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(31)
अकम्पन का संदेश, रावण का क्रोध और मारीच की चेतावनी
जनस्थान में भयंकर युद्ध समाप्त हो चुका था। राक्षसों की विशाल सेना नष्ट हो चुकी थी और खर तथा दूषण जैसे पराक्रमी योद्धा भी श्रीराम के हाथों मारे जा चुके थे। चारों ओर युद्ध की विभीषिका छाई हुई थी। इस भयानक घटना का समाचार लेकर अकम्पन नामक राक्षस किसी तरह अपने प्राण बचाकर वहाँ से निकला और अत्यन्त घबराया हुआ लंका की ओर चल पड़ा।
अकम्पन के मन में भय समाया हुआ था। उसे पता था कि जनस्थान में जो कुछ हुआ है, उसका समाचार राक्षसराज रावण के लिए अत्यन्त क्रोध उत्पन्न करने वाला होगा। वह शीघ्रता से लंका पहुँचा और राजमहल में प्रवेश करके रावण के सामने जा खड़ा हुआ।
हांफते हुए अकम्पन ने रावण को प्रणाम किया और काँपती हुई वाणी में बोला, “राजन्! जनस्थान में रहने वाले असंख्य राक्षस मारे जा चुके हैं। खर युद्ध में मारा गया है। मैं किसी प्रकार अपने प्राण बचाकर यहाँ तक पहुँच सका हूँ।”
अकम्पन के मुख से ये शब्द निकलते ही रावण का क्रोध भड़क उठा। उसकी आँखें क्रोध से लाल हो गईं। उसका चेहरा ऐसा भयानक दिखाई देने लगा मानो वह अपने सामने खड़े अकम्पन को अपने तेज से ही भस्म कर देगा।
रावण गरजते हुए बोला, “कौन है वह दुःसाहसी जिसने मेरे भयंकर जनस्थान का विनाश कर दिया? कौन ऐसा व्यक्ति है जिसने मेरे राक्षसों को मार डालने का साहस किया है? वह कहाँ छिपेगा? तीनों लोकों में उसे कहीं भी आश्रय नहीं मिलेगा!”
रावण का अहंकार और क्रोध लगातार बढ़ता गया। उसने गर्व से कहा, “यदि कोई मेरा अपराध करता है तो इन्द्र, यम, कुबेर और विष्णु जैसे देवता भी निश्चिन्त होकर नहीं रह सकते। मैं काल का भी काल हूँ। मैं अग्नि को भी जला सकता हूँ और मृत्यु को भी मृत्यु के मुख में पहुँचा सकता हूँ।”
उसका स्वर और अधिक भयंकर हो गया। वह बोला, “यदि मैं क्रोधित हो जाऊँ तो अपने वेग से वायु की गति रोक सकता हूँ और अपने तेज से सूर्य तथा अग्नि को भी जलाकर भस्म कर सकता हूँ।”
रावण के इस भयंकर रूप को देखकर अकम्पन के भीतर भय और भी बढ़ गया। उसकी वाणी रुक गई। उसने हाथ जोड़कर विनम्रता से रावण से अपने लिए अभय माँगा।
राक्षसराज ने उसे अभयदान दिया। तब अकम्पन के मन का भय कुछ कम हुआ। उसे विश्वास हुआ कि अब उसके प्राण सुरक्षित हैं। उसने साहस करके उस घटना का पूरा विवरण बताना आरम्भ किया।
अकम्पन ने कहा, “राक्षसराज! राजा दशरथ के नवयुवक पुत्र श्रीराम पंचवटी में निवास कर रहे हैं। उनका शरीर सिंह के समान सुदृढ़ है। उनके कंधे चौड़े हैं, भुजाएँ लंबी और गोल हैं तथा उनका वर्ण साँवला है। उनके व्यक्तित्व में अद्भुत तेज और यश दिखाई देता है। उनके बल और पराक्रम की किसी से तुलना नहीं की जा सकती।”
“उन्हीं श्रीराम ने जनस्थान में रहने वाले खर, दूषण और अन्य राक्षसों का वध कर दिया है।”
रावण ध्यानपूर्वक अकम्पन की बातें सुन रहा था। श्रीराम का नाम सुनते ही उसने नागराज के समान गहरी साँस ली और पूछा, “अकम्पन! क्या राम अकेले थे या सम्पूर्ण देवताओं और देवराज इन्द्र के साथ जनस्थान आए थे?”
अकम्पन ने उत्तर दिया, “लंकाधिपति! श्रीराम किसी साधारण योद्धा का नाम नहीं है। वे संसार के श्रेष्ठतम धनुर्धरों में से एक हैं। वे दिव्यास्त्रों के प्रयोग में पूर्ण निपुण हैं और युद्ध की कला में अद्वितीय हैं।”
“उनके साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी हैं। लक्ष्मण भी उन्हीं के समान बलवान और पराक्रमी हैं। उनका मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान मनोहर है, आँखों में तेज है और उनका स्वर दुन्दुभि के समान गंभीर है।”
अकम्पन ने आगे कहा, “जैसे अग्नि के साथ वायु मिल जाए तो उसकी शक्ति और भी प्रबल हो जाती है, उसी प्रकार राम और लक्ष्मण एक-दूसरे के साथ हैं। इन दोनों भाइयों ने मिलकर जनस्थान को उजाड़ दिया।”
रावण के मन में अभी भी यह विश्वास था कि इतने बड़े विनाश के पीछे अवश्य कोई दिव्य शक्ति होगी। उसने अकम्पन की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा।
अकम्पन बोला, “नहीं राजन्! उनके साथ कोई देवता नहीं था, न कोई महान् मुनि। श्रीराम अकेले ही थे। उनके हाथों से छोड़े गए सोने के पंखों वाले बाण इतने भयंकर थे कि वे राक्षसों को ऐसे भेदते थे मानो पाँच मुख वाले विषैले सर्प अपने शिकार पर टूट पड़े हों।”
“राक्षस भयभीत होकर जिस मार्ग से भागते थे, उन्हें हर दिशा में श्रीराम ही सामने खड़े दिखाई देते थे। ऐसा लगता था मानो उनसे बचने का कोई मार्ग ही नहीं है। हे रावण! अकेले श्रीराम ने ही आपके जनस्थान का विनाश कर दिया।”
अकम्पन की बात सुनते ही रावण के भीतर फिर से क्रोध की ज्वाला भड़क उठी। उसने तत्काल घोषणा की, “मैं अभी जनस्थान जाऊँगा और लक्ष्मण सहित राम का वध कर दूँगा।”
परंतु अकम्पन ने तुरंत उसे रोकने का प्रयास किया। उसने कहा, “राजन्! पहले श्रीराम के वास्तविक बल और पुरुषार्थ को सुन लीजिए। उनके विषय में जाने बिना उनसे युद्ध करना अत्यन्त घातक होगा।”
अकम्पन ने श्रीराम के पराक्रम का वर्णन करते हुए कहा, “यदि महायशस्वी श्रीराम क्रोधित हो जाएँ तो संसार में कोई भी उन्हें उनके पराक्रम से रोक नहीं सकता। वे अपने बाणों से प्रचण्ड नदी के वेग को भी उलट सकते हैं और तारों, ग्रहों तथा नक्षत्रों सहित सम्पूर्ण आकाशमंडल को भी विचलित कर सकते हैं।”
“वे समुद्र में डूबती हुई पृथ्वी को भी ऊपर उठा सकते हैं। वे समुद्र की मर्यादा को भंग करके सम्पूर्ण लोकों को उसके जल से भर सकते हैं। उनके बाण समुद्र के वेग और वायु की गति तक को रोकने में समर्थ हैं।”
अकम्पन की आवाज में अब भय स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
“वे इतने सामर्थ्यवान हैं कि अपने पराक्रम से सम्पूर्ण लोकों का संहार करके फिर से नई सृष्टि करने में भी समर्थ हैं। हे दशग्रीव! जिस प्रकार कोई पापी पुरुष अपने कर्मों के बल पर स्वर्ग का अधिकारी नहीं बन सकता, उसी प्रकार आप या समस्त राक्षस मिलकर भी युद्ध में श्रीराम को पराजित नहीं कर सकते।”
फिर अकम्पन कुछ क्षण रुका। उसके मन में एक उपाय आया था।
उसने धीमे स्वर में कहा, “मेरी समझ में देवता और असुर भी मिलकर श्रीराम का वध नहीं कर सकते। लेकिन उनके विनाश का एक उपाय मुझे सूझता है। यदि आप मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनें तो मैं वह उपाय बता सकता हूँ।”
रावण की उत्सुकता बढ़ गई।
अकम्पन बोला, “श्रीराम की पत्नी सीता अत्यन्त रूपवती हैं। संसार में उनके समान सौंदर्य वाली स्त्री मिलना कठिन है। उनके अंग-प्रत्यंग अत्यन्त सुंदर और सुडौल हैं तथा वे रत्नों के आभूषणों से सुशोभित रहती हैं। देवकन्या, गन्धर्वकन्या, अप्सरा या नागकन्या भी उनके सौंदर्य की बराबरी नहीं कर सकतीं।”
उसने रावण के मन को और अधिक भड़काते हुए कहा, “यदि किसी उपाय से श्रीराम को धोखे में डालकर आप उनकी पत्नी सीता का अपहरण कर लें, तो सीता से वियोग के कारण श्रीराम जीवित नहीं रहेंगे।”
अकम्पन की यह बात रावण को पसंद आ गई। उसके मन में एक कुटिल योजना आकार लेने लगी। उसने कुछ देर विचार किया और कहा, “ठीक है। मैं कल प्रातः सारथि के साथ अकेला जाऊँगा और विदेहकुमारी सीता को प्रसन्नतापूर्वक लंका ले आऊँगा।”
रावण ने अपनी योजना बना ली। वह गधों से जुते हुए सूर्य के समान तेजस्वी रथ पर सवार हुआ। उसका विशाल रथ आकाश में आगे बढ़ने लगा और अपनी चमक से दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ लंका से दूर चला गया।
आकाश में नक्षत्रों के बीच चलता हुआ वह विशाल रथ ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो बादलों के पीछे से प्रकाशित होता हुआ चन्द्रमा आकाश को सुशोभित कर रहा हो।
कुछ दूर जाने के बाद रावण एक आश्रम में पहुँचा और ताटकापुत्र मारीच से मिला। मारीच ने अतिथि के रूप में रावण का आदरपूर्वक स्वागत किया। उसने उसे आसन दिया, जल अर्पित किया और विविध प्रकार के भक्ष्य-भोज्य प्रस्तुत किए।
अतिथि-सत्कार के बाद मारीच ने रावण को ध्यान से देखा। उसे रावण के अचानक और उतावले होकर आने पर आश्चर्य हुआ। उसने गंभीर स्वर में पूछा, “राक्षसराज! आपके राज्य में सब कुशल तो है? आप इतनी उतावली में यहाँ आए हैं। आपके चेहरे और व्यवहार को देखकर मेरे मन में आशंका उत्पन्न हो रही है। मुझे लगता है कि लंका में सब कुछ ठीक नहीं है।”
रावण ने अपनी बात छिपाए बिना कहा, “तात! श्रीराम ने मेरे राज्य की सीमा की रक्षा करने वाले खर और दूषण आदि को मार डाला है। जिस जनस्थान को राक्षसों के लिए सुरक्षित और अवध्य समझा जाता था, वहाँ रहने वाले सभी राक्षसों को उन्होंने युद्ध में मार गिराया।”
फिर रावण ने अपनी कुटिल योजना मारीच के सामने रखी।
“मैं इस अपमान और विनाश का बदला लेना चाहता हूँ। इसलिए श्रीराम की पत्नी सीता का अपहरण करना चाहता हूँ। इस कार्य में तुम मेरी सहायता करो।”
रावण की बात सुनकर मारीच के मन में चिंता छा गई। वह समझ गया कि रावण स्वयं अपने विनाश की ओर बढ़ रहा है।
मारीच ने गंभीर होकर कहा, “निशाचरों के स्वामी! तुम्हारा ऐसा कौन-सा शत्रु है जो मित्र बनकर तुम्हें सीता का हरण करने की सलाह दे रहा है? कौन ऐसा व्यक्ति है जो तुम्हारा सुख और सम्मान देखकर भी प्रसन्न नहीं है और तुम्हारा विनाश चाहता है?”
“मुझे बताओ, वह कौन है जिसने तुम्हें यह सलाह दी है? जो तुम्हें इस कार्य के लिए प्रेरित कर रहा है, वह निश्चित रूप से तुम्हारा शत्रु है। वह तुम्हारे हाथों स्वयं तुम्हारे ही विनाश का द्वार खोलना चाहता है।”
मारीच ने रावण को समझाते हुए कहा, “किसने तुम्हें ऐसी बुरी सलाह देकर कुमार्ग पर पहुँचा दिया? यह तो ऐसा है मानो किसी ने तुम्हें सुखपूर्वक सोते समय तुम्हारे ही मस्तक पर लात मार दी हो।”
फिर मारीच ने श्रीराम के पराक्रम को समझाने के लिए अद्भुत उपमाओं का सहारा लिया।
उसने कहा, “राघवेन्द्र श्रीराम एक ऐसे विशाल गजराज हैं जिनकी गंध मात्र से दूसरे हाथी दूर भाग जाते हैं। उनका उत्तम कुल उस गजराज की सूँड के समान है, उनका प्रताप मद के समान है और उनकी विशाल भुजाएँ हाथी के दोनों दाँतों के समान हैं। युद्धभूमि में उनकी ओर देखना भी तुम्हारे लिए उचित नहीं है, उनसे युद्ध करना तो बहुत दूर की बात है।”
मारीच आगे बोला, “श्रीराम मनुष्य के रूप में सिंह हैं। रणभूमि उनका शरीर है, उनके बाण उनके अंगों के समान हैं और उनकी तलवारें तीखे दाँतों के समान हैं। वे चतुर राक्षसरूपी मृगों का वध करने वाले सिंह हैं। हे रावण! ऐसे सोते हुए सिंह को जगाना तुम्हारे लिए उचित नहीं है।”
फिर उसने एक और भयावह उपमा दी।
“श्रीराम एक अथाह महासागर के समान हैं। उनका धनुष उस समुद्र में रहने वाले भयंकर ग्राह के समान है। उनकी भुजाओं का वेग उसके कीचड़ के समान है, उनके बाण उसकी उठती हुई तरंगों के समान हैं और उनका युद्ध उस महासागर की अगाध जलराशि के समान है। उस महासागर के भयंकर बड़वानल में कूद पड़ना तुम्हारे लिए विनाश को बुलाना होगा।”
मारीच ने अंत में अत्यन्त विनम्र होकर कहा, “लंकेश्वर! मेरी बात मानिए। प्रसन्न रहिए, सुखी रहिए और सकुशल लंका लौट जाइए। अपनी नगरी में अपनी स्त्रियों के साथ सुखपूर्वक जीवन बिताइए और श्रीराम को उनकी पत्नी के साथ वन में रहने दीजिए। उनके मार्ग में बाधा डालना आपके लिए उचित नहीं है।”
मारीच की बातों में भय भी था और अनुभव से उपजा हुआ सत्य भी। वह रावण को समझाना चाहता था कि श्रीराम से शत्रुता करना साधारण युद्ध नहीं, बल्कि अपने ही विनाश को आमंत्रण देना है।
रावण ने मारीच की पूरी बात सुनी। कुछ समय के लिए वह शांत रहा। फिर बिना कोई निर्णय बदले वहाँ से लौट पड़ा। वह लंका पहुँचा और अपने भव्य महल में चला गया।
लेकिन उसके मन में श्रीराम, सीता और पंचवटी की घटना अब गहराई से बस चुकी थी। मारीच की चेतावनी ने उसे रोकने के बजाय उसके भीतर चल रही कुटिल योजना को और अधिक गंभीर बना दिया था। आगे चलकर यही योजना रामायण की कथा को एक ऐसे मोड़ पर ले जाने वाली थी, जहाँ लंका, रावण और समस्त राक्षस-जगत् का भाग्य बदलने वाला था।
प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. अकम्पन जनस्थान से लंका क्यों गया था?
उत्तर: जनस्थान में राक्षसों के विनाश और खर के मारे जाने का समाचार रावण को देने के लिए अकम्पन लंका गया था।
प्रश्न 2. अकम्पन ने रावण को जनस्थान के बारे में क्या बताया?
उत्तर: अकम्पन ने बताया कि जनस्थान के बहुत-से राक्षस मारे गए, खर युद्ध में मारा गया और वह किसी प्रकार अपने प्राण बचाकर आया।
प्रश्न 3. अकम्पन की बात सुनकर रावण की क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर: अकम्पन की बात सुनकर रावण अत्यन्त क्रोधित हो गया। उसकी आँखें लाल हो गईं और उसने शत्रु को नष्ट करने की प्रतिज्ञा की।
प्रश्न 4. अकम्पन ने श्रीराम के स्वरूप और पराक्रम का किस प्रकार वर्णन किया?
उत्तर: अकम्पन ने श्रीराम को सिंह के समान सुदृढ़ शरीर, विशाल कंधों, लंबी भुजाओं, अद्भुत तेज, यश और अतुलनीय पराक्रम से सम्पन्न बताया।
प्रश्न 5. श्रीराम के साथ कौन थे और अकम्पन ने उनके विषय में क्या कहा?
उत्तर: श्रीराम के साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण थे। अकम्पन ने उन्हें राम के समान बलवान, तेजस्वी, गंभीर स्वर और पराक्रमी बताया।
प्रश्न 6. अकम्पन के अनुसार श्रीराम ने जनस्थान के राक्षसों का किस प्रकार विनाश किया?
उत्तर: श्रीराम ने अकेले ही अपने दिव्य बाणों से जनस्थान के राक्षसों का संहार किया और भयभीत राक्षसों को भागने का अवसर नहीं मिला।
प्रश्न 7. अकम्पन ने रावण को श्रीराम से युद्ध करने के विषय में क्या चेतावनी दी?
उत्तर: अकम्पन ने चेतावनी दी कि श्रीराम को देवता और असुर मिलकर भी पराजित नहीं कर सकते, इसलिए रावण को उनसे युद्ध नहीं करना चाहिए।
प्रश्न 8. अकम्पन ने रावण को श्रीराम के वध का कौन-सा उपाय सुझाया?
उत्तर: अकम्पन ने सुझाव दिया कि किसी उपाय से श्रीराम को धोखे में डालकर उनकी पत्नी सीता का अपहरण कर लिया जाए।
प्रश्न 9. अकम्पन ने सीता के सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया?
उत्तर: अकम्पन ने सीता को संसार की सर्वोत्तम सुन्दरी बताया, जिनकी समानता देवकन्या, गन्धर्वकन्या, अप्सरा और नागकन्या भी नहीं कर सकतीं।
प्रश्न 10. सीता के अपहरण के विषय में अकम्पन ने रावण को क्या विश्वास दिलाया?
उत्तर: अकम्पन ने कहा कि सीता से वियोग होने पर श्रीराम अत्यन्त दुखी होकर जीवित नहीं रहेंगे और इस प्रकार उनका विनाश संभव होगा।
प्रश्न 11. अकम्पन की सलाह सुनकर रावण ने क्या निर्णय लिया?
उत्तर: अकम्पन की सलाह से प्रभावित होकर रावण ने अगले प्रातः सारथि के साथ अकेले जाकर सीता का अपहरण करने का निर्णय लिया।
प्रश्न 12. रावण मारीच के आश्रम तक किस प्रकार पहुँचा?
उत्तर: रावण गधों से जुते सूर्य के समान तेजस्वी रथ पर सवार होकर आकाशमार्ग से मारीच के आश्रम तक पहुँचा।
प्रश्न 13. मारीच ने रावण के अचानक आने पर क्या आशंका व्यक्त की?
उत्तर: मारीच ने रावण की उतावली देखकर आशंका व्यक्त की कि लंका में कोई गंभीर संकट उत्पन्न हुआ है और सब कुछ कुशल नहीं है।
प्रश्न 14. रावण ने मारीच को सीता के अपहरण की योजना क्यों बताई?
उत्तर: रावण खर-दूषण और जनस्थान के राक्षसों के वध का बदला लेना चाहता था, इसलिए उसने मारीच से सीता के अपहरण में सहायता माँगी।
प्रश्न 15. मारीच ने रावण की सीता-हरण योजना को किस दृष्टि से देखा?
उत्तर: मारीच ने सीता-हरण की योजना को रावण के लिए विनाशकारी माना और कहा कि ऐसी सलाह देने वाला व्यक्ति निश्चित रूप से उसका शत्रु है।
प्रश्न 16. मारीच ने श्रीराम की तुलना गजराज से करते हुए क्या समझाया?
उत्तर: मारीच ने श्रीराम को ऐसे गजराज के समान बताया, जिसकी शक्ति और प्रताप से दूसरे योद्धा भयभीत होकर दूर भागते हैं।
प्रश्न 17. मारीच ने श्रीराम को सिंह के समान क्यों बताया?
उत्तर: मारीच ने श्रीराम को सिंह इसलिए कहा क्योंकि वे रणभूमि में राक्षसरूपी मृगों का संहार करने वाले अत्यन्त शक्तिशाली और भयंकर योद्धा थे।
प्रश्न 18. मारीच ने श्रीराम की तुलना महासागर से किस प्रकार की?
उत्तर: मारीच ने श्रीराम को अथाह महासागर कहा, जिसमें उनका धनुष ग्राह, भुजाओं का वेग कीचड़ और बाण उठती हुई तरंगों के समान थे।
प्रश्न 19. मारीच ने रावण को अंत में क्या सलाह दी?
उत्तर: मारीच ने रावण को सीता का अपहरण छोड़कर लंका लौटने, सुखपूर्वक रहने और श्रीराम को उनकी पत्नी के साथ वन में रहने देने की सलाह दी।
प्रश्न 20. मारीच की चेतावनी सुनने के बाद रावण ने क्या किया?
उत्तर: मारीच की चेतावनी सुनकर रावण लंका लौट गया और अपने महल में चला गया, लेकिन उसके मन से सीता-हरण की योजना नहीं निकली।