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अनसूया का प्रेमोपहार और वन-मार्ग की नई यात्रा

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अनसूया का प्रेमोपहार और वन-मार्ग की नई यात्रा

अनसूया माता बड़े प्रेम और वात्सल्य से सीता की ओर देख रही थीं। मिथिलेशकुमारी सीता ने जिस विस्तार और मधुरता के साथ अपने स्वयंवर की पूरी कथा सुनाई थी, उसे सुनकर अनसूया का हृदय भाव-विभोर हो उठा। वे सीता के सरल स्वभाव, मधुर वाणी और धर्म के प्रति उनकी निष्ठा से अत्यंत प्रसन्न थीं। उन्होंने आगे बढ़कर सीता को अपनी दोनों भुजाओं में भर लिया और बड़े स्नेह से उनके मस्तक को सूँघकर आशीर्वाद दिया। उस क्षण ऐसा लग रहा था मानो एक तपस्विनी माता अपनी पुत्री को हृदय से लगा रही हो।

अनसूया ने प्रेमपूर्वक कहा, “बेटी सीते! तुमने इतने सुंदर, स्पष्ट और मधुर शब्दों में अपने जीवन के इस अद्भुत प्रसंग को सुनाया है कि मेरा मन प्रसन्न हो गया। तुम्हारा स्वयंवर किस प्रकार हुआ, तुम्हारे जीवन में श्रीराम का प्रवेश कैसे हुआ—तुमने सब कुछ मुझे बहुत सुंदर ढंग से बता दिया। तुम्हारी बातें सुनते हुए मुझे ऐसा लगा जैसे मैं स्वयं उस समय को अपनी आँखों के सामने घटित होते हुए देख रही हूँ।”

सीता की मधुर वाणी में अनसूया का मन इतना रम गया था कि वे उनकी बातें सुनते-सुनते समय का ध्यान ही भूल गई थीं। तभी उनकी दृष्टि धीरे-धीरे ढलते हुए सूर्य की ओर गयी। दिन समाप्त होने को था। सूर्यदेव अपनी सुनहरी किरणों को समेटते हुए पश्चिम दिशा की ओर बढ़ चुके थे और संध्या की लालिमा आकाश में फैलने लगी थी।

अनसूया ने चारों ओर देखा। दिनभर भोजन की खोज में वन में दूर-दूर तक उड़ने वाले पक्षी अब अपने घोंसलों की ओर लौट आए थे। पेड़ों पर बैठकर वे दिनभर की थकान मिटाने के लिए अपने-अपने बसेरों में सिमट रहे थे। उनके कलरव की जगह अब विश्राम की मधुर ध्वनियाँ सुनाई दे रही थीं। पूरे आश्रम का वातावरण धीरे-धीरे शांत और गंभीर होता जा रहा था।

आश्रम की ओर से कुछ मुनि भी लौटते दिखाई दिए। वे स्नान करके आए थे, इसलिए उनके वल्कल-वस्त्र अभी भी जल से भीगे हुए थे। उनके शरीर पर स्नान का जल चमक रहा था और हाथों में जल से भरे कलश थे। वे सभी एक साथ आश्रम की ओर बढ़ रहे थे। उनके शांत मुख, संयमित चाल और तपस्या से तेजस्वी शरीर देखकर वन का वातावरण और भी पवित्र प्रतीत हो रहा था।

आश्रम में उस दिन का अग्निहोत्र भी पूरा हो चुका था। महर्षि अत्रि ने विधिपूर्वक अग्नि में आहुति देकर अपना होमकर्म सम्पन्न कर लिया था। यज्ञाग्नि से उठता हुआ धुआँ हवा के साथ ऊपर की ओर जा रहा था। उसका गहरा श्याम रंग कबूतर के कंठ के समान दिखाई दे रहा था। वह धुआँ जैसे इस बात का संकेत दे रहा था कि आश्रम में दिनभर चले तप, यज्ञ और साधना का समय अब समाप्त हो चुका है।

संध्या का अंधकार धीरे-धीरे पूरे वन पर छाने लगा। दिन के प्रकाश में दूर-दूर तक दिखाई देने वाले वृक्ष अब अंधकार में धुँधले पड़ गए थे। उनके पत्ते भी कम दिखाई दे रहे थे और चारों ओर अंधकार इतना घना हो गया था कि दिशाओं का ठीक-ठीक पता लगाना कठिन हो रहा था। ऐसा लगता था जैसे पूरा वन रात की गहरी चादर में धीरे-धीरे ढकता जा रहा हो।

अब वन का स्वरूप भी बदलने लगा था। दिन में शांत रहने वाले कुछ रात्रिचर जीव बाहर निकल आए थे। उल्लू आदि रात्रि में विचरण करने वाले प्राणी चारों ओर घूमने लगे। दूसरी ओर तपोवन के हिरण और अन्य मृग दिनभर की थकान के बाद आश्रम की वेदियों और शांत स्थानों के आसपास विश्राम करने लगे थे। जहाँ दिन में साधना और गतिविधियों की चहल-पहल थी, वहाँ अब शांति और रात्रि का साम्राज्य फैल चुका था।

अनसूया ने आकाश की ओर देखा और प्रेम से सीता से कहा, “बेटी, अब रात हो गई है। आकाश नक्षत्रों से सज गया है और चन्द्रदेव भी अपनी शीतल चाँदनी बिखेरते हुए उदित हो चुके हैं। अब तुम्हें श्रीराम के पास लौट जाना चाहिए। मैं तुम्हें जाने की आज्ञा देती हूँ।”

सीता शांत भाव से अनसूया की बातें सुन रही थीं। अनसूया ने आगे कहा, “जाओ बेटी, जाकर श्रीराम की सेवा में लगो। तुमने अपनी मधुर बातों से आज मेरा मन भी बहुत प्रसन्न कर दिया है। तुम्हारे साथ बात करते हुए मुझे बहुत आनंद मिला।”

लेकिन जाने से पहले अनसूया के हृदय में अपनी इस प्रिय पुत्री के लिए कुछ और देने की इच्छा जागी। उन्होंने बड़े स्नेह से सीता से कहा, “बेटी! जाने से पहले मेरी आँखों के सामने स्वयं को इन दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से अलंकृत करो। इन्हें धारण करके मुझे प्रसन्न करो।”

अनसूया के प्रेम और आग्रह को देखकर सीता ने विनम्रतापूर्वक उनकी आज्ञा स्वीकार की। उन्होंने उन दिव्य वस्त्रों और आभूषणों को धारण किया। जब वे सजकर अनसूया के सामने आईं, तो उनका रूप और भी मनोहर दिखाई देने लगा। ऐसा लग रहा था मानो वन की सरलता और तपोवन की पवित्रता के बीच कोई दिव्य ज्योति प्रकट हो गई हो।

सीता ने अनसूया के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम किया। उनके मन में उस महान तपस्विनी के प्रति गहरा सम्मान और कृतज्ञता थी। अनसूया ने भी उन्हें स्नेहभरी दृष्टि से देखा और हृदय से आशीर्वाद दिया। फिर सीता श्रीराम के पास चली गईं।

जब श्रीराम ने सीता को दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से अलंकृत देखा, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने समझ लिया कि यह केवल वस्त्र और आभूषण नहीं थे, बल्कि अनसूया माता के स्नेह और आशीर्वाद का प्रेमपूर्ण उपहार थे। सीता के रूप में उन्हें अनसूया के मातृवत् प्रेम की झलक दिखाई दी। इस प्रेमोपहार को देखकर श्रीराम के हृदय में भी उस तपस्विनी के प्रति सम्मान और कृतज्ञता और अधिक बढ़ गया।

सीता ने श्रीराम को बताया कि अनसूया माता ने उन्हें किस प्रेम से ये वस्त्र, आभूषण और हार आदि प्रदान किए हैं। उन्होंने अनसूया के साथ हुई पूरी बातचीत भी श्रीराम को सुनाई। श्रीराम और लक्ष्मण दोनों ही सीता के इस सम्मान से बहुत प्रसन्न हुए। वनवास के कठिन जीवन में ऐसा आत्मीय स्नेह मिलना उनके लिए अत्यंत सुखद अनुभव था।

उस रात श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने उसी आश्रम में विश्राम किया। चारों ओर तपस्वियों की साधना से पवित्र वातावरण था। आकाश में चन्द्रमा चमक रहा था और वन की शांति के बीच तीनों ने रात्रि बिताई। दिनभर की घटनाओं के बाद वह रात उनके लिए स्नेह, सम्मान और शांति से भरी हुई थी।

धीरे-धीरे रात बीत गई और प्रातःकाल का प्रकाश वन में फैलने लगा। आश्रम के तपस्वी मुनि प्रातः स्नान करके अपने दैनिक धार्मिक कार्यों में लग गए। उन्होंने अग्निहोत्र सम्पन्न किया। वातावरण में फिर से मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों की पवित्रता भर गई।

अब श्रीराम और लक्ष्मण को आगे की यात्रा पर जाना था। दोनों भाइयों ने उन तपस्वी मुनियों से विनम्रतापूर्वक आगे जाने की अनुमति माँगी। मुनियों ने उन्हें आशीर्वाद दिया, लेकिन उनके मन में राम के लिए चिंता भी थी। वे जानते थे कि जिस वन में राम प्रवेश करने जा रहे हैं, वह साधारण वन नहीं था। वहाँ अनेक प्रकार के संकट छिपे हुए थे।

तपस्वियों ने गंभीर स्वर में कहा, “रघुनन्दन! इस वन का मार्ग राक्षसों से भरा हुआ है। यहाँ तपस्या करने वाले मुनियों को निरंतर उनके उपद्रव का सामना करना पड़ता है। इस विशाल और दुर्गम वन में अनेक प्रकार के नरभक्षी राक्षस रहते हैं। उनके रूप भी एक जैसे नहीं हैं। वे अपनी इच्छा के अनुसार अनेक रूप धारण कर सकते हैं। इनके अतिरिक्त यहाँ हिंसक पशु भी विचरण करते हैं।”

मुनियों की बातों में वर्षों से सहा हुआ भय और पीड़ा स्पष्ट दिखाई दे रही थी। उन्होंने बताया कि जो तपस्वी या ब्रह्मचारी किसी असावधान अवस्था में इन राक्षसों के हाथ लग जाता है, उसके लिए बड़ा संकट उत्पन्न हो जाता है। राक्षस और हिंसक जीव इस वन में रहने वाले साधुओं को परेशान करते रहते थे।

उन्होंने श्रीराम से विनती की, “राघवेन्द्र! आप इस वन में धर्म की रक्षा कीजिए। इन दुष्ट राक्षसों को रोकिए और उन्हें यहाँ से दूर भगाइए। हम तपस्वियों को आपके आगमन से आशा मिली है कि अब इस वन में धर्म और शांति की रक्षा होगी।”

श्रीराम ने मुनियों की बातें अत्यंत गंभीरता से सुनीं। उनके हृदय में उन तपस्वियों के प्रति करुणा जाग उठी। वे स्वयं धर्म की रक्षा के लिए वनवास स्वीकार करके निकले थे और अब उन्हें लगा कि इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य इन साधु-संतों की रक्षा करना भी है।

इसके बाद मुनियों ने उन्हें वन में आगे जाने का मार्ग बताया। उन्होंने कहा, “रघुकुलभूषण! यही वह मार्ग है जिससे महर्षि और तपस्वी वन के भीतर फल और मूल लेने के लिए जाते हैं। आपको भी इसी मार्ग से इस कठिन और दुर्गम वन में प्रवेश करना चाहिए।”

मुनियों ने हाथ जोड़कर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के मंगलमय मार्ग की कामना की। उन्होंने स्वस्तिवाचन करके उन्हें शुभकामनाएँ और आशीर्वाद दिए। आश्रम का वातावरण उस समय भावपूर्ण हो उठा था। एक ओर तपस्वियों को अपने प्रिय अतिथियों के आगे बढ़ जाने का भाव था, तो दूसरी ओर उन्हें यह विश्वास भी था कि श्रीराम जैसे धर्मनिष्ठ और पराक्रमी पुरुष के रहते वन में रहने वाले साधुओं को आशा और सुरक्षा मिलेगी।

श्रीराम ने मुनियों का सम्मानपूर्वक अभिवादन किया। सीता उनके साथ थीं और लक्ष्मण सदैव की तरह अपने बड़े भाई की सेवा और सुरक्षा के लिए तत्पर खड़े थे। तीनों ने उस पवित्र आश्रम से विदा ली और घने वन की ओर आगे बढ़ चले।

उनका आगे बढ़ना ऐसा प्रतीत होता था मानो सूर्यदेव स्वयं घने बादलों के समूह में प्रवेश कर रहे हों। सामने अज्ञात और दुर्गम वन था, जहाँ अनेक संकट उनका इंतजार कर रहे थे। फिर भी श्रीराम के कदमों में कोई भय नहीं था। उनके साथ सीता का धैर्य और लक्ष्मण की अटूट निष्ठा थी। धर्म, कर्तव्य और सत्य को अपना मार्गदर्शक बनाकर वे तीनों उस विशाल वन में प्रवेश कर गए—एक ऐसी यात्रा की ओर, जहाँ उनके सामने आने वाले संकट उनके साहस और धर्मनिष्ठा की और भी बड़ी परीक्षा लेने वाले थे।

 

प्रश्न–उत्तर

प्रश्न 1. अनसूया ने सीता को अपने अंक में भरकर उनका मस्तक सूँघने के बाद क्या कहा?
उत्तर: अनसूया ने सीता की मधुर वाणी और सुंदर वर्णन की प्रशंसा की तथा उनके स्वयंवर की कथा सुनकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की।

प्रश्न 2. संध्या होने पर आश्रम के वातावरण में क्या परिवर्तन दिखाई देने लगा?
उत्तर: सूर्य अस्त होने लगा, पक्षी घोंसलों में लौट आए, मुनि आश्रम की ओर आने लगे और चारों ओर धीरे-धीरे अंधकार छाने लगा।

प्रश्न 3. स्नान करके लौट रहे मुनियों का स्वरूप कैसा दिखाई दे रहा था?
उत्तर: मुनियों के वल्कल-वस्त्र जल से भीगे हुए थे और वे जल से भरे कलश लेकर एक साथ आश्रम की ओर लौट रहे थे।

प्रश्न 4. महर्षि अत्रि के अग्निहोत्र के बाद धुआँ कैसा दिखाई दे रहा था?
उत्तर: महर्षि अत्रि का अग्निहोत्र पूरा हो चुका था और अग्नि से उठता श्यामवर्ण धुआँ हवा के वेग से ऊपर जा रहा था।

प्रश्न 5. रात्रि होने पर वन का वातावरण कैसा हो गया था?
उत्तर: अंधकार घना हो गया, दिशाओं का ज्ञान कठिन हो गया, रात्रिचर प्राणी विचरने लगे और तपोवन के मृग विश्राम करने लगे।

प्रश्न 6. अनसूया ने रात होने पर सीता को क्या सलाह दी?
उत्तर: अनसूया ने सीता को श्रीराम के पास लौटकर उनकी सेवा में लगने की आज्ञा दी और उनकी मधुर बातों के लिए धन्यवाद दिया।

प्रश्न 7. अनसूया ने सीता को जाने से पहले क्या करने के लिए कहा?
उत्तर: अनसूया ने सीता से अपनी आँखों के सामने दिव्य वस्त्र और आभूषण धारण करके स्वयं को अलंकृत करने के लिए कहा।

प्रश्न 8. सीता ने अनसूया के दिए हुए वस्त्र और आभूषणों को किस प्रकार स्वीकार किया?
उत्तर: सीता ने विनम्रतापूर्वक अनसूया की आज्ञा मानी, दिव्य वस्त्र-आभूषण धारण किए और उनके चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम किया।

प्रश्न 9. श्रीराम ने सीता को अलंकृत देखकर कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त की?
उत्तर: श्रीराम सीता को दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से अलंकृत देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए और अनसूया के प्रेमोपहार से प्रभावित हुए।

प्रश्न 10. सीता ने श्रीराम को अनसूया के प्रेमोपहार के बारे में क्या बताया?
उत्तर: सीता ने श्रीराम को बताया कि अनसूया ने उन्हें प्रेमपूर्वक दिव्य वस्त्र, आभूषण और हार आदि उपहार में दिए थे।

प्रश्न 11. श्रीराम और लक्ष्मण सीता के सत्कार को देखकर क्यों प्रसन्न हुए?
उत्तर: श्रीराम और लक्ष्मण ने सीता को मिले दुर्लभ और प्रेमपूर्ण सत्कार को देखकर प्रसन्नता अनुभव की और अनसूया के प्रति सम्मान बढ़ा।

प्रश्न 12. श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने अनसूया के आश्रम में रात कैसे बिताई?
उत्तर: तीनों ने तपस्वियों से सम्मान और स्नेह प्राप्त करने के बाद शांत, पवित्र वातावरण में उसी आश्रम में रात्रि विश्राम किया।

प्रश्न 13. प्रातःकाल तपस्वियों ने अपने कौन-कौन से कार्य पूरे किए?
उत्तर: प्रातःकाल सभी तपस्वी स्नान करके अपने धार्मिक कार्यों में लगे और अग्निहोत्र पूरा करने के बाद आश्रम में पवित्र वातावरण बना।

प्रश्न 14. श्रीराम और लक्ष्मण ने प्रातःकाल तपस्वियों से क्या माँगा?
उत्तर: श्रीराम और लक्ष्मण ने आगे की यात्रा के लिए तपस्वी मुनियों से विनम्रतापूर्वक जाने की अनुमति माँगी और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।

प्रश्न 15. तपस्वियों ने श्रीराम को वन के बारे में क्या चेतावनी दी?
उत्तर: तपस्वियों ने बताया कि वन राक्षसों और हिंसक पशुओं से भरा है तथा यहाँ रहने वाले मुनियों को निरंतर उनके उपद्रव सहने पड़ते हैं।

प्रश्न 16. राक्षस तपस्वियों और ब्रह्मचारियों के लिए किस प्रकार संकट उत्पन्न करते थे?
उत्तर: राक्षस असावधान अवस्था में मिले तपस्वियों और ब्रह्मचारियों पर आक्रमण करते थे, जिससे वन में रहने वाले साधुओं का जीवन संकट में पड़ता था।

प्रश्न 17. तपस्वियों ने श्रीराम से वन में प्रवेश करने का आग्रह क्यों किया?
उत्तर: तपस्वियों ने श्रीराम से वन में प्रवेश करने का आग्रह किया ताकि वे राक्षसों के उपद्रव से साधुओं की रक्षा कर सकें।

प्रश्न 18. तपस्वियों ने श्रीराम को वन में जाने का मार्ग कैसे बताया?
उत्तर: तपस्वियों ने बताया कि यही वह मार्ग है जिससे महर्षि फल-मूल लेने वन में जाते हैं और श्रीराम को भी इसी मार्ग से जाना चाहिए।

प्रश्न 19. श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने आश्रम से विदा लेते समय क्या किया?
उत्तर: उन्होंने तपस्वियों का सम्मानपूर्वक अभिवादन किया, उनके आशीर्वाद लिए और सीता तथा लक्ष्मण के साथ आगे वन की ओर प्रस्थान किया।

प्रश्न 20. श्रीराम के वन में प्रवेश करने की तुलना किससे की गई है?
उत्तर: श्रीराम, सीता और लक्ष्मण का वन में प्रवेश ऐसे बताया गया है जैसे सूर्यदेव घने बादलों की घटा में प्रवेश कर रहे हों।