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(27)
त्रिशिरा का रणप्रवेश और श्रीराम के हाथों उसका अंत
खर को श्रीराम की ओर बढ़ते हुए देखकर उसकी सेना का सेनापति त्रिशिरा तुरंत उसके पास पहुँचा। वह अत्यंत पराक्रमी और युद्धकुशल राक्षस था। उसके मन में युद्ध के प्रति प्रबल उत्साह था और वह स्वयं को श्रीराम के सामने उतारकर अपनी वीरता सिद्ध करना चाहता था।
त्रिशिरा ने खर से कहा, “राक्षसराज! आप स्वयं इस युद्ध में आगे न बढ़ें। मुझे इस युद्ध में भेज दीजिए। मैं अपने पराक्रम से महाबाहु श्रीराम का सामना करूँगा और उन्हें युद्धभूमि में मार गिराऊँगा। आप कुछ समय के लिए पीछे रहकर मेरे युद्ध का परिणाम देखिए।”
उसने अपने शब्दों को और दृढ़ करते हुए कहा, “मैं आपके सामने प्रतिज्ञा करता हूँ और अपने अस्त्र-शस्त्रों को स्पर्श करके शपथ लेता हूँ कि जिन श्रीराम ने हमारे असंख्य राक्षसों का संहार किया है, उनका मैं अवश्य वध करूँगा। आज इस रणभूमि में हम दोनों में से किसी एक का अंत निश्चित है—या तो मैं श्रीराम को मारूँगा या श्रीराम मेरे प्राण ले लेंगे।”
त्रिशिरा ने खर को एक और प्रस्ताव दिया, “यदि मैं श्रीराम का वध कर दूँ, तो आप प्रसन्न होकर जनस्थान लौट जाइएगा। लेकिन यदि श्रीराम मुझे पराजित कर दें, तब आप स्वयं पूरी शक्ति के साथ उन पर आक्रमण कीजिएगा। अभी आप कुछ समय के लिए युद्ध का परिणाम देखने वाले साक्षी बन जाइए।”
त्रिशिरा के मन में भगवान् श्रीराम के हाथों मृत्यु प्राप्त करने की एक विचित्र लालसा भी थी। वह नहीं जानता था कि जिस युद्ध को वह अपनी वीरता दिखाने का अवसर समझ रहा है, वही उसके जीवन का अंतिम युद्ध बनने वाला है। खर ने उसकी बात स्वीकार कर ली और उसे युद्ध करने की अनुमति दे दी।
आज्ञा मिलते ही त्रिशिरा अपने विशाल और तेजस्वी रथ पर सवार हुआ। उसके रथ में शक्तिशाली घोड़े जुते हुए थे। वह जिस वेग से रणभूमि की ओर बढ़ा, उससे ऐसा प्रतीत होता था मानो तीन शिखरों वाला कोई विशाल पर्वत ही श्रीराम की ओर चला आ रहा हो।
रणभूमि में पहुँचते ही त्रिशिरा ने श्रीराम पर बाणों की घोर वर्षा आरम्भ कर दी। उसके बाण आकाश को इस प्रकार ढकने लगे मानो आकाश में उमड़े हुए घने बादल जल की धाराएँ बरसा रहे हों। वह भयंकर गर्जना करता हुआ श्रीराम को युद्ध के लिए ललकार रहा था। उसके रथ के पहियों की गति, घोड़ों की टाप और अस्त्रों की टंकार से पूरा रणक्षेत्र गूँज उठा।
श्रीराम ने त्रिशिरा को अपनी ओर आते देखा। रघुनाथजी तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपने धनुष को दृढ़ता से संभाला और तीक्ष्ण बाणों की वर्षा करते हुए उस राक्षस का सामना स्वीकार कर लिया। दोनों महान योद्धा आमने-सामने खड़े थे। उनकी भिड़ंत ऐसी भयंकर दिखाई दे रही थी मानो कोई शक्तिशाली सिंह और विशाल गजराज एक-दूसरे से युद्ध कर रहे हों।
युद्ध और भी उग्र हो गया। तभी त्रिशिरा ने तीन तीखे बाण चलाए, जो सीधे श्रीराम के ललाट में जा लगे। उन बाणों से श्रीराम के मस्तक पर चोट पहुँची। त्रिशिरा को अपने इस प्रहार पर गर्व हुआ, मानो उसने कोई बहुत बड़ा पराक्रम कर दिखाया हो।
श्रीराम ने उसके इस दुस्साहस को देखा। उनके नेत्रों में क्रोध की ज्वाला प्रज्वलित हो उठी। उन्होंने शांत किंतु व्यंग्यपूर्ण स्वर में कहा, “वाह! तुम्हारे पराक्रम की यही सीमा है कि तुमने फूलों के समान कोमल बाणों से मेरे ललाट पर प्रहार किया है। अब तुम भी मेरे धनुष से छूटने वाले बाणों की शक्ति का अनुभव करो।”
इतना कहते ही श्रीराम का क्रोध प्रचंड हो उठा। उन्होंने अपने धनुष पर बाण चढ़ाए और अत्यंत वेग से चौदह बाण त्रिशिरा की छाती में मार दिए। वे बाण इतने तीक्ष्ण और भयंकर थे कि उनका प्रहार विषैले सर्पों के डसने जैसा प्रतीत होता था। त्रिशिरा का शरीर उन प्रहारों से हिल उठा, किंतु वह अभी भी युद्ध से पीछे हटने को तैयार नहीं था।
श्रीराम ने उसे संभलने का अवसर भी नहीं दिया। उन्होंने चार तीक्ष्ण बाण चलाकर त्रिशिरा के चारों घोड़ों को धराशायी कर दिया। रथ का वेग अचानक रुक गया। इसके बाद उन्होंने आठ बाणों से उसके सारथी को भी मार गिराया। कुछ ही क्षणों में त्रिशिरा का शक्तिशाली रथ निष्प्राण होकर रणभूमि में खड़ा रह गया।
श्रीराम ने अगला बाण चलाकर उसकी ध्वजा भी काट गिराई। त्रिशिरा समझ गया कि उसका रथ नष्ट हो चुका है और अब उसे पैदल ही युद्ध करना पड़ेगा। वह रथ से नीचे उतरने के लिए आगे बढ़ा, लेकिन श्रीराम ने उसे कोई अवसर नहीं दिया। उनके तीक्ष्ण बाण लगातार उसकी ओर बढ़े और उसके वक्षस्थल को भेदते चले गए।
लगातार हुए प्रहारों से त्रिशिरा का शरीर अत्यंत पीड़ित हो उठा। उसकी शक्ति क्षीण पड़ने लगी। वह कुछ क्षणों के लिए मानो जड़वत् होकर खड़ा रह गया। रणभूमि में उसके सामने अब वही श्रीराम थे, जिन्हें मारने का उसने कुछ ही समय पहले गर्वपूर्वक संकल्प लिया था।
तब श्रीराम ने अपने भीतर उमड़ते क्रोध को एकाग्र शक्ति में बदल दिया। उन्होंने तीन अत्यंत वेगवान और विनाशकारी बाण उठाए। धनुष की प्रत्यञ्चा खिंची और अगले ही क्षण वे तीनों बाण बिजली की गति से त्रिशिरा की ओर चले।
तीनों बाणों ने त्रिशिरा के तीनों मस्तकों को काटकर अलग कर दिया। उसका विशाल शरीर रणभूमि में डगमगाया और देखते ही देखते धरती पर गिर पड़ा। जो राक्षस कुछ समय पहले गर्व से श्रीराम को युद्ध की चुनौती दे रहा था, उसका अंत श्रीराम के बाणों से हो चुका था।
त्रिशिरा के मस्तक भूमि पर गिर पड़े और उसका विशाल शरीर भी रणभूमि में धराशायी हो गया। श्रीराम के बाणों से घायल उसका शरीर रक्त बहाता हुआ निश्चेष्ट पड़ा था। युद्धभूमि में उसके अंत ने राक्षसों के हृदय में भय की लहर दौड़ा दी।
खर की सेना में बचे हुए राक्षसों ने जब अपने सेनापति त्रिशिरा को इस प्रकार मारा हुआ देखा, तो उनका साहस टूट गया। वे श्रीराम के पराक्रम से भयभीत होकर चारों दिशाओं में भागने लगे। उनकी दशा ऐसी थी जैसे किसी भयंकर व्याघ्र को देखकर भयभीत हुए मृग बिना पीछे देखे प्राण बचाकर भागते हैं।
राक्षसों को इस प्रकार भागते देखकर खर का क्रोध और भी भड़क उठा। उसे अपनी सेना का पीछे हटना असह्य लगा। उसके भीतर प्रतिशोध की आग धधक उठी। उसने भागते हुए राक्षसों को वापस बुलाया और स्वयं श्रीराम की ओर बढ़ पड़ा।
अब खर के मन में केवल एक ही विचार था—अपने सामने घट रही राक्षसों की पराजय का बदला लेना। वह अत्यंत क्रोध में श्रीराम पर टूट पड़ा। उसका वह आक्रमण ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो राहु आकाश में चन्द्रमा को ग्रसने के लिए उसकी ओर झपट रहा हो।
इस प्रकार त्रिशिरा का अंत होते ही युद्ध का अगला और भी भयंकर चरण आरम्भ होने वाला था—अब स्वयं खर और श्रीराम आमने-सामने होने जा रहे थे।
पठन-बोध : प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. त्रिशिरा ने खर से युद्ध में जाने का आग्रह क्यों किया?
उत्तर: त्रिशिरा श्रीराम से स्वयं युद्ध करके अपनी वीरता सिद्ध करना चाहता था। उसने खर को पीछे रहकर युद्ध का परिणाम देखने के लिए कहा।
प्रश्न 2. त्रिशिरा ने खर के सामने कौन-सी प्रतिज्ञा की?
उत्तर: त्रिशिरा ने प्रतिज्ञा की कि वह श्रीराम का वध अवश्य करेगा। उसने अपने अस्त्र-शस्त्रों को स्पर्श करके अपनी प्रतिज्ञा दृढ़ की।
प्रश्न 3. त्रिशिरा ने खर को युद्ध के परिणाम के विषय में क्या सुझाव दिया?
उत्तर: उसने कहा कि यदि वह श्रीराम को मार दे तो खर जनस्थान लौट जाएँ और यदि वह मारा जाए तो खर स्वयं युद्ध करें।
प्रश्न 4. त्रिशिरा के मन में श्रीराम के हाथों मृत्यु पाने की कैसी भावना थी?
उत्तर: त्रिशिरा के मन में भगवान् श्रीराम के हाथों मृत्यु प्राप्त करने की लालसा थी। वह इस युद्ध को अपने जीवन का निर्णायक अवसर मान रहा था।
प्रश्न 5. त्रिशिरा युद्धभूमि में किस प्रकार पहुँचा?
उत्तर: त्रिशिरा घोड़ों से जुते तेजस्वी रथ पर सवार होकर रणभूमि में पहुँचा। उसका विशाल रूप तीन शिखरों वाले पर्वत जैसा दिखाई दे रहा था।
प्रश्न 6. रणभूमि में पहुँचकर त्रिशिरा ने श्रीराम पर किस प्रकार आक्रमण किया?
उत्तर: त्रिशिरा ने श्रीराम पर बाणों की घोर वर्षा आरम्भ कर दी और भयंकर गर्जना करते हुए उन्हें युद्ध के लिए ललकारा।
प्रश्न 7. श्रीराम और त्रिशिरा का युद्ध किसके समान प्रतीत हो रहा था?
उत्तर: श्रीराम और त्रिशिरा का युद्ध अत्यंत भयंकर था। उनकी भिड़ंत शक्तिशाली सिंह और विशाल गजराज के युद्ध के समान प्रतीत होती थी।
प्रश्न 8. त्रिशिरा ने श्रीराम को क्रोधित क्यों कर दिया?
उत्तर: त्रिशिरा ने तीन बाणों से श्रीराम के ललाट को घायल कर दिया। उसके इस दुस्साहस से श्रीराम क्रोधित होकर प्रचंड वेग से युद्ध करने लगे।
प्रश्न 9. श्रीराम ने त्रिशिरा के तीन बाणों का उत्तर किस प्रकार दिया?
उत्तर: श्रीराम ने क्रोधपूर्वक चौदह तीक्ष्ण बाण चलाकर त्रिशिरा की छाती को भेद दिया, जिससे उसका शरीर अत्यंत पीड़ित हो उठा।
प्रश्न 10. श्रीराम ने त्रिशिरा के रथ को किस प्रकार नष्ट किया?
उत्तर: श्रीराम ने चार बाणों से त्रिशिरा के चारों घोड़े मार गिराए, आठ बाणों से सारथी को मारा और एक बाण से ध्वजा काट दी।
प्रश्न 11. रथ नष्ट होने के बाद त्रिशिरा की क्या स्थिति हुई?
उत्तर: रथ नष्ट होने के बाद त्रिशिरा नीचे उतरने लगा, किंतु श्रीराम ने लगातार बाण चलाकर उसकी छाती को भेद दिया और उसे जड़वत् कर दिया।
प्रश्न 12. श्रीराम ने त्रिशिरा का अंत किस प्रकार किया?
उत्तर: श्रीराम ने तीन अत्यंत वेगवान और विनाशकारी बाण चलाए, जिनसे त्रिशिरा के तीनों मस्तक कटकर भूमि पर गिर पड़े।
प्रश्न 13. त्रिशिरा की मृत्यु का राक्षसों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर: त्रिशिरा की मृत्यु देखकर बचे हुए राक्षस भयभीत हो गए और अपने प्राण बचाने के लिए व्याघ्र से डरे मृगों की तरह भागने लगे।
प्रश्न 14. राक्षसों को भागते देखकर खर की क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर: राक्षसों को भागते देखकर खर अत्यंत क्रोधित हुआ। उसने उन्हें लौटाया और स्वयं श्रीराम पर प्रचंड आक्रमण करने के लिए बढ़ चला।
प्रश्न 15. खर का श्रीराम पर किया गया आक्रमण किस उपमा द्वारा व्यक्त किया गया है?
उत्तर: खर का श्रीराम पर आक्रमण ऐसा प्रतीत हुआ जैसे राहु चन्द्रमा को ग्रसने के लिए उस पर झपटता है।