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(52) ​सीताहरण: सीता का करुण विलाप और रावण का विनाशकारी कृत्य

(52)
सीताहरण: सीता का करुण विलाप और रावण का विनाशकारी कृत्य

जटायु को रावण द्वारा घायल करके धरती पर गिरा देने के बाद सीता की दृष्टि जब उन पक्षिराज पर पड़ी, तो उनका हृदय दुःख से भर उठा। जटायु ने श्रीराम की अनुपस्थिति में उनकी रक्षा करने का पूरा प्रयास किया था, लेकिन अब वे स्वयं असहाय होकर भूमि पर पड़े थे। सीता की आँखों में आँसू भर आए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस भयानक संकट से स्वयं को कैसे बचाएँ।

सीता जानती थीं कि मनुष्य के जीवन में आने वाले सुख-दुःख के संकेत कभी-कभी स्वप्नों, पशु-पक्षियों की आवाज़ों और उनके दाएँ-बाएँ दिखाई देने से भी मिलते हैं। उन्हें लग रहा था कि वन के मृग और पक्षी अपने असामान्य व्यवहार से किसी बड़ी अनहोनी का संकेत दे रहे हैं। वे मन ही मन सोचने लगीं कि ये सभी जीव मानो श्रीराम को उनके अपहरण की सूचना देने के लिए व्याकुल होकर दौड़ रहे हैं। किंतु श्रीराम उनसे दूर थे और उन्हें इस भयंकर संकट का कोई ज्ञान नहीं था।

सीता ने दुःखी होकर पुकारा, “हे ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! मेरा कैसा दुर्भाग्य है कि मेरी रक्षा करने आए पक्षिराज जटायु इस दुष्ट राक्षस के हाथों मारे जाकर धरती पर पड़े हैं। हे राम! हे लक्ष्मण! आप दोनों कहाँ हैं? शीघ्र आकर मेरी रक्षा कीजिए!”

उनकी करुण पुकार वन में गूँजने लगी। वे चाहती थीं कि उनकी आवाज़ सुनकर कोई देवता, मनुष्य अथवा वन में रहने वाला कोई प्राणी उनकी सहायता के लिए आ जाए। उनके फूलों के हार और आभूषण संघर्ष में बिखरकर टूट गए थे। वे असहाय होकर विलाप कर रही थीं, जबकि राक्षसराज रावण उन्हें बलपूर्वक अपने साथ ले जाने के लिए आगे बढ़ रहा था।

भयभीत सीता स्वयं को बचाने के लिए कभी किसी विशाल वृक्ष से लिपट जातीं, तो कभी किसी लता को पकड़कर रुकने का प्रयास करतीं। वे उस लता के समान थीं, जो आँधी के प्रचंड वेग से बचने के लिए किसी मजबूत वृक्ष का सहारा खोजती है। वे बार-बार करुण स्वर में कहतीं, “मुझे इस संकट से बचाओ! कोई तो मुझे इस दुष्ट के चंगुल से छुड़ाओ!” किंतु उनकी पुकार सुनकर भी कोई उन्हें बचाने नहीं आ सका। इतने में रावण उनके निकट पहुँच गया।

श्रीराम से बिछुड़ी हुई सीता बार-बार राम का नाम लेकर पुकार रही थीं। उनकी विवशता देखकर भी रावण का हृदय नहीं पसीजा। वह अपने ही विनाश को निकट बुलाते हुए सीता के केश पकड़कर उन्हें बलपूर्वक खींचने लगा। यह दृश्य इतना दुःखद था कि मानो समस्त संसार की मर्यादा नष्ट हो गई हो और चारों ओर अंधकार छा गया हो।

सीता के साथ हो रहे इस अन्याय का प्रभाव मानो प्रकृति पर भी पड़ने लगा। वायु की गति रुक-सी गई और सूर्य का प्रकाश फीका पड़ गया। ऐसा प्रतीत होता था कि प्रकृति स्वयं इस अधर्मपूर्ण कृत्य से स्तब्ध है। ब्रह्माजी ने अपनी दिव्य दृष्टि से सीता का यह अपमान देखा, तो वे बोले, “अब कार्य सिद्ध हो गया।” उनके कथन का आशय था कि रावण ने अपने विनाश का मार्ग स्वयं खोल दिया है और उसके अंत का समय निकट आ गया है।

दण्डकारण्य में तपस्या करने वाले महर्षियों ने जब सीता के केश खींचकर किए जा रहे इस अपमान को देखा, तो वे मन-ही-मन अत्यंत व्यथित हो उठे। एक ओर उन्हें सीता की दुर्दशा का गहरा दुःख था, तो दूसरी ओर वे जानते थे कि रावण का यह अधर्म उसके विनाश का कारण बनेगा। इस विचार से उनके मन में उसके अंत की आशा भी जाग उठी।

सीता लगातार “हा राम! हा राम! हा लक्ष्मण!” कहकर पुकारती रहीं। उनके स्वर में भय, पीड़ा और अपने प्रियजनों से बिछुड़ने का असहनीय दुःख था। किंतु रावण ने उनकी पुकार पर ध्यान नहीं दिया। वह उन्हें लेकर आकाशमार्ग से आगे बढ़ गया।

उस समय सीता ने पीले रंग की रेशमी साड़ी पहन रखी थी और उनका शरीर तपे हुए सोने के समान चमकने वाले आभूषणों से सुसज्जित था। आकाश में उड़ते हुए रावण के साथ उनका पीतवस्त्र चमक रहा था। वे ऐसी दिखाई दे रही थीं, मानो किसी पर्वत से बिजली प्रकट होकर आकाश में चमक उठी हो। उनके पीले वस्त्रों की चमक से रावण का काला शरीर ऐसा प्रतीत होता था, मानो दावानल से प्रकाशित कोई विशाल पर्वत हो।

सीता के शरीर पर सजे कमलपुष्पों की सुगंधित, हल्की लालिमा लिए पंखुड़ियाँ बिखरकर रावण पर गिरने लगीं। उनका पीला रेशमी वस्त्र आकाश में लहराते हुए संध्याकाल के सूर्य की किरणों से रंगे ताँबे जैसे बादल की भाँति दिखाई दे रहा था। किंतु इस बाहरी सुंदरता के पीछे सीता के हृदय में असहनीय दुःख था। श्रीराम के बिना उनका मुख ऐसा लग रहा था, मानो अपनी डंडी से अलग हुआ कमल अपनी स्वाभाविक शोभा खो बैठा हो।

सीता का सुंदर मुख निर्मल और उज्ज्वल था। उनका ललाट सुशोभित था, केश मनोहर थे और दाँत स्वच्छ तथा चमकदार थे। उनके सुंदर नेत्र उनके मुख की शोभा बढ़ाते थे। आकाश में रावण की गोद में बैठी सीता ऐसी प्रतीत हो रही थीं, मानो काले बादलों के समूह को चीरकर चंद्रमा निकल आया हो।

उनका मुख अभी-अभी रोने के कारण उदास था। आँसू पोंछ दिए जाने पर भी उनकी आँखों में दुःख की छाया बनी हुई थी। उनकी सुडौल नासिका और ताँबे के समान लाल होंठ उनके मुख की सुंदरता बढ़ा रहे थे। रावण के वेग से आकाश में उड़ते समय उनका मुख काँप रहा था। श्रीराम से बिछुड़ने के कारण उनकी सारी प्रसन्नता मानो छिन गई थी। उनका मुख दिन में दिखाई देने वाले चंद्रमा के समान शोभाहीन प्रतीत हो रहा था।

सीता का शरीर स्वर्ण के समान चमक रहा था, जबकि रावण का शरीर काला था। उसकी गोद में बैठी सीता ऐसी लग रही थीं, मानो किसी काले हाथी को सोने की करधनी पहना दी गई हो। उनके सुनहरे आभूषण और पीले वस्त्र रावण के काले शरीर के सामने विशेष रूप से चमक रहे थे। वे रावण की पीठ पर ऐसी दिखाई दे रही थीं, जैसे काले बादलों के बीच बिजली चमक रही हो।

रावण के उड़ने और गर्जना करने से उसके शरीर पर सजे आभूषणों की झनकार सुनाई दे रही थी। वह निर्मल नीले बादल के समान दिखाई देता था, जिसके ऊपर सीता के आभूषणों की चमक और ध्वनि मानो बिजली की चमक और बादलों की गर्जना का आभास करा रही थी।

रावण सीता को बलपूर्वक लेकर आगे बढ़ता जा रहा था। उनके केशों में गुँथे हुए फूल एक-एक करके टूटकर धरती पर गिरने लगे। रावण के तीव्र वेग से उठी हवा उन फूलों को इधर-उधर उड़ाती और फिर उसी रावण के ऊपर बिखेर देती। ऐसा लगता था, मानो ऊँचे मेरु पर्वत पर आकाश से निर्मल तारों की माला उतर रही हो।

सीता के पैरों में पहना हुआ रत्नजड़ित नूपुर भी खिसककर नीचे गिर पड़ा। वह आकाश से टूटकर गिरते हुए बिजली के चमकीले मंडल के समान दिखाई दिया। उनके शरीर पर सजे आभूषण अग्नि की भाँति चमक रहे थे। रावण के वेग से वे एक-एक करके गिरने लगे, मानो आकाश से तारे टूटकर पृथ्वी पर आ रहे हों।

सीता के वक्षस्थल से खिसककर गिरता हुआ उनका चंद्रमा के समान उज्ज्वल हार आकाश से उतरती हुई गंगा की धारा के समान प्रतीत हो रहा था। इस प्रकार उनके आभूषणों का धरती पर गिरना उनके मार्ग की पहचान बनता जा रहा था। उनके केशों से बिखरे फूल और गिरते हुए आभूषण वन की धरती पर उनकी विवश यात्रा के चिह्न छोड़ रहे थे।

रावण के तीव्र वेग से उत्पन्न हवा के झोंकों से वन के वृक्ष हिलने लगे। उनकी शाखाओं पर बैठे अनेक पक्षी भयभीत होकर शोर करने लगे। ऐसा प्रतीत होता था, मानो वे अपने सिर हिलाकर सीता को सांत्वना दे रहे हों और कह रहे हों, “डरो मत, तुम्हारी सहायता अवश्य होगी।”

वन की पुष्करिणियाँ भी मानो सीता के दुःख में सहभागी हो उठीं। उनके कमल मुरझाए हुए थे और जल में रहने वाले मत्स्य आदि जीव भयभीत थे। वे उदास दिखाई दे रही थीं, जैसे सीता को अपनी सखी मानकर उनके वियोग में शोक कर रही हों।

सीताहरण के समय वन के सिंह, व्याघ्र, मृग और पक्षी सभी रावण के इस अनुचित कृत्य से क्रोधित प्रतीत हो रहे थे। वे सीता की परछाईं का अनुसरण करते हुए उसके पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। ऐसा लगता था, मानो वन के सभी जीव इस अन्याय का विरोध करना चाहते हों, किंतु सीता को बचाने में असमर्थ थे।

सीता को बलपूर्वक ले जाते देखकर पर्वत भी मानो शोक से व्याकुल हो उठे। उनके झरने आँसुओं की धारा के समान बहने लगे और ऊँचे शिखर ऊपर उठी हुई भुजाओं जैसे दिखाई देने लगे। ऐसा प्रतीत होता था, मानो पर्वत अपनी असहायता पर विलाप करते हुए रावण को रोकने के लिए पुकार रहे हों।

सीता के अपहरण का दृश्य देखकर सूर्यदेव भी दुःखी हो उठे। उनकी चमक फीकी पड़ गई और उनका मुख पीला-सा दिखाई देने लगा। मानो आकाश का प्रकाश भी इस अन्याय को देखकर अपनी आभा खो बैठा हो।

वन के सभी प्राणी इस घटना से व्याकुल थे। वे विलाप करते हुए मानो कह रहे थे, “हाय! जब श्रीराम की धर्मपत्नी सीता को रावण बलपूर्वक हरकर ले जा रहा है, तब संसार में धर्म कहाँ रह गया? सत्य, सरलता और दया का क्या हुआ?” मृगों के छोटे-छोटे बच्चे भी भयभीत होकर उदास मुख से रो रहे थे। ऐसा लग रहा था, मानो समस्त वन इस अधर्मपूर्ण घटना पर शोक मना रहा हो।

वनदेवता भी सीता की असहाय दशा देखकर भयभीत हो उठे। वे अपनी दिव्य दृष्टि से उन्हें बार-बार देखते और श्रीराम को पुकारते हुए उनकी करुण पुकार सुनते थे। सीता जिस भयंकर संकट में फँसी थीं, उसे देखकर वनदेवताओं के शरीर तक काँपने लगे।

सीता मधुर, किंतु दुःख से भरे स्वर में बार-बार “हा राम! हा लक्ष्मण!” पुकार रही थीं। वे आकाश से नीचे धरती की ओर देखतीं, मानो किसी परिचित स्थान, किसी सहायक या अपने प्रियजनों को खोज रही हों। उनके केश खुलकर चारों ओर बिखर गए थे और ललाट की बेंदी मिट गई थी। उनकी यह अवस्था उनके गहरे दुःख और असहायता को प्रकट कर रही थी। रावण उन्हें अपने साथ लिए जा रहा था, किंतु उसे यह आभास नहीं था कि सीता का अपहरण करके वह स्वयं अपने विनाश को आमंत्रित कर रहा है।

अपने बंधुजनों से बिछुड़ी हुई सीता दोनों भाइयों—श्रीराम और लक्ष्मण—को अपने पास न पाकर अत्यंत भयभीत हो उठीं। उनके सुंदर दाँतों और पवित्र मुस्कान से सुशोभित रहने वाला मुख अब दुःख से म्लान था। जिन श्रीराम और लक्ष्मण को वे अपनी रक्षा करने वाला मानती थीं, वे दोनों ही उस समय उनकी आँखों के सामने नहीं थे। अकेले आकाशमार्ग में रावण के बंधन में पड़ी सीता का हृदय भय, वियोग और निराशा से भर गया था। वे बार-बार अपने प्रिय श्रीराम को पुकार रही थीं, जबकि रावण उन्हें लेकर दूर निकलता जा रहा था। इस प्रकार सीताहरण की यह घटना वन, पर्वत, पशु-पक्षियों और देवताओं तक को शोकाकुल कर देने वाली बन गई।

 

प्रश्न–उत्तर

प्रश्न 1. जटायु को धरती पर घायल अवस्था में देखकर सीता की क्या प्रतिक्रिया हुई?

उत्तर: जटायु की दुर्दशा देखकर सीता अत्यंत दुःखी हो गईं। उन्होंने अपने दुर्भाग्य पर विलाप किया और श्रीराम तथा लक्ष्मण से रक्षा की करुण पुकार लगाई।

प्रश्न 2. सीता ने मृगों और पक्षियों के व्यवहार से क्या अनुमान लगाया?

उत्तर: सीता ने अनुमान लगाया कि मृग और पक्षी उनके अपहरण की सूचना श्रीराम तक पहुँचाने के लिए अशुभ संकेत देते हुए दौड़ रहे थे।

प्रश्न 3. सीता ने रावण से बचने के लिए क्या प्रयास किए?

उत्तर: सीता भयभीत होकर बड़े-बड़े वृक्षों और लताओं से लिपट गईं। वे बार-बार सहायता की गुहार लगाती रहीं, लेकिन रावण उन्हें पकड़ने में सफल रहा।

प्रश्न 4. सीता का अपमान देखकर प्रकृति की क्या प्रतिक्रिया वर्णित है?

उत्तर: सीता का अपमान देखकर वायु की गति रुक गई और सूर्य की प्रभा फीकी पड़ गई। मानो समस्त प्रकृति इस अधर्म से स्तब्ध हो गई हो।

प्रश्न 5. ब्रह्माजी ने सीता के केश खींचे जाने का दृश्य देखकर क्या कहा और क्यों?

उत्तर: ब्रह्माजी ने सीता का अपमान देखकर कहा, “अब कार्य सिद्ध हो गया।” रावण का यह अधर्म उसके विनाश का मार्ग प्रशस्त करने वाला था।

प्रश्न 6. दण्डकारण्य के महर्षियों की सीताहरण के प्रति क्या भावनाएँ थीं?

उत्तर: महर्षि सीता के अपमान से मन-ही-मन व्यथित थे, किंतु रावण के इस अधर्म से उसका विनाश निकट जानकर उन्हें उसके अंत की आशा भी हुई।

प्रश्न 7. आकाशमार्ग में रावण के साथ सीता की शोभा का वर्णन किस प्रकार किया गया है?

उत्तर: पीले रेशमी वस्त्रों और स्वर्णाभूषणों से सुसज्जित सीता काले बादलों के बीच चमकती बिजली के समान आकाश में दिखाई दे रही थीं।

प्रश्न 8. श्रीराम से बिछुड़ने के कारण सीता के मुख की शोभा कैसी हो गई थी?

उत्तर: रोने से सीता का मुख उदास हो गया था। श्रीराम से बिछुड़ने के दुःख ने उनकी स्वाभाविक आभा छीन ली थी, मानो दिन में चंद्रमा चमक रहा हो।

प्रश्न 9. सीता के आभूषणों और केशों में गुँथे फूलों के गिरने का क्या वर्णन है?

उत्तर: रावण के वेग से सीता के केशों के फूल और चमकते आभूषण एक-एक करके धरती पर गिरने लगे, मानो आकाश से तारे टूट रहे हों।

प्रश्न 10. सीता का हार आकाश से गिरते समय किसके समान दिखाई दिया?

उत्तर: सीता के वक्षस्थल से खिसककर गिरता हुआ चंद्रमा के समान उज्ज्वल हार आकाश से उतरती हुई गंगा की निर्मल धारा के समान प्रतीत हुआ।

प्रश्न 11. सीताहरण के समय वन के पक्षियों और वृक्षों की क्या स्थिति थी?

उत्तर: रावण के वेग से वृक्ष हिलने लगे और पक्षी कोलाहल करने लगे। ऐसा प्रतीत होता था, मानो वे सीता को सांत्वना देकर निर्भय रहने का संकेत कर रहे हों।

प्रश्न 12. सीताहरण के समय पुष्करिणियों की दशा का वर्णन किस प्रकार किया गया है?

उत्तर: पुष्करिणियों के कमल मुरझाए हुए थे और जलचर भयभीत थे। वे मानो सीता को अपनी सखी मानकर उनके संकट में दुःखी हो रही थीं।

प्रश्न 13. सीताहरण देखकर वन के पशु-पक्षियों ने किस प्रकार अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की?

उत्तर: सिंह, व्याघ्र, मृग और पक्षी मानो क्रोधित होकर सीता की परछाईं का अनुसरण करते हुए रावण के पीछे दौड़ रहे थे।

प्रश्न 14. सीताहरण के समय पर्वतों की स्थिति का वर्णन किस प्रकार किया गया है?

उत्तर: पर्वतों के झरने आँसुओं के समान बहने लगे और उनके ऊँचे शिखर उठी हुई भुजाओं जैसे दिखाई दिए, मानो वे शोक में चीत्कार कर रहे हों।

प्रश्न 15. सीताहरण देखकर सूर्यदेव की क्या दशा हुई?

उत्तर: सीता के अपहरण को देखकर सूर्यदेव दुःखी हो गए। उनकी प्रभा फीकी पड़ गई और उनका मुखमंडल पीला हो गया, मानो वे भी शोक मना रहे हों।

प्रश्न 16. सीताहरण के समय वन के प्राणियों ने धर्म और सत्य के विषय में क्या कहा?

उत्तर: प्राणियों ने विलाप करते हुए प्रश्न किया कि श्रीराम की धर्मपत्नी का अपहरण होने पर संसार में धर्म, सत्य, सरलता और दया कहाँ रह गए हैं।

प्रश्न 17. सीता की दुर्दशा देखकर वनदेवताओं की क्या प्रतिक्रिया हुई?

उत्तर: सीता को संकट में देखकर वनदेवताओं के अंग भय से काँपने लगे। वे श्रीराम को पुकारती हुई सीता की दुर्दशा देखकर अत्यंत व्याकुल हो उठे।

प्रश्न 18. रावण द्वारा हरकर ले जाए जाने पर सीता की शारीरिक अवस्था कैसी हो गई थी?

उत्तर: सीता के केश खुलकर बिखर गए थे, ललाट की बेंदी मिट गई थी और उनका मुख दुःख से म्लान हो गया था। वे लगातार राम-लक्ष्मण को पुकार रही थीं।

प्रश्न 19. सीताहरण को रावण के विनाश का कारण क्यों माना गया है?

उत्तर: सीताहरण रावण का गंभीर अधर्म था। उसके इस कृत्य ने उसके विनाश का मार्ग खोल दिया, क्योंकि उसने मर्यादा और धर्म की सीमाओं का उल्लंघन किया।

प्रश्न 20. सीताहरण के समय प्रकृति और समस्त वन का वातावरण कैसा हो गया था?

उत्तर: समस्त वन शोक और भय से भर गया था। पशु-पक्षी विलाप कर रहे थे, पर्वत आँसू बहाते प्रतीत होते थे और सूर्य की प्रभा भी फीकी पड़ गई थी।