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(58)  सीता-वियोग की आशंका से व्याकुल श्रीराम की करुण पुकार

(58)

सीता-वियोग की आशंका से व्याकुल श्रीराम की करुण पुकार

लक्ष्मण को अकेले लौटते और सीता को साथ न देखकर श्रीराम के मन में अनेक प्रकार की आशंकाएँ उठने लगीं। वे पहले से ही मारीच के छल और उसके द्वारा निकाली गई पुकार को लेकर चिंतित थे। अब लक्ष्मण को सीता के बिना आया देखकर उनका धैर्य टूटने लगा। वे अत्यंत व्याकुल होकर लक्ष्मण से सीता के विषय में पूछने लगे।

श्रीराम ने दुःखी स्वर में लक्ष्मण से पूछा, “भाई! जब मैं वनवास के लिए अयोध्या से निकला था, तब सीता भी सब सुखों का त्याग करके मेरे पीछे-पीछे वन में चली आई थी। वह राजमहल के सुख छोड़कर मेरे साथ इस कठिन वनजीवन को स्वीकार कर चुकी थी। फिर आज तुम उसे अकेला छोड़कर यहाँ कैसे आ गए? वह कहाँ है?”

श्रीराम को स्मरण हुआ कि जब वे अयोध्या का राज्य छोड़कर दण्डकारण्य में आए थे, तब सीता ने हर परिस्थिति में उनका साथ दिया था। राज्य छिन जाने और वन में अनेक कष्ट सहने के बाद भी वह कभी उनसे अलग नहीं हुई थी। उन्होंने लक्ष्मण से व्याकुल होकर पूछा, “वह सीता कहाँ है, जो मेरे प्रत्येक दुःख में मेरी सहायक बनी और जिसने कठिन परिस्थितियों में भी मेरा साथ नहीं छोड़ा?”

श्रीराम का दुःख और भी बढ़ गया। वे लक्ष्मण से कहने लगे, “भाई! सीता मेरे जीवन का आधार है। मैं उसके बिना दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता। वह केवल मेरी पत्नी ही नहीं, बल्कि मेरे प्राणों की सहचरी है। उसके बिना मेरा जीवन अधूरा है। बताओ, वह देवकन्या के समान सुन्दरी सीता कहाँ है?”

सीता के प्रति अपने प्रेम और समर्पण को प्रकट करते हुए श्रीराम बोले, “लक्ष्मण! जनकनन्दिनी सीता तपाए हुए सोने के समान सुन्दर और तेजस्विनी है। उसके बिना मुझे पृथ्वी का विशाल राज्य भी स्वीकार नहीं है। इतना ही नहीं, यदि मुझे देवताओं का आधिपत्य भी मिल जाए, तब भी मैं सीता के बिना उसे प्राप्त करना नहीं चाहूँगा। मेरे लिए संसार के सभी सुख उसके साथ के सामने तुच्छ हैं।”

इसके बाद श्रीराम को सीता के जीवित होने की चिंता सताने लगी। वे बोले, “भाई! सीता मुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय है। न जाने वह इस समय जीवित भी होगी या नहीं। यदि उसे कोई अनहोनी हो गई है, तो फिर मेरा वनवास भी व्यर्थ हो जाएगा। मैं जिस उद्देश्य से उसके साथ वन में आया था, यदि वही मेरे पास नहीं रही, तो इस जीवन का क्या अर्थ रह जाएगा?”

श्रीराम के मन में माता कैकेयी का विचार भी आया। वे अत्यंत दुःखी होकर लक्ष्मण से बोले, “जब सीता के वियोग में मैं अपने प्राण त्याग दूँगा और तुम अकेले ही अयोध्या लौटोगे, तब क्या माता कैकेयी अपने उद्देश्य में सफल होकर प्रसन्न होगी? क्या उसे अपने किए पर संतोष होगा कि उसके कारण मुझे इतना बड़ा दुःख सहना पड़ा?”

फिर उन्हें अपनी माता कौसल्या की याद आई। वे बोले, “लक्ष्मण! मैं माता कौसल्या का इकलौता पुत्र हूँ। यदि मेरी मृत्यु हो गई, तो मेरी तपस्विनी माता का क्या होगा? क्या वह पुत्र और राज्य से सम्पन्न कैकेयी के सामने विवश होकर विनीत भाव से उपस्थित होगी? यह विचार भी मेरे हृदय को और अधिक पीड़ा पहुँचा रहा है।”

श्रीराम अब सीता के जीवित होने की आशा पर ही अपना जीवन टिकाए हुए थे। उन्होंने लक्ष्मण से दृढ़ किन्तु अत्यंत दुःखी स्वर में कहा, “भाई! यदि सीता जीवित होगी, तभी मैं आश्रम में वापस जाऊँगा। लेकिन यदि सदाचार का पालन करने वाली मैथिली इस संसार में नहीं रही, तो मैं भी अपने प्राण त्याग दूँगा। उसके बिना मेरे जीवित रहने का कोई कारण नहीं है।”

वे आगे बोले, “लक्ष्मण! यदि आश्रम में पहुँचने पर सीता पहले की तरह प्रसन्न मुख से मेरा स्वागत करने के लिए सामने नहीं आई और प्रेमपूर्वक मुझसे बातें नहीं कीं, तो मैं यह वियोग सहन नहीं कर पाऊँगा। उसके हँसते हुए मुख को देखना ही मेरे लिए सबसे बड़ा सुख है।”

श्रीराम अब लक्ष्मण से स्पष्ट उत्तर चाहते थे। उन्होंने व्याकुल होकर पूछा, “लक्ष्मण! तुम कुछ बोलते क्यों नहीं? मुझे बताओ कि वैदेही जीवित है या नहीं? कहीं तुम्हारी असावधानी का लाभ उठाकर उन क्रूर राक्षसों ने उस तपस्विनी को अपना भोजन तो नहीं बना लिया? वह वन में अकेली थी, इसलिए मेरे मन में तरह-तरह की आशंकाएँ उठ रही हैं।”

सीता की कोमलता और वनजीवन की कठिनाइयों को याद करके श्रीराम का हृदय और भी द्रवित हो उठा। वे बोले, “वह अत्यंत सुकुमारी और भोली-भाली है। उसने वनवास से पहले कभी ऐसे दुःखों का अनुभव नहीं किया था। आज मेरे वियोग में उसका हृदय कितना व्याकुल हो रहा होगा! न जाने वह इस समय किस अवस्था में होगी और मुझे याद करके कितना दुःख सह रही होगी।”

इसके बाद श्रीराम ने मारीच के छल को याद किया। उन्होंने लक्ष्मण से कहा, “उस कुटिल और दुष्ट राक्षस ने मेरी आवाज की नकल करके ऊँचे स्वर में ‘हा लक्ष्मण!’ पुकारा था। उसकी इस चाल ने तुम्हारे मन में भी भय उत्पन्न कर दिया। वह जानता था कि मेरी आवाज सुनकर सीता व्याकुल हो जाएगी और तुम्हें मेरी सहायता के लिए भेजने का आग्रह करेगी।”

श्रीराम को अब पूरी घटना समझ में आने लगी थी। उन्होंने कहा, “संभव है कि सीता ने भी उस राक्षस की आवाज को मेरी आवाज समझ लिया हो। मेरी सहायता के लिए वह भयभीत हो गई होगी और उसने तुम्हें तुरंत मेरे पास भेज दिया होगा। तुम भी मेरी चिंता में शीघ्रता से यहाँ चले आए। इस प्रकार उस दुष्ट राक्षस ने अपनी योजना में सफलता प्राप्त कर ली।”

लेकिन अगले ही क्षण श्रीराम ने लक्ष्मण को सीता को अकेला छोड़कर आने के लिए दोषी ठहराया। वे दुःखी होकर बोले, “भाई! तुमने वन में सीता को अकेला छोड़कर बहुत अनुचित कार्य किया है। तुम जानते थे कि इस वन में क्रूर और मायावी राक्षस रहते हैं। तुम्हारे वहाँ से चले आने के कारण उन्हें सीता का अपहरण करने का अवसर मिल गया।”

श्रीराम को खर और उसके राक्षसों के साथ हुए युद्ध की भी याद आई। उन्होंने कहा, “खर के वध के बाद वे मांसभक्षी राक्षस मुझसे अत्यंत क्रोधित थे। वे अपनी पराजय का बदला लेना चाहते थे। अब मुझे भय हो रहा है कि उन्हीं क्रूर राक्षसों ने सीता को मार डाला होगा। मेरे मन में इस आशंका के सिवाय कोई और विचार नहीं आ रहा है।”

अंत में श्रीराम का धैर्य पूरी तरह टूटने लगा। उन्होंने अत्यंत दुःखी होकर लक्ष्मण से कहा, “हे शत्रुओं का नाश करने वाले भाई! मैं इस समय संकट के अथाह समुद्र में डूब गया हूँ। मेरे सामने एक के बाद एक विपत्तियाँ आ रही हैं। मुझे ऐसा लग रहा है कि अब मुझे ऐसा दुःख सहना पड़ेगा, जिसे सहना मेरे लिए अत्यंत कठिन होगा। समझ में नहीं आता कि अब मैं क्या करूँ और किस प्रकार सीता को खोजूँ।”

इस प्रकार सीता की चिंता में डूबे हुए श्रीराम लक्ष्मण के साथ शीघ्रता से जनस्थान पहुँचे। रास्ते भर उनके मन में केवल सीता की सुरक्षा का विचार बना रहा। वे बार-बार अपने दुःखी छोटे भाई लक्ष्मण को दोष दे रहे थे। भूख-प्यास और लंबी यात्रा के कारण उनका मुख सूख गया था। वे बार-बार गहरी साँसें ले रहे थे और अत्यंत व्याकुल अवस्था में आश्रम की ओर बढ़ रहे थे।

जब श्रीराम आश्रम के निकट पहुँचे, तो वहाँ असामान्य सन्नाटा देखकर उनका हृदय और अधिक काँप उठा। जिस स्थान पर सीता की मधुर उपस्थिति से सदैव प्रसन्नता बनी रहती थी, आज वही स्थान सूना पड़ा था। आश्रम के आसपास सीता कहीं दिखाई नहीं दी। यह देखकर श्रीराम गहरे शोक में डूब गए।

वे आश्रम के भीतर गए और वहाँ भी सीता को न पाकर उन्हें अत्यंत दुःख हुआ। इसके बाद वे उन स्थानों पर सीता को खोजने लगे, जहाँ वह प्रायः बैठती, घूमती और उनके साथ समय बिताती थी। प्रत्येक स्थान उन्हें सीता की याद दिला रहा था। जहाँ कभी दोनों ने साथ बैठकर बातें की थीं, जहाँ उन्होंने सीता के साथ हँसी-खुशी के क्षण बिताए थे, वहाँ आज केवल उसकी अनुपस्थिति थी।

उन स्थानों को देखकर श्रीराम को अपने और सीता के साथ बिताए हुए पुराने क्षण याद आने लगे। प्रत्येक परिचित स्थान उनके हृदय में पुरानी स्मृतियाँ जगा रहा था। वे उन स्थानों को देखकर सोचने लगे कि यहाँ सीता उनके साथ किस प्रकार क्रीड़ा करती थी और किस प्रकार प्रसन्न होकर समय बिताती थी। इन स्मृतियों के कारण उनका शरीर रोमांचित हो उठा और हृदय विरह की पीड़ा से भर गया। आश्रम का प्रत्येक कोना उन्हें सीता की याद दिला रहा था और उसकी अनुपस्थिति उनके लिए असहनीय होती जा रही थी।

 

प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. लक्ष्मण को सीता के बिना आया देखकर श्रीराम ने उनसे क्या पूछा?

उत्तर: श्रीराम ने व्याकुल होकर पूछा कि सीता कहाँ है, जिसे अयोध्या से वनवास के समय वह अपने साथ वन में लाए थे।

प्रश्न 2. श्रीराम ने सीता को अपने जीवन का आधार क्यों बताया?

उत्तर: सीता प्रत्येक दुःख में उनकी सहायक थी और उनके प्राणों की सहचरी थी। वे उसके बिना दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकते थे।

प्रश्न 3. श्रीराम ने सीता के बिना राज्य और देवताओं के आधिपत्य को तुच्छ क्यों माना?

उत्तर: सीता उनके लिए संसार के सभी सुखों से बढ़कर थी। उसके बिना उन्हें पृथ्वी का राज्य और देवताओं का आधिपत्य भी स्वीकार नहीं था।

प्रश्न 4. श्रीराम ने सीता के जीवित न होने की स्थिति में क्या निश्चय किया?

उत्तर: श्रीराम ने निश्चय किया कि यदि सीता जीवित नहीं होगी, तो वे भी उसके वियोग में अपने प्राण त्याग देंगे।

प्रश्न 5. सीता के वियोग में श्रीराम को माता कैकेयी का स्मरण क्यों आया?

उत्तर: श्रीराम को लगा कि उनकी मृत्यु के बाद लक्ष्मण अकेले अयोध्या लौटेंगे और माता कैकेयी अपने उद्देश्य में सफल होकर प्रसन्न होगी।

प्रश्न 6. श्रीराम ने अपनी माता कौसल्या की भविष्य की स्थिति के विषय में क्या चिंता व्यक्त की?

उत्तर: उन्हें चिंता थी कि उनके न रहने पर पुत्रहीन माता कौसल्या को कैकेयी की सेवा में विवश होकर उपस्थित होना पड़ेगा।

प्रश्न 7. श्रीराम ने आश्रम में लौटने के लिए कौन-सी शर्त रखी?

उत्तर: श्रीराम ने कहा कि यदि सीता जीवित होगी, तभी वे आश्रम में लौटेंगे, अन्यथा उसके वियोग में अपने प्राण त्याग देंगे।

प्रश्न 8. श्रीराम को किस बात की आशंका थी कि राक्षसों ने सीता को अपना भोजन बना लिया होगा?

उत्तर: सीता को अकेला छोड़कर आने के कारण श्रीराम को आशंका थी कि असावधानी का लाभ उठाकर क्रूर राक्षसों ने उसे मार डाला होगा।

प्रश्न 9. श्रीराम ने सीता की कोमलता और वनजीवन के प्रति उसकी अपरिचितता का उल्लेख क्यों किया?

उत्तर: सीता अत्यंत सुकुमारी और भोली थी। उसने पहले कभी वन के कष्ट नहीं सहे थे, इसलिए श्रीराम को उसके दुःख की चिंता थी।

प्रश्न 10. मारीच की किस चाल ने लक्ष्मण को आश्रम छोड़ने के लिए विवश कर दिया?

उत्तर: मारीच ने श्रीराम की आवाज की नकल करके ‘हा लक्ष्मण!’ पुकारा, जिससे सीता भयभीत हुई और उसने लक्ष्मण को भेज दिया।

प्रश्न 11. श्रीराम ने लक्ष्मण के आश्रम छोड़कर आने को अनुचित कार्य क्यों बताया?

उत्तर: लक्ष्मण सीता को वन में अकेला छोड़ आए थे, जिससे क्रूर राक्षसों को उसका अपहरण करने का अवसर मिल गया था।

प्रश्न 12. खर के वध के बाद श्रीराम को सीता की सुरक्षा के विषय में क्या आशंका हुई?

उत्तर: खर के वध से क्रोधित राक्षस बदला लेना चाहते थे। श्रीराम को आशंका हुई कि उन्होंने सीता को मार डाला होगा।

प्रश्न 13. जनस्थान पहुँचते समय श्रीराम की शारीरिक और मानसिक स्थिति कैसी थी?

उत्तर: श्रीराम सीता की चिंता में व्याकुल थे। भूख-प्यास और परिश्रम से उनका मुख सूख गया था तथा वे लंबी साँसें ले रहे थे।

प्रश्न 14. आश्रम के निकट पहुँचकर श्रीराम किस कारण विषाद में डूब गए?

उत्तर: आश्रम के आसपास सीता दिखाई नहीं दी और वहाँ असामान्य सन्नाटा था। उसकी अनुपस्थिति देखकर श्रीराम अत्यंत दुःखी हो गए।

प्रश्न 15. आश्रम के भीतर सीता को न पाकर श्रीराम ने क्या किया?

उत्तर: श्रीराम ने उन स्थानों पर सीता को खोजना शुरू किया, जहाँ वह प्रायः उनके साथ बैठती, घूमती और क्रीड़ा करती थी।

प्रश्न 16. सीता के क्रीड़ास्थलों को देखकर श्रीराम की क्या दशा हुई?

उत्तर: पुराने स्थानों को देखकर उन्हें सीता के साथ बिताए सुखद क्षण याद आए। स्मृतियों से उनका शरीर रोमांचित और हृदय व्यथित हो उठा।

प्रश्न 17. आश्रम का प्रत्येक स्थान श्रीराम को सीता की याद क्यों दिला रहा था?

उत्तर: आश्रम के प्रत्येक स्थान पर श्रीराम ने सीता के साथ सुखद क्षण बिताए थे। उसकी अनुपस्थिति में वे सभी स्थान विरह की पीड़ा बढ़ा रहे थे।