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(29)
खर का अहंकार और श्रीराम का धर्ममय प्रत्युत्तर
खर का रथ युद्धभूमि में नष्ट हो चुका था। उसका विशाल रथ चूर-चूर होकर धरती पर बिखरा पड़ा था। हाथी-घोड़ों से भरी सेना का स्वामी रहा खर अब रथहीन होकर हाथ में अपनी भयंकर गदा लिये श्रीराम के सामने खड़ा था। उसकी आँखों में क्रोध की ज्वाला धधक रही थी, किंतु श्रीराम के मुख पर अद्भुत शान्ति थी। रणभूमि में चारों ओर युद्ध की धूल उड़ रही थी और वातावरण अगले निर्णायक संघर्ष की प्रतीक्षा कर रहा था।
महातेजस्वी श्रीराम ने खर की ओर देखा। उनके स्वर में पहले करुणा और समझाने का भाव था, किंतु धीरे-धीरे वही वाणी कठोर और गंभीर होती गई।
श्रीराम बोले, “निशाचर! तूने विशाल सेना, हाथी, घोड़ों और रथों के बीच खड़े होकर अपने बल और अधिकार का अभिमान किया है। तूने दण्डकारण्य में तपस्या करने वाले निर्दोष मुनियों पर अत्याचार किए, प्राणियों को भयभीत किया और ऐसे क्रूर कर्म किए जिनकी सभी लोकों में निन्दा होती है। याद रख, कोई व्यक्ति कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, यदि उसके कर्म प्राणियों में भय और पीड़ा उत्पन्न करते हैं, तो वह अधिक समय तक अपने ऐश्वर्य और सत्ता को बनाए नहीं रख सकता। तीनों लोकों का स्वामी भी यदि लोकविरोधी और अत्याचारी बन जाए, तो लोग उसे उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं जैसे सामने आए हुए दुष्ट सर्प को मार दिया जाता है।”
श्रीराम की आँखों में अब धर्म के प्रति दृढ़ता दिखाई दे रही थी। उन्होंने खर को उसके भीतर छिपे वास्तविक शत्रु की ओर संकेत करते हुए कहा, “मनुष्य के विनाश का कारण केवल बाहरी शत्रु नहीं होता। उसके भीतर की कामना और लोभ भी उसके पतन का मार्ग बना देते हैं। जो वस्तु प्राप्त नहीं हुई, उसे पाने की तीव्र इच्छा काम कहलाती है और जो प्राप्त हो चुकी है, उसे लगातार अधिकाधिक पाने की इच्छा लोभ है। जब मनुष्य काम और लोभ के वश में होकर पाप करता है और उसके परिणाम को समझने के बजाय उसी पाप में प्रसन्न होता है, तब उसका विनाश निश्चित हो जाता है। यह वैसा ही है जैसे वर्षा के साथ गिरे ओलों को खाने वाली रक्तपुच्छिका नामक कीड़ी अनजाने में अपने ही विनाश का कारण बनती है।”
श्रीराम का स्वर और गंभीर हो गया। “तूने दण्डकारण्य में तपस्या में लगे धर्मपरायण और महान मुनियों की हत्या की है। बता, उनके वध से तुझे कौन-सा कल्याण प्राप्त हुआ? क्या किसी निर्दोष का रक्त बहाकर कोई वास्तव में सुखी हो सकता है?”
उन्होंने आगे कहा, “जिस वृक्ष की जड़ भीतर से खोखली हो जाती है, वह बाहर से कितना ही विशाल और मजबूत दिखाई दे, अधिक समय तक खड़ा नहीं रह सकता। उसी प्रकार पाप करने वाला मनुष्य यदि पूर्व पुण्यों के कारण कुछ समय के लिए ऐश्वर्य और शक्ति प्राप्त भी कर ले, तो उसके पाप उसकी जड़ों को खोखला कर देते हैं। अंततः उसका वैभव और प्रतिष्ठा उससे छिन ही जाती है।”
श्रीराम ने आकाश और वन की ओर संकेत करते हुए कहा, “जैसे ऋतु आने पर वृक्षों में अपने समय के अनुसार फूल अवश्य खिलते हैं, वैसे ही पापकर्म का फल भी अपने समय पर अवश्य प्रकट होता है। कोई व्यक्ति अपने कर्मों के परिणाम से बच नहीं सकता। जैसे विष मिला हुआ अन्न खाने के बाद उसका विषैला परिणाम भोगना ही पड़ता है, उसी प्रकार संसार में किए गए पापकर्मों का फल भी किसी न किसी रूप में प्राप्त होता है।”
अब श्रीराम ने अपने वनवास के उद्देश्य को स्पष्ट किया। “राक्षस! जो लोग संसार का अहित चाहते हुए घोर पापों में लगे हैं, उन्हें दण्ड देने के लिए ही मेरे पिता महाराज दशरथ ने मुझे वन में भेजा है। इसलिए आज तुझे दण्ड देना मेरे लिए व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा का कर्तव्य है।”
श्रीराम ने अपना धनुष संभाला और उनके स्वर में अटल आत्मविश्वास झलकने लगा। उन्होंने कहा, “आज मेरे द्वारा छोड़े गए ये सुवर्णभूषित बाण तेरे शरीर को उसी प्रकार भेदेंगे जैसे सर्प बाँबी को भेदकर बाहर निकलता है। वे तेरे शरीर को विदीर्ण करते हुए पृथ्वी तक को भेद देंगे और पाताल तक पहुँचेंगे।”
फिर उन्होंने खर को उसके अत्याचारों की याद दिलाई। “जिन धर्मपरायण ऋषियों का तूने दण्डकारण्य में वध किया और भक्षण किया है, आज युद्ध में मारा जाकर तू भी उन्हीं के पीछे जाएगा। जिन महर्षियों के प्राण तूने छीन लिए, वे आज दिव्य विमानों पर बैठकर देखेंगे कि अत्याचार करने वाला खर अपने कर्मों का परिणाम प्राप्त कर रहा है।”
श्रीराम ने निर्भीक होकर अंतिम चुनौती दी, “कुलाधम! जितना प्रहार करना चाहता है, कर ले। जितनी शक्ति है, उसका प्रयोग कर और मुझे परास्त करने का प्रयास कर। किंतु आज मैं तेरे मस्तक को ताड़ के फल की तरह काटकर धरती पर गिरा दूँगा।”
श्रीराम के इन दृढ़ वचनों ने खर के भीतर धधकते क्रोध को और भड़का दिया। उसकी आँखें लाल हो गईं। क्रोध से उसका चेहरा विकृत हो उठा। वह कुछ क्षणों के लिए जैसे अपने ऊपर नियंत्रण खो बैठा और फिर व्यंग्यपूर्ण हँसी हँसते हुए श्रीराम को उत्तर देने लगा।
खर ने कहा, “दशरथकुमार! तुमने कुछ साधारण राक्षसों को युद्ध में मार दिया और अब उसी के आधार पर स्वयं अपनी प्रशंसा करने लगे हो? क्या तुम्हें लगता है कि तुम इतनी प्रशंसा के योग्य हो?”
उसके स्वर में उपहास था। वह अपने बल के मद में श्रीराम को नीचा दिखाने का प्रयास कर रहा था।
खर आगे बोला, “जो वास्तव में श्रेष्ठ और पराक्रमी होते हैं, वे अपने पराक्रम का ढिंढोरा नहीं पीटते। उनका बल ही उनके लिए बोलता है। केवल वे ही अपने मुँह से अपनी प्रशंसा करते हैं जो स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख पाते और अपने कुल के लिए कलंक बन जाते हैं। इस समय तुम भी अपने विषय में बढ़-चढ़कर बातें करके अपनी ही बड़ाई कर रहे हो।”
वह और अधिक उत्तेजित होकर बोला, “जब मृत्यु के समान भयंकर युद्ध सामने खड़ा हो, तब कौन-सा वीर स्वयं अपनी प्रशंसा करता है? युद्धभूमि में वीरता शब्दों से नहीं, कर्मों से सिद्ध होती है।”
खर ने श्रीराम का उपहास करते हुए एक और कटु उदाहरण दिया। “पीतल जब सोना शुद्ध करने वाली अग्नि में तपाया जाता है, तब उसकी वास्तविक लघुता और कालिमा सामने आ जाती है। उसी प्रकार अपनी झूठी प्रशंसा करके तुमने भी अपने ही ओछेपन को प्रकट कर दिया है।”
इतना कहकर खर ने अपनी विशाल गदा को और कसकर पकड़ लिया। उसके सामने खड़े श्रीराम को चुनौती देते हुए वह गरजा, “क्या तुम नहीं देखते कि मैं यहाँ अचल पर्वत की तरह स्थिर खड़ा हूँ? मेरे चारों ओर नाना प्रकार की धातुओं से युक्त पर्वतों के समान मेरा बल अडिग है। मेरे हाथ में यह गदा है और मैं अकेला ही यमराज के समान तुम्हारे प्राण लेने की शक्ति रखता हूँ। इतना ही नहीं, यदि आवश्यकता पड़े तो मैं तीनों लोकों के प्राणियों को भी चुनौती दे सकता हूँ।”
खर ने श्रीराम को बहुत कुछ कहने की इच्छा होते हुए भी स्वयं को रोकने का बहाना बनाया। उसने कहा, “तुम्हारे विषय में मैं और भी बहुत कुछ कह सकता हूँ, लेकिन अब सूर्य अस्त होने को है। यदि मैंने अधिक समय व्यर्थ किया तो युद्ध में बाधा उत्पन्न हो जाएगी।”
फिर उसके भीतर अपने मारे गए राक्षसों का क्रोध फिर से भड़क उठा। वह बोला, “तुमने चौदह हजार राक्षसों का संहार किया है। आज मैं तुम्हारा भी विनाश करके उन सभी की मृत्यु का बदला लूँगा और उनके परिजनों के आँसू पोंछूँगा।”
यह कहते-कहते खर का क्रोध चरम पर पहुँच गया। उसने अपनी दोनों भुजाओं में असाधारण बल भर लिया और उत्तम वलयों से सुशोभित, अग्नि के समान चमकती तथा वज्र के समान भयंकर अपनी विशाल गदा को पूरी शक्ति से श्रीराम की ओर फेंक दिया।
गदा खर के हाथों से छूटते ही भयंकर वेग से आकाश में घूमती हुई आगे बढ़ी। उसका वेग इतना प्रचण्ड था कि मार्ग में आने वाले वृक्ष और लताएँ उसके प्रभाव से जलने लगे। रणभूमि में उपस्थित सभी दिशाओं में भयावह गर्जना-सी सुनाई देने लगी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं मृत्यु का कोई विशाल अस्त्र श्रीराम की ओर दौड़ा चला आ रहा हो।
लेकिन श्रीराम तनिक भी विचलित नहीं हुए।
उनकी दृष्टि उस तेजी से आती हुई गदा पर स्थिर थी। जैसे कोई महान योद्धा संकट की घड़ी में भी अपने मन को पूरी तरह शांत रखता है, वैसे ही श्रीराम ने अपने धनुष पर बाण चढ़ाए।
विशाल गदा अब उनके अत्यन्त निकट पहुँच चुकी थी। वह मानो मृत्यु के पाश की तरह श्रीराम को अपने भीतर समेट लेने के लिए आगे बढ़ रही थी।
उसी क्षण श्रीराम के धनुष से एक के बाद एक अनेक तीक्ष्ण बाण बिजली की गति से निकले।
आकाश में अद्भुत दृश्य उपस्थित हो गया। श्रीराम के बाणों ने उस विशाल गदा को बीच आकाश में ही चारों ओर से घेर लिया। प्रचण्ड वेग से आते हुए बाणों ने गदा को इतनी तीव्रता से विदीर्ण किया कि वह देखते-ही-देखते टुकड़े-टुकड़े हो गई।
जो गदा कुछ क्षण पहले विनाश का भयंकर अस्त्र बनकर श्रीराम की ओर बढ़ रही थी, वही अब बाणों से चूर-चूर होकर धरती पर गिर पड़ी।
उसका धरती पर गिरना ऐसा प्रतीत हुआ मानो कोई विषैला सर्प मंत्र और औषधियों के प्रभाव से अपनी शक्ति खोकर निष्प्राण होकर गिर पड़ा हो।
खर की भयंकर गदा का इस प्रकार आकाश में ही नष्ट हो जाना उसके लिए एक बड़ा आघात था। श्रीराम वहीं धनुष हाथ में लिए शांत और अडिग खड़े थे, जबकि खर के सामने अब युद्ध का अगला और निर्णायक चरण उपस्थित था।
प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. खर को रथहीन अवस्था में श्रीराम के सामने किस प्रकार उपस्थित बताया गया है?
उत्तर: खर अपना रथ नष्ट हो जाने के बाद हाथ में भयंकर गदा लेकर क्रोधित अवस्था में श्रीराम के सामने युद्ध के लिए खड़ा था।
प्रश्न 2. श्रीराम ने खर को उसके क्रूर कर्मों के विषय में क्या समझाया?
उत्तर: श्रीराम ने कहा कि प्राणियों को भयभीत करने वाले क्रूर और लोकविरोधी कर्म करने वाला व्यक्ति अपनी शक्ति और ऐश्वर्य अधिक समय तक नहीं बचा सकता।
प्रश्न 3. श्रीराम के अनुसार काम और लोभ में क्या अंतर है?
उत्तर: अप्राप्त वस्तु को पाने की इच्छा काम कहलाती है, जबकि प्राप्त वस्तु को अधिकाधिक पाने की इच्छा लोभ कहलाती है।
प्रश्न 4. काम और लोभ से प्रेरित होकर पाप करने वाले व्यक्ति की तुलना किससे की गई है?
उत्तर: ऐसे व्यक्ति की तुलना वर्षा के साथ गिरे ओले खाने वाली रक्तपुच्छिका नामक कीड़ी से की गई है, जो स्वयं अपने विनाश का कारण बनती है।
प्रश्न 5. श्रीराम ने पापकर्म करने वाले व्यक्ति की स्थिति को खोखली जड़ वाले वृक्ष से क्यों जोड़ा?
उत्तर: जैसे खोखली जड़ों वाला वृक्ष अधिक समय तक खड़ा नहीं रहता, वैसे ही पापी व्यक्ति पूर्वपुण्य से प्राप्त ऐश्वर्य अधिक समय तक बनाए नहीं रख सकता।
प्रश्न 6. श्रीराम ने पापकर्म के फल को ऋतु के अनुसार खिलने वाले फूलों से कैसे समझाया?
उत्तर: श्रीराम ने कहा कि जैसे समय आने पर वृक्ष में ऋतु के अनुसार फूल खिलते हैं, वैसे ही पापकर्म का भयंकर फल समय आने पर मिलता है।
प्रश्न 7. श्रीराम ने खर को वन में दण्ड देने का अपना उद्देश्य क्या बताया?
उत्तर: श्रीराम ने बताया कि संसार का अहित करने वाले घोर पापियों को दण्ड देने के लिए महाराज दशरथ ने उन्हें वन भेजा था।
प्रश्न 8. श्रीराम ने अपने बाणों की शक्ति का वर्णन किस प्रकार किया?
उत्तर: श्रीराम ने कहा कि उनके सुवर्णभूषित बाण खर के शरीर को भेदकर पृथ्वी को विदीर्ण करते हुए पाताल तक पहुँचने में समर्थ हैं।
प्रश्न 9. श्रीराम ने खर को उसके द्वारा मारे गए ऋषियों के विषय में क्या कहा?
उत्तर: श्रीराम ने कहा कि खर ने जिन धर्मपरायण ऋषियों की हत्या की है, युद्ध में मारे जाने पर वह भी उन्हीं का अनुसरण करेगा।
प्रश्न 10. श्रीराम ने खर को अंतिम रूप से क्या चुनौती दी?
उत्तर: श्रीराम ने खर को अपनी पूरी शक्ति से प्रहार करने की चुनौती देते हुए उसका मस्तक ताड़ के फल की तरह काट गिराने का संकल्प किया।
प्रश्न 11. श्रीराम के कठोर वचनों का खर पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर: श्रीराम के कठोर वचनों से खर अत्यन्त क्रोधित हो गया, उसकी आँखें लाल हो गईं और वह क्रोध में व्यंग्यपूर्ण हँसी हँसने लगा।
प्रश्न 12. खर ने श्रीराम की वीरता पर किस प्रकार प्रश्न उठाया?
उत्तर: खर ने कहा कि साधारण राक्षसों को मारने के बाद श्रीराम स्वयं अपनी प्रशंसा कर रहे हैं, जबकि वे वास्तविक प्रशंसा के योग्य नहीं हैं।
प्रश्न 13. खर के अनुसार सच्चे पराक्रमी पुरुषों की क्या विशेषता होती है?
उत्तर: खर के अनुसार सच्चे पराक्रमी पुरुष अपने प्रताप का घमंड नहीं करते और अपने पराक्रम की स्वयं प्रशंसा करने से बचते हैं।
प्रश्न 14. खर ने आत्मप्रशंसा करने वालों की तुलना में श्रीराम को किस प्रकार संबोधित किया?
उत्तर: खर ने श्रीराम को क्षुद्र, अजितात्मा और क्षत्रियकुल का कलंक बताते हुए आरोप लगाया कि वे व्यर्थ अपनी बड़ाई कर रहे हैं।
प्रश्न 15. खर ने युद्धभूमि में अपनी स्थिति का वर्णन किस उपमा से किया?
उत्तर: खर ने स्वयं को नाना धातुओं वाले अविचल कुलपर्वत के समान स्थिर बताते हुए हाथ में गदा लेकर श्रीराम के सामने खड़ा बताया।
प्रश्न 16. खर ने अपनी गदा और शक्ति के विषय में क्या दावा किया?
उत्तर: खर ने दावा किया कि वह अकेला ही यमराज के समान श्रीराम और तीनों लोकों के प्राण लेने की शक्ति रखता है।
प्रश्न 17. खर ने सूर्यास्त का उल्लेख करते हुए श्रीराम से क्या कहा?
उत्तर: खर ने कहा कि सूर्य अस्त होने को है, इसलिए युद्ध में बाधा न पड़े, इस कारण वह श्रीराम से अधिक बातें नहीं करेगा।
प्रश्न 18. चौदह हजार राक्षसों के वध का उल्लेख करते हुए खर ने श्रीराम से क्या कहा?
उत्तर: खर ने कहा कि वह श्रीराम का भी विनाश करके चौदह हजार मारे गए राक्षसों की मृत्यु का बदला चुकाएगा।
प्रश्न 19. खर ने श्रीराम पर अपनी विशाल गदा किस प्रकार फेंकी?
उत्तर: अत्यन्त क्रोधित खर ने वलयों से सुशोभित, प्रज्वलित वज्र के समान भयंकर विशाल गदा पूरी शक्ति से श्रीराम पर चला दी।
प्रश्न 20. खर की गदा के मार्ग में आने वाले वृक्षों और लताओं पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर: खर की तीव्र गति से आती हुई गदा ने मार्ग में स्थित वृक्षों और लताओं को अपने प्रचण्ड प्रभाव से भस्म कर दिया।
प्रश्न 21. श्रीराम ने अपनी ओर आती हुई गदा का सामना किस प्रकार किया?
उत्तर: श्रीराम ने बिना विचलित हुए अनेक तीक्ष्ण बाण चलाए और आकाश में ही उस विशाल गदा के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
प्रश्न 22. गदा के धरती पर गिरने का दृश्य किस उपमा से समझाया गया है?
उत्तर: बाणों से विदीर्ण गदा धरती पर ऐसे गिरी जैसे मंत्र और औषधियों के प्रभाव से गिराया गया कोई शक्तिहीन सर्प हो।
प्रश्न 23. गदा के नष्ट होने के बाद श्रीराम और खर की स्थिति कैसी थी?
उत्तर: गदा नष्ट होने के बाद श्रीराम धनुष सहित शांत और अडिग खड़े रहे, जबकि खर के सामने युद्ध का अगला निर्णायक चरण उपस्थित था।