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(26)  दूषण का अंत और चौदह हजार राक्षसों का संहार

(26)

दूषण का अंत और चौदह हजार राक्षसों का संहार

 

रणभूमि में भयंकर युद्ध अपने चरम पर पहुँच चुका था। श्रीराम के तीखे बाणों के सामने राक्षसों की विशाल सेना लगातार धराशायी हो रही थी। चारों ओर युद्ध की गर्जना, शस्त्रों की टंकार और घायल योद्धाओं की चीखें सुनाई दे रही थीं। अपनी सेना की ऐसी दुर्दशा देखकर महाबली दूषण का क्रोध भड़क उठा। उसने पीछे हटना स्वीकार नहीं किया और पाँच हजार अत्यन्त बलवान, वेगशाली तथा युद्ध में दुर्धर्ष राक्षसों को श्रीराम पर एक साथ आक्रमण करने की आज्ञा दी।

 

दूषण के आदेश मिलते ही वे पाँच हजार राक्षस चारों दिशाओं से श्रीराम को घेरकर टूट पड़े। किसी के हाथ में शूल था, किसी के हाथ में पट्टिश, कोई तलवार चला रहा था, तो कोई विशाल पत्थर और वृक्ष उखाड़कर फेंक रहा था। असंख्य बाण भी आकाश को ढकते हुए श्रीराम की ओर आने लगे। देखते ही देखते ऐसा लगने लगा मानो श्रीराम के ऊपर शस्त्रों, वृक्षों और शिलाओं की भयंकर वर्षा होने लगी हो।

 

परन्तु रघुकुल के तेजस्वी श्रीराम उस प्रचण्ड आक्रमण से तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपने तीखे और तीव्रगामी बाणों से उन वृक्षों और शिलाओं को आकाश में ही रोक दिया। उनके धनुष से निकलने वाले बाण इतनी तीव्र गति से चल रहे थे कि शत्रुओं द्वारा छोड़ी गयी प्राणघातक वस्तुएँ श्रीराम तक पहुँचने से पहले ही नष्ट हो जाती थीं।

 

जब शत्रुओं का वह भयंकर आक्रमण समाप्त हुआ, तब श्रीराम अत्यन्त स्थिर होकर खड़े रहे। उनका स्वरूप ऐसा प्रतीत होता था जैसे युद्ध के बीच आँखें मूँदकर खड़ा हुआ कोई विशाल, अडिग साँड़ अपने चारों ओर के कोलाहल से अप्रभावित हो। किंतु उस शान्त बाहरी रूप के भीतर अधर्म और अत्याचार का सामना करने का प्रचण्ड संकल्प जाग चुका था। समस्त राक्षसों का संहार करने के लिए उनके हृदय में तीव्र क्रोध उत्पन्न हुआ।

 

क्रोध से उनके नेत्रों में तेज चमक उठा। उनके पराक्रम से पूरा रणक्षेत्र मानो प्रकाशित हो गया। उन्होंने दूषण सहित सम्पूर्ण राक्षस-सेना पर चारों दिशाओं से बाणों की ऐसी वर्षा आरम्भ कर दी कि राक्षसों में फिर से भय व्याप्त हो गया।

 

अपने सामने अपने सैनिकों को गिरते देखकर दूषण का क्रोध और बढ़ गया। उसने श्रीराम को रोकने के लिए वज्र के समान कठोर और तीक्ष्ण बाण छोड़े। वह पूरी शक्ति से युद्ध कर रहा था और उसे विश्वास था कि वह किसी प्रकार श्रीराम को रोक लेगा।

 

किन्तु श्रीराम ने दूषण के प्रहारों का उत्तर अत्यन्त तीव्रता से दिया। उन्होंने क्षुर नामक तीखे बाण से दूषण का विशाल धनुष काट डाला। धनुष टूटते ही दूषण के हाथ से उसका सबसे महत्वपूर्ण अस्त्र छिन गया। इसके बाद श्रीराम ने चार तीखे बाण चलाकर उसके चारों घोड़ों को मार गिराया और एक अर्धचन्द्राकार बाण से उसके सारथि का भी अंत कर दिया। फिर तीन बाणों से उन्होंने दूषण की छाती को घायल कर दिया।

 

अब दूषण रथ, धनुष, घोड़ों और सारथि—सबसे वंचित हो चुका था। लेकिन उसका युद्ध करने का उत्साह समाप्त नहीं हुआ। वह अत्यन्त क्रोध में भर उठा। उसने एक विशाल परिघ उठा लिया। वह परिघ पर्वत की चोटी के समान विशाल और भयंकर था। उसके ऊपर सोने की परतें चढ़ी थीं और चारों ओर लोहे की तीखी कीलें लगी थीं। वह इतना कठोर और भारी था कि शत्रु के नगर-द्वार तक को तोड़ सकता था।

 

उस भयंकर परिघ को हाथ में लेकर दूषण क्रोध से गरजता हुआ श्रीराम की ओर दौड़ा। उसका रूप रणभूमि में किसी विशाल और क्रूर सर्प के समान भयावह दिखाई दे रहा था। वह पूरी शक्ति से श्रीराम पर प्रहार करने के लिए आगे बढ़ा।

 

श्रीराम ने उसकी गति को देखा और तनिक भी घबराए नहीं। उन्होंने अत्यन्त तीव्र गति से दो बाण छोड़े। वे दोनों बाण दूषण की दोनों भुजाओं पर जा लगे और उसकी दोनों भुजाएँ काट डालीं। भुजाओं के कटते ही दूषण के हाथ से वह विशाल परिघ छूट गया और इन्द्रध्वज के समान भारी गर्जना करता हुआ भूमि पर जा गिरा।

 

जिस दूषण ने कुछ ही क्षण पहले श्रीराम पर आक्रमण करने के लिए उस विशाल अस्त्र को उठाया था, वही अब अपनी कटी हुई भुजाओं के साथ धरती पर गिर पड़ा। यह दृश्य ऐसा था जैसे अपने दोनों दाँतों से वंचित कोई विशाल और शक्तिशाली गजराज अचानक धराशायी हो जाए।

 

दूषण के मारे जाने का दृश्य देखकर रणभूमि में उपस्थित सभी प्राणियों के मन में श्रीराम के पराक्रम के प्रति आदर उमड़ पड़ा। चारों ओर से ‘साधु! साधु!’ की ध्वनि सुनाई देने लगी। श्रीराम की वीरता और धर्म के लिए उनके अदम्य संकल्प की प्रशंसा होने लगी।

 

लेकिन युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ था।

 

दूषण के पतन के बाद सेना के अग्रभाग में चलने वाले तीन महाबली राक्षस—महाकपाल, स्थूलाक्ष और प्रमाथी—क्रोध से भरकर श्रीराम की ओर बढ़े। उन्हें ऐसा लग रहा था कि यदि वे तीनों मिलकर आक्रमण करें तो श्रीराम को रोक सकते हैं। वे मृत्यु के समान भयंकर रूप धारण किए हुए युद्धभूमि में आगे बढ़े।

 

महाकपाल ने विशाल शूल उठा लिया। स्थूलाक्ष ने अपने हाथ में पट्टिश सँभाला और प्रमाथी ने फरसा उठा लिया। तीनों ने एक साथ श्रीराम पर धावा बोल दिया।

 

श्रीराम ने उन तीनों को अपनी ओर आते देखा। उनके चेहरे पर युद्ध का आत्मविश्वास था। उन्होंने तीखे अग्रभाग वाले बाणों को धनुष पर चढ़ाया और उन तीनों का उसी प्रकार स्वागत किया, जैसे द्वार पर आए अतिथियों का किया जाता है—अंतर केवल इतना था कि इस रणभूमि में उनका ‘स्वागत’ तीक्ष्ण बाणों से हुआ।

 

श्रीराम के बाणों ने महाकपाल का सिर काटकर गिरा दिया। प्रमाथी पर उन्होंने असंख्य बाणों की ऐसी वर्षा की कि वह उनके प्रहारों से धराशायी हो गया। स्थूलाक्ष की विशाल आँखों को भी श्रीराम के तीखे बाणों ने अपना लक्ष्य बना लिया।

 

तीनों अग्रगामी राक्षसों का वह समूह कुछ ही क्षणों में धरती पर पड़ा था। उनका विशाल शरीर ऐसा लग रहा था मानो अनेक शाखाओं वाला कोई विशाल वृक्ष टूटकर धरती पर गिर पड़ा हो।

 

अब श्रीराम ने अपना ध्यान दूषण के पाँच हजार अनुयायी राक्षसों की ओर किया। उन्होंने उतने ही बाण चलाए जितने राक्षस शेष थे। श्रीराम के प्रत्येक बाण ने अपने लक्ष्य को भेद दिया और देखते ही देखते दूषण के पाँच हजार अनुयायी भी रणभूमि में मारे गए।

 

दूषण और उसकी विशाल सेना के विनाश का समाचार जब खर तक पहुँचा, तो उसका क्रोध सीमा पार कर गया। उसके भीतर प्रतिशोध की अग्नि और भी प्रचण्ड हो उठी। उसने अपने शक्तिशाली सेनापतियों को आदेश दिया कि वे एक विशाल सेना लेकर श्रीराम पर टूट पड़ें और उन्हें किसी भी प्रकार युद्ध में समाप्त कर दें।

 

खर के आदेश के साथ ही युद्ध का एक नया चरण आरम्भ हुआ। खर स्वयं भी श्रीराम की ओर बढ़ा और उसके साथ बारह महापराक्रमी सेनापति—श्येनगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, विहङ्गम, दुर्जय, करवीराक्ष, परुष, कालकार्मुक, हेममाली, महामाली, सर्पास्य और रुधिराशन—भी अपनी-अपनी सेनाओं के साथ श्रीराम पर टूट पड़े।

 

चारों ओर से बाणों की वर्षा होने लगी। असंख्य राक्षस श्रीराम को घेरकर आक्रमण कर रहे थे। रणभूमि में धूल उड़ रही थी और शस्त्रों की टकराहट से वातावरण गूँज रहा था।

 

लेकिन श्रीराम अकेले थे—और फिर भी उनके मन में तनिक भी भय नहीं था।

 

उन्होंने सोने और हीरों से सजे हुए तेजस्वी बाण उठाए। वे बाण अग्नि की ज्वाला के समान चमक रहे थे। श्रीराम के धनुष से निकलते ही वे बिजली की गति से राक्षसों की ओर दौड़ते और अपने लक्ष्य को भेदते जाते।

 

श्रीराम के स्वर्ण-पंखों वाले बाणों ने देखते ही देखते राक्षसों की विशाल सेना को तहस-नहस करना शुरू कर दिया। उनका वेग ऐसा था मानो आकाश से प्रचण्ड वज्र गिरकर विशाल वृक्षों को जड़ से उखाड़ रहा हो। राक्षसों के समूह एक के बाद एक धरती पर गिरते चले गए।

 

श्रीराम ने अपनी अद्भुत युद्ध-कुशलता का परिचय देते हुए कर्णिनामक सौ बाणों से सौ राक्षसों को एक साथ मार गिराया। फिर उन्होंने सहस्र बाणों से सहस्र निशाचरों का संहार कर दिया। उनके बाणों की गति इतनी तीव्र थी कि देखते ही देखते असंख्य राक्षस युद्धभूमि में गिर पड़े।

 

उनके बाणों ने राक्षसों के कवचों को चीर दिया, उनके धनुष और आभूषणों को तोड़ दिया। थोड़ी ही देर में रणभूमि का दृश्य पूरी तरह बदल गया। चारों ओर घायल और मारे गए राक्षसों के शरीर पड़े थे और भूमि रक्त से भीग गयी थी।

 

युद्ध इतना भयंकर हो चुका था कि पूरी रणभूमि रक्त से लथपथ दिखाई देने लगी। खुले बालों वाले राक्षसों के शरीर धरती पर इस प्रकार बिखरे पड़े थे जैसे कुशों से ढकी कोई विशाल वेदी हो। रक्त और मांस के कारण भूमि पर कीचड़-सा बन गया था और वह भयानक वन किसी नरक के समान प्रतीत होने लगा।

 

इस पूरे विनाश के बीच सबसे अद्भुत बात यह थी कि श्रीराम अकेले थे। उनके साथ कोई विशाल सेना नहीं थी। वे पैदल ही युद्ध कर रहे थे। सामने चौदह हजार भयंकर, पराक्रमी और दुर्धर्ष राक्षसों की विशाल सेना थी—फिर भी श्रीराम ने अपने अद्भुत शौर्य और धनुर्विद्या के बल पर उस पूरी सेना का संहार कर दिया।

 

जब युद्ध का कोलाहल धीरे-धीरे शांत होने लगा, तब रणभूमि में राक्षसों की विशाल सेना का नामोनिशान लगभग मिट चुका था। चौदह हजार राक्षसों में केवल दो ही प्रमुख योद्धा जीवित बचे थे—महारथी खर और त्रिशिरा।

 

श्रीराम अभी भी उसी प्रकार युद्ध के लिए दृढ़तापूर्वक खड़े थे। उनके भीतर न थकान का भय था, न शत्रुओं की संख्या का दबाव। वे धर्म की रक्षा के अपने संकल्प में अडिग थे।

 

खर और त्रिशिरा को छोड़कर सभी राक्षस श्रीराम के हाथों मारे जा चुके थे। जो सेना कुछ समय पहले गर्जना करती हुई रणभूमि में उतरी थी, वही अब पूर्णतः नष्ट हो चुकी थी।

 

अपनी भयंकर सेना को इस प्रकार समाप्त हुआ देखकर खर के क्रोध की कोई सीमा न रही। उसके सामने उसके महान् सेनापतियों और हजारों सैनिकों का विनाश हो चुका था। फिर भी उसने पीछे हटने का विचार नहीं किया।

 

वह एक विशाल रथ पर सवार हुआ और श्रीराम का सामना करने के लिए आगे बढ़ा। उसका रथ रणभूमि में उसी प्रकार श्रीराम की ओर बढ़ रहा था, जैसे वज्र धारण करने वाला देवराज इन्द्र किसी प्रबल शत्रु पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ता हो।

 

अब रणभूमि में एक निर्णायक सामना होने वाला था—एक ओर अकेले, अडिग और धर्म के लिए खड़े श्रीराम; दूसरी ओर अपनी पूरी सेना के विनाश से क्रोध में जलता हुआ खर।
 

प्रश्न–उत्तर

प्रश्न 1. दूषण ने श्रीराम पर आक्रमण करने के लिए कितने राक्षसों को आगे बढ़ने की आज्ञा दी?
उत्तर: दूषण ने युद्ध से पीछे न हटने वाले पाँच हजार अत्यन्त बलवान, वेगशाली और दुर्धर्ष राक्षसों को श्रीराम पर आक्रमण करने भेजा।

प्रश्न 2. पाँच हजार राक्षसों ने श्रीराम पर किस प्रकार आक्रमण किया?
उत्तर: राक्षसों ने चारों ओर से शूल, पट्टिश, तलवार, पत्थर, वृक्ष और असंख्य बाणों की लगातार वर्षा करते हुए श्रीराम को घेर लिया।

प्रश्न 3. श्रीराम ने राक्षसों द्वारा की गई शस्त्रों, वृक्षों और शिलाओं की वर्षा को कैसे रोका?
उत्तर: श्रीराम ने अपने तीखे और तीव्रगामी बाणों द्वारा राक्षसों की ओर से छोड़ी गई वृक्षों और शिलाओं की प्राणघातक वर्षा को रोक दिया।

प्रश्न 4. राक्षसों की प्रचण्ड वर्षा रुकने के बाद श्रीराम किस प्रकार खड़े रहे?
उत्तर: शत्रुओं की भयंकर वर्षा रोकने के बाद श्रीराम आँखें मूँदे हुए साँड़ की भाँति अत्यन्त स्थिर, अविचल और आत्मविश्वास से खड़े रहे।

प्रश्न 5. दूषण ने श्रीराम को रोकने के लिए क्या किया?
उत्तर: दूषण ने अत्यन्त क्रोधित होकर वज्र के समान कठोर बाणों की वर्षा की और श्रीराम को रोकने का प्रयास किया।

प्रश्न 6. श्रीराम ने दूषण के रथ को किस प्रकार नष्ट किया?
उत्तर: श्रीराम ने क्षुर बाण से दूषण का धनुष काटा, चार बाणों से उसके घोड़े मारे और अर्धचन्द्राकार बाण से सारथि का सिर काट दिया।

प्रश्न 7. रथ और धनुष नष्ट होने के बाद दूषण ने कौन-सा अस्त्र उठाया?
उत्तर: रथहीन होने के बाद दूषण ने पर्वतशिखर के समान विशाल, स्वर्णपत्रों से मढ़ा और लोहे की कीलों वाला भयंकर परिघ उठाया।

प्रश्न 8. दूषण द्वारा उठाया गया परिघ कैसा था?
उत्तर: वह विशाल परिघ स्वर्णपत्रों से मढ़ा, लोहे की तीखी कीलों से युक्त और अत्यन्त कठोर था तथा शत्रुओं के नगरद्वार को भी तोड़ सकता था।

प्रश्न 9. श्रीराम ने दूषण के आक्रमण का सामना किस प्रकार किया?
उत्तर: दूषण को परिघ लेकर अपनी ओर आते देखकर श्रीराम ने दो तीखे बाण चलाए और उसकी दोनों भुजाएँ काट डालीं।

प्रश्न 10. दूषण की मृत्यु की तुलना किस घटना से की गई है?
उत्तर: दूषण की मृत्यु की तुलना दोनों दाँतों से वंचित होकर धरती पर गिर पड़ने वाले विशाल और शक्तिशाली गजराज से की गई है।

प्रश्न 11. दूषण के मारे जाने के बाद कौन-कौन से तीन राक्षस श्रीराम पर टूट पड़े?
उत्तर: दूषण के बाद महाकपाल, स्थूलाक्ष और महाबली प्रमाथी क्रोधित होकर अपने-अपने शस्त्रों के साथ श्रीराम पर आक्रमण करने के लिए टूट पड़े।

प्रश्न 12. महाकपाल, स्थूलाक्ष और प्रमाथी कौन-कौन से शस्त्र लेकर युद्ध में आए?
उत्तर: महाकपाल ने विशाल शूल, स्थूलाक्ष ने पट्टिश और प्रमाथी ने फरसा सँभाला तथा तीनों ने मिलकर श्रीराम पर आक्रमण किया।

प्रश्न 13. श्रीराम ने तीनों अग्रगामी राक्षसों का किस प्रकार अंत किया?
उत्तर: श्रीराम ने महाकपाल का सिर काट दिया, प्रमाथी को असंख्य बाणों से मार गिराया और स्थूलाक्ष की विशाल आँखों को बाणों से भर दिया।

प्रश्न 14. दूषण के पाँच हजार अनुयायियों का श्रीराम ने किस प्रकार संहार किया?
उत्तर: श्रीराम ने दूषण के पाँच हजार अनुयायी राक्षसों को उतने ही तीखे बाणों का लक्ष्य बनाकर थोड़े ही समय में मार डाला।

प्रश्न 15. दूषण और उसके अनुयायियों की मृत्यु का समाचार सुनकर खर की क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर: दूषण और उसके अनुयायियों की मृत्यु सुनकर खर अत्यन्त क्रोधित हुआ और उसने अपने महाबली सेनापतियों को श्रीराम पर आक्रमण करने की आज्ञा दी।

प्रश्न 16. खर के साथ श्रीराम पर आक्रमण करने वाले बारह सेनापतियों के नाम क्या थे?
उत्तर: श्येनगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, विहङ्गम, दुर्जय, करवीराक्ष, परुष, कालकार्मुक, हेममाली, महामाली, सर्पास्य और रुधिराशन बारह सेनापति थे।

प्रश्न 17. श्रीराम ने राक्षसों की विशाल सेना का सामना किस प्रकार किया?
उत्तर: श्रीराम ने सोने और हीरों से विभूषित अग्नितुल्य तेजस्वी बाण चलाकर राक्षसों की विशाल सेना के बचे हुए सैनिकों का भी संहार कर दिया।

प्रश्न 18. श्रीराम के बाणों की तुलना वज्र से क्यों की गई है?
उत्तर: श्रीराम के सोने की पाँख वाले बाणों ने राक्षसों को उसी प्रकार नष्ट किया, जैसे वज्र बड़े-बड़े वृक्षों को नष्ट कर देता है।

प्रश्न 19. श्रीराम ने कर्णिनामक बाणों से कितने राक्षसों का संहार किया?
उत्तर: श्रीराम ने कर्णिनामक सौ बाणों से सौ राक्षसों और सहस्र बाणों से एक साथ एक हजार निशाचरों का संहार किया।

प्रश्न 20. युद्धभूमि का दृश्य इतना भयंकर क्यों हो गया था?
उत्तर: असंख्य राक्षसों के मारे जाने से उनके रक्त और मांस की कीचड़ जम गई थी, जिससे पूरी रणभूमि अत्यन्त भयंकर और नरक जैसी दिखाई दे रही थी।

प्रश्न 21. श्रीराम ने चौदह हजार राक्षसों की सेना का सामना किस परिस्थिति में किया?
उत्तर: श्रीराम अकेले और पैदल होकर भी भयानक कर्म करने वाले चौदह हजार राक्षसों की विशाल सेना के सामने निर्भय होकर युद्ध करते रहे।

प्रश्न 22. चौदह हजार राक्षसों में अंततः कौन-कौन जीवित बचे?
उत्तर: श्रीराम के हाथों चौदह हजार राक्षसों के संहार के बाद केवल महारथी खर और त्रिशिरा ही उस विशाल सेना में जीवित बचे।

प्रश्न 23. अपनी सेना का विनाश देखकर खर ने क्या किया?
उत्तर: अपनी भयंकर सेना को श्रीराम द्वारा मारा हुआ देखकर खर क्रोध से भर उठा और एक विशाल रथ पर सवार होकर श्रीराम की ओर बढ़ा।

प्रश्न 24. खर का श्रीराम की ओर बढ़ना किसके आक्रमण के समान बताया गया है?
उत्तर: खर का विशाल रथ लेकर श्रीराम की ओर बढ़ना ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वज्रधारी देवराज इन्द्र किसी शत्रु पर आक्रमण करने जा रहे हों।

प्रश्न 25. चौदह हजार राक्षसों के संहार के बाद श्रीराम की स्थिति कैसी थी?
उत्तर: इतनी बड़ी सेना का संहार करने के बाद भी श्रीराम युद्धभूमि में उसी प्रकार अडिग और युद्ध के लिए तत्पर खड़े रहे, जैसे पहले थे।