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(33) शूर्पणखा की कठोर चेतावनी और रावण का मौन चिंतन

(33)
शूर्पणखा की कठोर चेतावनी और रावण का मौन चिंतन

श्रीराम के द्वारा अपमानित और तिरस्कृत होने के कारण शूर्पणखा के भीतर क्रोध, पीड़ा और प्रतिशोध की अग्नि धधक रही थी। वह अपने अपमान को भूल नहीं पा रही थी। उसकी आँखों में क्रोध था और हृदय में रावण के प्रति भी गहरा आक्रोश उमड़ रहा था। उसे यह देखकर और भी अधिक पीड़ा हो रही थी कि लंका का राजा रावण अपने वैभव, शक्ति और विषय-भोगों में इतना डूब चुका है कि उसे अपने ही राज्य पर मंडरा रहे संकट का आभास तक नहीं है।

एक दिन वह रावण के सामने पहुँची। उस समय रावण अपने मंत्रियों से घिरा हुआ राजसभा में बैठा था। चारों ओर उसका ऐश्वर्य, शक्ति और राजसी वैभव दिखाई दे रहा था। किंतु शूर्पणखा के मन में उसके लिए न तो सम्मान था और न ही भय। उसने अत्यंत कठोर स्वर में रावण को संबोधित किया।

उसने कहा, “हे राक्षसराज! तुम अपनी शक्ति और ऐश्वर्य के मद में इतने डूब चुके हो कि तुम्हें अपने ऊपर मंडरा रहा भयंकर संकट दिखाई ही नहीं दे रहा। तुम स्वेच्छाचारी हो गए हो। विषय-भोगों में तुम्हारी आसक्ति ने तुम्हारी बुद्धि को ढक लिया है। जिस राजा को अपने राज्य और प्रजा की चिंता होनी चाहिए, वह यदि अपने सुखों में ही डूबा रहे, तो उसका विनाश निश्चित हो जाता है।”

शूर्पणखा ने राजा के आचरण का उदाहरण देते हुए समझाया कि जो शासक निम्न और तुच्छ भोगों में आसक्त होकर लोभी तथा निरंकुश बन जाता है, उसकी प्रजा के मन में उसके प्रति सम्मान समाप्त होने लगता है। ऐसा राजा लोगों को श्मशान की अग्नि के समान अप्रिय और भयावह लगने लगता है। लोग उसके सामने भले ही मौन रहें, लेकिन हृदय से उससे दूर हो जाते हैं।

उसकी वाणी और भी कठोर होती गई।

“जो राजा समय रहते अपने आवश्यक कार्य स्वयं नहीं करता, वह केवल उन कार्यों को ही नष्ट नहीं करता, बल्कि उसके साथ उसका राज्य भी विनाश की ओर बढ़ जाता है। राजा का एक क्षण का प्रमाद कभी-कभी पूरे राज्य को भारी संकट में डाल सकता है।”

शूर्पणखा ने रावण को शासन की एक और महत्वपूर्ण बात समझाई। उसने कहा कि राजा को अपने राज्य की वास्तविक स्थिति जानने के लिए विश्वसनीय गुप्तचरों की व्यवस्था करनी चाहिए। यदि राजा को अपने ही राज्य में क्या हो रहा है, इसका समाचार न मिले, यदि प्रजा उससे दूर हो जाए और वह स्त्रियों तथा अन्य विषय-भोगों में इतना आसक्त हो जाए कि अपनी स्वतंत्रता और विवेक खो बैठे, तो प्रजा भी उससे दूरी बना लेती है।

उसने इसकी तुलना नदी की कीचड़ से दूर रहने वाले हाथियों से की। जिस प्रकार हाथी कीचड़ में फँसने के भय से उससे दूर रहते हैं, उसी प्रकार प्रजा भी ऐसे राजा से दूर रहने लगती है जो स्वयं अपने दोषों और दुर्बलताओं में फँसा हुआ हो।

शूर्पणखा ने आगे कहा कि यदि राज्य का कोई प्रदेश राजा की अपनी असावधानी के कारण शत्रु के अधिकार में चला जाए और राजा उसे वापस प्राप्त करने का प्रयास न करे, तो ऐसे राजा का उत्थान रुक जाता है। उसका वैभव धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। वह समुद्र में डूबे हुए पर्वत के समान हो जाता है—शक्तिशाली होते हुए भी उसकी शक्ति किसी काम नहीं आती।

अब शूर्पणखा के शब्दों में केवल शिकायत नहीं थी, बल्कि रावण के शासन की तीखी आलोचना थी।

उसने कहा, “तुमने देवताओं, गंधर्वों और दानवों जैसे शक्तिशाली शत्रुओं से विरोध मोल लिया है, फिर भी अपने राज्य की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए उचित गुप्तचर नहीं रखे। तुम इतने विषयलोलुप और असावधान हो गए हो कि तुम्हें अपने राज्य की वास्तविक स्थिति तक ज्ञात नहीं है। ऐसे में तुम राजा के पद पर कैसे बने रह सकते हो?”

उसने रावण के स्वभाव पर भी प्रहार किया। उसने कहा कि उसका व्यवहार एक अपरिपक्व बालक जैसा हो गया है। वह शक्ति और वैभव के कारण स्वयं को बहुत बुद्धिमान समझता है, लेकिन वास्तव में उसे उन बातों का भी ज्ञान नहीं है जिन्हें एक राजा के लिए जानना अत्यंत आवश्यक है।

शूर्पणखा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो राजा अपने गुप्तचरों, कोष और राज्यनीति पर नियंत्रण नहीं रखता, वह चाहे कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, वास्तव में साधारण मनुष्य के समान ही है। राजा की वास्तविक शक्ति केवल सेना और धन में नहीं होती, बल्कि उसके विवेक, नीति, सूचना-व्यवस्था और प्रशासनिक नियंत्रण में होती है।

उसने समझाया कि गुप्तचरों की सहायता से राजा अपने राज्य के दूर-दराज के क्षेत्रों में होने वाली घटनाओं की जानकारी प्राप्त करता रहता है। इसी कारण दूर की घटनाओं को समय रहते जानने वाला राजा दूरदर्शी कहलाता है। जो राजा अपने राज्य की वास्तविक स्थिति से अनजान रहता है, वह अचानक आने वाले संकटों के सामने असहाय हो जाता है।

फिर शूर्पणखा ने रावण के मंत्रियों पर भी कटाक्ष किया।

उसने कहा, “मुझे लगता है कि तुम्हारे चारों ओर अयोग्य और मूर्ख मंत्री बैठे हुए हैं। तभी तो तुम्हें अपने ही राज्य में घटित इतनी बड़ी घटना का समाचार नहीं मिला। तुम्हारे अपने संबंधी मारे गए, जनस्थान उजाड़ दिया गया, चौदह हजार राक्षसों की सेना नष्ट हो गई, खर और दूषण जैसे शक्तिशाली योद्धा मारे गए—फिर भी तुम्हें इसकी सही जानकारी नहीं हुई!”

यह कहते-कहते शूर्पणखा की आवाज में अपने अपमान की पीड़ा भी घुल गई।

उसने रावण को बताया कि श्रीराम ने अकेले ही वह असंभव प्रतीत होने वाला कार्य कर दिखाया था। उन्होंने भयंकर पराक्रमी चौदह हजार राक्षसों का संहार कर दिया। खर और दूषण जैसे योद्धा भी उनके सामने टिक नहीं सके। ऋषियों को उन्होंने भयमुक्त किया और दण्डकारण्य में राक्षसों द्वारा उत्पन्न किए जा रहे उपद्रव को समाप्त कर वहाँ शांति स्थापित कर दी।

शूर्पणखा के शब्द रावण के लिए किसी वज्राघात से कम नहीं थे।

जिस राक्षसराज को अपनी शक्ति और विजय पर इतना गर्व था, उसे यह सुनना पड़ रहा था कि उसके राज्य के भीतर ही एक मनुष्य ने उसके सेनापतियों और विशाल सेना का विनाश कर दिया, और उसे इसकी जानकारी तक नहीं हुई।

शूर्पणखा ने फिर कहा, “तुम लोभ और प्रमाद के बंधन में बँध चुके हो। तुम्हारी अपनी इच्छाएँ ही तुम्हें पराधीन बना रही हैं। यही कारण है कि तुम्हें अपने राज्य में उत्पन्न हुए वास्तविक भय का पता तक नहीं चला।”

इसके बाद उसने राजा के उन दोषों को गिनाना शुरू किया जिनके कारण संकट के समय उसके अपने लोग भी उसका साथ छोड़ देते हैं।

उसने कहा कि जो राजा कठोर और निर्दयी व्यवहार करता है, जिसका स्वभाव तीखा है, जो अपने सेवकों को उचित पारिश्रमिक नहीं देता, जो हमेशा प्रमाद और अहंकार में डूबा रहता है और जिसके स्वभाव में छल-कपट भरा रहता है, संकट आने पर कोई उसके लिए आगे नहीं आता। ऐसे राजा के चारों ओर दिखाई देने वाली भीड़ संकट के क्षण में अचानक गायब हो जाती है।

शूर्पणखा ने आगे चेतावनी दी कि अत्यधिक अभिमानी, क्रोधी और स्वयं को सबसे बड़ा समझने वाला राजा अपने ही लोगों के लिए असहनीय हो जाता है। जब ऐसा राजा संकट में पड़ता है, तब कभी-कभी उसके अपने आत्मीयजन भी उसके विरोधी बन जाते हैं।

उसने कहा कि जो राजा अपने कर्तव्यों को नहीं निभाता, आवश्यक कार्यों को समय पर पूरा नहीं करता और संकट के समय अपनी तथा अपने राज्य की रक्षा के लिए सावधान नहीं होता, वह बहुत जल्दी अपने पद से गिर जाता है। उसका वैभव समाप्त हो जाता है और वह पृथ्वी पर पड़े तिनके के समान उपेक्षित हो जाता है।

शूर्पणखा ने रावण को एक अत्यंत कठोर सत्य बताया—राजा का पद छिन जाने के बाद उसकी शक्ति और वैभव भी किसी काम के नहीं रहते। लोगों को सूखी लकड़ी, मिट्टी का ढेला और धूल तक किसी न किसी काम आ सकती है, लेकिन अपने पद से गिर चुके राजा से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं रहता।

उसने एक और प्रभावशाली उदाहरण दिया। जैसे पहना हुआ वस्त्र दोबारा किसी दूसरे के उपयोग का नहीं रहता और मसल दी गई फूलों की माला अपनी सुंदरता खो देती है, उसी प्रकार राज्य से भ्रष्ट हुआ राजा भी, चाहे वह भीतर से कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, दूसरों के लिए निरर्थक हो जाता है।

लेकिन शूर्पणखा केवल रावण की आलोचना करके नहीं रुकी। उसने यह भी बताया कि एक आदर्श राजा कैसा होना चाहिए।

उसने कहा, “जो राजा सदैव सावधान रहता है, अपने राज्य की प्रत्येक महत्वपूर्ण गतिविधि की जानकारी रखता है, अपनी इंद्रियों को वश में रखता है, दूसरों के उपकार को याद रखता है और धर्म के मार्ग पर चलता है, वही लंबे समय तक राज्य कर सकता है।”

ऐसे राजा के विषय में उसने कहा कि वह भले ही शरीर से सो रहा हो, लेकिन उसकी नीति की आँखें सदैव खुली रहती हैं। वह अपने राज्य की गतिविधियों से अनजान नहीं होता। उसके क्रोध और प्रसन्नता दोनों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। इसलिए प्रजा ऐसे राजा का सम्मान करती है और उसकी आज्ञा का पालन करती है।

फिर शूर्पणखा ने रावण को सीधे संबोधित करते हुए कहा—

“रावण! तुम्हारी बुद्धि दूषित हो चुकी है। तुम्हारे भीतर राजा के आवश्यक गुणों का अभाव हो गया है। यदि तुम्हारी शासन-व्यवस्था ठीक होती और तुम्हारे गुप्तचर अपना कार्य कर रहे होते, तो तुम्हें राक्षसों के इस भयंकर संहार का समाचार बहुत पहले मिल चुका होता।”

उसकी वाणी अब चेतावनी से भर गई थी।

“तुम दूसरों का अनादर करते हो। तुम विषय-भोगों में डूबे हुए हो। तुम्हें देश और काल की परिस्थितियों का सही ज्ञान नहीं है। तुम किसी कार्य के गुण-दोष पर विचार करके निर्णय लेने की आदत खो चुके हो। यदि तुम इसी प्रकार चलते रहे, तो तुम्हारा राज्य शीघ्र ही विनाश की ओर चला जाएगा और तुम्हें स्वयं भी भयंकर विपत्ति का सामना करना पड़ेगा।”

राजसभा में शूर्पणखा की कठोर वाणी गूँजती रही।

रावण, जो देवताओं और दानवों तक को चुनौती देने का साहस रखता था, उस समय मौन बैठा था। उसके भीतर क्रोध भी था, अपमान भी और गहरी चिंता भी। शूर्पणखा की बातें उसे कड़वी लग रही थीं, लेकिन उनमें छिपे सत्य को वह पूरी तरह नकार भी नहीं पा रहा था।

उसके मन में एक-एक करके वे बातें घूमने लगीं—जनस्थान का विनाश, खर और दूषण की मृत्यु, चौदह हजार राक्षसों का संहार और सबसे बढ़कर यह तथ्य कि इतना बड़ा संकट उसके राज्य के भीतर घट गया और उसे समय पर उसका समाचार तक नहीं मिला।

धन, अभिमान और अपार बल से सम्पन्न रावण कुछ क्षणों के लिए भीतर से विचलित हो उठा। उसका अहंकार उसे शूर्पणखा की बातों को स्वीकार करने से रोक रहा था, लेकिन उसकी बुद्धि उन शब्दों पर विचार करने के लिए विवश हो रही थी।

राजसभा का वातावरण गंभीर हो गया। शूर्पणखा अपने मन की सारी आग उगल चुकी थी और रावण गहरे चिंतन में डूब चुका था।

वह बहुत देर तक चुप बैठा रहा। उसके सामने अब केवल शूर्पणखा का अपमानित चेहरा नहीं था, बल्कि श्रीराम का अद्भुत पराक्रम और अपने राज्य पर मंडराता हुआ एक अनजाना संकट भी खड़ा था।

उस रात रावण के मन में पहली बार यह प्रश्न गहराई से उठ रहा था कि जिस शक्ति पर उसे इतना गर्व है, क्या वास्तव में वह उसके राज्य की रक्षा करने के लिए पर्याप्त है?

शूर्पणखा के कठोर शब्दों ने उसके अहंकार पर चोट तो की ही थी, साथ ही आने वाले एक बड़े संघर्ष की भूमिका भी तैयार कर दी थी।


 

प्रश्न–उत्तर

प्रश्न 1. शूर्पणखा रावण के प्रति अत्यंत क्रोधित क्यों थी?
उत्तर: श्रीराम द्वारा तिरस्कृत होने से शूर्पणखा अत्यंत दुःखी और क्रोधित थी। उसे रावण की असावधानी और विषयासक्ति पर भी बहुत आक्रोश था।

प्रश्न 2. शूर्पणखा ने रावण को किस प्रकार का राजा बताया?
उत्तर: शूर्पणखा ने रावण को स्वेच्छाचारी, विषयलोलुप, लोभी, प्रमादी और अहंकारी राजा बताया, जो राज्य के वास्तविक संकटों से अनजान था।

प्रश्न 3. शूर्पणखा के अनुसार राजा के लिए गुप्तचरों की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर: गुप्तचरों की सहायता से राजा दूर-दूर के क्षेत्रों की गतिविधियों और राज्य की वास्तविक स्थिति की जानकारी प्राप्त करता रहता है।

प्रश्न 4. शूर्पणखा ने असावधान राजा की तुलना किससे की?
उत्तर: शूर्पणखा ने असावधान और राज्य से भ्रष्ट राजा की तुलना समुद्र में डूबे पर्वत तथा उपेक्षित तिनके से की।

प्रश्न 5. रावण को अपने राज्य में घटित किस बड़ी घटना का पता नहीं चला था?
उत्तर: रावण को जनस्थान के उजड़ने, खर-दूषण की मृत्यु और चौदह हजार राक्षसों के संहार का समय पर समाचार नहीं मिला था।

प्रश्न 6. श्रीराम ने जनस्थान में क्या किया था?
उत्तर: श्रीराम ने चौदह हजार राक्षसों का संहार किया, खर-दूषण को मारा, ऋषियों को अभय दिया और जनस्थान में शांति स्थापित की।

प्रश्न 7. शूर्पणखा के अनुसार कौन-से राजा संकट में अपने लोगों का साथ खो देते हैं?
उत्तर: कठोर, अहंकारी, क्रोधी, प्रमादी, शठ और सेवकों के साथ अनुचित व्यवहार करने वाले राजा संकट में अपना साथ खो देते हैं।

प्रश्न 8. शूर्पणखा के अनुसार आदर्श राजा के क्या गुण होने चाहिए?
उत्तर: आदर्श राजा सावधान, कर्तव्यनिष्ठ, इंद्रियजित, कृतज्ञ, धर्मपरायण और राज्य की सभी महत्वपूर्ण गतिविधियों से भली-भाँति परिचित होना चाहिए।

प्रश्न 9. शूर्पणखा ने कहा कि प्रजा किस राजा का सम्मान करती है?
उत्तर: प्रजा उस राजा का सम्मान करती है जो नीतिगत रूप से सदैव जागरूक रहता है और जिसके क्रोध तथा अनुग्रह का प्रभाव स्पष्ट होता है।

प्रश्न 10. शूर्पणखा ने रावण को उसके मंत्रियों के विषय में क्या कहा?
उत्तर: शूर्पणखा ने कहा कि रावण अयोग्य मंत्रियों से घिरा हुआ है, इसलिए उसे अपने राज्य में हुए भीषण विनाश की जानकारी नहीं मिली।

प्रश्न 11. शूर्पणखा ने रावण के भविष्य के बारे में क्या चेतावनी दी?
उत्तर: उसने चेतावनी दी कि यदि रावण अपनी गलतियाँ नहीं सुधारेगा, तो उसका राज्य शीघ्र नष्ट होगा और वह स्वयं भी भारी विपत्ति में पड़ेगा।

प्रश्न 12. शूर्पणखा की बातें सुनकर रावण की क्या स्थिति हुई?
उत्तर: शूर्पणखा की कठोर बातों ने रावण को भीतर तक विचलित कर दिया और वह अपने दोषों तथा राज्य की स्थिति पर गंभीरता से सोचने लगा।

प्रश्न 13. शूर्पणखा ने विषयासक्त राजा के बारे में क्या विचार व्यक्त किया?
उत्तर: उसके अनुसार विषयासक्त राजा अपनी स्वतंत्रता और विवेक खो देता है तथा राज्य की वास्तविक परिस्थितियों से अनजान होकर विनाश की ओर बढ़ता है।

प्रश्न 14. शूर्पणखा ने राज्य से भ्रष्ट राजा को निरर्थक क्यों बताया?
उत्तर: राज्य से भ्रष्ट राजा की शक्ति और पद समाप्त हो जाते हैं, इसलिए समर्थ होने पर भी समाज और प्रजा के लिए उसका कोई महत्व नहीं रहता।

प्रश्न 15. शूर्पणखा की चेतावनी का रावण पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर: शूर्पणखा की चेतावनी से रावण लंबे समय तक मौन और चिंतित रहा तथा उसने अपने राज्य और अपनी नीतियों पर गंभीरता से विचार किया।