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खर–श्रीराम का भीषण रण: धर्म और अधर्म का निर्णायक संग्राम
रणभूमि का दृश्य अत्यन्त भयानक और रोमांचकारी हो उठा था। दूषण और त्रिशिरा जैसे महाबली राक्षस श्रीराम के हाथों मारे जा चुके थे। चौदह हजार राक्षस-वीरों की विशाल सेना भी देखते-ही-देखते धराशायी हो गई थी। चारों ओर राक्षस-सेना के विनाश के चिन्ह दिखाई दे रहे थे। यह सब देखकर खर के मन में पहली बार श्रीराम के अद्भुत पराक्रम को लेकर भय उत्पन्न हुआ। जिस वीर को वह साधारण मनुष्य समझ रहा था, उसके सामने उसकी पूरी सेना नष्ट हो चुकी थी।
खर उदास और भीतर से विचलित हो उठा। उसके सामने एक ही प्रश्न था—एक अकेले श्रीराम ने इतनी विशाल और बलशाली राक्षस-सेना का विनाश कैसे कर दिया? दूषण और त्रिशिरा जैसे उसके प्रमुख सेनानायक भी मारे जा चुके थे। चौदह हजार योद्धाओं का बल भी श्रीराम के सामने टिक नहीं सका। यह विचार खर के हृदय में चिंता भर रहा था, फिर भी उसके भीतर का अहंकार उसे पीछे हटने नहीं दे रहा था। वह उसी प्रकार क्रोध से भरकर श्रीराम पर टूट पड़ा, जैसे प्राचीन समय में असुर नमुचि ने देवराज इन्द्र को युद्ध के लिए ललकारा था।
खर ने अपने विशाल और शक्तिशाली धनुष को उठाया। उसने प्रत्यञ्चा को जोर से खींचा और श्रीराम की ओर तीखे नाराच-बाणों की वर्षा कर दी। वे बाण इतने भयंकर दिखाई दे रहे थे, मानो क्रोध से फुफकारते हुए विषैले सर्प आकाश में दौड़ रहे हों। खर के भीतर क्रोध, प्रतिशोध और अपमान की अग्नि एक साथ धधक रही थी। वह अपनी पूरी शक्ति के साथ श्रीराम को परास्त करना चाहता था।
धनुर्विद्या में अत्यन्त निपुण खर अपने रथ पर खड़ा होकर बड़ी तेजी से धनुष चला रहा था। कभी वह प्रत्यञ्चा को झटके से खींचता, कभी अलग-अलग प्रकार के अस्त्रों का प्रदर्शन करता और कभी अपने रथ को युद्धभूमि में इस प्रकार घुमाता कि देखने वालों को उसकी युद्ध-कुशलता पर आश्चर्य होता। उसका रथ रणभूमि में तीव्र गति से घूम रहा था और उसके बाण चारों ओर चमक रहे थे।
खर ने इतनी तीव्र गति से बाण चलाए कि मानो उसने आकाश की सभी दिशाओं और विदिशाओं को अपने बाणों से ढक दिया हो। लेकिन श्रीराम तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने भी अपना विशाल धनुष उठाया और प्रत्युत्तर में असंख्य बाण छोड़ दिए। देखते ही देखते दोनों ओर से बाणों की ऐसी वर्षा होने लगी कि आकाश का कोई भाग खाली दिखाई नहीं देता था।
दृश्य ऐसा था मानो घने बादल आकाश में उमड़ आए हों और चारों ओर जल की वर्षा हो रही हो। पर यहाँ जल नहीं, बल्कि श्रीराम के अग्नि की चिनगारियों जैसे चमकते हुए तीखे बाण बरस रहे थे। उनके बाण आकाश को इस प्रकार भर रहे थे कि क्षणभर के लिए ऐसा प्रतीत होता था जैसे रणभूमि और आकाश के बीच कोई अंतर ही नहीं रह गया हो।
खर और श्रीराम के बाण आपस में टकराते हुए चारों दिशाओं में फैल रहे थे। दोनों योद्धाओं के बाणों से आकाश इतना भर गया कि उसमें मानो थोड़ी-सी भी जगह शेष नहीं थी। दोनों के बीच युद्ध की तीव्रता क्षण-प्रतिक्षण बढ़ती जा रही थी।
उन दोनों के बाणों का जाल इतना घना था कि सूर्य का प्रकाश भी मानो उसके भीतर दब गया। आकाश में उड़ते हुए बाणों के कारण सूर्यदेव का तेज स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था। रणभूमि में उपस्थित देवता, महर्षि और अन्य दिव्य दर्शक इस अद्भुत युद्ध को आश्चर्य से देख रहे थे। दो महान् योद्धा एक-दूसरे को परास्त करने के लिए पूरी शक्ति से संघर्ष कर रहे थे।
खर ने फिर और भी तीखे बाण उठाए। उसने नालीक, नाराच और विकर्णि नामक बाणों से श्रीराम पर प्रहार किया। उसके बाण इतने तीक्ष्ण थे कि उनका प्रहार किसी विशाल हाथी पर अंकुशों की चोट जैसा प्रतीत होता था। खर के भीतर अब क्रोध अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका था।
उस समय रथ पर धनुष लेकर स्थिर खड़े खर को देखने वाले सभी प्राणी उसे मृत्यु के अधिपति यमराज के समान भयानक समझ रहे थे। उसके हाथ में धनुष था, आँखों में क्रोध था और उसके चारों ओर बाणों की वर्षा हो रही थी। ऐसा लगता था मानो वह अकेला ही पूरी रणभूमि को चुनौती दे रहा हो।
खर ने श्रीराम को देखकर यह समझ लिया कि वे युद्ध से थक चुके होंगे। उसे लगा कि लगातार युद्ध करने के कारण अब श्रीराम की शक्ति कम हो गई होगी। यही उसका भ्रम था। श्रीराम समस्त राक्षस-सेना का विनाश करने के बाद भी अपने आत्मबल और धैर्य में अडिग खड़े थे।
यद्यपि खर सिंह के समान गर्व और पराक्रम के साथ आगे बढ़ रहा था, श्रीराम के मन में उसके प्रति कोई भय नहीं था। जैसे जंगल का शक्तिशाली सिंह किसी छोटे मृग को देखकर भयभीत नहीं होता, उसी प्रकार श्रीराम खर की गर्जना और पराक्रम से तनिक भी विचलित नहीं हुए। उनके चेहरे पर धैर्य था और मन में विजय का दृढ़ विश्वास।
तभी खर अपने सूर्य के समान चमकते विशाल रथ को तेजी से चलाता हुआ श्रीराम के निकट आ पहुँचा। उसकी गति ऐसी थी जैसे कोई पतंगा स्वयं अग्नि की ओर आकर्षित होकर चला जाता है। वह अपने क्रोध में यह भूल चुका था कि जिसके सामने वह जा रहा है, वही उसकी पूरी सेना का विनाश कर चुका है।
श्रीराम के निकट पहुँचते ही खर ने अपनी युद्ध-कुशलता का प्रदर्शन किया। उसने अत्यन्त तेजी से वार करते हुए श्रीराम के बाण सहित धनुष को उस स्थान से काट दिया जहाँ हाथ से उसे पकड़ा जाता था। कुछ क्षण के लिए ऐसा लगा मानो खर ने श्रीराम के अस्त्र को निष्क्रिय कर दिया हो।
इसके बाद खर ने इन्द्र के वज्र के समान चमकते हुए सात और बाण उठाए। क्रोध से भरे हुए खर ने उन बाणों से श्रीराम के शरीर के मर्मस्थलों पर प्रहार किया। फिर उसने सहस्रों बाणों की वर्षा करके श्रीराम को चारों ओर से घायल कर दिया और अपनी विजय की आशा में जोर-जोर से गर्जना करने लगा।
खर के बाणों से श्रीराम का तेजस्वी कवच कटकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। कवच के टूटकर गिरने से रणभूमि में उपस्थित लोगों को लगा कि श्रीराम अब गंभीर रूप से आहत हुए हैं। खर के बाण श्रीराम के शरीर के अनेक अंगों में लगे थे। उनके शरीर से रक्त बह रहा था, फिर भी श्रीराम के तेज में कोई कमी नहीं आई।
इसके विपरीत, क्रोध से भरे श्रीराम का रूप और भी अधिक प्रभावशाली हो उठा। वे रणभूमि में ऐसे दिखाई दे रहे थे जैसे धुएँ से रहित प्रज्वलित अग्नि—जिसका प्रकाश किसी आवरण के हट जाने पर और भी स्पष्ट दिखाई देता है। खर ने समझा था कि बाणों से श्रीराम को कमजोर कर दिया है, पर वास्तव में उसके प्रहारों ने श्रीराम के भीतर का प्रचंड संकल्प और अधिक जागृत कर दिया था।
अब श्रीराम ने अपने शत्रु का अंत करने का निश्चय कर लिया। उन्होंने एक और विशाल धनुष उठाया, जिसकी प्रत्यञ्चा की ध्वनि अत्यन्त गंभीर थी। उस धनुष को हाथ में लेते ही रणभूमि का वातावरण बदल गया। श्रीराम के व्यक्तित्व में अब करुणा और शांति के स्थान पर धर्म की रक्षा के लिए आवश्यक कठोरता और दृढ़ता दिखाई देने लगी।
यह वही महान् वैष्णव धनुष था, जो महर्षि अगस्त्य ने श्रीराम को प्रदान किया था। श्रीराम ने उस दिव्य धनुष को धारण किया और खर की ओर बढ़े। अब युद्ध का निर्णायक चरण आरम्भ हो चुका था।
अत्यन्त क्रोधित श्रीराम ने अपने चमकते हुए बाणों को धनुष पर चढ़ाया। उन बाणों की स्वर्णमयी पंखुड़ियाँ सूर्य के प्रकाश में चमक रही थीं। श्रीराम ने लक्ष्य साधकर ऐसा बाण छोड़ा जिसने खर की ध्वजा को काट डाला।
खर की सुवर्णमयी ध्वजा अनेक टुकड़ों में कटकर पृथ्वी पर जा गिरी। वह ध्वजा इतनी सुंदर और दर्शनीय थी कि उसके धरती पर गिरने का दृश्य अद्भुत प्रतीत हुआ। ऐसा लगा मानो देवताओं की आज्ञा से स्वयं सूर्य का कोई तेजस्वी अंश आकाश से उतरकर पृथ्वी पर आ गया हो।
ध्वजा के गिरते ही खर का क्रोध और बढ़ गया। वह भी युद्ध में पूरी शक्ति से लगा रहा। उसे श्रीराम के मर्मस्थलों का ज्ञान था। उसने लक्ष्य साधकर श्रीराम की छाती और शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अंगों पर चार तीखे बाण मारे। उसका प्रहार ऐसा था जैसे कोई महावत अपने विशाल हाथी पर अंकुश से प्रहार करे।
खर के असंख्य बाणों से श्रीराम का शरीर घायल हो गया और उनका शरीर रक्त से भीग उठा। यह देखकर उनके भीतर प्रचंड क्रोध जागा। अब श्रीराम ने निश्चय कर लिया कि खर के अत्याचार का अंत करने का समय आ गया है।
धनुर्धरों में श्रेष्ठ श्रीराम ने अपने हाथ में वैष्णव धनुष को दृढ़ता से पकड़ा। उन्होंने शांत मन से लक्ष्य निश्चित किया और खर पर छह तीखे बाण छोड़े। उनका निशाना इतना अचूक था कि एक बाण खर के मस्तक में लगा, दो उसकी भुजाओं में और तीन अर्धचन्द्राकार बाण उसकी छाती में जा लगे।
खर को संभलने का अवसर भी नहीं मिला। श्रीराम ने अपने क्रोध को और प्रखर करते हुए शान पर तेज किए हुए सूर्य के समान चमकते तेरह बाण उठाए। अब उनका लक्ष्य केवल खर को घायल करना नहीं, बल्कि उसके युद्ध-सामर्थ्य को पूरी तरह समाप्त करना था।
श्रीराम ने अत्यन्त कुशलता से एक बाण चलाकर खर के रथ का जूआ काट दिया। फिर चार बाणों से उसके चारों चितकबरे घोड़ों को मार गिराया और एक अन्य बाण से उसके सारथी को भी युद्ध से बाहर कर दिया। देखते ही देखते खर का शक्तिशाली रथ निष्क्रिय हो गया।
इसके बाद श्रीराम ने तीन बाणों से रथ के आधारदण्डों को और दो बाणों से उसके धुरे को काट डाला। खर का रथ पूरी तरह टूट गया। फिर एक बाण से श्रीराम ने खर के बाणों से भरे धनुष को दो टुकड़ों में काट दिया। अंत में तेरहवें वज्रतुल्य बाण से उन्होंने खर को घायल कर दिया। श्रीराम के इस अद्भुत पराक्रम को देखकर रणभूमि में उपस्थित सभी लोग स्तब्ध रह गए।
कुछ ही क्षणों में खर का धनुष टूट चुका था, रथ नष्ट हो चुका था, उसके घोड़े मारे जा चुके थे और उसका सारथी भी युद्ध से बाहर हो चुका था। जिस खर के पास अभी कुछ ही समय पहले विशाल रथ, शक्तिशाली धनुष और पूरी सेना का बल था, वह अब अकेला धरती पर खड़ा था।
लेकिन खर ने हार नहीं मानी। वह क्रोध से भर उठा और रथ के टूटे हुए अवशेषों के बीच से एक विशाल गदा उठाकर धरती पर कूद पड़ा। अब उसके सामने केवल श्रीराम थे और हाथ में केवल उसकी गदा।
उधर आकाश में बैठे देवता और महर्षि इस अद्भुत युद्ध के साक्षी बने हुए थे। श्रीराम ने जिस अद्वितीय कौशल और पराक्रम से खर के विशाल रथ, घोड़ों, सारथी और धनुष को नष्ट किया था, उसे देखकर उनके हृदय में आनंद भर उठा। उन्होंने हाथ जोड़कर श्रीराम के पराक्रम की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
रणभूमि में अब एक ओर गदा उठाए क्रोध से भरा खर खड़ा था और दूसरी ओर वैष्णव धनुष धारण किए हुए श्रीराम अडिग खड़े थे। दोनों के बीच होने वाला अगला संघर्ष निर्णायक होने वाला था। देवता और महर्षि भी जानते थे कि यह केवल दो योद्धाओं का युद्ध नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच होने वाले निर्णायक संघर्ष का अंतिम चरण बन चुका है।
प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. दूषण, त्रिशिरा और चौदह हजार राक्षसों के मारे जाने के बाद खर की मनःस्थिति कैसी हो गई?
उत्तर: दूषण, त्रिशिरा और विशाल राक्षस-सेना के विनाश को देखकर खर भयभीत और उदास हो गया तथा श्रीराम के पराक्रम से चिंतित हुआ।
प्रश्न 2. खर ने श्रीराम पर आक्रमण करने का निर्णय क्यों लिया?
उत्तर: अपनी सेना और प्रमुख योद्धाओं के विनाश से क्रोधित होकर खर ने प्रतिशोध लेने तथा श्रीराम को परास्त करने का निश्चय किया।
प्रश्न 3. खर द्वारा छोड़े गए नाराच बाण किसके समान प्रतीत हो रहे थे?
उत्तर: खर के तीखे नाराच बाण क्रोध से भरे विषधर सर्पों के समान प्रतीत हो रहे थे और तीव्र गति से श्रीराम की ओर बढ़ रहे थे।
प्रश्न 4. युद्धभूमि में खर अपनी युद्ध-कुशलता का प्रदर्शन किस प्रकार कर रहा था?
उत्तर: खर रथ पर सवार होकर प्रत्यञ्चा हिलाता, विभिन्न अस्त्र चलाता और अनेक युद्ध-पैंतरे दिखाते हुए तीव्र गति से रणभूमि में विचरण कर रहा था।
प्रश्न 5. श्रीराम और खर के बाणों से युद्धभूमि का आकाश कैसा दिखाई देने लगा?
उत्तर: दोनों योद्धाओं के असंख्य बाणों से आकाश पूरी तरह ढक गया और चारों दिशाओं में कहीं भी खाली स्थान दिखाई नहीं देता था।
प्रश्न 6. श्रीराम और खर के बाणों के कारण सूर्य का प्रकाश क्यों दिखाई नहीं दे रहा था?
उत्तर: दोनों के बाणों का घना जाल आकाश में फैल गया था, जिसके कारण सूर्यदेव का प्रकाश भी स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रहा था।
प्रश्न 7. खर ने श्रीराम को थका हुआ क्यों समझ लिया था?
उत्तर: लगातार युद्ध करने के कारण श्रीराम को अनेक बाण लगे थे और उनका कवच भी गिर चुका था, इसलिए खर ने उन्हें थका समझा।
प्रश्न 8. खर के प्रति श्रीराम के मन में भय क्यों नहीं था?
उत्तर: श्रीराम खर के वास्तविक सामर्थ्य से परिचित थे और अपने आत्मबल तथा पराक्रम पर पूर्ण विश्वास रखते थे, इसलिए वे तनिक भी भयभीत नहीं हुए।
प्रश्न 9. खर ने श्रीराम के धनुष के साथ क्या किया?
उत्तर: खर ने अत्यन्त फुर्ती से वार करके श्रीराम के बाण सहित धनुष को उस स्थान से काट दिया जहाँ वे उसे पकड़ रहे थे।
प्रश्न 10. खर के अनेक बाणों से घायल होने के बाद श्रीराम का रूप कैसा दिखाई दे रहा था?
उत्तर: बाणों से घायल और रक्तरंजित श्रीराम धुएँ से रहित प्रज्वलित अग्नि के समान और भी अधिक तेजस्वी तथा प्रभावशाली दिखाई दे रहे थे।
प्रश्न 11. श्रीराम ने वैष्णव धनुष कब धारण किया और उसका क्या उद्देश्य था?
उत्तर: खर के प्रहारों से क्रोधित होकर श्रीराम ने महर्षि अगस्त्य द्वारा दिए गए वैष्णव धनुष को धारण किया और निर्णायक युद्ध आरम्भ किया।
प्रश्न 12. श्रीराम ने खर की ध्वजा को किस प्रकार नष्ट किया?
उत्तर: श्रीराम ने स्वर्णमयी पंखों वाले तीखे बाण चलाकर खर की दर्शनीय सुवर्ण ध्वजा को काट दिया, जिससे वह अनेक टुकड़ों में धरती पर गिर पड़ी।
प्रश्न 13. खर ने श्रीराम की छाती पर बाण चलाकर किस प्रकार प्रहार किया?
उत्तर: खर ने श्रीराम के मर्मस्थलों, विशेषकर छाती पर चार तीखे बाण चलाए, मानो कोई महावत विशाल हाथी पर अंकुशों से प्रहार कर रहा हो।
प्रश्न 14. श्रीराम ने खर को छह बाणों से किस प्रकार घायल किया?
उत्तर: श्रीराम ने छह बाण चलाए, जिनमें एक खर के मस्तक, दो भुजाओं और तीन अर्धचन्द्राकार बाण उसकी छाती में लगे।
प्रश्न 15. श्रीराम ने खर के रथ को किस प्रकार नष्ट किया?
उत्तर: श्रीराम ने बाणों से खर के रथ का जूआ, चार घोड़े और सारथी को नष्ट कर दिया तथा बाद में रथ के अन्य भाग भी काट डाले।
प्रश्न 16. श्रीराम ने खर के धनुष का क्या किया?
उत्तर: श्रीराम ने अपने बारहवें बाण से खर के बाणों सहित धनुष को दो टुकड़ों में काट दिया और उसकी युद्ध-क्षमता कमजोर कर दी।
प्रश्न 17. रथ नष्ट होने के बाद खर ने क्या किया?
उत्तर: रथ, घोड़ों, सारथी और धनुष के नष्ट हो जाने पर खर गदा लेकर रथ से कूदा और धरती पर युद्ध के लिए खड़ा हो गया।
प्रश्न 18. देवताओं और महर्षियों ने श्रीराम के पराक्रम पर कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त की?
उत्तर: देवता और महर्षि अत्यन्त प्रसन्न हुए, उन्होंने हाथ जोड़कर श्रीराम के अद्भुत पराक्रम की प्रशंसा की और उनके महान् युद्ध-कौशल की सराहना की।