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(41)
अंशुमान का अश्रु और गंगा का आह्वान
अयोध्या की राजसभा में उस दिन वातावरण असामान्य रूप से गंभीर था। महाराज सगर के हृदय में अनेक दिनों से एक ही चिंता जल रही थी—उनके साठ हजार पुत्र पृथ्वी को खोदते हुए यज्ञ के अश्व की खोज में गये थे, परन्तु बहुत समय बीत जाने पर भी उनका कोई समाचार नहीं मिला था। पिता का हृदय आशंका से काँप रहा था।
एक दिन उन्होंने अपने तेजस्वी पौत्र अंशुमान को बुलाया। अंशुमान का मुख तेज से दमक रहा था, जैसे सूर्य की किरणें धरती पर उतर आई हों। सगर ने उसे स्नेहभरी दृष्टि से देखा, पर उनकी आँखों में चिंता की रेखाएँ स्पष्ट थीं।
उन्होंने कहा, “वत्स! तुम्हारे चाचा बहुत दिनों से गये हैं। न उनका कोई संदेश आया, न यज्ञ का अश्व लौटा। तुम शूरवीर हो, विद्वान हो, और अपने पूर्वजों के समान तेजस्वी भी। अब तुम ही जाओ और उस दुष्ट का पता लगाओ जिसने मेरे यज्ञ का अश्व चुरा लिया है। अपने चाचाओं के मार्ग पर चलो।”
राजा ने आगे सावधान करते हुए कहा, “पृथ्वी के भीतर अनेक बलवान और भयानक जीव रहते हैं। उनसे सामना करना सरल नहीं। अतः अपने साथ तलवार और धनुष अवश्य ले जाओ। मार्ग में जो वंदनीय हों, उन्हें प्रणाम करना; पर जो विघ्न डालें, उन्हें दंड देना। सफल होकर लौटना और मेरे यज्ञ को पूर्ण कराना।”
पितामह की आज्ञा को सिर पर रखकर अंशुमान ने धनुष और तलवार उठाई। उसकी आँखों में दृढ़ निश्चय था। वह शीघ्र ही उसी मार्ग पर चल पड़ा, जिसे उसके चाचाओं ने पृथ्वी के भीतर बनाकर छोड़ा था। वह मार्ग अंधकारमय था, गहरा और भयावह, पर अंशुमान के साहस की ज्योति उस अंधकार को चीरती जा रही थी।
कुछ दूर चलने पर उसने एक विशाल दिग्गज को देखा। वह इतना दिव्य और प्रभावशाली था कि देवता, दानव, राक्षस, पिशाच, पक्षी और नाग—सभी उसकी पूजा कर रहे थे। अंशुमान ने विनम्रतापूर्वक उसकी परिक्रमा की, कुशल-क्षेम पूछा और अपने चाचाओं का समाचार तथा अश्व के अपहरणकर्ता के विषय में प्रश्न किया।
दिग्गज ने बुद्धिमानी भरी दृष्टि से उसे देखा और कहा, “असमंजकुमार! तुम अपना कार्य सिद्ध कर घोड़े सहित शीघ्र लौटोगे।” यह आशीर्वचन सुनकर अंशुमान आगे बढ़ा। मार्ग में उसे अन्य दिग्गज भी मिले। उसने सबको प्रणाम कर वही प्रश्न पूछा। सबने उसका आदर किया और आशीर्वाद दिया कि वह अश्व के साथ सकुशल लौटे।
इन आशीर्वादों से उसका हृदय दृढ़ होता गया। परन्तु जो दृश्य आगे था, उसने उसके साहस को भी हिला दिया।
वह उस स्थान पर पहुँचा जहाँ उसके चाचा—सगरपुत्र—राख के ढेर बनकर पड़े थे। कभी जिनके पराक्रम से पृथ्वी काँपती थी, वे आज मुट्ठी भर भस्म बन चुके थे। यह दृश्य देखकर अंशुमान का कलेजा फट पड़ा। वह भूमि पर गिर पड़ा और फूट-फूटकर रोने लगा। उसके अश्रु उस भस्म पर गिर रहे थे, जैसे किसी शूरवीर की अंतिम विदाई पर वर्षा हो रही हो।
उसी समय उसकी दृष्टि पास ही चरते हुए यज्ञ के अश्व पर पड़ी। अश्व सुरक्षित था, पर उसके चाचाओं का अस्तित्व मिट चुका था।
अंशुमान ने सोचा—“मैं इनका अंतिम संस्कार करूँ, इन्हें जलांजलि दूँ।” पर चारों ओर देखा तो कहीं जल का नामोनिशान नहीं था। पृथ्वी सूखी थी, जैसे स्वयं शोक में डूबी हो।
तभी उसने अपनी दूरदर्शी दृष्टि फैलायी। उसे आकाश में वेग से उड़ते हुए पक्षिराज गरुड़ दिखाई दिए। वे उसके चाचाओं के मामा थे। गरुड़ समीप आये और बोले, “पुरुषसिंह! शोक मत करो। इन राजकुमारों का वध सम्पूर्ण जगत के कल्याण के लिए हुआ है। महात्मा कपिल के तप के प्रभाव से ये दग्ध हुए हैं। इन्हें साधारण जल से तर्पण देना उचित नहीं।”
गरुड़ ने आगे कहा, “हिमवान की ज्येष्ठ पुत्री गंगा ही इनके उद्धार का मार्ग हैं। जब गंगा का पवित्र जल इनकी भस्म को स्पर्श करेगा, तभी ये सब स्वर्गलोक को प्राप्त होंगे। गंगा ही इनका तारण करेंगी।”
यह सुनकर अंशुमान के आँसू थम गये, पर हृदय में एक नई चिंता जन्मी—गंगा को पृथ्वी पर कैसे लाया जाये?
गरुड़ ने अंत में कहा, “अब तुम घोड़ा लेकर जाओ और अपने पितामह का यज्ञ पूर्ण कराओ।”
अंशुमान ने गरुड़ को प्रणाम किया, अश्व को साथ लिया और शीघ्र ही अयोध्या लौट आया। यज्ञ में दीक्षित राजा सगर के सामने पहुँचकर उसने सम्पूर्ण घटना सुनायी—चाचाओं की भस्म, कपिल मुनि का तेज, और गरुड़ का संदेश।
यह भयानक समाचार सुनकर राजा सगर का हृदय शोक से भर गया, पर उन्होंने धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। शास्त्रों के अनुसार उन्होंने यज्ञ को विधिपूर्वक पूर्ण किया। यज्ञ समाप्त होने पर वे राजधानी लौटे।
अब उनके मन में एक ही विचार था—गंगा को पृथ्वी पर कैसे लाया जाए? वे दिन-रात चिंतन करते रहे, पर कोई उपाय न सूझा। समय बीतता गया। उन्होंने तीस हजार वर्षों तक राज्य किया, पर गंगा को लाने का निश्चय न कर सके।
अंततः एक दिन वे स्वर्गलोक को चले गये—अपने पीछे एक अधूरी पीड़ा छोड़कर।
पर उसी अधूरी पीड़ा ने आगे चलकर भगीरथ जैसे महापुरुष को जन्म दिया, जिसने गंगा को पृथ्वी पर लाकर अपने पूर्वजों का उद्धार किया।
यह कथा केवल वीरता की नहीं, बल्कि एक पौत्र के आँसुओं, एक पिता के शोक और एक वंश के अधूरे संकल्प की है—जिसे पूर्ण करने के लिए स्वयं गंगा को धरती पर उतरना पड़ा।