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मायावी स्वर्णमृग की अद्भुत लीला और सीताजी का आकर्षण
रावण की कठोर बातों और उसके हठ के सामने मारीच विवश हो गया। वह जानता था कि श्रीरामचन्द्रजी से शत्रुता करना अपने विनाश को स्वयं बुलाने के समान है। रावण के भय से दुःखी मारीच ने अन्ततः उसकी आज्ञा मानते हुए कहा, “चलो, अब चलते हैं।”
मारीच को श्रीरामचन्द्रजी के पराक्रम का भलीभाँति अनुभव था। उसने रावण को समझाया कि श्रीराम के हाथों में धनुष-बाण और तलवार सदा शत्रुओं के विनाश के लिए तत्पर रहते हैं। यदि श्रीराम ने उसे फिर से देख लिया, तो उसका जीवन बचना असम्भव है। उसके मन में श्रीराम के प्रति भय और उनके अद्भुत बल के प्रति सम्मान दोनों थे।
मारीच ने रावण को चेतावनी दी कि श्रीरामचन्द्रजी से युद्ध करके कोई भी जीवित वापस नहीं लौट सकता। उसने रावण से कहा कि वह स्वयं अपने विनाश को आमन्त्रित कर रहा है। श्रीराम उसके लिए यमराज के दण्ड के समान सिद्ध होंगे। फिर भी जब रावण अपनी दुष्ट योजना छोड़ने को तैयार नहीं हुआ, तब मारीच ने विवश होकर कहा कि अब वह और क्या कर सकता है। उसने रावण के कल्याण की कामना करते हुए उसके साथ चलने की स्वीकृति दे दी।
मारीच की सहमति सुनकर रावण अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसने मारीच को कसकर हृदय से लगा लिया, मानो उसकी सबसे बड़ी चिन्ता दूर हो गई हो। रावण ने प्रसन्न होकर कहा कि अब मारीच ने वीरता की बात कही है और उसकी इच्छा के अनुसार चलने को तैयार हो गया है। उसने व्यंग्यपूर्वक यह भी कहा कि अब वह वास्तव में मारीच है, जबकि पहले उस पर किसी दूसरे राक्षस का प्रभाव हो गया था।
इसके बाद रावण ने अपने रत्नों से सजे हुए आकाश में उड़ने वाले रथ की ओर संकेत किया। उस रथ में पिशाचों के समान मुख वाले गधे जुते हुए थे। रावण ने मारीच को शीघ्र उसमें बैठने के लिए कहा। उसकी योजना थी कि मारीच किसी प्रकार जनकनन्दिनी सीता के मन में उस मायावी मृग के प्रति आकर्षण उत्पन्न कर दे। जब सीता उस मृग को पाने की इच्छा से श्रीराम के पीछे जाएँगी और आश्रम सूना हो जाएगा, तब वह अवसर पाकर सीताजी का अपहरण कर लेगा।
ताटकापुत्र मारीच ने रावण की बात स्वीकार करते हुए कहा, “तथास्तु।” इसके बाद दोनों राक्षस उस विमान के समान रथ पर सवार हुए और शीघ्र ही वहाँ से चल पड़े। उनके मन में एक भयानक योजना थी, जिसका परिणाम आगे चलकर रामायण की कथा को निर्णायक मोड़ देने वाला था।
मार्ग में दोनों अनेक नगरों, बस्तियों, वनों, पर्वतों, नदियों और विभिन्न जनपदों को देखते हुए आगे बढ़ते रहे। यात्रा करते-करते वे दण्डकारण्य पहुँचे। वहाँ पहुँचकर रावण और मारीच ने श्रीरामचन्द्रजी के आश्रम को देखा। अब उनकी योजना को कार्यरूप देने का समय आ गया था।
रत्नों से सुशोभित रथ से उतरकर रावण ने मारीच का हाथ अपने हाथ में लिया और उसे आश्रम दिखाते हुए कहा, “मित्र! देखो, केले के वृक्षों से घिरा हुआ श्रीराम का आश्रम सामने है। अब शीघ्र ही वह कार्य पूरा करो, जिसके लिए हम यहाँ आए हैं।”
रावण की आज्ञा सुनकर मारीच ने अपनी माया का प्रयोग किया और एक अद्भुत मृग का रूप धारण कर लिया। वह श्रीराम के आश्रम के द्वार के पास विचरने लगा। उसका रूप इतना अनोखा था कि देखने वाला सहज ही उसकी ओर आकर्षित हो जाता।
उस मायावी मृग के सींगों के ऊपरी भाग ऐसे चमक रहे थे, मानो वे इन्द्रनील मणियों से बने हों। उसके मुख पर सफेद और काले रंग की छोटी-छोटी बूँदें थीं तथा उसका मुख लाल कमल के समान सुन्दर दिखाई देता था। उसके कान नीलकमल जैसे थे और गरदन कुछ ऊँची थी। उसके उदर पर इन्द्रनील मणि जैसी नीली आभा झलकती थी, जबकि उसके दोनों पार्श्व महुए के फूलों के समान श्वेत दिखाई देते थे। उसके शरीर का सुनहरा रंग कमल के केसर जैसा चमक रहा था।
उसके खुर वैदूर्यमणि के समान दमकते थे और उसकी पिंडलियाँ पतली थीं। ऊपर उठी हुई पूँछ इन्द्रधनुष के रंगों जैसी दिखाई देती थी। उसके शरीर की सुडौल बनावट और रंगों की अद्भुत छटा उसे साधारण वन्य मृगों से बिल्कुल अलग बना रही थी।
उसकी देह अत्यन्त चिकनी, चमकीली और मनोहर थी। पूरे शरीर पर अनेक प्रकार के रत्नों जैसी रंग-बिरंगी बूँदियाँ दिखाई देती थीं। देखते ही देखते मारीच ने ऐसा सुन्दर मृग रूप धारण कर लिया, जिसकी शोभा किसी अलौकिक रचना से कम नहीं थी।
सीताजी को आकर्षित करने के उद्देश्य से मारीच ने अपने शरीर को अनेक रंगों और धातुओं की चमक से युक्त बना रखा था। वह रमणीय वन में और श्रीराम के आश्रम के आसपास घूमने लगा। वहाँ की हरी-भरी घास चरते हुए वह बार-बार ऐसी चपलता दिखाता कि उसकी ओर देखने वाले की दृष्टि उसी पर ठहर जाती।
उसके शरीर पर सैकड़ों चाँदी जैसी चमकती बूँदियाँ थीं, जो उसे और भी विलक्षण बना रही थीं। वह कभी वृक्षों के कोमल पत्ते खाता, तो कभी इधर-उधर उछलता-कूदता। उसकी हर गतिविधि में ऐसी सहज सुन्दरता थी कि वह किसी कुशल चित्रकार द्वारा बनाई गई जीवित आकृति जैसा प्रतीत होता था।
केले के बगीचे से विचरता हुआ वह कनेर के वृक्षों के कुंज तक जा पहुँचा। फिर वह ऐसी जगह आकर मन्द गति से घूमने लगा, जहाँ से सीताजी की दृष्टि आसानी से उस पर पड़ सकती थी। वह जानबूझकर अपनी गति धीमी रखता, ताकि सीताजी उसे ठीक से देख सकें और उसके मोहक रूप से प्रभावित हो जाएँ।
उसकी पीठ का सुनहरा रंग कमल के केसर के समान चमक रहा था। श्रीरामचन्द्रजी के आश्रम के निकट घूमता हुआ वह मृग बार-बार अपनी अनुपम छटा बिखेर रहा था। उसका रूप इतना आकर्षक था कि कोई भी उसे देखकर कुछ क्षणों के लिए मुग्ध हो सकता था।
मारीच कभी आश्रम से कुछ दूर चला जाता और फिर लौटकर उसी स्थान पर आ जाता। कभी वह कुछ समय के लिए आँखों से ओझल हो जाता, फिर बड़ी उतावली से वापस आकर आश्रम के आसपास घूमने लगता। उसकी इन गतिविधियों के पीछे एक ही उद्देश्य था—किसी तरह सीताजी की दृष्टि उस पर पड़ जाए।
वह कभी खेलता, कभी उछलता-कूदता और फिर भूमि पर बैठ जाता। कुछ देर बाद वह आश्रम के द्वार के पास आकर वन के दूसरे मृगों के पीछे चलने लगता। उसके व्यवहार में ऐसी स्वाभाविकता थी कि उसे देखकर किसी को भी यह संदेह नहीं होता कि वह एक राक्षस की मायावी चाल है।
थोड़ी देर बाद वह अनेक मृगों के झुंड के साथ फिर लौट आता। मारीच के मन में केवल एक ही अभिलाषा थी कि सीताजी उसे देख लें और उसके अद्भुत रूप को पाने की इच्छा करने लगें। इसी उद्देश्य से वह बार-बार उनके निकट आने का प्रयास कर रहा था।
जब वह सीताजी के समीप आता, तो विचित्र ढंग से चक्कर लगाता और अनेक प्रकार की चपलताएँ दिखाता। वन में रहने वाले दूसरे मृग उसके असाधारण रूप को देखकर उसके पास आते। वे उसे सूँघते ही मानो किसी अनजाने भय से घबरा जाते और दसों दिशाओं में भाग जाते। उनका यह व्यवहार उस मायावी मृग की विचित्रता को और भी बढ़ा देता था।
मारीच स्वभाव से हिंसक राक्षस था और मृगों का वध करने में तत्पर रहता था। परन्तु इस समय उसने अपनी वास्तविक प्रकृति छिपा रखी थी। वह दूसरे वन्य मृगों के पास जाता और उन्हें छूता भी था, लेकिन उन्हें हानि नहीं पहुँचाता था। सीताजी के सामने स्वयं को एक सौम्य, निरापद और सुन्दर मृग सिद्ध करना ही उसकी योजना का मुख्य भाग था।
उसी समय सीताजी फूल चुनने के लिए वन में आईं। उनके नेत्र सुन्दर और भावों से भरे हुए थे। वे कनेर, अशोक और आम के वृक्षों के बीच से गुजरती हुई फूलों की खोज में आगे बढ़ रही थीं। तभी उनकी दृष्टि उस विलक्षण मृग पर पड़ी, जिसका शरीर रत्नों की भाँति चमक रहा था।
वनवास का जीवन सीताजी के लिए अनेक कठिनाइयाँ लेकर आया था, फिर भी वे प्रकृति की सुन्दरता के बीच अपने दिन व्यतीत कर रही थीं। उस दिन फूल चुनते हुए उन्होंने ऐसा मृग देखा, जैसा उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। उसके अंग-प्रत्यंग पर अनेक रंगों और रत्नों जैसी चमक थी। उसे देखते ही उनके मन में आश्चर्य और कौतूहल जाग उठा।
उस मायावी मृग के दाँत और होंठ भी अत्यन्त सुन्दर दिखाई देते थे। उसके शरीर के रोएँ चाँदी और ताँबे जैसी चमक बिखेर रहे थे। जैसे ही सीताजी की दृष्टि उस पर पड़ी, आश्चर्य से उनकी आँखें खिल उठीं। वे प्रेम और कौतूहल से उसे निहारने लगीं। उस अद्भुत प्राणी की सुन्दरता ने उनके मन को अपनी ओर खींच लिया था।
मारीच ने भी सीताजी को देख लिया। वह श्रीरामचन्द्रजी की प्राणप्रिय पत्नी के सामने अपनी माया का प्रदर्शन करता हुआ वन में विचरता रहा। उसके चमकीले शरीर और मनमोहक चपलता से आसपास का वन भी मानो आलोकित हो उठा। उसकी प्रत्येक गतिविधि सीताजी का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए थी।
सीताजी ने अपने जीवन में ऐसा विचित्र मृग कभी नहीं देखा था। वह उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो उसका पूरा शरीर ही नाना प्रकार के बहुमूल्य रत्नों से बना हो। जनकनन्दिनी उसके अद्भुत रूप को देखकर विस्मित रह गईं। उनके मन में उस मृग के प्रति आकर्षण बढ़ता जा रहा था, जबकि उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि उसकी मनमोहक सुन्दरता के पीछे एक भयानक षड्यन्त्र छिपा हुआ है।
प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. मारीच श्रीरामचन्द्रजी से युद्ध करने के लिए क्यों भयभीत था?
उत्तर: मारीच श्रीरामचन्द्रजी के अद्भुत पराक्रम से परिचित था। वह जानता था कि उनके धनुष-बाण के सामने टिकना असम्भव है और उनसे भिड़ना मृत्यु को बुलाना है।
प्रश्न 2. मारीच ने रावण को श्रीरामचन्द्रजी के विषय में क्या चेतावनी दी?
उत्तर: मारीच ने रावण को चेतावनी दी कि श्रीरामचन्द्रजी से युद्ध करके कोई जीवित नहीं लौटता। वे उसके लिए यमराज के दण्ड के समान सिद्ध होंगे।
प्रश्न 3. मारीच की सहमति से प्रसन्न होकर रावण ने क्या किया?
उत्तर: मारीच की सहमति से प्रसन्न होकर रावण ने उसे कसकर हृदय से लगाया और अपने रत्नों से सजे आकाशगामी रथ में बैठने को कहा।
प्रश्न 4. सीताजी का अपहरण करने के लिए रावण ने क्या योजना बनाई थी?
उत्तर: रावण ने मारीच को मायावी मृग बनकर सीताजी को आकर्षित करने को कहा, ताकि श्रीराम उनके पीछे जाएँ और आश्रम सूना होने पर वह उनका अपहरण कर सके।
प्रश्न 5. रावण और मारीच किस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के आश्रम पहुँचे?
उत्तर: रावण और मारीच रत्नों से सजे विमानाकार रथ पर बैठकर अनेक नगरों, वनों, पर्वतों और नदियों को पार करते हुए दण्डकारण्य में श्रीराम के आश्रम पहुँचे।
प्रश्न 6. मारीच ने स्वर्णमृग का रूप धारण करके कैसा अद्भुत रूप प्रस्तुत किया?
उत्तर: मारीच के सींग इन्द्रनील मणियों जैसे, कान नीलकमल जैसे, मुख लाल कमल जैसा और शरीर सुनहरी आभा तथा रंग-बिरंगी रत्नमयी बूँदियों से सुशोभित था।
प्रश्न 7. मायावी मृग का शरीर किन-किन रत्नों और प्राकृतिक वस्तुओं के समान दिखाई देता था?
उत्तर: उसके सींग इन्द्रनील मणियों, खुर वैदूर्यमणि, कान नीलकमल, पार्श्व महुए के फूलों और सुनहरा शरीर कमल के केसर के समान दिखाई देता था।
प्रश्न 8. मारीच ने सीताजी का ध्यान आकर्षित करने के लिए क्या-क्या किया?
उत्तर: मारीच आश्रम के आसपास घास चरता, वृक्षों के कोमल पत्ते खाता, उछलता-कूदता, दूर जाकर लौटता और सीताजी की दृष्टि पड़ने वाले स्थानों पर घूमता रहा।
प्रश्न 9. वन के दूसरे मृग मायावी स्वर्णमृग के पास आकर क्या करते थे?
उत्तर: दूसरे मृग उसके असाधारण रूप को देखकर पास आते और उसे सूँघते थे, लेकिन उसके विचित्र प्रभाव से घबराकर दसों दिशाओं में भाग जाते थे।
प्रश्न 10. मारीच ने अपने वास्तविक स्वभाव को छिपाने के लिए क्या किया?
उत्तर: हिंसक राक्षस होने पर भी मारीच ने मृगों के प्रति सौम्य व्यवहार किया। वह उन्हें छूता था, लेकिन हानि नहीं पहुँचाता था, ताकि उसका छल उजागर न हो।
प्रश्न 11. सीताजी वन में किस कार्य के लिए आई थीं और उन्होंने वहाँ क्या देखा?
उत्तर: सीताजी कनेर, अशोक और आम के वृक्षों के बीच फूल चुनने आई थीं। तभी उन्होंने रत्नों की भाँति चमकने वाले अद्भुत स्वर्णमृग को देखा।
प्रश्न 12. मायावी स्वर्णमृग को देखकर सीताजी की क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर: स्वर्णमृग का अद्भुत और रत्नों जैसा चमकीला रूप देखकर सीताजी की आँखें आश्चर्य से खिल उठीं। वे प्रेम और कौतूहल से उसे निहारने लगीं।
प्रश्न 13. मारीच सीताजी के सामने अपनी माया का प्रदर्शन क्यों कर रहा था?
उत्तर: मारीच का उद्देश्य अपनी असाधारण सुन्दरता से सीताजी को मोहित करना और उनके मन में मृग को पाने की इच्छा उत्पन्न करके रावण की योजना सफल बनाना था।
प्रश्न 14. सीताजी स्वर्णमृग को देखकर विस्मित क्यों रह गईं?
उत्तर: सीताजी ने पहले कभी ऐसा विचित्र मृग नहीं देखा था। उसका शरीर बहुमूल्य रत्नों से बना हुआ प्रतीत होता था, जिससे वे अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गईं।
प्रश्न 15. मायावी स्वर्णमृग की सुन्दरता के पीछे कौन-सा भयानक षड्यन्त्र छिपा था?
उत्तर: स्वर्णमृग की सुन्दरता मारीच की माया थी। रावण चाहता था कि सीताजी उससे आकर्षित हों, श्रीराम आश्रम से दूर जाएँ और वह सीताजी का अपहरण कर सके।