंदर और व्यवस्थित थे, जबकि उसके बाल ताँबे के समान लाल और भयावह थे।
श्रीराम की वाणी मधुर थी, लेकिन शूर्पणखा का स्वर भयंकर था। श्रीराम सदैव सौम्य, युवा, सरल और उदार दिखाई देते थे, जबकि शूर्पणखा क्रूर, कुटिल और दुराचारिणी स्वभाव की थी।
इस प्रकार उसका बाहरी रूप ही नहीं, बल्कि उसके स्वभाव और श्रीराम के चरित्र के बीच भी गहरा विरोध दिखाया गया है।
शूर्पणखा अब अपने आकर्षण और इच्छा से इतनी अभिभूत थी कि वह सीधे श्रीराम के पास चली आई।
उसने श्रीराम को देखा—एक ओर उनके सिर पर तपस्वी की जटाएँ थीं, दूसरी ओर हाथ में धनुष-बाण थे और उनके साथ उनकी पत्नी सीता थीं। शूर्पणखा के मन में यह प्रश्न उठा कि आखिर ऐसा राजसी तेज वाला पुरुष इस राक्षसों से भरे वन में तपस्वी के वेश में क्यों रह रहा है?
उसने श्रीराम से पूछा,
“तुम तपस्वी के समान जटाएँ धारण किए हुए हो, तुम्हारे साथ एक स्त्री है और हाथ में धनुष-बाण हैं। फिर इस राक्षसों के प्रदेश में कैसे आ गए? यहाँ आने का तुम्हारा उद्देश्य क्या है? मुझे सब कुछ स्पष्ट बताओ।”
श्रीराम ने उसके प्रश्न को शांत भाव से सुना। वे स्वभाव से सरल थे और किसी से अनावश्यक कठोरता से बात नहीं करते थे। इसलिए उन्होंने बिना किसी संदेह के अपने विषय में बताना आरम्भ किया।
उन्होंने कहा,
“देवि, दशरथ नाम के एक महान् और पराक्रमी राजा थे। मैं उन्हीं का ज्येष्ठ पुत्र हूँ और संसार मुझे राम के नाम से जानता है।”
फिर श्रीराम ने अपने पास बैठे लक्ष्मण की ओर संकेत किया।
“ये मेरे छोटे भाई लक्ष्मण हैं। ये सदैव मेरी आज्ञा का पालन करते हैं।”
इसके बाद उन्होंने सीता की ओर देखकर अत्यन्त सम्मानपूर्वक कहा,
“और ये मेरी पत्नी सीता हैं। ये विदेहराज जनक की पुत्री हैं।”
श्रीराम ने आगे अपने वनवास का कारण भी बताया। उन्होंने कहा कि अपने पिता महाराज दशरथ और माता कैकेयी की आज्ञा का पालन करने तथा धर्म की रक्षा के लिए वे वन में निवास कर रहे हैं।
उनकी वाणी में न शिकायत थी, न क्रोध और न ही वनवास के प्रति कोई दुःख। वे अपने कर्तव्य को सहज भाव से स्वीकार कर चुके थे।
इसके बाद श्रीराम ने शूर्पणखा से कहा,
“अब मैं भी तुम्हारे विषय में जानना चाहता हूँ। तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? तुम्हारा नाम क्या है? तुम्हारा पति कौन है? तुम्हारे अंगों की बनावट देखकर लगता है कि तुम कोई ऐसी राक्षसी हो जो अपनी इच्छा के अनुसार रूप बदल सकती है। तुम इस वन में किस उद्देश्य से आई हो? मुझे सब कुछ बताओ।”
श्रीराम के इन सरल प्रश्नों को सुनकर शूर्पणखा ने अपना परिचय देना शुरू किया।
उसने कहा,
“राम! मैं तुम्हें सब कुछ बताती हूँ। मेरा नाम शूर्पणखा है। मैं ऐसी राक्षसी हूँ जो अपनी इच्छा के अनुसार अपना रूप बदल सकती है।”
उसकी आवाज में अब अपने सामर्थ्य का गर्व था।
“मैं इस वन में अकेली घूमती हूँ और मेरे कारण प्राणियों के मन में भय उत्पन्न होता है। मेरा भाई रावण है। सम्भव है तुमने उसका नाम पहले सुना हो।”
फिर वह अपने परिवार के बारे में बताने लगी।
“रावण महान् ऋषि विश्रवा का वीर पुत्र है। मेरा दूसरा भाई महाबली कुम्भकर्ण है, जिसकी निद्रा बहुत लंबी होती है। मेरा एक और भाई विभीषण है, लेकिन वह धर्मात्मा है। वह राक्षसों के दुष्ट आचार-विचार का पालन नहीं करता। खर और दूषण भी मेरे भाई हैं, जिनका युद्ध में पराक्रम प्रसिद्ध है।”
अपने शक्तिशाली भाइयों का परिचय देने के बाद शूर्पणखा ने अपने बारे में भी बड़े गर्व से कहा,
“लेकिन शक्ति और पराक्रम में मैं अपने उन सभी भाइयों से बढ़कर हूँ।”
इसके बाद उसकी वाणी का स्वर बदल गया।
अब वह अपने मन की बात श्रीराम के सामने रखने लगी।
“श्रीराम, तुम्हें पहली बार देखते ही मेरा मन तुम पर आसक्त हो गया है। मैंने आज तक देवताओं में भी ऐसा अद्भुत रूप नहीं देखा। तुम्हारा सौन्दर्य असाधारण है और इसी कारण मैं तुम्हारे प्रति आकर्षित हो गई हूँ।”
उसके मन में अब एक ही इच्छा थी—श्रीराम उसके पति बन जाएँ।
वह बोली,
“मैं शक्तिशाली हूँ। अपनी इच्छा के अनुसार समस्त लोकों में घूम सकती हूँ। इसलिए तुम मेरे पति बन जाओ और मेरे साथ रहो।”
फिर उसने सीता की ओर देखा।
उसकी दृष्टि में अब ईर्ष्या और उपेक्षा दिखाई देने लगी।
उसने सीता को अपने लिए बाधा मानते हुए कहा,
“इस सीता को लेकर तुम क्या करोगे? यह तुम्हारे योग्य नहीं है। यह साधारण और कुरूप है। तुम्हारे समान पुरुष के लिए मैं ही उचित हूँ। तुम मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करो।”
शूर्पणखा की बात यहीं नहीं रुकी। उसके भीतर का क्रोध और ईर्ष्या बढ़ती गई। उसने सीता का अपमान करते हुए कहा कि वह सीता को भाई लक्ष्मण के साथ ही खा जाएगी।
फिर उसने श्रीराम को अपने साथ वन में घूमने और पर्वतों तथा सुंदर वनों का आनंद लेने के लिए आमंत्रित किया।
उसकी कल्पना में अब श्रीराम और वह दोनों साथ थे और सीता उनके जीवन से पूरी तरह हट चुकी थीं।
श्रीराम ने उसकी पूरी बात शांत भाव से सुनी।
फिर अचानक उनके मुख पर मुस्कान आ गई।
वे जोर से हँस पड़े।
उनकी हँसी में इस विचित्र परिस्थिति पर आश्चर्य भी था और शूर्पणखा की बातों की विडम्बना भी। उनके सामने एक ऐसी राक्षसी खड़ी थी जो अभी-अभी स्वयं को अत्यन्त शक्तिशाली बताकर उनकी पत्नी बनने की इच्छा प्रकट कर चुकी थी और उनकी धर्मपत्नी सीता का अपमान भी कर चुकी थी।
श्रीराम ने उस मतवाले नेत्रों वाली शूर्पणखा की ओर देखा।
अब वे उसे उत्तर देने वाले थे।
प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. स्नान करने के बाद श्रीराम, लक्ष्मण और सीता कहाँ से लौटकर आए?
उत्तर: स्नान करने के बाद श्रीराम, लक्ष्मण और सीता गोदावरी नदी के तट से अपने आश्रम में लौटकर आए।
प्रश्न 2. आश्रम लौटकर श्रीराम और लक्ष्मण ने कौन-कौन से कार्य किए?
उत्तर: आश्रम लौटकर श्रीराम और लक्ष्मण ने पूर्वाह्नकाल के होम, पूजन तथा अन्य धार्मिक कार्यों को विधिपूर्वक पूरा किया।
प्रश्न 3. श्रीराम और लक्ष्मण पर्णशाला में आकर क्या करते थे?
उत्तर: श्रीराम और लक्ष्मण पर्णशाला में आकर सीता के साथ रहते और आपस में विभिन्न विषयों पर बातचीत किया करते थे।
प्रश्न 4. श्रीराम पर्णशाला में किस प्रकार शोभायमान हो रहे थे?
उत्तर: सीता के साथ पर्णशाला में बैठे श्रीराम चित्रा के साथ चन्द्रमा के समान अत्यन्त सुंदर और मनोहर दिखाई दे रहे थे।
प्रश्न 5. उस समय आश्रम में कौन-कौन आया करते थे?
उत्तर: उन दिनों बड़े-बड़े ऋषि-मुनि आश्रम में आते थे और श्रीराम, लक्ष्मण तथा सीता का आदर-सत्कार किया करते थे।
प्रश्न 6. अचानक पर्णशाला के पास कौन आ पहुँची?
उत्तर: जब श्रीराम और लक्ष्मण बातचीत कर रहे थे, तभी रावण की बहन शूर्पणखा नामक एक राक्षसी अचानक वहाँ आ पहुँची।
प्रश्न 7. शूर्पणखा श्रीराम को देखकर क्यों आकर्षित हो गई?
उत्तर: श्रीराम का सुंदर रूप, श्याम कान्ति, बल, तेज और राजसी व्यक्तित्व देखकर शूर्पणखा उनके प्रति अत्यन्त आकर्षित होकर मोहित हो गई।
प्रश्न 8. श्रीराम के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर: श्रीराम तेजस्वी, बलशाली, सुंदर, श्याम वर्ण वाले, विशाल नेत्रों से युक्त, राजोचित लक्षणों वाले और अत्यन्त आकर्षक व्यक्तित्व के थे।
प्रश्न 9. श्रीराम और शूर्पणखा के रूप में क्या अंतर बताया गया है?
उत्तर: श्रीराम सुंदर, सौम्य और आकर्षक थे, जबकि शूर्पणखा का वास्तविक रूप कुरूप, विकराल और भय उत्पन्न करने वाला बताया गया है।
प्रश्न 10. श्रीराम और शूर्पणखा के स्वभाव में क्या अंतर था?
उत्तर: श्रीराम सरल, उदार, न्यायप्रिय और सदाचारी थे, जबकि शूर्पणखा कुटिल, क्रूर और दुराचारिणी स्वभाव की थी।
प्रश्न 11. शूर्पणखा ने श्रीराम से क्या प्रश्न किया?
उत्तर: शूर्पणखा ने श्रीराम से पूछा कि वे जटाएँ, धनुष-बाण और पत्नी के साथ राक्षसों के इस वन में क्यों आए थे।
प्रश्न 12. श्रीराम ने शूर्पणखा को अपने विषय में क्या बताया?
उत्तर: श्रीराम ने बताया कि वे राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र राम हैं और पिता की आज्ञा से वन में निवास कर रहे हैं।
प्रश्न 13. श्रीराम ने लक्ष्मण और सीता का परिचय कैसे दिया?
उत्तर: श्रीराम ने लक्ष्मण को अपना छोटा और आज्ञाकारी भाई बताया तथा सीता को विदेहराज जनक की पुत्री और अपनी पत्नी बताया।
प्रश्न 14. श्रीराम वन में किस उद्देश्य से आए थे?
उत्तर: श्रीराम पिता दशरथ और माता कैकेयी की आज्ञा का पालन करने तथा धर्म की रक्षा के उद्देश्य से वन में आए थे।
प्रश्न 15. श्रीराम ने शूर्पणखा से कौन-कौन सी बातें पूछीं?
उत्तर: श्रीराम ने शूर्पणखा से उसका नाम, पिता, पति, परिचय और वन में आने का उद्देश्य बताने के लिए कहा।
प्रश्न 16. शूर्पणखा ने अपना परिचय देते हुए क्या बताया?
उत्तर: शूर्पणखा ने बताया कि वह राक्षसी है, इच्छानुसार रूप बदल सकती है और अकेली वन में घूमते हुए प्राणियों को भयभीत करती है।
प्रश्न 17. शूर्पणखा ने अपने भाइयों के बारे में क्या बताया?
उत्तर: उसने बताया कि रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और दूषण उसके भाई हैं तथा उनमें से विभीषण धर्मात्मा है।
प्रश्न 18. शूर्पणखा ने अपने बारे में क्या दावा किया?
उत्तर: शूर्पणखा ने दावा किया कि वह अपने सभी भाइयों से अधिक शक्तिशाली और पराक्रमी है तथा अपनी इच्छा से कहीं भी जा सकती है।
प्रश्न 19. शूर्पणखा श्रीराम से विवाह क्यों करना चाहती थी?
उत्तर: श्रीराम के अद्भुत रूप और व्यक्तित्व से मोहित होकर शूर्पणखा उन्हें अपना पति बनाना चाहती थी और उनके साथ रहना चाहती थी।
प्रश्न 20. शूर्पणखा ने सीता के बारे में क्या कहा?
उत्तर: शूर्पणखा ने ईर्ष्या के कारण सीता का अपमान किया और उन्हें श्रीराम के योग्य न बताते हुए स्वयं को उपयुक्त पत्नी बताया।
प्रश्न 21. शूर्पणखा ने सीता के साथ क्या करने की धमकी दी?
उत्तर: शूर्पणखा ने क्रोध और ईर्ष्या में सीता को लक्ष्मण के साथ खा जाने की धमकी दी और श्रीराम को अपने साथ चलने कहा।
प्रश्न 22. शूर्पणखा ने श्रीराम को कहाँ घूमने का प्रस्ताव दिया?
उत्तर: शूर्पणखा ने श्रीराम को अपने साथ पर्वतीय शिखरों और विभिन्न प्रकार के सुंदर वनों में घूमने का प्रस्ताव दिया।
प्रश्न 23. शूर्पणखा की बातें सुनकर श्रीराम की क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर: शूर्पणखा की विचित्र और अहंकारपूर्ण बातें सुनकर श्रीराम जोर-जोर से हँस पड़े और फिर उसे उत्तर देने लगे।