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(7)
सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में श्रीराम का आगमन
वनवास का समय चल रहा था। श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ वन में विचरण कर रहे थे। वे अपने पिता की आज्ञा और धर्म का पालन करते हुए वनवास का जीवन व्यतीत कर रहे थे। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उनके मन में न तो किसी प्रकार का भय था और न ही राजसी सुखों की कोई इच्छा। वे शांत भाव से अपने कर्तव्य के मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे।
अब श्रीराम, सीता और लक्ष्मण महान तपस्वी सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम की ओर जा रहे थे। यात्रा लम्बी थी। वे दूर तक का मार्ग तय करते हुए आगे बढ़े। रास्ते में उन्हें अगाध जल से भरी हुई अनेक नदियाँ मिलीं। उन नदियों का जल गहरा था और उनका प्रवाह भी कम नहीं था, फिर भी श्रीराम और लक्ष्मण ने साहसपूर्वक उन्हें पार किया और सीता के साथ अपनी यात्रा जारी रखी।
कुछ दूर आगे बढ़ने पर उन्हें सामने एक अत्यन्त ऊँचा और विशाल पर्वत दिखाई दिया। वह पर्वत महान मेरुगिरि के समान प्रतीत हो रहा था। उसका स्वरूप अत्यन्त निर्मल और भव्य था। प्रकृति के इस विराट रूप को देखकर ऐसा लगता था मानो वनवास की कठिन यात्रा के बीच प्रकृति स्वयं उनका स्वागत कर रही हो।
पर्वत को पार करके वे तीनों आगे बढ़े और एक घने तथा विशाल वन में प्रवेश कर गए। चारों ओर तरह-तरह के वृक्ष फैले हुए थे। उनकी शाखाएँ दूर-दूर तक फैली थीं और वन की गहराई के कारण वह स्थान कुछ दुर्गम और एकांत प्रतीत होता था। फिर भी प्रकृति अपने सौन्दर्य से भरपूर थी। कहीं वृक्षों पर रंग-बिरंगे फूल खिले थे, तो कहीं डालियाँ स्वादिष्ट फलों से झुकी हुई थीं। पक्षियों की मधुर आवाजें और पत्तों से होकर आती हवा वन के वातावरण को मनोहर बना रही थीं।
इसी विशाल वन के भीतर आगे बढ़ते हुए श्रीराम की दृष्टि एक सुन्दर आश्रम पर पड़ी। वन की गहराई और एकांत के बीच वह आश्रम शांति और तपस्या का पवित्र केंद्र दिखाई दे रहा था। आश्रम के चारों ओर अनेक वृक्ष फल और फूलों से लदे हुए थे। जगह-जगह तपस्वियों के चीर-वस्त्र टँगे हुए थे, जो उस आश्रम की शोभा को और बढ़ा रहे थे।
वास्तव में वह महान तपस्वी सुतीक्ष्ण मुनि का आश्रम था।
आश्रम के भीतर सुतीक्ष्ण मुनि पद्मासन लगाकर ध्यान में लीन बैठे थे। वे अपने मन की आन्तरिक अशुद्धियों को दूर करने और आत्मिक शुद्धि प्राप्त करने के लिए गहन तपस्या कर रहे थे। उनका शरीर तपस्या से तेजस्वी हो उठा था और उनके चेहरे पर गहरी शांति दिखाई दे रही थी।
श्रीराम ने जब मुनि को देखा तो उनके मन में श्रद्धा उमड़ आई। वे आदरपूर्वक उनके पास गए और विनम्रता से प्रणाम किया। फिर मधुर स्वर में बोले—
“हे सत्य पराक्रमी और धर्म के ज्ञाता महर्षि! हे भगवन्! मैं राम हूँ। मैं आपके दर्शन करने के लिए यहाँ आया हूँ। कृपया मुझसे बात कीजिए।”
श्रीराम को अपने सामने देखकर सुतीक्ष्ण मुनि का हृदय प्रसन्नता से भर गया। जिस महापुरुष की वे बहुत समय से प्रतीक्षा कर रहे थे, आज वही श्रीराम उनके सामने उपस्थित थे। मुनि ने प्रेमपूर्वक अपनी दोनों भुजाएँ फैलाकर श्रीराम को गले से लगा लिया।
यह आलिंगन केवल एक अतिथि का स्वागत नहीं था। इसमें मुनि के हृदय में श्रीराम के प्रति उमड़ता हुआ प्रेम, श्रद्धा और वर्षों की प्रतीक्षा का भाव समाया हुआ था।
सुतीक्ष्ण मुनि ने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—
“हे सत्यवादियों में श्रेष्ठ और रघुकुल के भूषण श्रीराम! आपका स्वागत है। आपके चरणों के इस आश्रम में पड़ते ही मेरा आश्रम धन्य हो गया। आज ऐसा लगता है जैसे इसे उसका सच्चा स्वामी और संरक्षक मिल गया हो।”
मुनि की आँखों में प्रसन्नता थी। उन्होंने बताया कि वे बहुत समय से श्रीराम की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने कहा—
“हे महायशस्वी वीर! मैं आपकी ही प्रतीक्षा कर रहा था। इसी कारण अब तक मैंने इस पृथ्वी पर अपने शरीर का त्याग नहीं किया। यदि आपके दर्शन किए बिना मैं इस संसार से चला जाता, तो मेरी यह इच्छा अधूरी रह जाती।”
यह सुनकर श्रीराम के हृदय में भी मुनि के प्रति श्रद्धा और बढ़ गई।
सुतीक्ष्ण मुनि ने आगे कहा कि उन्होंने सुना था कि श्रीराम को राज्य से वंचित होकर वनवास स्वीकार करना पड़ा है और वे चित्रकूट पर्वत पर निवास कर रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि एक बार देवराज इन्द्र स्वयं उनके आश्रम में आए थे।
देवराज इन्द्र ने मुनि की महान तपस्या से प्रसन्न होकर कहा था कि उन्होंने अपने पुण्यकर्मों के बल पर अनेक श्रेष्ठ और शुभ लोकों को प्राप्त कर लिया है।
इन्द्र ने सुतीक्ष्ण मुनि से कहा था कि यदि वे चाहें तो उन दिव्य लोकों में जाकर निवास कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि मुनि अपनी इच्छा से श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को भी उन लोकों में ले जाकर उनके साथ वहाँ निवास कर सकते हैं। इन्द्र उन लोकों को श्रीराम की सेवा में समर्पित करने के लिए तैयार थे।
लेकिन श्रीराम के मन में स्वर्ग या दिव्य लोकों के सुख की कोई इच्छा नहीं थी। वे अपने वनवास के उद्देश्य और पिता की आज्ञा को भली-भाँति जानते थे। इसलिए उन्होंने मुनि से अत्यन्त विनम्रता के साथ कहा—
“हे महामुने! जिन दिव्य लोकों को आप अपनी तपस्या के बल पर प्राप्त कर चुके हैं, वे आपको ही शोभा देते हैं। मैं तो स्वयं आपको वे लोक प्राप्त कराना चाहता हूँ। इस समय मेरी केवल एक इच्छा है—आप मुझे यह बताइए कि मैं इस वन में अपने निवास के लिए कहाँ कुटिया बनाऊँ?”
श्रीराम का यह उत्तर उनके त्याग और कर्तव्यनिष्ठा को प्रकट करता है। उनके सामने दिव्य लोकों का सुख उपलब्ध था, फिर भी उन्होंने उसे स्वीकार करने की इच्छा नहीं दिखाई। वे केवल अपने धर्म का पालन करते हुए वन में रहने के लिए उचित स्थान की तलाश कर रहे थे।
श्रीराम ने आगे कहा—
“आप सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं। आपको इस लोक और परलोक की सभी बातों का ज्ञान है। महात्मा शरभंग ने भी आपके गुणों और आपकी महानता के बारे में मुझे बताया था। इसलिए मुझे विश्वास है कि आप मेरे लिए उचित स्थान बता सकते हैं।”
श्रीराम की विनम्र वाणी सुनकर सुतीक्ष्ण मुनि बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रेमपूर्वक कहा—
“हे श्रीराम! मेरा यही आश्रम आपके लिए सबसे उपयुक्त है। आप यहीं सुखपूर्वक निवास कीजिए। यहाँ ऋषि-मुनियों का आना-जाना लगा रहता है। फल और मूल भी यहाँ आसानी से उपलब्ध हैं। आपके और सीता तथा लक्ष्मण के लिए यहाँ किसी प्रकार की असुविधा नहीं होगी।”
फिर मुनि ने आश्रम की एक विशेषता बताते हुए कहा कि यहाँ बड़े-बड़े मृगों के झुंड भी आते हैं। वे अत्यन्त सुन्दर होते हैं। उनके रूप, चमक और तेज गति को देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। वे आश्रम में घूमते हैं, लेकिन किसी को नुकसान नहीं पहुँचाते। उन्हें किसी से भय भी नहीं होता और कुछ समय बाद वे स्वयं ही वहाँ से चले जाते हैं।
मुनि ने कहा—
“इस आश्रम में यदि कोई दोष है तो केवल इतना ही है कि कभी-कभी मृगों के झुंड यहाँ आकर कुछ उपद्रव कर देते हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ कोई विशेष कमी नहीं है।”
मुनि की यह बात सुनकर श्रीराम ने अपने धनुष-बाण की ओर देखा। वे जानते थे कि यदि ये मृग आश्रम में परेशानी उत्पन्न करें तो उन्हें रोकना उनके लिए कठिन नहीं होगा। लेकिन श्रीराम केवल एक महान योद्धा ही नहीं, बल्कि अत्यन्त संवेदनशील और मर्यादापूर्ण व्यक्ति भी थे।
उन्होंने सोचा कि यदि मृगों के उपद्रव को रोकने के लिए उन्हें उन्हें मारना पड़े, तो यह मुनि के आश्रम की मर्यादा के अनुकूल नहीं होगा। वह स्थान तपस्या और अहिंसा का स्थान था।
इसलिए श्रीराम ने अत्यन्त विनम्रता से कहा—
“हे महाभाग! यदि यहाँ आने वाले उन उपद्रवकारी मृगों को मैं अपने तीखे बाणों से मार डालूँ, तो यह आपके लिए उचित नहीं होगा। आपके आश्रम में आकर आपके सामने किसी जीव की हत्या करना मेरे लिए अत्यन्त दुःखद बात होगी। यदि मेरे कारण आपके आश्रम की शांति भंग हो जाए, तो इससे बढ़कर मेरे लिए और क्या कष्ट हो सकता है?”
श्रीराम के इन शब्दों से स्पष्ट होता है कि वे अपनी शक्ति का उपयोग केवल आवश्यकता पड़ने पर ही करना चाहते थे। वे ऋषि के आश्रम की मर्यादा और वहाँ के शांत वातावरण का सम्मान करते थे।
उन्होंने आगे कहा—
“इसी कारण मैं इस आश्रम में बहुत अधिक समय तक निवास नहीं करना चाहता।”
यह कहकर श्रीराम शांत हो गए। इसके बाद वे संध्योपासना के लिए चले गए।
दिन धीरे-धीरे समाप्त हो रहा था। सूर्य अस्त होने लगा था और आकाश में संध्या का सौम्य प्रकाश फैल गया था। वन का वातावरण भी धीरे-धीरे शांत हो रहा था। श्रीराम ने विधिपूर्वक संध्योपासना की। उनके साथ सीता और लक्ष्मण भी थे।
संध्योपासना पूरी करने के बाद श्रीराम ने सीता और लक्ष्मण के साथ उसी सुन्दर आश्रम में रात्रि के लिए निवास किया।
रात्रि होने लगी। दिनभर की यात्रा से सभी थके हुए थे। ऐसे समय सुतीक्ष्ण मुनि ने अपने अतिथि श्रीराम और लक्ष्मण के प्रति अपना प्रेम और सम्मान प्रकट करने के लिए स्वयं भोजन की व्यवस्था की।
उन्होंने तपस्वी-जनों के योग्य पवित्र और शुभ अन्न स्वयं लाकर दोनों भाइयों को बड़े आदर के साथ अर्पित किया। मुनि के मन में श्रीराम के प्रति इतनी श्रद्धा थी कि वे स्वयं उनकी सेवा करना अपना सौभाग्य समझ रहे थे।
इस प्रकार उस दिन की यात्रा समाप्त हुई। एक ओर वनवास की कठिनाइयाँ थीं, तो दूसरी ओर सुतीक्ष्ण मुनि जैसे संतों का स्नेह और आशीर्वाद श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को प्राप्त हो रहा था।
सुतीक्ष्ण मुनि और श्रीराम का यह मिलन केवल एक साधारण भेंट नहीं थी। इसमें एक भक्त की वर्षों की प्रतीक्षा पूरी हुई थी और दूसरी ओर श्रीराम की विनम्रता, त्याग, धर्मनिष्ठा तथा ऋषि-मुनियों के प्रति सम्मान का अद्भुत परिचय मिलता है। श्रीराम के लिए राजमहल का सुख और दिव्य लोकों का वैभव भी उतना महत्वपूर्ण नहीं था, जितना अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करना।
यही श्रीराम के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता थी—शक्ति होते हुए भी विनम्र रहना, सुख उपलब्ध होते हुए भी त्याग करना और हर परिस्थिति में धर्म का मार्ग अपनाना।
प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. श्रीराम वन में किसके साथ विचरण कर रहे थे?
उत्तर: श्रीराम अपनी पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ वन में विचरण कर रहे थे।
प्रश्न 2. श्रीराम वनवास में किसका पालन कर रहे थे?
उत्तर: श्रीराम अपने पिता की आज्ञा और धर्म का पालन करते हुए वनवास का जीवन व्यतीत कर रहे थे।
प्रश्न 3. श्रीराम किस मुनि के आश्रम की ओर जा रहे थे?
उत्तर: श्रीराम सीता और लक्ष्मण के साथ महान तपस्वी सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम की ओर जा रहे थे।
प्रश्न 4. यात्रा के दौरान श्रीराम को क्या-क्या पार करना पड़ा?
उत्तर: यात्रा के दौरान श्रीराम को गहरी और तेज प्रवाह वाली अनेक नदियों को पार करना पड़ा।
प्रश्न 5. श्रीराम को पर्वत कैसा दिखाई दिया?
उत्तर: श्रीराम को मेरुगिरि के समान अत्यन्त ऊँचा, विशाल, निर्मल और भव्य पर्वत दिखाई दिया।
प्रश्न 6. वन का वातावरण कैसा था?
उत्तर: वन घना, विशाल और एकांत था, फिर भी फूलों, फलों, पक्षियों और शीतल हवा के कारण मनोहर था।
प्रश्न 7. आश्रम के चारों ओर क्या दिखाई दे रहा था?
उत्तर: आश्रम के चारों ओर फल-फूलों से लदे वृक्ष और जगह-जगह टँगे हुए तपस्वियों के चीर-वस्त्र दिखाई दे रहे थे।
प्रश्न 8. सुतीक्ष्ण मुनि उस समय क्या कर रहे थे?
उत्तर: सुतीक्ष्ण मुनि पद्मासन लगाकर ध्यान में लीन थे और आत्मिक शुद्धि के लिए गहन तपस्या कर रहे थे।
प्रश्न 9. श्रीराम ने सुतीक्ष्ण मुनि से कैसे भेंट की?
उत्तर: श्रीराम ने श्रद्धापूर्वक मुनि को प्रणाम किया और मधुर वाणी में अपना परिचय देकर उनसे बात करने का अनुरोध किया।
प्रश्न 10. श्रीराम को देखकर सुतीक्ष्ण मुनि ने क्या किया?
उत्तर: श्रीराम को देखकर सुतीक्ष्ण मुनि अत्यन्त प्रसन्न हुए और प्रेमपूर्वक अपनी भुजाओं में भरकर उन्हें गले लगा लिया।
प्रश्न 11. सुतीक्ष्ण मुनि श्रीराम की प्रतीक्षा क्यों कर रहे थे?
उत्तर: सुतीक्ष्ण मुनि श्रीराम के दर्शन की इच्छा रखते थे, इसलिए उन्होंने उनके दर्शन किए बिना शरीर त्याग नहीं किया।
प्रश्न 12. सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में कौन आए थे?
उत्तर: सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में देवराज इन्द्र आए थे और उनकी महान तपस्या से प्रसन्न हुए थे।
प्रश्न 13. इन्द्र ने सुतीक्ष्ण मुनि को क्या बताया?
उत्तर: इन्द्र ने बताया कि मुनि ने पुण्यकर्मों और तपस्या के बल पर अनेक श्रेष्ठ तथा शुभ लोक प्राप्त कर लिए हैं।
प्रश्न 14. इन्द्र ने सुतीक्ष्ण मुनि को क्या प्रस्ताव दिया?
उत्तर: इन्द्र ने मुनि को दिव्य लोकों में निवास करने और श्रीराम, सीता तथा लक्ष्मण के साथ वहाँ रहने का प्रस्ताव दिया।
प्रश्न 15. श्रीराम ने दिव्य लोकों को स्वीकार क्यों नहीं किया?
उत्तर: श्रीराम को स्वर्गीय सुखों की इच्छा नहीं थी; वे पिता की आज्ञा, धर्म और वनवास के कर्तव्य को सर्वोपरि मानते थे।
प्रश्न 16. श्रीराम ने सुतीक्ष्ण मुनि से क्या पूछा?
उत्तर: श्रीराम ने मुनि से पूछा कि वे वन में अपनी कुटिया बनाकर रहने के लिए कौन-सा स्थान चुनें।
प्रश्न 17. श्रीराम ने सुतीक्ष्ण मुनि की प्रशंसा क्यों की?
उत्तर: श्रीराम ने मुनि की प्रशंसा इसलिए की क्योंकि वे सभी प्राणियों के हितैषी और लोक-परलोक के ज्ञाता थे।
प्रश्न 18. सुतीक्ष्ण मुनि ने श्रीराम को कहाँ रहने का सुझाव दिया?
उत्तर: सुतीक्ष्ण मुनि ने श्रीराम को अपने ही आश्रम में सीता और लक्ष्मण सहित रहने का सुझाव दिया।
प्रश्न 19. आश्रम में आने वाले मृग कैसे थे?
उत्तर: आश्रम में आने वाले मृग अत्यन्त सुन्दर, तेज गति वाले और आकर्षक थे तथा किसी को हानि नहीं पहुँचाते थे।
प्रश्न 20. आश्रम में मृगों से क्या समस्या होती थी?
उत्तर: कभी-कभी मृगों के झुंड आश्रम में आकर थोड़ा उपद्रव करते थे, यही आश्रम की एकमात्र छोटी समस्या थी।
प्रश्न 21. श्रीराम ने मृगों को मारने से इनकार क्यों किया?
उत्तर: श्रीराम आश्रम की तपस्या, अहिंसा और मर्यादा का सम्मान करते थे, इसलिए वे मृगों की हत्या नहीं करना चाहते थे।
प्रश्न 22. श्रीराम ने आश्रम में अधिक समय तक रहने से क्यों मना किया?
उत्तर: श्रीराम को भय था कि मृगों के उपद्रव को रोकने के लिए उनकी हत्या करनी पड़ सकती है।
प्रश्न 23. श्रीराम ने अपनी शक्ति के विषय में क्या आदर्श प्रस्तुत किया?
उत्तर: श्रीराम ने दिखाया कि शक्ति का उपयोग केवल आवश्यकता पर करना चाहिए और संतों के आश्रम की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए।
प्रश्न 24. श्रीराम आश्रम में पहुँचकर किस धार्मिक कार्य में लगे?
उत्तर: आश्रम में पहुँचकर श्रीराम ने सीता और लक्ष्मण के साथ विधिपूर्वक संध्योपासना की।
प्रश्न 25. सुतीक्ष्ण मुनि ने श्रीराम और लक्ष्मण के लिए क्या किया?
उत्तर: सुतीक्ष्ण मुनि ने प्रेम और सम्मानपूर्वक तपस्वियों के योग्य पवित्र भोजन स्वयं लाकर श्रीराम और लक्ष्मण को अर्पित किया।
प्रश्न 26. सुतीक्ष्ण मुनि के आतिथ्य से क्या प्रकट हुआ?
उत्तर: सुतीक्ष्ण मुनि के आतिथ्य से श्रीराम के प्रति उनका गहरा प्रेम, श्रद्धा और सेवा-भाव प्रकट हुआ।
प्रश्न 27. श्रीराम के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर: श्रीराम विनम्र, त्यागी, धर्मनिष्ठ, कर्तव्यपरायण, संवेदनशील और ऋषि-मुनियों का सम्मान करने वाले थे।
प्रश्न 28. श्रीराम ने राजसी सुखों के प्रति कैसा भाव रखा?
उत्तर: श्रीराम ने राजसी सुखों और दिव्य लोकों के वैभव को त्यागकर धर्म और पिता की आज्ञा को अधिक महत्व दिया।
प्रश्न 29. सुतीक्ष्ण मुनि और श्रीराम का मिलन विशेष क्यों था?
उत्तर: यह मिलन भक्त की वर्षों पुरानी प्रतीक्षा पूरी होने और श्रीराम की विनम्रता तथा धर्मनिष्ठा प्रकट होने के कारण विशेष था।
प्रश्न 30. इस प्रसंग से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर: इस प्रसंग से शिक्षा मिलती है कि शक्ति, सुख और वैभव से अधिक महत्वपूर्ण धर्म, कर्तव्य, विनम्रता और दूसरों की मर्यादा का सम्मान है।