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(45)
श्रीराम की मायावी पुकार और माता सीता का लक्ष्मण पर क्रोध
वन में श्रीराम की आर्तनाद सुनकर सीता की व्याकुलता
स्वर्णमृग के पीछे गए श्रीराम की प्रतीक्षा करते हुए माता सीता का मन बार-बार उनकी ओर जा रहा था। तभी वन में एक अत्यंत करुण आर्तनाद सुनाई दिया। वह स्वर श्रीराम के स्वर से मिलता-जुलता था। जैसे ही सीता ने वह पुकार सुनी, उनका हृदय भय से काँप उठा। उन्हें ऐसा लगा मानो श्रीराम किसी भयंकर संकट में फँस गए हों और सहायता के लिए उन्हें पुकार रहे हों।
सीता ने घबराकर लक्ष्मण से कहा, “भैया! तुम शीघ्र जाओ और श्रीराम का समाचार लेकर आओ। उन्होंने अत्यंत आर्त स्वर में हमें पुकारा है। उनकी आवाज इतनी ऊँची और करुण थी कि उसे सुनते ही मेरा मन व्याकुल हो उठा है। मेरे प्राण जैसे अपने स्थान पर नहीं रह गए हैं। न जाने स्वामी पर कैसी विपत्ति आ पड़ी है!”
सीता की व्याकुलता बढ़ती जा रही थी। उन्होंने लक्ष्मण से फिर कहा, “तुम्हारे बड़े भाई वन में संकट में हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वे किसी की सहायता चाहते हैं। तुम शीघ्र उनके पास पहुँचो और उनकी रक्षा करो। कहीं ऐसा न हो कि वे राक्षसों के बीच फँस गए हों। जिस प्रकार कोई शक्तिशाली साँड़ सिंहों के पंजों में घिर जाने पर असहाय हो जाता है, उसी प्रकार यदि श्रीराम किसी संकट में पड़ गए हैं, तो तुम्हारा वहाँ पहुँचना आवश्यक है।”
लेकिन लक्ष्मण अपने बड़े भाई की आज्ञा को याद कर वहीं खड़े रहे। श्रीराम ने उन्हें स्पष्ट निर्देश दिया था कि वे सीता की रक्षा करें और उन्हें अकेला न छोड़ें। लक्ष्मण जानते थे कि श्रीराम अत्यंत पराक्रमी हैं और कोई भी शत्रु उनका सामना नहीं कर सकता। इसलिए वे सीता को अकेला छोड़कर जाने के लिए तैयार नहीं हुए।
सीता का संदेह और लक्ष्मण पर कठोर आरोप
जब सीता ने देखा कि बार-बार आग्रह करने पर भी लक्ष्मण जाने को तैयार नहीं हैं, तो उनका भय क्रोध में बदलने लगा। पति के संकट की आशंका ने उनकी बुद्धि को व्याकुल कर दिया था। वे दुःख और चिंता से काँपती हुई लक्ष्मण से बोलीं, “सुमित्रा के पुत्र! तुम्हारा व्यवहार देखकर ऐसा लगता है कि तुम मित्र का रूप धारण किए हुए अपने ही भाई के शत्रु हो। श्रीराम संकट में हैं, फिर भी तुम उनकी सहायता के लिए नहीं जा रहे हो। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि तुम मेरे प्रति आसक्ति के कारण श्रीराम का विनाश चाहते हो।”
सीता के मुख से ऐसे कठोर शब्द सुनकर भी लक्ष्मण शांत रहने का प्रयास करते रहे। लेकिन सीता का संदेह बढ़ता गया। उन्होंने कहा, “लक्ष्मण! ऐसा लगता है कि तुम्हारे मन में मुझे पाने का लोभ उत्पन्न हो गया है। इसी कारण तुम श्रीराम के पीछे नहीं जाना चाहते। तुम्हें अपने भाई का संकट प्रिय लग रहा है। यदि तुम्हारे हृदय में उनके प्रति सच्चा प्रेम होता, तो तुम इस प्रकार निश्चिंत खड़े नहीं रहते।”
सीता के लिए श्रीराम का जीवन ही सब कुछ था। उन्हें लगा कि यदि उनके पति ही संकट में हैं, तो उनकी अपनी रक्षा का क्या अर्थ रह जाता है? उन्होंने दुःख से कहा, “हाय! जिन श्रीराम की सेवा और रक्षा के लिए तुम मेरे साथ यहाँ आए हो, यदि उन्हीं के प्राण संकट में पड़ गए, तो फिर मेरी रक्षा करने से क्या लाभ होगा? मेरे लिए तो तुम्हारा यहाँ रुकना और स्वामी की सहायता के लिए न जाना असहनीय है।”
लक्ष्मण का आश्वासन और श्रीराम की अपराजेय शक्ति
सीता की दशा भयभीत हिरणी के समान हो गई थी। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे और हृदय में अनिष्ट की आशंका गहराती जा रही थी। उन्हें इस अवस्था में देखकर लक्ष्मण ने अत्यंत विनम्रता से समझाया।
उन्होंने कहा, “विदेहनंदिनी! आप मेरी बात पर विश्वास कीजिए। नाग, असुर, गंधर्व, देवता, दानव और राक्षस—ये सभी मिलकर भी आपके स्वामी श्रीराम को पराजित नहीं कर सकते। उनकी शक्ति असाधारण है। उनके रहते किसी शत्रु का सफल होना असंभव है।”
लक्ष्मण ने आगे कहा, “देवि! इस संसार में ऐसा कोई वीर नहीं है जो युद्धभूमि में इंद्र के समान पराक्रमी श्रीराम का सामना कर सके। देवता हों या मनुष्य, गंधर्व हों या राक्षस, पिशाच हों या किन्नर—कोई भी उनकी शक्ति के सामने टिक नहीं सकता। श्रीराम युद्ध में अवध्य हैं। इसलिए आपको उनके विषय में ऐसी आशंकाएँ नहीं करनी चाहिए।”
लक्ष्मण चाहते थे कि सीता का भय दूर हो जाए। उन्होंने उन्हें समझाया कि श्रीराम की अनुपस्थिति में वे उन्हें इस घने वन में अकेला नहीं छोड़ सकते। उन्होंने कहा, “बड़े-बड़े राजा अपनी सेनाओं के साथ भी श्रीराम की शक्ति को रोक नहीं सकते। यदि देवता और इंद्र सहित तीनों लोक भी उनके विरुद्ध आ जाएँ, तो भी वे उनके पराक्रम को रोकने में समर्थ नहीं होंगे। अतः आप अपने हृदय को शांत कीजिए और चिंता छोड़ दीजिए।”
फिर लक्ष्मण ने सीता को विश्वास दिलाया, “आपके स्वामी उस सुंदर मृग को मारकर शीघ्र ही लौट आएँगे। आपने जो आर्तनाद सुना है, वह निश्चय ही श्रीराम का स्वर नहीं था। संभव है कि वह किसी राक्षस की मायावी चाल हो। राक्षस छल और भ्रम उत्पन्न करने में निपुण होते हैं। वे अपनी माया से ऐसे स्वर उत्पन्न कर सकते हैं, जिनसे सुनने वाला धोखा खा जाए।”
लक्ष्मण ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “सुंदरी! श्रीराम ने आपकी रक्षा का भार मुझे सौंपा है। आप मेरे लिए उनकी धरोहर के समान हैं। जब तक वे लौटकर नहीं आते, तब तक आपको सुरक्षित रखना मेरा कर्तव्य है। मैं आपको अकेला छोड़कर कैसे जा सकता हूँ?”
उन्होंने खर के वध की घटना भी याद दिलाई। बोले, “जब श्रीराम ने जनस्थान में खर और अनेक राक्षसों का संहार किया था, तभी से ये निशाचर हमसे शत्रुता रखने लगे हैं। वे इस वन में विचित्र आवाजें निकालकर प्राणियों को भयभीत करते रहते हैं। इसलिए संभव है कि आपने जो आवाज सुनी, वह भी उन्हीं की किसी माया का परिणाम हो। आप व्यर्थ चिंता न करें।”
सीता का क्रोध और लक्ष्मण पर बढ़ता हुआ अविश्वास
लक्ष्मण के इतने आश्वासन देने पर भी सीता का मन शांत नहीं हुआ। श्रीराम के संकट की आशंका ने उनके विवेक को ढक लिया था। उन्हें लगा कि लक्ष्मण जान-बूझकर उनकी बात नहीं मान रहे हैं। क्रोध से उनकी आँखें लाल हो गईं और वे कठोर स्वर में बोलीं, “अनार्य! निर्दयी! क्रूर कर्म करने वाले! तुम अपने कुल पर कलंक हो। मैं तुम्हारे मन की बात समझ गई हूँ। तुम्हें यही प्रिय है कि श्रीराम किसी बड़ी विपत्ति में पड़ जाएँ। इसी कारण तुम उनकी सहायता के लिए जाने के स्थान पर मुझे बहलाने का प्रयास कर रहे हो।”
सीता के शब्द लगातार कठोर होते जा रहे थे। उन्होंने कहा, “लक्ष्मण! तुम्हारे जैसे छिपे हुए शत्रु के मन में ऐसा पापपूर्ण विचार आना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। तुम बाहर से श्रीराम के सेवक और भाई दिखाई देते हो, लेकिन तुम्हारे हृदय में कुछ और ही चल रहा है।”
इसके बाद उन्होंने लक्ष्मण पर एक और आरोप लगाया। वे बोलीं, “तुमने श्रीराम को वन में अकेले जाते देखा और मुझे पाने की इच्छा से अपने मन का भाव छिपाकर उनके पीछे चले आए। अथवा संभव है कि भरत ने ही तुम्हें यहाँ भेजा हो, ताकि श्रीराम को संकट में डालकर अपना उद्देश्य पूरा किया जा सके।”
फिर सीता ने दृढ़ स्वर में कहा, “लेकिन सुमित्राकुमार! न तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा और न भरत का। मैंने नीलकमल के समान श्यामवर्ण, कमलनयन श्रीराम को अपना पति स्वीकार किया है। उनके रहते मैं किसी दूसरे पुरुष के विषय में सोच भी कैसे सकती हूँ? मेरे लिए श्रीराम ही सर्वस्व हैं।”
सीता का हृदय अब भय, क्रोध और दुःख से भर चुका था। उन्होंने कहा, “लक्ष्मण! मैं तुम्हारे सामने ही अपने प्राण त्याग देना स्वीकार करूँगी, लेकिन श्रीराम के बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती। मेरे जीवन का अर्थ केवल श्रीराम हैं। उनसे बिछुड़ने की कल्पना भी मेरे लिए असहनीय है।”
लक्ष्मण का धैर्य और आहत हृदय
सीता के मुख से इतने कठोर और अपमानजनक शब्द सुनकर लक्ष्मण अत्यंत दुःखी हुए। वे जितेंद्रिय थे और अपने बड़े भाई तथा भाभी के प्रति गहरी श्रद्धा रखते थे। उन्होंने हाथ जोड़कर विनम्रता से कहा, “देवि! मैं आपकी बातों का उत्तर नहीं दे सकता, क्योंकि आप मेरे लिए आराधना योग्य देवी के समान हैं। आपके प्रति मेरे मन में सदैव आदर रहा है। मैं आपके सामने विवाद कैसे कर सकता हूँ?”
इसके बाद लक्ष्मण ने दुःख और आक्रोश से कहा कि ऐसी अनुचित बातें सुनकर उनका हृदय आहत हुआ है। उन्होंने स्त्रियों के स्वभाव के विषय में उस समय प्रचलित सामान्य धारणाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि कभी-कभी स्त्रियाँ भय और आवेश में कठोर तथा अनुचित बातें कह देती हैं। सीता के शब्द उन्हें ऐसे चुभ रहे थे, मानो उनके कानों में तपाया हुआ लोहा डाल दिया गया हो।
लक्ष्मण ने वन में विचरने वाले प्राणियों को साक्षी मानकर कहा, “हे वन के प्राणियो! तुम सब मेरे कथन के साक्षी बनो। मैंने न्याय और धर्म के अनुसार ही बात कही है, फिर भी सीता ने मुझ पर ऐसे भयंकर आरोप लगाए हैं। ऐसा लगता है कि आज उनका विवेक भय और शोक से ढक गया है। वे मुझ पर संदेह कर रही हैं, जबकि मैं अपने बड़े भाई की आज्ञा का पालन करने के लिए पूर्णतः समर्पित हूँ।”
उनके लिए यह परिस्थिति अत्यंत कठिन थी। एक ओर बड़े भाई की आज्ञा थी कि वे सीता की रक्षा करें, दूसरी ओर सीता स्वयं उन्हें श्रीराम के पास जाने के लिए बाध्य कर रही थीं। लक्ष्मण धर्मसंकट में पड़ गए थे। अंततः उन्होंने कहा, “अच्छा, अब मैं वहीं जाता हूँ जहाँ भैया श्रीराम गए हैं। सुमुखि! आपका कल्याण हो।”
जाने से पहले लक्ष्मण ने सीता की ओर देखा और भारी मन से कहा, “विशाल नेत्रों वाली देवी! वन के सभी देवता आपकी रक्षा करें। इस समय मेरे सामने अनेक भयंकर अपशकुन दिखाई दे रहे हैं, जिनसे मेरा मन आशंकित हो उठा है। मुझे भय है कि कहीं कोई अनिष्ट न हो जाए। क्या मैं श्रीराम के साथ लौटकर आपको फिर से सकुशल देख पाऊँगा?”
सीता की प्रतिज्ञा और लक्ष्मण का प्रस्थान
लक्ष्मण के जाने की बात सुनकर सीता की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। वे अब भी श्रीराम के संकट की आशंका से व्याकुल थीं। रोते हुए उन्होंने लक्ष्मण से कहा, “यदि मैं श्रीराम से बिछुड़ गई, तो गोदावरी नदी में समा जाऊँगी, अथवा किसी पर्वत के दुर्गम शिखर से नीचे कूद जाऊँगी। मैं विष पी लूँगी या जलती हुई अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगी, लेकिन श्रीराम के अतिरिक्त किसी दूसरे पुरुष का स्पर्श कभी स्वीकार नहीं करूँगी।”
सीता के ये शब्द उनके अटूट पतिव्रत और श्रीराम के प्रति समर्पण को प्रकट करते हैं। उस समय उनका मन अत्यंत दुःखी था और वे अपने स्वामी के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर पा रही थीं।
अपनी प्रतिज्ञा कहने के बाद सीता शोक से व्याकुल होकर रोने लगीं। दुःख की तीव्रता में वे अपने उदर पर हाथ मारने लगीं और छाती पीटकर विलाप करने लगीं। उन्हें इस प्रकार आर्त होकर रोते देखकर लक्ष्मण का हृदय भी द्रवित हो उठा। वे मन ही मन उन्हें सांत्वना देना चाहते थे, लेकिन परिस्थिति ऐसी बन चुकी थी कि सीता उनसे कुछ सुनने को तैयार नहीं थीं।
अंततः लक्ष्मण ने दोनों हाथ जोड़कर और थोड़ा झुककर माता सीता को प्रणाम किया। उनके मन में उनके प्रति आदर बना हुआ था, यद्यपि उनके कठोर शब्दों ने उन्हें भीतर तक आहत कर दिया था। वे बार-बार पीछे मुड़कर सीता की ओर देखते रहे और भारी मन से श्रीराम की खोज में वन की ओर चल पड़े।
इस प्रकार सीता की व्याकुलता, श्रीराम के प्रति उनका अटूट प्रेम और लक्ष्मण का धर्मसंकट उस वन में एक अत्यंत मार्मिक परिस्थिति उत्पन्न कर गया। लक्ष्मण सीता की रक्षा का दायित्व निभाना चाहते थे, लेकिन उनके आग्रह और कठोर आरोपों के कारण उन्हें श्रीराम के पास जाना पड़ा। यही वह निर्णायक क्षण था, जिसके बाद रामायण की कथा एक नए और गंभीर मोड़ की ओर बढ़ती है।
प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. वन में आर्तनाद सुनकर माता सीता ने लक्ष्मण से क्या कहा?
उत्तर: माता सीता ने लक्ष्मण से शीघ्र श्रीराम के पास जाकर उनका समाचार जानने और संकट में उनकी सहायता करने का आग्रह किया।
प्रश्न 2. माता सीता श्रीराम की आवाज सुनकर क्यों व्याकुल हो उठीं?
उत्तर: आर्तनाद श्रीराम के स्वर से मिलता-जुलता था। उसे सुनकर सीता को आशंका हुई कि उनके स्वामी किसी भयंकर संकट में पड़ गए हैं।
प्रश्न 3. लक्ष्मण ने माता सीता के आग्रह पर तुरंत जाने से इनकार क्यों किया?
उत्तर: लक्ष्मण को श्रीराम की आज्ञा याद थी कि वे सीता की रक्षा करें। वे उन्हें वन में अकेला छोड़ना उचित नहीं समझते थे।
प्रश्न 4. माता सीता ने लक्ष्मण पर क्या आरोप लगाया?
उत्तर: सीता ने आरोप लगाया कि लक्ष्मण उन्हें पाने की इच्छा से श्रीराम के संकट में पड़ने की प्रतीक्षा कर रहे हैं और उनकी सहायता नहीं करना चाहते।
प्रश्न 5. लक्ष्मण ने श्रीराम की शक्ति के विषय में सीता को क्या समझाया?
उत्तर: लक्ष्मण ने कहा कि देवता, दानव, राक्षस और अन्य शक्तिशाली प्राणी भी मिलकर श्रीराम को युद्ध में पराजित नहीं कर सकते।
प्रश्न 6. लक्ष्मण ने सीता द्वारा सुने गए आर्तनाद का क्या कारण बताया?
उत्तर: लक्ष्मण ने समझाया कि वह आर्तनाद श्रीराम का नहीं था, बल्कि संभवतः किसी राक्षस की मायावी चाल थी, जिसका उद्देश्य उन्हें भ्रमित करना था।
प्रश्न 7. लक्ष्मण ने सीता को अकेला छोड़ने से इनकार करते हुए क्या कहा?
उत्तर: लक्ष्मण ने कहा कि श्रीराम ने सीता की रक्षा का दायित्व उन्हें सौंपा है। इसलिए वे उन्हें अकेला छोड़कर नहीं जा सकते।
प्रश्न 8. माता सीता ने लक्ष्मण पर भरत के साथ मिलकर षड्यंत्र करने का संदेह क्यों किया?
उत्तर: लक्ष्मण के जाने से इनकार करने पर सीता भय और क्रोध में आ गईं तथा उन्हें लगा कि लक्ष्मण या भरत का कोई गुप्त उद्देश्य है।
प्रश्न 9. माता सीता ने श्रीराम के प्रति अपने प्रेम और निष्ठा को कैसे व्यक्त किया?
उत्तर: सीता ने कहा कि नीलकमल के समान श्यामसुन्दर श्रीराम ही उनके पति हैं और उनके अतिरिक्त वे किसी दूसरे पुरुष को स्वीकार नहीं करेंगी।
प्रश्न 10. सीता के कठोर वचनों से लक्ष्मण को कैसा अनुभव हुआ?
उत्तर: लक्ष्मण का हृदय अत्यंत आहत हुआ। उन्होंने सीता के प्रति सम्मान बनाए रखते हुए कहा कि उनके कठोर शब्द उन्हें तपाए हुए लोहे के समान लगे।
प्रश्न 11. लक्ष्मण ने सीता को कौन-से अपशकुन दिखाई देने की बात बताई?
उत्तर: लक्ष्मण ने कहा कि वन में अनेक भयंकर अपशकुन दिखाई दे रहे हैं, जिनसे उनका मन आशंकित है कि कहीं कोई अनिष्ट न हो जाए।
प्रश्न 12. माता सीता ने श्रीराम से बिछुड़ने की आशंका में क्या प्रतिज्ञा की?
उत्तर: सीता ने प्रतिज्ञा की कि श्रीराम से बिछुड़ने पर वे जीवित नहीं रहना चाहेंगी, लेकिन उनके अतिरिक्त किसी दूसरे पुरुष को कभी स्वीकार नहीं करेंगी।
प्रश्न 13. लक्ष्मण ने अंततः सीता के सामने क्या निर्णय लिया?
उत्तर: सीता के लगातार आग्रह और कठोर आरोपों से व्यथित होकर लक्ष्मण ने उन्हें प्रणाम किया और भारी मन से श्रीराम की खोज में वन की ओर प्रस्थान किया।
प्रश्न 14. इस प्रसंग में लक्ष्मण किस धर्मसंकट में फँस गए थे?
उत्तर: लक्ष्मण एक ओर श्रीराम की आज्ञा के अनुसार सीता की रक्षा करना चाहते थे, वहीं दूसरी ओर सीता के आग्रह पर श्रीराम की सहायता के लिए जाना चाहते थे।
प्रश्न 15. इस प्रसंग से सीता और लक्ष्मण के चरित्र की कौन-सी विशेषताएँ सामने आती हैं?
उत्तर: सीता का श्रीराम के प्रति अटूट प्रेम और व्याकुलता तथा लक्ष्मण की कर्तव्यनिष्ठा, धैर्य, विनम्रता और बड़े भाई के प्रति समर्पण सामने आता है।