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(25)
श्रीराम और खर की सेना का भयंकर संग्राम
खर अपने अग्रगामी सैनिकों के साथ आगे बढ़ता हुआ उस आश्रम के निकट पहुँचा। उसके मन में क्रोध की ज्वाला धधक रही थी। तभी उसकी दृष्टि उस अद्भुत दृश्य पर पड़ी—श्रीराम अकेले खड़े थे और हाथ में धनुष धारण किए हुए थे। उनके मुख पर अद्भुत शान्ति थी, किंतु उनके व्यक्तित्व से ऐसा तेज प्रकट हो रहा था कि शत्रु भी सहज ही भयभीत हो जाए।
श्रीराम को सामने देखकर खर ने तुरंत अपना प्रचण्ड धनुष उठाया। उसकी प्रत्यञ्चा के खिंचने से भयंकर टंकार हुई। उसने अपने सारथी को आदेश दिया कि उसका रथ शीघ्र श्रीराम के सामने ले जाया जाए। सारथी ने घोड़ों को संकेत किया और रथ तीव्र गति से श्रीराम की ओर बढ़ चला।
खर को श्रीराम के निकट पहुँचते देखकर उसके मंत्री और प्रमुख राक्षस—श्येनगामी आदि—भी जोर-जोर से सिंहनाद करने लगे। वे चारों ओर से खर को घेरकर खड़े हो गए। राक्षसों के विशाल समूह के बीच रथ पर बैठा हुआ खर ऐसा दिखाई दे रहा था, जैसे आकाश में चमकते असंख्य तारों के बीच मंगल ग्रह दिखाई देता है।
युद्ध का वातावरण देखते ही देखते भयंकर हो उठा। खर ने हजारों बाणों की वर्षा करके श्रीराम को चारों ओर से घेर लिया और जोरदार गर्जना की। उसके साथ आए सभी राक्षस भी क्रोध से भर उठे। उन्होंने भयंकर धनुष उठाए और नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से श्रीराम पर आक्रमण आरम्भ कर दिया।
किसी ने लोहे के भारी मुद्गर चलाए, किसी ने शूल और प्रास फेंके, तो कोई खड्ग और फरसा लेकर श्रीराम की ओर झपटा। विशालकाय, काले बादलों के समान दिखने वाले वे महाबली राक्षस रथों, घोड़ों और पर्वत की चोटियों जैसे विशाल हाथियों के साथ चारों दिशाओं से श्रीराम पर टूट पड़े। उनके मन में केवल एक ही उद्देश्य था—किसी भी प्रकार श्रीराम को परास्त कर देना।
ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो आकाश में उमड़े हुए विशाल बादल किसी पर्वत पर लगातार जल बरसा रहे हों। उसी प्रकार राक्षसों के असंख्य बाण श्रीराम पर बरस रहे थे। चारों ओर से राक्षसों ने उन्हें घेर लिया। उनका भयंकर रूप ऐसा था मानो प्रदोषकाल में भगवान् शिव के गण स्वयं उन्हें चारों ओर से घेरे हुए हों।
लेकिन श्रीराम तनिक भी विचलित नहीं हुए। राक्षसों द्वारा छोड़े गए अस्त्र-शस्त्र जैसे ही उनकी ओर आते, श्रीराम के बाण उन्हें बीच में ही रोक लेते। जिस प्रकार समुद्र में गिरने वाली नदियों की धाराएँ समुद्र में समा जाती हैं, उसी प्रकार राक्षसों के अस्त्र श्रीराम के बाणों में समा जाते और निष्फल हो जाते।
राक्षसों के निरन्तर प्रहार से श्रीराम का शरीर घायल हो गया। उनके अंगों पर अनेक घाव हो गए और रक्त बहने लगा। फिर भी उनके मन में न भय था, न घबराहट और न ही युद्ध से पीछे हटने का विचार। वे उसी प्रकार अडिग खड़े रहे, जैसे असंख्य वज्रों के प्रहार सहकर भी कोई विशाल पर्वत अपनी जगह से नहीं हिलता।
घावों से उनका शरीर रक्तरंजित हो उठा। उस समय वे संध्याकाल के बादलों से घिरे हुए सूर्य के समान दिखाई दे रहे थे। उनका शरीर घायल था, किंतु उनका तेज पहले से भी अधिक प्रखर हो उठा था।
श्रीराम को अकेले और चारों ओर से हजारों शत्रुओं से घिरा देखकर देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षि भी चिंतित हो उठे। उन्हें लगा कि इतने विशाल राक्षस-सैन्य के बीच अकेले श्रीराम किस प्रकार युद्ध करेंगे। वातावरण में एक क्षण के लिए चिंता और आशंका छा गई।
लेकिन श्रीराम के मन में कोई भय नहीं था।
उन्होंने अत्यन्त क्रोध के साथ अपना धनुष खींचा। उन्होंने उसे इतना पीछे तक खींचा कि वह पूर्ण गोलाकार दिखाई देने लगा। फिर उस धनुष से ऐसे तीखे और वेगवान बाण निकलने लगे जिन्हें रोक पाना अत्यन्त कठिन था। वे बाण राक्षसों के लिए काल के पाश के समान भयंकर बन गए।
श्रीराम ने असंख्य सुवर्णभूषित बाण छोड़े। उन बाणों पर चील सदृश पंख लगे हुए थे और वे सूर्य के प्रकाश में चमक रहे थे। श्रीराम उन्हें इतनी सहजता से छोड़ रहे थे, मानो यह कोई कठिन युद्ध न होकर उनके लिए खेल हो। किंतु वही बाण राक्षसों के लिए मृत्यु का संदेश बनकर पहुँच रहे थे।
राक्षसों के शरीरों को भेदकर जब वे बाण आकाश में ऊपर उठते, तो रक्त से भीगे हुए होने पर भी अग्नि की ज्वाला के समान चमकने लगते। श्रीराम के मण्डलाकार धनुष से लगातार असंख्य बाण निकल रहे थे और देखते ही देखते पूरा युद्धक्षेत्र बाणों से भरने लगा।
उन बाणों ने राक्षसों के असंख्य धनुषों को तोड़ दिया। उनकी ध्वजाएँ गिरने लगीं, ढालें टूटने लगीं और कवच चकनाचूर होने लगे। अनेक राक्षसों के हाथों और भुजाओं से उनके अस्त्र छूट गए। युद्ध में प्रयुक्त विशाल हाथियों और घोड़ों पर भी श्रीराम के बाणों का प्रचण्ड प्रभाव पड़ा।
सुनहरे साज-सामान और कवचों से सुसज्जित रथों के घोड़े, सारथी, हाथी और उनके महावत—सब श्रीराम के बाणों से अस्त-व्यस्त हो गए। रथों के पहिए और युद्ध-सामग्री टूटने लगी। पैदल सैनिक भी श्रीराम के प्रचण्ड बाणों से बच नहीं सके।
नालीक, नाराच और तीखे अग्रभाग वाले विकर्णी बाणों से घायल होकर राक्षस भयंकर आर्तनाद करने लगे। चारों ओर उनकी चीख-पुकार सुनाई देने लगी। श्रीराम के मर्मभेदी बाणों से राक्षसों की सेना उसी प्रकार व्याकुल हो उठी, जैसे अग्नि से जलता हुआ सूखा वन शान्ति खो देता है।
कुछ अत्यन्त बलशाली राक्षस इस स्थिति से और अधिक क्रोधित हो गए। वे प्रास, शूल और फरसे लेकर श्रीराम पर टूट पड़े। लेकिन श्रीराम ने अपने तीखे बाणों से उनके अस्त्रों को आकाश में ही रोक दिया और फिर अपने बाणों से उनका सामना किया। उनके सामने आते ही वे भी धराशायी होने लगे।
युद्धभूमि में राक्षसों के सिर, ढाल और धनुष कट-कटकर गिरने लगे। वे इस प्रकार भूमि पर गिर रहे थे, जैसे गरुड़ के पंखों की तीव्र वायु से नन्दनवन के वृक्ष उखड़कर गिर पड़ते हों।
जो राक्षस अभी जीवित थे, वे भी श्रीराम के पराक्रम से भयभीत और निराश हो गए। वे अपनी रक्षा के लिए खर की ओर भागने लगे। तभी दूषण उनके सामने आया। उसने धनुष उठाकर भयभीत राक्षसों को आश्वासन दिया और स्वयं अत्यन्त क्रोधित होकर श्रीराम की ओर बढ़ा। उसका रूप ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं यमराज युद्धभूमि में उतर आया हो।
दूषण को अपने साथ पाकर राक्षसों के भीतर फिर साहस जाग उठा। वे लौट पड़े। किसी ने साखू और ताड़ के वृक्ष उखाड़ लिए, तो किसी ने बड़े-बड़े पत्थर उठा लिए। कुछ राक्षस हाथों में शूल, मुद्गर और पाश लेकर फिर से श्रीराम पर टूट पड़े।
अब युद्ध ने एक नया रूप ले लिया। कहीं वृक्षों की वर्षा हो रही थी, तो कहीं विशाल पत्थर आकाश में उड़ते दिखाई दे रहे थे। राक्षस नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा कर रहे थे। श्रीराम अकेले उस विशाल सेना के बीच खड़े होकर सबका सामना कर रहे थे।
चारों दिशाओं से राक्षसों ने श्रीराम को घेर लिया। उनकी संख्या इतनी अधिक थी कि दिशाएँ और उपदिशाएँ तक राक्षसों से भर गईं। चारों ओर से आती हुई अस्त्रों की वर्षा के बीच श्रीराम ने एक भयंकर गर्जना की। उनके उस सिंहनाद से युद्धभूमि गूँज उठी।
इसके बाद श्रीराम ने अत्यन्त तेजस्वी गान्धर्व अस्त्र का प्रयोग किया।
अचानक उनके मण्डलाकार धनुष से हजारों बाण निकलने लगे। देखते ही देखते दसों दिशाएँ बाणों से ढक गईं। आकाश तक बाणों से भर गया। राक्षसों की आँखों के सामने केवल बाण ही बाण दिखाई दे रहे थे।
राक्षस यह समझ ही नहीं पा रहे थे कि श्रीराम कब बाण उठाते हैं और कब उन्हें छोड़ देते हैं। वे केवल श्रीराम को धनुष खींचते हुए देख पाते थे। उनके हाथों की गति इतनी तीव्र थी कि बाणों के निकलने का क्षण पहचानना भी असम्भव हो गया था।
कुछ ही समय में श्रीराम के बाणों का ऐसा घना समूह आकाश में छा गया कि सूर्य सहित पूरा आकाश मानो अन्धकार में डूब गया। श्रीराम स्वयं एक ही स्थान पर स्थिर खड़े थे, लेकिन उनके धनुष से बाणों की धारा लगातार निकल रही थी।
एक साथ असंख्य राक्षस श्रीराम के बाणों से घायल होकर भूमि पर गिरने लगे। थोड़े ही समय में युद्धभूमि राक्षसों से भर गई। जहाँ दृष्टि जाती, वहाँ घायल और गिरे हुए राक्षस दिखाई देते।
समरभूमि का दृश्य अत्यन्त भयावह हो चुका था। जगह-जगह कटे हुए मस्तक, भुजाएँ, जाँघें और आभूषण बिखरे पड़े थे। टूटे हुए रथ, गिरे हुए ध्वज, चँवर, छत्र, शूल, प्रास, फरसे, खड्ग और बाण चारों ओर फैले हुए थे। अनेक घोड़े और विशाल हाथी भी युद्धभूमि में गिर चुके थे। बड़े-बड़े पत्थर भी श्रीराम के बाणों से टूटकर बिखरे पड़े थे।
जिस युद्धभूमि में कुछ समय पहले हजारों राक्षस गर्जना करते हुए विजय के लिए आगे बढ़ रहे थे, वही भूमि अब उनके पराजित होने की साक्षी बन चुकी थी।
श्रीराम अभी भी उसी प्रकार धनुष हाथ में लिए अकेले खड़े थे। उनके चारों ओर शत्रुओं की विशाल सेना का गर्व चूर हो चुका था।
अपने साथियों को इस प्रकार मारा हुआ देखकर बचे हुए राक्षसों का साहस टूट गया। वे श्रीराम के सामने जाने का साहस नहीं कर पा रहे थे। जिस सेना ने कुछ समय पहले चारों दिशाओं से श्रीराम को घेर रखा था, वही सेना अब भय और व्याकुलता से पीछे हटने लगी।
युद्धभूमि में श्रीराम का पराक्रम स्पष्ट दिखाई दे रहा था—वे अकेले थे, पर उनका साहस अडिग था; चारों ओर शत्रु थे, पर उनके मन में भय का नाम तक नहीं था।
प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. खर ने श्रीराम को आश्रम के पास किस अवस्था में देखा और उसने अपने सारथी को क्या आदेश दिया?
उत्तर: खर ने श्रीराम को हाथ में धनुष लिए अकेले खड़े देखा। उसने सारथी को अपना रथ श्रीराम के सामने ले चलने की आज्ञा दी।
प्रश्न 2. खर के निकट पहुँचते ही उसके मंत्री और राक्षसों ने क्या किया?
उत्तर: श्येनगामी आदि राक्षस मंत्रियों ने जोरदार सिंहनाद किया और खर को चारों ओर से घेरकर उसके साथ युद्धभूमि में खड़े हो गए।
प्रश्न 3. राक्षसों ने श्रीराम पर किस प्रकार का आक्रमण किया?
उत्तर: राक्षसों ने चारों ओर से श्रीराम पर बाण, मुद्गर, शूल, प्रास, खड्ग, फरसे, वृक्ष और पत्थरों सहित अनेक अस्त्र-शस्त्र बरसाए।
प्रश्न 4. राक्षसों के अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा के बीच श्रीराम की क्या विशेषता दिखाई दी?
उत्तर: राक्षसों के प्रहार से घायल होने पर भी श्रीराम विचलित नहीं हुए और विशाल पर्वत की तरह अडिग रहकर युद्ध करते रहे।
प्रश्न 5. घायल और रक्तरंजित होने के बाद श्रीराम किसके समान दिखाई दे रहे थे?
उत्तर: अस्त्रों के प्रहार से रक्तरंजित श्रीराम संध्याकाल के बादलों से घिरे हुए सूर्यदेव के समान अत्यन्त तेजस्वी दिखाई दे रहे थे।
प्रश्न 6. श्रीराम को अकेले हजारों शत्रुओं से घिरा देखकर देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षि क्यों चिंतित हुए?
उत्तर: उन्हें लगा कि अकेले श्रीराम असंख्य शत्रुओं से घिरे हैं, इसलिए देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षि उनके संघर्ष को देखकर विषाद में डूब गए।
प्रश्न 7. श्रीराम ने अपना धनुष किस प्रकार खींचा और उससे निकलने वाले बाण कैसे थे?
उत्तर: श्रीराम ने धनुष को इतना खींचा कि वह गोलाकार दिखाई देने लगा। उससे निकलने वाले बाण अत्यन्त तीखे, वेगवान और रोकना कठिन थे।
प्रश्न 8. श्रीराम के बाणों ने राक्षसों की सेना को किस प्रकार प्रभावित किया?
उत्तर: श्रीराम के बाणों ने राक्षसों के धनुष, ध्वज, ढाल, कवच, रथ, घोड़े, हाथी और सैनिकों को भारी क्षति पहुँचाई।
प्रश्न 9. श्रीराम के बाणों से घायल राक्षसों की स्थिति कैसी हो गई?
उत्तर: बाणों से घायल राक्षस भयंकर आर्तनाद करने लगे और उनकी सेना जलते हुए सूखे वन की तरह अत्यन्त व्याकुल और अशान्त हो गई।
प्रश्न 10. जब कुछ राक्षस श्रीराम पर प्रास, शूल और फरसे लेकर टूट पड़े, तब श्रीराम ने क्या किया?
उत्तर: श्रीराम ने अपने बाणों से उन राक्षसों के अस्त्र-शस्त्रों को रोक दिया और फिर उनका सामना करते हुए उनके प्राण हर लिए।
प्रश्न 11. घायल राक्षस श्रीराम से बचने के लिए कहाँ भागे और उन्हें किसने आश्वासन दिया?
उत्तर: घायल राक्षस अपनी रक्षा के लिए खर के पास भागे। बीच में दूषण ने उन्हें आश्वासन दिया और स्वयं श्रीराम की ओर बढ़ा।
प्रश्न 12. दूषण का सहारा मिलने पर राक्षसों ने पुनः श्रीराम पर किस प्रकार आक्रमण किया?
उत्तर: दूषण का सहारा पाकर राक्षस निर्भय होकर लौटे और वृक्ष, पत्थर, शूल, मुद्गर तथा पाश लेकर श्रीराम पर टूट पड़े।
प्रश्न 13. श्रीराम ने चारों दिशाओं से घिरे होने पर कौन-सा अस्त्र प्रयोग किया?
उत्तर: चारों दिशाओं और उपदिशाओं से घिरने पर श्रीराम ने भैरव-नाद किया और परम तेजस्वी गान्धर्व नामक अस्त्र का प्रयोग किया।
प्रश्न 14. गान्धर्व अस्त्र के प्रयोग के बाद युद्धभूमि का दृश्य कैसा हो गया?
उत्तर: श्रीराम के हजारों बाणों से दसों दिशाएँ ढक गईं और राक्षसों को उनके बाण चलाने की गति समझ में नहीं आती थी।
प्रश्न 15. राक्षस श्रीराम के बाणों को देखकर भी उन्हें रोक क्यों नहीं पा रहे थे?
उत्तर: श्रीराम के हाथों की गति अत्यन्त तीव्र थी। राक्षस केवल उन्हें धनुष खींचते देखते थे, बाण कब छोड़ा गया, यह समझ नहीं पाते थे।
प्रश्न 16. श्रीराम के बाणों से आकाश किस प्रकार दिखाई देने लगा?
उत्तर: श्रीराम के बाणों का घना समूह सूर्य सहित पूरे आकाश को ढकने लगा, जिससे आकाश बाणों के अन्धकार से आच्छादित दिखाई देने लगा।
प्रश्न 17. युद्ध के अंत में समरभूमि की स्थिति कैसी दिखाई दे रही थी?
उत्तर: समरभूमि में मरे और घायल राक्षसों, टूटे रथों, गिरे ध्वजों, अस्त्र-शस्त्रों तथा युद्ध-सामग्री के कारण अत्यन्त भयावह दृश्य था।
प्रश्न 18. अपने साथियों का विनाश देखकर शेष राक्षसों की क्या स्थिति हुई?
उत्तर: अपने साथियों का विनाश देखकर शेष राक्षस अत्यन्त आतुर और भयभीत हो गए तथा श्रीराम के सामने जाने का साहस नहीं कर सके।
प्रश्न 19. इस युद्ध में श्रीराम के व्यक्तित्व की कौन-सी प्रमुख विशेषताएँ सामने आती हैं?
उत्तर: युद्ध में श्रीराम का अदम्य साहस, धैर्य, एकाग्रता, पराक्रम और विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग रहने की क्षमता स्पष्ट दिखाई देती है।
प्रश्न 20. राक्षसों की विशाल सेना के सामने अकेले खड़े श्रीराम का चित्रण किस प्रकार किया गया है?
उत्तर: श्रीराम अकेले होकर भी हजारों शत्रुओं से घिरे रहते हुए अडिग रहे और अपने अद्भुत पराक्रम से विशाल राक्षस सेना को परास्त किया।