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(50)  जटायु की धर्मपूर्ण चेतावनी और रावण को युद्ध की ललकार

(50)

जटायु की धर्मपूर्ण चेतावनी और रावण को युद्ध की ललकार

सीता माता के करुण विलाप को सुनकर जटायु का जागना, रावण को धर्म का उपदेश देना और निर्भीक होकर उसे युद्ध की चुनौती देना

जटायु उस समय वृक्ष पर विश्राम कर रहे थे। तभी उन्हें सीता माता की करुण पुकार सुनाई दी। उनकी आवाज़ में भय, पीड़ा और असहायता झलक रही थी। सीता को संकट में देखकर जटायु ने तुरंत अपनी आँखें खोलीं। उन्होंने देखा कि लंका का राजा रावण सीता माता को बलपूर्वक अपने साथ ले जा रहा है। यह दृश्य देखकर जटायु का हृदय व्याकुल हो उठा। उन्होंने तुरंत परिस्थिति को समझा और रावण को रोकने का निश्चय किया।

जटायु का शरीर पर्वत की चोटी के समान विशाल और उनकी चोंच अत्यंत तीक्ष्ण थी। वे वृक्ष पर बैठे-बैठे ही रावण की ओर देखकर गंभीर स्वर में बोले, “दशमुख रावण! मैं गिद्धों का राजा जटायु हूँ। मैं सनातन धर्म का पालन करने वाला, सत्यप्रतिज्ञ और अत्यंत बलवान हूँ। हे रावण! तुम्हें मेरे सामने ऐसा निंदनीय कार्य नहीं करना चाहिए। किसी असहाय स्त्री का अपहरण करना वीरता नहीं, बल्कि अधर्म है।”

जटायु ने रावण को श्रीराम के सामर्थ्य और महानता का स्मरण कराया। उन्होंने कहा, “रावण! तुम जानते नहीं कि तुम किसकी पत्नी का अपहरण करने का दुस्साहस कर रहे हो। ये दशरथनंदन श्रीराम की धर्मपत्नी हैं। श्रीराम सम्पूर्ण जगत के स्वामी के समान महान, इंद्र और वरुण के समान पराक्रमी तथा सभी प्राणियों का हित चाहने वाले हैं। उनकी पत्नी का अपमान करके तुम स्वयं अपने विनाश को आमंत्रित कर रहे हो।”

इसके बाद जटायु ने रावण को राजधर्म समझाते हुए कहा, “जो राजा स्वयं धर्म का पालन करता है, वह कभी दूसरे की पत्नी पर बुरी दृष्टि नहीं डाल सकता। राजा का कर्तव्य है कि वह सभी स्त्रियों की रक्षा करे, विशेषकर उन स्त्रियों की, जो किसी दूसरे की पत्नी हैं। पराई स्त्री का अपहरण करने से मनुष्य को अपयश और पाप ही प्राप्त होता है। इसलिए अभी भी समय है, अपने इस नीच कर्म से पीछे हट जाओ।”

जटायु ने आगे कहा, “बुद्धिमान व्यक्ति वही है, जो ऐसा कोई कार्य नहीं करता जिसकी दूसरे लोग निंदा करें। जिस प्रकार मनुष्य अपनी पत्नी की रक्षा करता है और नहीं चाहता कि कोई परपुरुष उसे अनुचित दृष्टि से देखे, उसी प्रकार उसे दूसरों की स्त्रियों का भी सम्मान और संरक्षण करना चाहिए। धर्म का अर्थ केवल अपने अधिकारों की रक्षा करना नहीं, बल्कि दूसरों के अधिकारों और मर्यादा का सम्मान करना भी है।”

फिर जटायु ने रावण को उसके कुल और पद का स्मरण कराया। उन्होंने कहा, “हे पुलस्त्य कुल के गौरव! संसार में सामान्य लोग भी राजाओं के आचरण को देखकर अपना व्यवहार निर्धारित करते हैं। यदि राजा स्वयं शास्त्रविरुद्ध और अधर्मपूर्ण कार्य करने लगे, तो प्रजा भी उसी मार्ग पर चलने लगती है। इसलिए राजा को अपने प्रत्येक कर्म में धर्म, मर्यादा और न्याय का ध्यान रखना चाहिए।”

जटायु ने रावण को समझाया कि राजा केवल राज्य का स्वामी नहीं होता, बल्कि वह समाज में धर्म और सदाचार की स्थापना करने वाला भी होता है। राजा के आचरण से ही प्रजा में अच्छे या बुरे कर्मों की प्रवृत्ति बढ़ती है। यदि राजा धर्म का पालन करे, तो समाज में धर्म बढ़ता है; लेकिन यदि वही पाप करने लगे, तो उसके राज्य में अधर्म फैलने लगता है। इस प्रकार रावण अपने पद और कर्तव्य दोनों का अपमान कर रहा था।

रावण के पापपूर्ण स्वभाव को देखकर जटायु ने आश्चर्य व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “हे राक्षसराज! तुम्हारा स्वभाव इतना दुष्ट और चंचल है, फिर भी तुम्हें इतना बड़ा ऐश्वर्य कैसे प्राप्त हुआ? जिस व्यक्ति के मन पर काम और वासना का आधिपत्य हो जाता है, उसके लिए अपने दुर्गुणों को छोड़ना कठिन हो जाता है। दुष्ट प्रवृत्ति वाले व्यक्ति के जीवन में पुण्य और सदाचार का स्थायी निवास नहीं हो पाता।”

इसके बाद जटायु ने रावण से प्रश्न किया, “जब श्रीराम ने तुम्हारे राज्य या नगर में आकर तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया, तब तुम उनके विरुद्ध इतना बड़ा अपराध क्यों कर रहे हो? उन्होंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, जो तुम उनकी पत्नी का अपहरण करने पर उतारू हो गए हो?”

जटायु ने खर के वध का प्रसंग भी याद दिलाया। उन्होंने कहा, “यदि खर अपनी बहन शूर्पणखा का बदला लेने के लिए श्रीराम पर आक्रमण करने आया था और श्रीराम ने युद्ध में उसका वध कर दिया, तो इसमें श्रीराम का क्या दोष था? श्रीराम ने अपने ऊपर हुए आक्रमण का सामना किया था। केवल इस कारण उनकी पत्नी का अपहरण करना कि तुम अपने भाई की मृत्यु का बदला लेना चाहते हो, किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।”

जटायु ने रावण को अंतिम अवसर देते हुए कहा, “रावण! अभी भी सीता माता को सम्मानपूर्वक छोड़ दो। यदि तुमने ऐसा नहीं किया, तो श्रीराम का क्रोध तुम्हारे लिए विनाशकारी सिद्ध होगा। उनकी क्रोधाग्नि तुम्हें उसी प्रकार भस्म कर देगी, जैसे इंद्र के वज्र ने वृत्रासुर का विनाश किया था। अपनी हठधर्मिता छोड़ दो और उस संकट से बच जाओ, जिसे तुम स्वयं अपने लिए खड़ा कर रहे हो।”

रावण पर जटायु की बातों का कोई प्रभाव पड़ता नहीं दिखाई दिया। तब जटायु ने उसे कठोर शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा, “तुमने अपने वस्त्र में विषधर सर्प बाँध लिया है, लेकिन तुम्हें इसका भय नहीं है। तुमने मानो अपने ही गले में मृत्यु का फंदा डाल लिया है, फिर भी तुम्हें अपने विनाश का आभास नहीं हो रहा। सीता माता का अपहरण करके तुम जिस संकट को अपने साथ ले जा रहे हो, उसका परिणाम अत्यंत भयानक होगा।”

इसके बाद जटायु ने उसे जीवन का एक सरल सिद्धांत समझाया। उन्होंने कहा, “मनुष्य को उतना ही बोझ उठाना चाहिए, जितना वह सहन कर सके। उसे वही भोजन करना चाहिए, जो उसके शरीर में पच सके और रोग उत्पन्न न करे। इसी प्रकार किसी भी व्यक्ति को अपनी शक्ति और सामर्थ्य से परे जाकर ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए, जो अंततः उसके लिए विनाश का कारण बन जाए।”

जटायु ने आगे कहा, “जिस कार्य से न धर्म की प्राप्ति हो, न कीर्ति बढ़े और न स्थायी यश मिले, बल्कि शरीर को कष्ट और जीवन को संकट प्राप्त हो, ऐसा कार्य कौन बुद्धिमान व्यक्ति करेगा? तुम्हारे इस कृत्य से तुम्हें कोई वास्तविक लाभ नहीं मिलेगा। इसके विपरीत तुम्हारा नाम अधर्मी और परस्त्री का अपहरण करने वाले के रूप में लिया जाएगा।”

अब जटायु ने अपने जीवन और अनुभव का परिचय देते हुए कहा, “रावण! मुझे अपने पूर्वजों से यह पक्षीराज्य प्राप्त हुआ था। मैं तब से लेकर आज तक, लगभग साठ हजार वर्षों से, इसका विधिपूर्वक पालन करता आया हूँ। मैंने जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं और धर्म के मार्ग पर चलते हुए अपने कर्तव्यों का निर्वाह किया है। आज मेरी आयु बहुत अधिक हो गई है, लेकिन मेरे भीतर धर्म की रक्षा करने का साहस अभी भी जीवित है।”

उन्होंने अपनी वृद्धावस्था और रावण की युवावस्था का उल्लेख करते हुए कहा, “मैं बूढ़ा हो चुका हूँ और तुम युवा हो। तुम्हारे पास धनुष, बाण, कवच और रथ जैसे युद्ध के सभी साधन हैं, जबकि मैं वृद्ध हूँ। फिर भी तुम्हें यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि तुम सीता माता को लेकर सुरक्षित चले जाओगे। जब तक मैं जीवित हूँ, तुम्हें उन्हें बलपूर्वक ले जाने नहीं दूँगा।”

जटायु का साहस देखकर रावण को समझ जाना चाहिए था कि उसके सामने खड़ा वृद्ध पक्षी केवल उपदेश देने वाला नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाने को तैयार है। जटायु ने दृढ़ स्वर में कहा, “रावण! तुम मेरी आँखों के सामने सीता माता का अपहरण नहीं कर सकते। जिस प्रकार सत्य और उचित प्रमाणों से सिद्ध वैदिक वाणी को कोई व्यक्ति अपनी मनमानी युक्तियों से झुठला नहीं सकता, उसी प्रकार तुम भी मेरे रहते इस अन्याय को सफल नहीं बना सकते।”

इसके बाद जटायु ने रावण को सीधे युद्ध की चुनौती दी। उन्होंने कहा, “यदि तुम स्वयं को वीर समझते हो, तो भागने के बजाय मेरे सामने ठहरकर युद्ध करो। दो घड़ी रुक जाओ और अपने बल का परिचय दो। जिस प्रकार खर का वध हुआ था, उसी प्रकार यदि तुमने अधर्म का मार्ग नहीं छोड़ा, तो तुम्हारा भी अंत मेरे हाथों हो सकता है।”

जटायु ने श्रीराम की शक्ति का स्मरण कराते हुए कहा, “श्रीराम कोई साधारण राजकुमार नहीं हैं। उन्होंने युद्ध में अनेक दैत्यों और दानवों का संहार किया है। वन में तपस्वियों के समान चीर-वस्त्र धारण करके रहने वाले वे महान योद्धा शीघ्र ही तुम्हारे अत्याचारों का अंत करेंगे। तुम चाहे जितना बलवान क्यों न हो, धर्म और न्याय के विरुद्ध किया गया तुम्हारा यह कार्य तुम्हारे विनाश का कारण बनेगा।”

जटायु जानते थे कि श्रीराम और लक्ष्मण इस समय वहाँ से बहुत दूर जा चुके हैं। उन्होंने रावण से कहा, “काश! वे दोनों राजकुमार इस समय यहाँ होते, तो तुम्हारे इस अन्याय को देखकर तुम्हें दंड अवश्य देते। लेकिन यदि मैं उन्हें बुलाने चला जाऊँ, तो तुम भयभीत होकर यहाँ से भाग जाओगे। इसलिए मैं स्वयं ही तुम्हें रोकूँगा और सीता माता की रक्षा करने का पूरा प्रयास करूँगा।”

अब जटायु का संकल्प और भी दृढ़ हो गया। उन्होंने सीता माता की ओर देखकर कहा, “कमल के समान सुंदर नेत्रों वाली ये देवी श्रीराम की प्रिय पत्नी हैं। इनका अपहरण करना केवल श्रीराम का ही नहीं, बल्कि धर्म और मर्यादा का भी अपमान है। रावण! जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, मैं तुम्हें इन्हें अपने साथ नहीं ले जाने दूँगा।”

जटायु के मन में राजा दशरथ के प्रति मित्रता और श्रीराम के प्रति गहरा स्नेह था। उन्होंने निश्चय किया कि चाहे इसके लिए उन्हें अपने प्राण ही क्यों न देने पड़ें, वे अपने मित्र के पुत्र और उसकी पत्नी की रक्षा अवश्य करेंगे। उन्होंने मन ही मन संकल्प लिया कि इस कठिन समय में श्रीराम और राजा दशरथ के प्रति अपने कर्तव्य से पीछे हटना उनके लिए संभव नहीं है।

अंत में जटायु ने अपने विशाल पंख फैलाए और रावण को युद्ध के लिए ललकारते हुए कहा, “दशमुख रावण! ठहर जा, ठहर जा! केवल दो घड़ी मेरे सामने रुककर देख। मैं तुझे तेरे इस रथ से उसी प्रकार नीचे गिरा दूँगा, जैसे वृक्ष की डाली से पका हुआ फल नीचे गिर पड़ता है। हे निशाचर! अपनी पूरी शक्ति लगाकर युद्ध कर। मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार तेरा ऐसा स्वागत करूँगा कि तू जीवन भर इसे याद रखेगा।”

इस प्रकार वृद्ध जटायु ने अपनी आयु, शारीरिक दुर्बलता और रावण के अस्त्र-शस्त्रों की परवाह किए बिना धर्म की रक्षा करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। उनके लिए यह केवल एक युद्ध नहीं था, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने, मित्रधर्म निभाने और एक असहाय स्त्री की रक्षा करने का अवसर था। रावण के सामने अब एक ऐसा वीर खड़ा था, जो विजय की आशा से अधिक अपने कर्तव्य को महत्व देता था और जिसकी सबसे बड़ी शक्ति उसका अटूट साहस तथा धर्म के प्रति निष्ठा थी।

 

प्रश्न–उत्तर

प्रश्न 1. जटायु ने सीता माता की पुकार सुनकर क्या किया?

उत्तर: सीता माता की करुण पुकार सुनकर जटायु ने तुरंत आँखें खोलीं और देखा कि रावण उन्हें बलपूर्वक अपने साथ ले जा रहा है।

प्रश्न 2. जटायु ने रावण को अपना परिचय देते हुए क्या कहा?

उत्तर: जटायु ने स्वयं को गिद्धों का राजा, सनातन धर्म का पालन करने वाला, सत्यप्रतिज्ञ और महाबलवान् पक्षी बताया।

प्रश्न 3. जटायु ने रावण को श्रीराम की महानता के बारे में क्या बताया?

उत्तर: जटायु ने बताया कि श्रीराम महान पराक्रमी, जगत् के स्वामी के समान और सभी प्राणियों का हित चाहने वाले हैं।

प्रश्न 4. जटायु के अनुसार राजा का प्रमुख कर्तव्य क्या है?

उत्तर: जटायु के अनुसार राजा को धर्म, न्याय और सदाचार का पालन करना चाहिए तथा सभी स्त्रियों की मर्यादा और सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।

प्रश्न 5. जटायु ने दूसरों की स्त्रियों के प्रति कैसा व्यवहार करने की शिक्षा दी?

उत्तर: जटायु ने सिखाया कि जिस प्रकार मनुष्य अपनी पत्नी की रक्षा करता है, उसी प्रकार दूसरों की स्त्रियों का भी सम्मान करना चाहिए।

प्रश्न 6. जटायु ने राजा के आचरण को समाज के लिए महत्त्वपूर्ण क्यों बताया?

उत्तर: जटायु के अनुसार सामान्य लोग राजा के आचरण का अनुसरण करते हैं, इसलिए उसके अच्छे या बुरे कर्म समाज में वैसी ही प्रवृत्तियाँ बढ़ाते हैं।

प्रश्न 7. जटायु ने रावण के स्वभाव के विषय में क्या कहा?

उत्तर: जटायु ने रावण को कामप्रधान, चंचल और पापपूर्ण स्वभाव वाला बताया तथा समझाया कि दुष्ट प्रवृत्ति वाले व्यक्ति में पुण्य स्थायी रूप से नहीं टिकता।

प्रश्न 8. जटायु ने खर के वध को श्रीराम का अपराध मानने से इनकार क्यों किया?

उत्तर: खर शूर्पणखा का बदला लेने के लिए श्रीराम पर आक्रमण करने आया था। इसलिए उसका वध करने में श्रीराम का कोई अपराध नहीं था।

प्रश्न 9. जटायु ने रावण को सीता माता को छोड़ने की सलाह क्यों दी?

उत्तर: जटायु ने चेतावनी दी कि सीता माता का अपहरण करने पर श्रीराम का क्रोध रावण के विनाश का कारण बनेगा।

प्रश्न 10. जटायु ने रावण को विषधर सर्प और मृत्यु के फंदे का उदाहरण क्यों दिया?

उत्तर: जटायु ने इन उदाहरणों से समझाया कि सीता माता का अपहरण करके रावण अनजाने में अपने विनाश को स्वयं आमंत्रित कर रहा है।

प्रश्न 11. जटायु ने मनुष्य को अपनी सामर्थ्य के अनुसार कार्य करने की शिक्षा कैसे दी?

उत्तर: जटायु ने कहा कि मनुष्य को उतना ही बोझ उठाना चाहिए, जितना वह सह सके, और ऐसे कार्यों से बचना चाहिए जो हानि पहुँचाएँ।

प्रश्न 12. जटायु ने रावण के इस कार्य को व्यर्थ क्यों बताया?

उत्तर: इस कार्य से न धर्म की प्राप्ति होती, न कीर्ति बढ़ती और न स्थायी यश मिलता; उलटे रावण के जीवन पर संकट आ जाता।

प्रश्न 13. जटायु ने अपने जीवन के विषय में रावण को क्या बताया?

उत्तर: जटायु ने बताया कि वे अपने पूर्वजों से प्राप्त पक्षीराज्य का लगभग साठ हजार वर्षों से विधिपूर्वक पालन करते आ रहे थे।

प्रश्न 14. वृद्धावस्था के बावजूद जटायु रावण से युद्ध करने के लिए क्यों तैयार हुए?

उत्तर: जटायु सीता माता की रक्षा करना और श्रीराम तथा राजा दशरथ के प्रति अपना कर्तव्य निभाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने प्राणों की परवाह नहीं की।

प्रश्न 15. जटायु ने रावण को किस प्रकार युद्ध करने की चुनौती दी?

उत्तर: जटायु ने रावण को भागने के बजाय दो घड़ी रुककर युद्ध करने की चुनौती दी और खर के समान उसका वध करने का संकल्प व्यक्त किया।

प्रश्न 16. जटायु ने श्रीराम की युद्धकुशलता का वर्णन कैसे किया?

उत्तर: जटायु ने बताया कि श्रीराम ने अनेक दैत्यों और दानवों का वध किया था और वे शीघ्र ही रावण का भी विनाश करेंगे।

प्रश्न 17. जटायु ने श्रीराम और लक्ष्मण को बुलाने के लिए जाने से क्यों परहेज किया?

उत्तर: जटायु को आशंका थी कि उनके जाते ही रावण श्रीराम और लक्ष्मण के भय से भाग जाएगा और सीता माता की रक्षा कठिन हो जाएगी।

प्रश्न 18. जटायु ने सीता माता की रक्षा के लिए क्या संकल्प लिया?

उत्तर: जटायु ने संकल्प लिया कि जब तक उनके शरीर में प्राण हैं, वे रावण को सीता माता का अपहरण करके नहीं ले जाने देंगे।

प्रश्न 19. जटायु ने श्रीराम और राजा दशरथ के प्रति अपना कर्तव्य कैसे व्यक्त किया?

उत्तर: जटायु ने कहा कि वे अपने प्राण देकर भी श्रीराम और राजा दशरथ का प्रिय कार्य करेंगे तथा सीता माता की रक्षा के लिए संघर्ष करेंगे।

प्रश्न 20. जटायु की रावण को दी गई अंतिम चुनौती में कौन-सा भाव प्रकट होता है?

उत्तर: उनकी अंतिम चुनौती में अदम्य साहस, धर्मनिष्ठा, मित्रता के प्रति समर्पण और अन्याय के विरुद्ध प्राणों की बाजी लगाने का दृढ़ संकल्प प्रकट होता है।