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सुतीक्ष्ण मुनि से विदाई और दण्डकारण्य की ओर श्रीराम की यात्रा
वनवास के दिनों में श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण अनेक ऋषि-मुनियों के आश्रमों में जाकर उनका दर्शन कर रहे थे। इसी क्रम में वे महर्षि सुतीक्ष्ण के आश्रम पहुँचे थे। सुतीक्ष्ण मुनि ने बड़े प्रेम और श्रद्धा से उनका स्वागत किया था। उनके आश्रम में तीनों ने अत्यंत शांति और सुख का अनुभव किया। दिनभर की यात्रा की थकान दूर होने के बाद उस रात उन्होंने वहीं विश्राम किया।
प्रातःकाल जब पूर्व दिशा में हल्की लालिमा दिखाई देने लगी और वन में पक्षियों का मधुर कलरव सुनाई देने लगा, तब श्रीराम, सीता और लक्ष्मण समय पर जाग उठे। चारों ओर प्रकृति का अद्भुत सौंदर्य फैला हुआ था। शीतल वायु मंद-मंद बह रही थी और वातावरण में एक अलौकिक शांति थी।
तीनों ने कमलों की सुगंध से सुवासित और अत्यंत शीतल जल से स्नान किया। स्नान के बाद उन्होंने विधिपूर्वक अग्निदेव और अन्य देवताओं की प्रातःकालीन पूजा की। पूजा समाप्त करके उन्होंने वन के ऊपर धीरे-धीरे उदित होते सूर्यदेव के दर्शन किए। उगते हुए सूर्य की सुनहरी किरणें वृक्षों और वन-पथों पर फैल रही थीं। उस पवित्र वातावरण में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण महर्षि सुतीक्ष्ण के पास पहुँचे।
श्रीराम ने अत्यंत विनम्रता और मधुर स्वर में मुनि से कहा, “भगवन्! आप स्वयं पूजनीय हैं, फिर भी आपने हमारा इतना आदर और सत्कार किया। हमने आपके आश्रम में बहुत सुखपूर्वक समय बिताया है। अब हमारी इच्छा है कि हम आगे की यात्रा करें। इसलिए आपकी आज्ञा लेने के लिए आपके पास आए हैं।”
श्रीराम के स्वर में मुनि के प्रति गहरी कृतज्ञता थी। उन्होंने आगे कहा कि वे दण्डकारण्य में रहने वाले पुण्यात्मा ऋषियों के अनेक आश्रमों का दर्शन करना चाहते हैं। उनके मन में उन तपस्वियों से मिलने और उनके जीवन को समझने की तीव्र इच्छा थी।
श्रीराम ने महर्षि सुतीक्ष्ण से निवेदन किया, “हम चाहते हैं कि आप हमें उन महान महर्षियों के आश्रमों में जाने की अनुमति दें, जो तपस्या के द्वारा अपने अंतःकरण को पवित्र रखते हैं, अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हैं और सदैव धर्म के मार्ग पर चलते हैं।”
फिर श्रीराम ने प्रस्थान की अपनी इच्छा का एक सुंदर कारण बताया। उन्होंने कहा कि जैसे अन्यायपूर्वक प्राप्त धन किसी नीच व्यक्ति के भीतर अनुचित अहंकार और उग्रता पैदा कर देता है, वैसे ही सूर्य भी कुछ समय बाद अत्यंत प्रचण्ड होकर असहनीय गर्मी देने लगता है। इसलिए वे चाहते हैं कि सूर्य का ताप बहुत अधिक बढ़ने से पहले ही आगे की यात्रा आरम्भ कर दें।
यह कहकर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने श्रद्धापूर्वक महर्षि सुतीक्ष्ण के चरणों में प्रणाम किया।
मुनि सुतीक्ष्ण का हृदय श्रीराम के प्रति स्नेह से भर उठा। उन्होंने प्रेमपूर्वक श्रीराम और लक्ष्मण को अपने चरणों से उठाया और दोनों को कसकर हृदय से लगा लिया। उनके मन में वात्सल्य उमड़ आया था। वे जानते थे कि श्रीराम धर्म की रक्षा और पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए वन में कठिन जीवन बिता रहे हैं। इसलिए उनसे विदा होना उनके लिए भी भावुक क्षण था।
मुनि ने प्रेम से श्रीराम से कहा, “राम! आप अपनी धर्मपत्नी सीता और सुमित्रा के पुत्र लक्ष्मण के साथ यात्रा कीजिए। सीता जिस प्रकार छाया की तरह आपका अनुसरण करती हैं, उसी प्रकार वे हर परिस्थिति में आपके साथ रहेंगी। लक्ष्मण भी अपने भाई की सेवा में सदैव तत्पर हैं। आपकी यह यात्रा मंगलमय हो और आपके मार्ग की सभी बाधाएँ दूर हों।”
मुनि ने उन्हें दण्डकारण्य में रहने वाले तपस्वी ऋषियों के आश्रमों का दर्शन करने की प्रेरणा दी। उन्होंने बताया कि उन ऋषियों ने कठोर तपस्या के द्वारा अपने अंतःकरण को पवित्र बनाया है और उनके आश्रम अत्यंत रमणीय हैं।
उन्होंने श्रीराम को दण्डकारण्य के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन करते हुए कहा कि यात्रा के दौरान उन्हें अनेक ऐसे वन दिखाई देंगे, जहाँ चारों ओर हरे-भरे वृक्ष होंगे, फल-मूल की प्रचुरता होगी और रंग-बिरंगे फूलों से वन सुशोभित होंगे। उन वनों में सुंदर मृगों के झुंड स्वतंत्र रूप से विचरते दिखाई देंगे। पक्षी भी भय से रहित होकर शांत वातावरण में विचरण करते और मधुर स्वर में बोलते होंगे।
आगे उन्होंने बताया कि मार्ग में अनेक सुंदर तालाब और सरोवर मिलेंगे। उनके स्वच्छ जल में खिले हुए कमल मन को मोह लेंगे। जल में विभिन्न प्रकार के पक्षी विचरते होंगे और चारों ओर प्रकृति का अनुपम सौंदर्य दिखाई देगा। ऐसा लगता था मानो स्वयं वनदेवी ने इन स्थानों को अपने हाथों से सजाया हो।
मुनि ने आगे कहा कि श्रीराम को पहाड़ों से बहते हुए निर्मल झरने भी दिखाई देंगे। उन झरनों का स्वच्छ जल चट्टानों के बीच से कल-कल करता हुआ नीचे गिरेगा। कहीं दूर मोरों की मधुर आवाज सुनाई देगी और उनके स्वर से पूरा वन गूँज उठेगा। ऐसे शांत और सुंदर वन-प्रदेशों में यात्रा करते हुए मनुष्य प्रकृति के साथ एकाकार हो सकता है।
इन बातों के बाद सुतीक्ष्ण मुनि ने स्नेहपूर्वक श्रीराम और लक्ष्मण को विदा करते हुए कहा, “राम! अब आप जाइए। वत्स लक्ष्मण, तुम भी अपने भाई के साथ जाओ। दण्डकारण्य के विभिन्न आश्रमों का दर्शन करने के बाद आप लोगों को फिर मेरे इस आश्रम में लौटकर अवश्य आना चाहिए।”
मुनि के इन स्नेहभरे शब्दों को सुनकर श्रीराम ने विनम्रता से कहा कि उन्हें उनकी आज्ञा स्वीकार है। उन्होंने लक्ष्मण के साथ मुनि की श्रद्धापूर्वक परिक्रमा की। तीनों के हृदय में एक ओर आगे की यात्रा का उत्साह था, तो दूसरी ओर इतने स्नेह से सेवा करने वाले मुनि से बिछड़ने की भावना भी थी।
अब यात्रा की तैयारी होने लगी।
माता सीता ने दोनों भाइयों के लिए उनके आवश्यक अस्त्र-शस्त्र सँभाले। विशाल और सुंदर नेत्रों वाली सीता ने श्रीराम और लक्ष्मण के हाथों में दो अत्यंत सुंदर तूणीर दिए। उन तूणीरों में बाण भरे हुए थे। साथ ही उन्होंने उन्हें धनुष और चमचमाती हुई तलवारें भी प्रदान कीं।
श्रीराम और लक्ष्मण ने अपने-अपने तूणीर पीठ पर बाँध लिए। उनके हाथों में धनुष आ गए और अस्त्र-शस्त्र धारण करते ही दोनों वीरों का स्वरूप और भी तेजस्वी दिखाई देने लगा। धनुषों की टंकार से वन का शांत वातावरण गूँज उठा। ऐसा प्रतीत होता था मानो दोनों रघुवंशी वीर किसी महान उद्देश्य की ओर बढ़ने के लिए पूरी तरह तैयार हों।
महर्षि सुतीक्ष्ण से अंतिम बार आज्ञा लेकर श्रीराम और लक्ष्मण आश्रम से बाहर निकले। उनके साथ माता सीता भी थीं। दोनों भाई अत्यंत तेजस्वी और सुंदर दिखाई दे रहे थे। उनके चेहरे पर दृढ़ता थी, आँखों में आत्मविश्वास था और हृदय में धर्म के प्रति अटूट निष्ठा।
आश्रम से विदा होते समय पीछे छूटता हुआ सुतीक्ष्ण मुनि का आश्रम मानो उनके प्रेम और आशीर्वाद की स्मृति अपने भीतर सँजोए हुए था। आगे दण्डकारण्य का विशाल वन था—अनजाने रास्ते, अनेक ऋषियों के आश्रम, सुंदर झरने, सरोवर, वन्य जीव और प्रकृति की अनगिनत छवियाँ उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं।
श्रीराम आगे बढ़ रहे थे, उनके साथ सीता और लक्ष्मण थे। कठिन वनवास के बीच भी उनके कदमों में कोई भय नहीं था। धर्म उनका मार्गदर्शक था, सीता उनका साथ थीं और लक्ष्मण उनकी सेवा में सदैव तत्पर थे। इस प्रकार महर्षि सुतीक्ष्ण के आशीर्वाद को हृदय में धारण किए हुए तीनों दण्डकारण्य की नई यात्रा पर निकल पड़े।
प्रश्न–उत्तर
प्रश्न 1. श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने प्रातःकाल उठकर कौन-कौन से कार्य किए?
उत्तर: तीनों ने शीतल, सुगंधित जल से स्नान किया, अग्नि और देवताओं की पूजा की तथा उदित होते सूर्यदेव के दर्शन किए।
प्रश्न 2. श्रीराम ने महर्षि सुतीक्ष्ण से किस बात की आज्ञा माँगी?
उत्तर: श्रीराम ने दण्डकारण्य में रहने वाले पुण्यात्मा ऋषियों के विभिन्न आश्रमों का दर्शन करने के लिए आगे जाने की आज्ञा माँगी।
प्रश्न 3. श्रीराम दण्डकारण्य के ऋषियों के आश्रमों का दर्शन क्यों करना चाहते थे?
उत्तर: श्रीराम तपस्या से पवित्र, इन्द्रियों को वश में रखने वाले और धर्मपरायण महर्षियों के जीवन तथा आश्रमों का दर्शन करना चाहते थे।
प्रश्न 4. श्रीराम ने शीघ्र प्रस्थान करने की इच्छा क्यों व्यक्त की?
उत्तर: श्रीराम चाहते थे कि सूर्य का ताप अत्यधिक बढ़ने से पहले वे आश्रम से निकलकर अपनी आगे की यात्रा आरम्भ कर दें।
प्रश्न 5. महर्षि सुतीक्ष्ण ने श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को क्या आशीर्वाद दिया?
उत्तर: महर्षि ने उनकी यात्रा को मंगलमय होने तथा मार्ग की सभी बाधाएँ दूर होने का आशीर्वाद दिया और उन्हें निर्भय होकर यात्रा करने कहा।
प्रश्न 6. सुतीक्ष्ण मुनि ने दण्डकारण्य के वनों की कैसी विशेषताएँ बताईं?
उत्तर: वहाँ फल-मूल से भरे और फूलों से सजे वन, विचरते मृग, शांत पक्षी, सुंदर सरोवर और मनोहर प्राकृतिक दृश्य दिखाई देंगे।
प्रश्न 7. दण्डकारण्य के तालाबों और सरोवरों का वर्णन किस प्रकार किया गया है?
उत्तर: तालाब और सरोवर स्वच्छ जल से भरे होंगे तथा उनमें खिले कमलों के समूह और कारण्डव आदि जलपक्षी विचरते दिखाई देंगे।
प्रश्न 8. दण्डकारण्य के झरनों और वनस्थलियों की क्या विशेषता थी?
उत्तर: वहाँ सुंदर पहाड़ी झरने बहते थे और मोरों की मधुर बोली से गूँजती सुरम्य वनस्थलियाँ यात्रियों के मन को आकर्षित करती थीं।
प्रश्न 9. महर्षि सुतीक्ष्ण ने श्रीराम और लक्ष्मण से वापस आने के लिए क्या कहा?
उत्तर: उन्होंने कहा कि दण्डकारण्य के आश्रमों का दर्शन करने के बाद श्रीराम और लक्ष्मण को पुनः उनके आश्रम में लौटना चाहिए।
प्रश्न 10. सीता ने श्रीराम और लक्ष्मण की यात्रा की तैयारी में क्या सहायता की?
उत्तर: सीता ने दोनों भाइयों को सुंदर तूणीर, धनुष और चमचमाती तलवारें प्रदान कीं, जिन्हें धारण करके वे यात्रा के लिए तैयार हुए।
प्रश्न 11. अस्त्र-शस्त्र धारण करने के बाद श्रीराम और लक्ष्मण कैसे दिखाई दे रहे थे?
उत्तर: अस्त्र-शस्त्र धारण करने के बाद दोनों रघुवंशी वीर अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और पराक्रमी दिखाई दे रहे थे तथा यात्रा के लिए तत्पर थे।
प्रश्न 12. सुतीक्ष्ण मुनि से विदा लेते समय श्रीराम और लक्ष्मण ने क्या किया?
उत्तर: दोनों भाइयों ने मुनि की आज्ञा लेकर श्रद्धापूर्वक उनकी परिक्रमा की और सीता के साथ आगे की यात्रा के लिए आश्रम से प्रस्थान किया।