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(22)
खर का क्रोध और चौदह हजार राक्षसों का रण-प्रस्थान
शूर्पणखा के कटु वचनों और उसके अपमान से राक्षसराज खर के भीतर पहले से ही क्रोध की ज्वाला धधक रही थी। अपनी बहन की दशा देखकर उसका मन क्षोभ और प्रतिशोध से भर उठा। शूर्पणखा ने जिस प्रकार राम के पराक्रम का वर्णन करते हुए खर को चुनौती दी थी, उससे उसके स्वाभिमान को भी गहरी चोट पहुँची थी। उसने राक्षसों के बीच अत्यन्त कठोर स्वर में बोलना आरम्भ किया।
खर ने शूर्पणखा की ओर देखते हुए कहा, “बहिन! तुम्हारे इस अपमान ने मेरे हृदय में ऐसा क्रोध उत्पन्न कर दिया है, जिसे अब रोक पाना मेरे लिए सम्भव नहीं। जिस प्रकार पूर्णिमा के समय समुद्र का जल प्रचण्ड वेग से उमड़ पड़ता है और उसे रोकना कठिन होता है, उसी प्रकार मेरे भीतर उठे इस क्रोध को दबाना मेरे वश में नहीं है। तुम्हारे साथ जो हुआ है, उसका प्रतिशोध अवश्य लिया जाएगा।”
उसकी आँखों में क्रोध की ज्वाला दिखाई दे रही थी। उसकी वाणी में प्रतिशोध की तीव्रता थी। वह राम के पराक्रम को किसी भी प्रकार स्वीकार करने को तैयार नहीं था।
वह आगे बोला, “मैं पराक्रम की दृष्टि से राम को कुछ भी नहीं समझता। वह एक मनुष्य ही तो है और उसके जीवन का अन्त अब निकट है। अपने कर्मों के कारण आज वह स्वयं मृत्यु के मुख में जाने वाला है। वह अपने किए का फल आज ही भोगेगा।”
खर की बात सुनकर शूर्पणखा के मन में आशा जाग उठी। अभी कुछ ही समय पहले वह अपने भाई को राम के विरुद्ध भड़का रही थी, और अब उसके सामने खर स्वयं राम के वध की प्रतिज्ञा कर रहा था।
खर ने उसे ढाढ़स देते हुए कहा, “अपने आँसू पोंछ दो और भय को अपने मन से निकाल दो। तुम अब चिन्ता मत करो। मैं भाई लक्ष्मण सहित राम को आज ही यमलोक पहुँचा दूँगा।”
उसका स्वर अब और भी कठोर हो गया। वह क्रोध में इतना डूब चुका था कि उसे अपने सामने केवल एक ही लक्ष्य दिखाई दे रहा था—राम का वध।
खर ने अपनी प्रतिशोध-भावना को और तीखे शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा, “आज मेरे फरसे के प्रहार से राम भूमि पर निष्प्राण पड़ा होगा और उसका रक्त तुम्हारे सामने होगा। तुम्हारे अपमान का बदला लेकर ही मेरा क्रोध शान्त होगा।”
खर के मुख से ये शब्द सुनते ही शूर्पणखा अत्यन्त प्रसन्न हो गई। उसके चेहरे पर संतोष झलकने लगा। उसे विश्वास हो गया कि अब राम और लक्ष्मण उसके क्रोध से बच नहीं सकेंगे। उसने अपने भाई खर की बार-बार प्रशंसा करनी शुरू कर दी। जिस भाई को वह कुछ ही क्षण पहले कठोर शब्दों से तिरस्कृत कर रही थी, उसी को अब वह महान, पराक्रमी और वीर बताकर उसकी स्तुति करने लगी।
खर ने उसकी इन बातों पर अधिक ध्यान नहीं दिया। उसका मन अब युद्ध की तैयारी में लग चुका था। उसने अपने सेनापति दूषण को बुलाया और गंभीर स्वर में आदेश दिया।
“सौम्य दूषण! ऐसे चौदह हजार राक्षसों को युद्ध के लिए तैयार करो जो मेरे आदेश का पालन करने वाले हों, युद्धभूमि से पीछे हटना जिनके स्वभाव में न हो, जिनका वेग अत्यन्त तीव्र हो और जिनके हृदय में युद्ध का उत्साह भरा हो। उनका रूप भयंकर हो और वे शत्रुओं पर टूट पड़ने में तनिक भी संकोच न करें।”
खर की आज्ञा सुनते ही दूषण युद्ध की तैयारी में लग गया। जनस्थान में चारों ओर हलचल मच गई। सैनिकों को बुलाया जाने लगा। अस्त्र-शस्त्र सजाए जाने लगे और युद्ध के लिए विशाल सेना को एकत्र किया जाने लगा।
खर ने फिर कहा, “और मेरा रथ भी शीघ्र यहाँ मँगवाओ। उसपर अनेक धनुष और बाण रखे जाएँ। विभिन्न प्रकार की तलवारें और तीखी शक्तियाँ भी उसमें सजाकर रखी जाएँ। मैं स्वयं इस उद्दण्ड राम का वध करने के लिए अपनी विशाल सेना के आगे-आगे चलूँगा।”
उसकी आवाज में ऐसा दृढ़ निश्चय था मानो युद्ध का परिणाम पहले ही उसके पक्ष में निश्चित हो चुका हो।
खर की आज्ञा मिलते ही कुछ ही समय में एक विशाल और अद्भुत रथ वहाँ लाया गया। उसका प्रकाश सूर्य के समान चमक रहा था। उसमें चितकबरे, उत्तम और शक्तिशाली घोड़े जुते हुए थे। रथ इतना ऊँचा था कि वह मेरु पर्वत के शिखर जैसा प्रतीत होता था।
उस रथ को तपाए हुए सोने के सुन्दर साज-सामान से सजाया गया था। उसके पहियों में सोना जड़ा हुआ था और उसका आकार अत्यन्त विशाल था। उसके कूबर वैदूर्यमणि से सुशोभित थे। रथ की सजावट इतनी भव्य थी कि उसे देखने वाला कुछ क्षणों के लिए उसकी ओर देखता ही रह जाए।
उसपर सोने से बने मत्स्य, फूल, वृक्ष, पर्वत, चन्द्रमा और सूर्य की आकृतियाँ अंकित थीं। मंगलसूचक पक्षियों के समूह और तारों के समान चमकते अलंकरण भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके ऊपर एक ध्वजा फहरा रही थी और भीतर अनेक प्रकार के खड्ग तथा अन्य अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे। छोटी-छोटी घंटियों और सुन्दर घुँघरुओं से सजे घोड़े जब हिलते-डुलते तो रथ के चारों ओर एक विचित्र ध्वनि उत्पन्न होती।
ऐसे भव्य रथ पर राक्षसराज खर आरूढ़ हुआ। लेकिन रथ की सारी चमक-दमक के पीछे उसके मन में केवल एक ही स्मृति थी—अपनी बहन शूर्पणखा का अपमान। उस घटना को याद करते ही उसका क्रोध फिर भड़क उठता।
उसके सामने अब एक विशाल राक्षस-सेना तैयार खड़ी थी। रथ, ढाल, ध्वज और असंख्य अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित वह सेना दूर तक फैली हुई दिखाई देती थी। खर और दूषण ने उस विशाल सेना को देखा और ऊँचे स्वर में आदेश दिया—
“निकलो! आगे बढ़ो!”
आज्ञा मिलते ही पूरी सेना में जैसे प्राणों का संचार हो गया। भयंकर रूप वाले राक्षस अपनी-अपनी ढालें और अस्त्र-शस्त्र सँभालकर आगे बढ़ने लगे। उनके कदमों और युद्ध-उत्साह से जनस्थान का वातावरण गूँज उठा। देखते ही देखते चौदह हजार राक्षसों की वह विशाल सेना युद्ध के लिए जनस्थान से निकल पड़ी।
किसी के हाथ में मुद्गर था, किसी के हाथ में पट्टिश और किसी के हाथ में भयंकर शूल। तीखे फरसे, चमकती तलवारें, चक्र और तोमर उनके हाथों में दमक रहे थे। कहीं विशाल धनुष दिखाई देते, तो कहीं भारी गदाएँ और मुसल। अनेक राक्षसों के हाथों में भयंकर परिघ और शक्तियाँ थीं। कुछ के हाथों में वज्र जैसे कठोर और भयावह आयुध चमक रहे थे।
असंख्य अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित वह विशाल सेना किसी उमड़ते हुए काले बादल की तरह आगे बढ़ रही थी। उनके मन में युद्ध का उत्साह था और वे अपने राजा खर की इच्छा पूरी करने के लिए राम की ओर बढ़ रहे थे।
राक्षसों की विशाल टुकड़ियाँ आगे निकलने लगीं। खर कुछ समय तक अपने सैनिकों को आगे बढ़ते हुए देखता रहा। जब सेना पर्याप्त दूरी तक आगे निकल गई, तब उसका रथ भी उनके पीछे चल पड़ा।
तभी खर के सारथि ने अपने स्वामी का संकेत समझ लिया। उसने सोने के आभूषणों से सजे चितकबरे घोड़ों की लगाम सँभाली और उन्हें तीव्र गति से हाँक दिया।
घोड़ों के वेग से खर का विशाल रथ आगे बढ़ा। उसके पहियों की गर्जना और घोड़ों की गति से ऐसी भयंकर ध्वनि उत्पन्न हुई कि दिशाएँ और उपदिशाएँ तक गूँज उठीं। रथ की घंटियाँ और घुँघरू भी उस युद्ध-यात्रा में अपनी अलग ध्वनि मिला रहे थे।
खर का क्रोध अब चरम पर पहुँच चुका था। उसका चेहरा कठोर हो गया था और उसकी वाणी में पहले से कहीं अधिक उग्रता आ गई थी। वह शत्रु का वध करने के लिए इतना उतावला था कि उसका स्वरूप यमराज के समान भयानक प्रतीत हो रहा था।
उसने अपने सामने बढ़ती हुई सेना को देखा और फिर राम की ओर जाने वाले मार्ग पर अपनी दृष्टि जमा दी। उसके मन में केवल युद्ध और प्रतिशोध था।
अचानक खर ने ऊँचे स्वर में सिंहनाद किया। उसकी गर्जना से वातावरण काँप उठा। वह ऐसा प्रतीत हुआ मानो ओलों की वर्षा करने वाला कोई घना और प्रचण्ड मेघ आकाश में भयंकर गर्जना कर रहा हो।
उसने फिर सारथि को आदेश दिया कि रथ को और तीव्र गति से आगे बढ़ाया जाए।
घोड़े और तेज दौड़ने लगे। विशाल रथ गर्जना करता हुआ आगे बढ़ा और उसके पीछे-पीछे चौदह हजार राक्षसों की सेना भी युद्ध की ओर बढ़ती चली गई।
जनस्थान पीछे छूट रहा था और सामने था—राम से होने वाला वह भयंकर संघर्ष, जिसके परिणाम की कल्पना अभी किसी ने नहीं की थी।
प्रश्न–उत्तर
1. शूर्पणखा की दशा देखकर खर के मन में कौन-से भाव उत्पन्न हुए?
उत्तर: शूर्पणखा की दशा देखकर खर के मन में क्रोध, क्षोभ और प्रतिशोध की भावना उत्पन्न हुई तथा उसने उसके अपमान का बदला लेने का निश्चय किया।
2. खर ने राम के विषय में क्या कहा?
उत्तर: खर ने राम को साधारण मनुष्य बताते हुए उनके पराक्रम को तुच्छ समझा और कहा कि वे शीघ्र अपने कर्मों का फल भोगेंगे।
3. खर ने शूर्पणखा को किस प्रकार ढाढ़स बँधाया?
उत्तर: खर ने शूर्पणखा से आँसू पोंछने और भय त्यागने को कहा तथा आश्वासन दिया कि वह राम और लक्ष्मण को यमलोक पहुँचा देगा।
4. खर ने अपने क्रोध की शान्ति के लिए क्या संकल्प किया?
उत्तर: खर ने संकल्प किया कि राम का वध करके और शूर्पणखा के अपमान का प्रतिशोध लेकर ही उसके भीतर धधकता क्रोध शान्त होगा।
5. खर ने सेनापति दूषण को क्या आदेश दिया?
उत्तर: खर ने दूषण को चौदह हजार आज्ञाकारी, तीव्रगामी, युद्धोत्साही और युद्धभूमि से पीछे न हटने वाले भयंकर राक्षसों को तैयार करने का आदेश दिया।
6. खर अपने रथ में कौन-कौन से युद्ध-सामग्री रखवाना चाहता था?
उत्तर: खर ने रथ में अनेक धनुष-बाण, विभिन्न प्रकार की तलवारें, तीखी शक्तियाँ तथा अन्य अस्त्र-शस्त्र सजाकर रखने का आदेश दिया।
7. खर के रथ की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर: खर का रथ विशाल, स्वर्ण-सज्जित और मेरु शिखर जैसा ऊँचा था। उसमें चितकबरे घोड़े जुते थे तथा अनेक अलंकरण उसकी शोभा बढ़ाते थे।
8. खर के रथ पर किन आकृतियों के स्वर्ण-चित्र अंकित थे?
उत्तर: खर के रथ पर स्वर्ण से बने मत्स्य, फूल, वृक्ष, पर्वत, चन्द्रमा और सूर्य की आकृतियाँ अंकित थीं, जो उसकी शोभा बढ़ाती थीं।
9. रथ को देखकर उसकी भव्यता का अनुमान किन बातों से होता है?
उत्तर: रथ के स्वर्ण-जड़ित पहिए, वैदूर्यमणि से सुशोभित कूबर, अलंकरण, ध्वजा और सजे हुए घोड़े उसकी असाधारण भव्यता दर्शाते थे।
10. खर की सेना में किस प्रकार के अस्त्र-शस्त्र दिखाई दे रहे थे?
उत्तर: सेना में मुद्गर, पट्टिश, शूल, फरसे, तलवारें, चक्र, तोमर, धनुष, गदाएँ, मुसल, परिघ, शक्तियाँ और वज्र जैसे अनेक आयुध थे।
11. चौदह हजार राक्षसों की सेना किस प्रकार आगे बढ़ रही थी?
उत्तर: चौदह हजार राक्षसों की विशाल सेना अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर उमड़ते काले बादल के समान युद्ध के लिए आगे बढ़ रही थी।
12. खर की सेना के प्रस्थान के समय जनस्थान का वातावरण कैसा हो गया था?
उत्तर: जनस्थान में चारों ओर हलचल मच गई थी। सैनिक एकत्र हुए, अस्त्र-शस्त्र सजाए गए और युद्ध-उत्साह से वातावरण गूँज उठा।
13. सेना के आगे निकल जाने के बाद खर ने क्या किया?
उत्तर: जब राक्षसों की सेना पर्याप्त दूरी तक आगे निकल गई, तब खर ने अपने रथ को भी उनके पीछे चलने का संकेत दिया।
14. खर के सारथि ने रथ को कैसे आगे बढ़ाया?
उत्तर: सारथि ने स्वर्णाभूषणों से सजे चितकबरे घोड़ों की लगाम सँभाली और उन्हें तीव्र गति से हाँककर खर का विशाल रथ आगे बढ़ाया।
15. खर के रथ की गति से कैसी ध्वनि उत्पन्न हुई?
उत्तर: रथ के पहियों की गर्जना, घोड़ों की गति, घंटियों और घुँघरुओं की ध्वनि मिलकर इतनी भयंकर आवाज उत्पन्न करती थी कि दिशाएँ गूँज उठीं।
16. युद्ध के समय खर का स्वरूप कैसा प्रतीत हो रहा था?
उत्तर: अत्यधिक क्रोध और युद्ध की उतावली के कारण खर का स्वरूप अत्यन्त उग्र और भयानक हो गया था तथा वह यमराज के समान प्रतीत हो रहा था।
17. खर ने सेना को आगे बढ़ाने के लिए क्या आदेश दिया?
उत्तर: खर और दूषण ने ऊँचे स्वर में सैनिकों को आगे बढ़ने का आदेश दिया। आदेश मिलते ही पूरी सेना युद्ध के लिए चल पड़ी।
18. खर ने अचानक सिंहनाद क्यों किया?
उत्तर: युद्ध के प्रति अपने तीव्र उत्साह और उग्रता को प्रकट करते हुए खर ने अचानक सिंहनाद किया, जिससे वातावरण उसकी गर्जना से काँप उठा।
19. खर के सिंहनाद की तुलना किससे की गई है?
उत्तर: खर के सिंहनाद की तुलना ओलों की वर्षा करने वाले घने और प्रचण्ड मेघ की भयंकर गर्जना से की गई है।
20. खर की युद्ध-यात्रा के पीछे मुख्य उद्देश्य क्या था?
उत्तर: खर की युद्ध-यात्रा का मुख्य उद्देश्य शूर्पणखा के अपमान का प्रतिशोध लेना और राम तथा लक्ष्मण का वध करना था।