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(43) स्वर्णमृग का मोह और श्रीराम का मारीच-वध के लिए प्रस्थान

(43)
स्वर्णमृग का मोह और श्रीराम का मारीच-वध के लिए प्रस्थान

पञ्चवटी के शांत वन में एक ऐसा अद्भुत प्रसंग घटित हुआ, जिसने माता सीता के मन में आकर्षण जगाया और आगे चलकर रामायण की कथा को एक निर्णायक मोड़ पर पहुँचा दिया। स्वर्णमृग की अद्भुत छटा, लक्ष्मण की आशंका, माता सीता का आग्रह और श्रीराम का संकल्प—इन सबके बीच छल की एक गहरी योजना छिपी हुई थी।

स्वर्णमृग को देखकर माता सीता का मुग्ध होना

पञ्चवटी के वन में माता सीता फूल चुन रही थीं। तभी उनकी दृष्टि एक ऐसे अद्भुत मृग पर पड़ी, जिसके शरीर के पार्श्व सोने और चाँदी जैसी चमक से सुशोभित थे। उसका संपूर्ण शरीर शुद्ध सोने के समान दमक रहा था। उसकी अनुपम सुंदरता देखकर माता सीता का मन आनंद और आश्चर्य से भर उठा। वे फूल चुनना भूलकर उस मृग को निहारने लगीं। उन्होंने तुरंत अपने पति श्रीराम और देवर लक्ष्मण को पुकारा, ताकि वे भी उस अद्भुत जीव को देख सकें और उसे पकड़ने का प्रयास करें।

माता सीता बार-बार श्रीराम और लक्ष्मण को आवाज देने लगीं। उनकी उत्सुकता इतनी बढ़ गई थी कि वे एक क्षण भी उस मृग को अपनी दृष्टि से दूर नहीं करना चाहती थीं। उन्होंने पुकारकर कहा, “आर्यपुत्र! आप अपने भाई लक्ष्मण के साथ शीघ्र यहाँ आइए। देखिए, वन में कितना सुंदर मृग दिखाई दे रहा है!”

सीता की पुकार सुनकर श्रीराम और लक्ष्मण तुरंत वहाँ पहुँचे। दोनों भाइयों ने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई और उस असाधारण मृग को देखा। उसकी सुंदरता साधारण वन्य जीवों से बिल्कुल अलग थी। उसके रूप में कुछ ऐसा विलक्षण था कि मनुष्य सहज ही उसकी ओर आकर्षित हो जाए।

लक्ष्मण की आशंका और मारीच की माया

मृग को देखते ही लक्ष्मण के मन में संदेह उत्पन्न हुआ। उसके अस्वाभाविक रूप और अलौकिक चमक को देखकर उन्हें लगा कि यह कोई साधारण मृग नहीं हो सकता। उन्होंने श्रीराम से कहा, “भैया! मुझे विश्वास है कि यह मारीच नाम का राक्षस है, जो मृग का रूप धारण करके यहाँ आया है।”

लक्ष्मण ने श्रीराम को सावधान करते हुए बताया कि मारीच अपनी इच्छानुसार अनेक रूप धारण करने में समर्थ है। वह पहले भी शिकार खेलने के लिए वन में आए अनेक राजाओं को अपने छल में फँसाकर मार चुका है। उसकी मायावी शक्तियाँ अत्यंत प्रबल हैं और वह अपने शत्रुओं को भ्रमित करने में निपुण है।

लक्ष्मण ने आगे कहा कि मारीच की माया ही इस अद्भुत मृगरूप में प्रकट हुई है। जिस प्रकार दूर से गन्धर्वों का नगर दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में उसका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं होता, उसी प्रकार यह मृग भी केवल आँखों को चमत्कृत करने वाला मायावी दृश्य हो सकता है।

उन्होंने समझाया कि पृथ्वी पर ऐसा रत्नों से बना हुआ, स्वर्णमय और अलौकिक चमक वाला मृग कहीं नहीं मिलता। इसलिए यह निश्चित रूप से कोई छल प्रतीत होता है। लक्ष्मण की बातें विवेकपूर्ण थीं, लेकिन मारीच की माया के प्रभाव में माता सीता का मन उस मृग को पाने के लिए व्याकुल हो चुका था।

माता सीता का आग्रह और स्वर्णमृग पाने की इच्छा

लक्ष्मण जब श्रीराम को मारीच के छल से सावधान कर रहे थे, तब माता सीता ने उन्हें रोक दिया। मृग की सुंदरता ने उनके मन में इतना गहरा आकर्षण उत्पन्न कर दिया था कि वे लक्ष्मण की आशंका पर ध्यान नहीं दे पा रही थीं। उन्होंने प्रेम और उत्साह से श्रीराम से कहा, “आर्यपुत्र! यह मृग कितना सुंदर है! इसने तो मेरा मन ही मोह लिया है। आप इसे पकड़कर ले आइए। यह हमारे वनवास के दिनों में हमारे मनोरंजन का साधन बनेगा।”

माता सीता ने बताया कि उनके आश्रम के आसपास अनेक सुंदर और पवित्र मृग विचरण करते रहते हैं। वहाँ सृमर, चमर, रीछ, चितकबरे मृगों के झुंड, वानर और सुंदर रूप वाले शक्तिशाली किन्नर भी दिखाई देते हैं। फिर भी उन्होंने आज तक ऐसा तेजस्वी, शांत और चमकदार मृग नहीं देखा था। इस मृग की सुंदरता उन सभी से बिल्कुल अलग थी।

उसके शरीर पर अनेक रंगों की छटा दिखाई दे रही थी। ऐसा लगता था मानो उसके प्रत्येक अंग में कोई बहुमूल्य रत्न जड़ा हो। वह बिना किसी भय के शांत भाव से उनके सामने खड़ा था और अपनी अद्भुत चमक से पूरे वन को आलोकित कर रहा था। उसका रूप चन्द्रमा के समान मनमोहक था।

माता सीता उसकी सुंदरता, उसकी विचित्र काया और उसकी मधुर ध्वनि से अत्यंत प्रभावित थीं। उन्हें वह मृग इतना अद्भुत लग रहा था कि वे उसकी तुलना किसी भी दूसरे प्राणी से नहीं कर पा रही थीं। उन्होंने श्रीराम से कहा कि यदि वह मृग जीवित ही पकड़ लिया जाए, तो यह सभी के लिए आश्चर्य और प्रसन्नता का विषय होगा।

वनवास के बाद स्वर्णमृग को अयोध्या ले जाने की कल्पना

माता सीता के मन में उस समय वनवास के बाद के जीवन की एक सुंदर कल्पना भी जाग उठी। उन्होंने सोचा कि जब वनवास की अवधि पूरी हो जाएगी और श्रीराम पुनः अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे, तब इस अद्भुत मृग को अयोध्या के राजमहल में रखा जाएगा। उसकी उपस्थिति से अन्तःपुर की शोभा बढ़ेगी और सभी लोग उसे देखकर आनंदित होंगे।

उन्होंने श्रीराम से कहा कि यह दिव्य मृग भरत, स्वयं श्रीराम, उनकी सासुओं और उनके लिए भी विस्मय का कारण बनेगा। यदि उसे जीवित पकड़ना संभव न हो, तो कम-से-कम उसका सुंदर चमड़ा ही प्राप्त कर लिया जाए।

माता सीता ने कल्पना की कि घास-फूस से बनी चटाई पर उस मृग का सुनहरा चमड़ा बिछाकर वे श्रीराम के साथ बैठेंगी। यह विचार उनके मन को बहुत प्रिय लग रहा था। वे जानती थीं कि अपने पति को इस प्रकार किसी कार्य के लिए आग्रहपूर्वक प्रेरित करना उचित नहीं माना जाता, फिर भी उस मृग के अद्भुत रूप ने उनके हृदय में ऐसा आकर्षण उत्पन्न कर दिया था कि वे स्वयं को रोक नहीं पा रही थीं।

श्रीराम भी स्वर्णमृग की सुंदरता से प्रभावित हुए

माता सीता की बातें सुनते हुए श्रीराम की दृष्टि भी उस मृग पर टिक गई। उसके सुनहरे बाल, इन्द्रनील मणि जैसे सींग, उदय होते सूर्य के समान चमक और तारों जैसे बिखरे हुए बिंदु उसकी सुंदरता को और भी विलक्षण बना रहे थे। श्रीराम भी उसके रूप को देखकर आश्चर्यचकित हो उठे।

उन्होंने लक्ष्मण से कहा, “देखो, सीता के मन में इस मृग को पाने की कितनी तीव्र इच्छा जाग उठी है! इसका रूप वास्तव में अद्भुत है। अपनी इसी असाधारण सुंदरता के कारण आज यह जीवित नहीं बच सकेगा।”

श्रीराम ने कहा कि देवराज इन्द्र के नन्दनवन और कुबेर के चैत्ररथवन में भी ऐसा कोई मृग नहीं होगा, जो इसकी बराबरी कर सके। पृथ्वी पर तो इसकी समानता करने वाला प्राणी मिलना और भी कठिन है।

उस मृग के शरीर पर सुनहरे बिंदुओं से सजी टेढ़ी-सीधी रोमावलियाँ अत्यंत मनमोहक दिखाई दे रही थीं। जब वह जँभाई लेता, तब उसके मुख से निकलती लाल चमकती जीभ ऐसी लगती मानो अग्नि की लपट हो। उसकी चमक मेघों के बीच कौंधती बिजली की याद दिलाती थी।

उसका मुख इन्द्रनील मणि से बने पात्र जैसा दिखाई देता था और उसका उदर शंख तथा मोती के समान सफेद था। उसके शरीर पर बिखरे विविध रंग और रत्नों जैसी चमक किसी को भी विस्मित कर सकती थी। श्रीराम ने स्वीकार किया कि उसका रूप सचमुच मन को मोह लेने वाला था।

श्रीराम द्वारा मृगया और वन्य धन का उल्लेख

मृग की सुंदरता देखकर श्रीराम ने लक्ष्मण को राजाओं की मृगया-परंपरा के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में राजा विशाल वनों में शिकार खेलने जाते थे। कभी वे मृगचर्म प्राप्त करने के लिए और कभी शिकार का अभ्यास करने के लिए धनुष उठाते थे।

वन केवल शिकार का स्थान ही नहीं, बल्कि अनेक बहुमूल्य वस्तुओं का भंडार भी होते थे। वहाँ विभिन्न प्रकार की धातुएँ, मणियाँ, रत्न और सोना प्राप्त हो सकते थे। इस प्रकार वन्य संपदा राज्य के कोष को समृद्ध करने में भी सहायक होती थी।

श्रीराम ने समझाया कि जिस प्रकार किसी ज्ञानी पुरुष के लिए मनन और चिंतन से प्राप्त ज्ञान मूल्यवान होता है, उसी प्रकार राजा के लिए राज्य की आवश्यकताओं को पूरा करने वाली संपदा भी महत्त्वपूर्ण होती है। किसी प्रयोजन को पूरा करने की इच्छा से मनुष्य जिस वस्तु की ओर आकर्षित होता है, अर्थशास्त्र के ज्ञाता उसी प्रयोजन की पूर्ति को अर्थ-साधन के रूप में समझते हैं।

इसके बाद उन्होंने माता सीता की इच्छा का उल्लेख करते हुए कहा कि इस मृग का बहुमूल्य सुनहरा चमड़ा प्राप्त होने पर सीता उनके साथ उस पर बैठ सकेंगी। उन्हें विश्वास था कि कदली, प्रियक, बकरी और भेड़ जैसे अन्य पशुओं की खाल भी इस मायावी मृग के चमड़े जैसी कोमल और सुखद नहीं हो सकती।

श्रीराम ने यह भी कहा कि आकाश में दिखाई देने वाला मृगशिरा नक्षत्र और पृथ्वी पर विचरण करता यह मृग—दोनों ही अपने-अपने स्थान पर अद्भुत हैं। एक आकाश का मृग है और दूसरा धरती का।

मारीच के वध का श्रीराम का संकल्प

लक्ष्मण की आशंका श्रीराम के मन में थी। वे जानते थे कि संभव है यह मृग वास्तव में मारीच की माया हो। फिर भी उन्होंने निश्चय किया कि यदि ऐसा है, तो भी उसका वध करना आवश्यक है।

श्रीराम ने लक्ष्मण को बताया कि मारीच अत्यंत क्रूर और दुष्ट स्वभाव का राक्षस है। उसने वन में विचरण करने वाले अनेक श्रेष्ठ मुनियों की हत्या की थी। शिकार के समय वह मायावी रूप धारण करके प्रकट होता और बड़े-बड़े धनुर्धारी राजाओं को भी अपने छल का शिकार बना लेता था।

इसलिए श्रीराम के विचार से, यदि यह मृग मारीच ही है, तो उसका वध संसार को उसके अत्याचारों से मुक्त करने का एक उचित अवसर होगा।

अगस्त्य मुनि और वातापि की कथा

मारीच के दुष्ट आचरण को समझाने के लिए श्रीराम ने लक्ष्मण को एक पुरानी घटना सुनाई। उन्होंने बताया कि इसी वन में कभी वातापि नाम का एक भयानक राक्षस रहता था। वह तपस्वियों और ब्राह्मणों के प्रति छल करता तथा उन्हें नष्ट करने के लिए कुटिल उपाय अपनाता था।

वातापि का भाई इल्वल भी इस छल में उसका साथ देता था। दोनों मिलकर अतिथियों को धोखे से भोजन कराते और फिर वातापि अपनी मायावी शक्ति से उन पर आक्रमण करता। इस प्रकार वे अनेक श्रेष्ठ ब्राह्मणों और तपस्वियों को हानि पहुँचाते थे।

एक दिन बहुत समय बीत जाने के बाद वातापि लोभवश तेजस्वी महर्षि अगस्त्य के पास पहुँचा। उसने अपनी पुरानी चाल चलने का प्रयास किया, लेकिन इस बार उसका सामना ऐसे महात्मा से था जिनकी तपस्या और दिव्य शक्ति के सामने उसका छल सफल नहीं हो सकता था।

भोजन के बाद वातापि ने अपने राक्षसी रूप में प्रकट होकर बाहर निकलने की इच्छा की। वह समझ रहा था कि पहले की तरह वह महर्षि को हानि पहुँचा देगा। किंतु अगस्त्य मुनि उसकी योजना समझ चुके थे। उन्होंने शांत भाव से मुसकराते हुए वातापि को संबोधित किया और कहा कि उसने अपने अहंकार तथा दुष्टता के कारण अनेक श्रेष्ठ ब्राह्मणों को कष्ट पहुँचाया है। अब उसके पापों का अंत हो चुका है और वह उनके भीतर ही पच चुका है।

इस प्रकार महर्षि अगस्त्य ने वातापि के अत्याचारों का अंत कर दिया। श्रीराम ने यह कथा सुनाकर लक्ष्मण को समझाया कि जैसे वातापि अपने छल के कारण अगस्त्य मुनि के हाथों नष्ट हुआ था, वैसे ही मारीच को भी उसके दुष्कर्मों का परिणाम भुगतना चाहिए।

सीता की रक्षा का दायित्व लक्ष्मण को सौंपना

श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि मारीच जैसे राक्षस को, जो धर्मपरायण और संयमी पुरुषों को भी छल से हानि पहुँचाने का प्रयास करता है, उसके अपराधों के लिए दंड मिलना चाहिए। वे उसे इस बार बचकर निकलने नहीं देना चाहते थे।

उन्होंने लक्ष्मण को आदेश दिया कि वे अस्त्र-शस्त्र और कवच धारण करके पूरी तरह सतर्क हो जाएँ। जब तक श्रीराम मृग का पीछा करें, तब तक लक्ष्मण आश्रम में रहकर माता सीता की रक्षा करें।

श्रीराम ने स्पष्ट किया कि उनका सबसे आवश्यक कर्तव्य सीता की सुरक्षा है। वे मृग को मारकर उसका चमड़ा लेकर लौटेंगे, अथवा यदि संभव हुआ तो उसे जीवित पकड़कर आश्रम में ले आएँगे। माता सीता की इच्छा पूरी करने के लिए वे तत्काल उसके पीछे जाने को तैयार थे।

उन्होंने लक्ष्मण को यह भी बताया कि सीता उस मृग का चमड़ा पाने के लिए बहुत उत्सुक हैं, इसलिए वे देर किए बिना उसका पीछा करेंगे। श्रीराम का विश्वास था कि वे अपने एक ही बाण से उस चितकबरे मृग को मार गिराएँगे और शीघ्र लौट आएँगे।

जटायु की सहायता और अंतिम सावधानी

प्रस्थान करने से पहले श्रीराम ने लक्ष्मण को एक और महत्त्वपूर्ण बात समझाई। उन्होंने कहा कि गृध्रराज जटायु अत्यंत बलवान और सामर्थ्यशाली हैं। लक्ष्मण को उनके साथ मिलकर आश्रम की रक्षा करनी चाहिए।

श्रीराम ने लक्ष्मण को विशेष रूप से सावधान किया कि वे माता सीता को अपने संरक्षण में रखें और चारों दिशाओं से आने वाले संभावित संकटों पर दृष्टि बनाए रखें। वन में राक्षसों की उपस्थिति और मारीच की मायावी शक्ति को देखते हुए किसी भी प्रकार की लापरवाही उचित नहीं थी।

इस प्रकार श्रीराम ने माता सीता की रक्षा का दायित्व लक्ष्मण को सौंपा और स्वर्णमृग के पीछे जाने के लिए तैयार हो गए। माता सीता उस मृग को पाने की आशा में प्रसन्न थीं, लक्ष्मण के मन में अनिष्ट की आशंका बनी हुई थी और श्रीराम उसे पकड़ने अथवा उसका वध करने का निश्चय कर चुके थे।

किन्तु उस चमकते हुए स्वर्णमृग की सुंदरता के पीछे एक गहरा छल छिपा था। मारीच की माया ने पञ्चवटी के शांत वातावरण में ऐसी घटना की भूमिका तैयार कर दी थी, जिसका प्रभाव आगे चलकर श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता के जीवन पर पड़ने वाला था।

 

प्रश्न–उत्तर

प्रश्न 1. माता सीता ने स्वर्णमृग को देखकर क्या अनुभव किया?

उत्तर: स्वर्णमृग की अद्भुत सुंदरता देखकर माता सीता अत्यंत प्रसन्न और आकर्षित हुईं। उन्होंने श्रीराम और लक्ष्मण को बुलाकर उस मृग को दिखाया।

प्रश्न 2. लक्ष्मण को स्वर्णमृग पर संदेह क्यों हुआ?

उत्तर: मृग का असाधारण रूप और रत्नों जैसी चमक देखकर लक्ष्मण को संदेह हुआ कि वह मारीच नामक मायावी राक्षस है।

प्रश्न 3. लक्ष्मण ने मारीच के छल के विषय में श्रीराम को क्या बताया?

उत्तर: लक्ष्मण ने बताया कि मारीच इच्छानुसार रूप बदल सकता था और पहले भी छलपूर्वक अनेक राजाओं तथा श्रेष्ठ मुनियों को हानि पहुँचा चुका था।

प्रश्न 4. माता सीता स्वर्णमृग को क्यों प्राप्त करना चाहती थीं?

उत्तर: माता सीता उसकी अनुपम सुंदरता से मोहित थीं। वे उसे आश्रम में मनोरंजन के लिए रखना और वनवास के बाद अयोध्या ले जाना चाहती थीं।

प्रश्न 5. यदि स्वर्णमृग जीवित नहीं पकड़ा जाता, तो माता सीता क्या चाहती थीं?

उत्तर: माता सीता चाहती थीं कि यदि मृग जीवित न पकड़ा जा सके, तो उसका सुंदर सुनहरा चमड़ा प्राप्त करके चटाई पर बिछाया जाए।

प्रश्न 6. स्वर्णमृग की सुंदरता का वर्णन श्रीराम ने किस प्रकार किया?

उत्तर: श्रीराम ने उसके सुनहरे बिंदुओं, इन्द्रनील मणि जैसे सींगों, सूर्य जैसी चमक और अद्भुत रंगों से सजे शरीर की प्रशंसा की।

प्रश्न 7. प्राचीन काल में राजा वन में मृगया के लिए क्यों जाते थे?

उत्तर: राजा मृगया के लिए वन में जाते थे, ताकि शिकार का अभ्यास कर सकें, मृगचर्म प्राप्त करें और बहुमूल्य वन्य संपदा जुटाएँ।

प्रश्न 8. श्रीराम ने मारीच का वध करना आवश्यक क्यों समझा?

उत्तर: श्रीराम जानते थे कि मारीच ने अनेक मुनियों और राजाओं को छलपूर्वक हानि पहुँचाई थी। इसलिए वे उसके अत्याचारों का अंत करना चाहते थे।

प्रश्न 9. वातापि नामक राक्षस कौन था और वह क्या करता था?

उत्तर: वातापि एक दुष्ट राक्षस था, जो अपने भाई इल्वल के साथ मिलकर छलपूर्वक ब्राह्मणों और तपस्वियों को हानि पहुँचाता था।

प्रश्न 10. महर्षि अगस्त्य ने वातापि का अंत कैसे किया?

उत्तर: महर्षि अगस्त्य ने वातापि का छल समझ लिया और अपनी तपोशक्ति से उसे पचा लिया, जिससे उसके अत्याचारों का अंत हो गया।

प्रश्न 11. श्रीराम ने वातापि की कथा लक्ष्मण को क्यों सुनाई?

उत्तर: श्रीराम ने वातापि की कथा सुनाकर समझाया कि मारीच जैसे दुष्ट राक्षस को भी उसके छल और अत्याचारों के लिए दंड मिलना चाहिए।

प्रश्न 12. स्वर्णमृग के पीछे जाने से पहले श्रीराम ने लक्ष्मण को क्या निर्देश दिया?

उत्तर: श्रीराम ने लक्ष्मण को अस्त्र-शस्त्र धारण करके आश्रम में रहने, माता सीता की रक्षा करने और हर दिशा से सतर्क रहने का निर्देश दिया।

प्रश्न 13. श्रीराम ने जटायु के विषय में लक्ष्मण को क्या बताया?

उत्तर: श्रीराम ने बताया कि गृध्रराज जटायु अत्यंत बलवान और सामर्थ्यशाली हैं। लक्ष्मण को उनके साथ मिलकर माता सीता की सुरक्षा करनी चाहिए।

प्रश्न 14. श्रीराम स्वर्णमृग के पीछे जाने से पहले किस बात के प्रति विशेष रूप से सावधान थे?

उत्तर: श्रीराम माता सीता की सुरक्षा को सर्वोपरि मानते थे। इसलिए उन्होंने लक्ष्मण को आश्रम में रहकर उनकी रक्षा करने और राक्षसों से सावधान रहने को कहा।

प्रश्न 15. स्वर्णमृग की घटना ने आगे की रामायण कथा के लिए किस प्रकार भूमिका तैयार की?

उत्तर: मारीच की मायावी योजना ने श्रीराम को आश्रम से दूर जाने के लिए प्रेरित किया, जिससे आगे चलकर माता सीता के अपहरण की भूमिका बनी।