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अनसूया के प्रेमोपहार और सीता के पातिव्रत्य की महिमा
अनसूया माता के मुख से पतिव्रता-धर्म और पत्नी के कर्तव्यों का गंभीर उपदेश सुनकर सीता के हृदय में उनके प्रति श्रद्धा और भी बढ़ गई। उनके प्रत्येक वचन में अनुभव, तपस्या और स्नेह का अद्भुत संगम था। सीता ने विनम्रता से अनसूया की ओर देखा। उनके मन में यह भाव था कि ऐसी महान तपस्विनी के मुख से निकले हुए वचन किसी अमूल्य निधि से कम नहीं हैं।
सीता ने हाथ जोड़कर मधुर स्वर में कहा, “देवि! संसार की स्त्रियों में आप वास्तव में श्रेष्ठ हैं। आपके मुख से ऐसी बातें सुनना मेरे लिए कोई आश्चर्य नहीं है। आपने जीवनभर तपस्या और धर्म का पालन किया है, इसलिए आपके प्रत्येक वचन में अनुभव की गहराई है। आपने मुझे बताया कि नारी के लिए उसका पति ही गुरु के समान होता है। यह बात मेरे लिए नई नहीं है; विवाह के समय से ही मुझे इसका ज्ञान कराया गया है।”
सीता के स्वर में न तो अपने धर्म का अहंकार था और न ही किसी प्रकार की शिकायत। वह अपने कर्तव्य को सहज भाव से स्वीकार करती थीं। उन्होंने आगे कहा, “यदि मेरे पतिदेव गुणहीन होते, उनका आचरण अच्छा न होता या उनके पास जीवन-यापन के साधन भी न होते, तब भी मैं बिना किसी संकोच और दुविधा के उनकी सेवा करती रहती। मेरे लिए पत्नी का धर्म केवल पति के गुण देखकर नहीं बदलता।”
फिर सीता के चेहरे पर श्रीराम के प्रति प्रेम और गर्व की झलक दिखाई देने लगी। उन्होंने कहा, “लेकिन मेरे सौभाग्य की बात तो यह है कि मेरे पति श्रीराम अपने गुणों के कारण सभी के प्रिय और प्रशंसा के पात्र हैं। वे अत्यंत दयालु हैं, अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखते हैं, धर्म के मार्ग पर अडिग रहते हैं और सभी के प्रति गहरा प्रेम रखते हैं। वे मेरे लिए ही नहीं, अपने माता-पिता के लिए भी अत्यंत प्रिय हैं।”
सीता को श्रीराम का अपनी माताओं के प्रति व्यवहार याद आया। उन्होंने भावपूर्ण स्वर में कहा, “मेरे महाबली श्रीराम अपनी माता कौसल्या के साथ जैसा सम्मान और प्रेम रखते हैं, वैसा ही व्यवहार महाराज दशरथ की अन्य रानियों के साथ भी करते हैं। वे कभी किसी के साथ भेदभाव नहीं करते।”
सीता ने आगे बताया कि श्रीराम के लिए उनके पिता की सभी पत्नियाँ माताओं के समान थीं। “महाराज दशरथ ने जिन स्त्रियों को कभी प्रेम की दृष्टि से देखा था, श्रीराम उनके प्रति भी अपने पिता के सम्मान के कारण अत्यंत आदर रखते हैं। वे उन्हें माता के समान मानते हैं। यही उनकी महानता है।”
इन बातों को कहते हुए सीता के मन में अयोध्या की स्मृतियाँ भी उमड़ रही थीं। वन में आने से पहले माता कौसल्या ने उन्हें जो कर्तव्य और धर्म की बातें समझाई थीं, वे उन्हें आज भी अक्षरशः याद थीं। सीता ने कहा, “जब मैं अपने पति के साथ इस निर्जन वन में आने लगी थी, तब माता कौसल्या ने मुझे जो उपदेश दिया था, वह मेरे हृदय में उसी प्रकार अंकित है जैसे किसी पत्थर पर गहरी रेखा अंकित हो जाती है।”
फिर उन्हें अपने विवाह का समय याद आया। अग्निदेव को साक्षी मानकर जब उनका विवाह श्रीराम के साथ हुआ था, तब माता ने उन्हें पत्नी के धर्म के बारे में जो शिक्षा दी थी, वह भी उनके मन में सुरक्षित थी। सीता के लिए वे केवल पुराने शब्द नहीं थे, बल्कि जीवन में निभाए जाने वाले संकल्प थे।
उन्होंने अनसूया से कहा, “मेरे विवाह के समय अग्नि के समीप मेरी माता ने मुझे जो बातें समझाई थीं, वे भी मुझे पूरी तरह स्मरण हैं। इसके अतिरिक्त मेरे दूसरे स्वजनों ने भी समय-समय पर जो धर्म और कर्तव्य की बातें बताई थीं, उन्हें मैं भूली नहीं हूँ।”
सीता ने दृढ़ विश्वास के साथ कहा, “स्त्री के लिए अपने पति की सेवा और उसके प्रति निष्ठा से बढ़कर कोई दूसरा तप नहीं माना गया है।”
फिर उन्होंने उदाहरण देते हुए सावित्री का स्मरण किया। “सत्यवान की पत्नी सावित्री ने भी अपने पति की सेवा और निष्ठा के कारण महान सम्मान प्राप्त किया। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्ची निष्ठा और धर्म का पालन कितना महान फल देता है। और आप, माता अनसूया, स्वयं इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। आपने भी अपने पति की सेवा और तपस्या के प्रभाव से स्वर्गलोक में स्थान प्राप्त किया है।”
सीता ने आगे चन्द्रमा और रोहिणी का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि स्वर्ग की श्रेष्ठ देवी रोहिणी अपने पति चन्द्रमा से इतनी दृढ़ता से जुड़ी हुई हैं कि उन्हें एक मुहूर्त के लिए भी चन्द्रमा से अलग नहीं देखा जाता। इसी प्रकार अनेक साध्वी और पतिव्रता स्त्रियाँ अपने धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करके अपने पुण्य के बल पर देवलोक में सम्मान प्राप्त करती हैं।
सीता के मुख से निकले ये शब्द सुनकर अनसूया का हृदय प्रसन्नता से भर उठा। उन्हें अनुभव हुआ कि वन के कठिन जीवन में रहते हुए भी सीता के भीतर धर्म के प्रति कितनी गहरी श्रद्धा और अपने कर्तव्य के प्रति कितना दृढ़ विश्वास है।
अनसूया ने स्नेह से सीता का मस्तक सूँघा और उन्हें आशीर्वाद दिया। फिर अत्यंत प्रसन्न होकर बोलीं, “सीते! तुमने उत्तम व्रत का पालन किया है। मैंने जीवनभर अनेक नियमों का पालन करते हुए महान तपस्या संचित की है। उस तपस्या से प्राप्त तपोबल के आधार पर मैं तुम्हें अपनी इच्छा के अनुसार कोई वर माँगने के लिए कहती हूँ। बताओ, तुम्हारी कौन-सी इच्छा मैं पूरी करूँ?”
यह सुनकर सीता कुछ क्षणों के लिए आश्चर्य में पड़ गईं। उनके सामने इतनी महान तपस्विनी स्वयं उन्हें वर देने की इच्छा प्रकट कर रही थीं। लेकिन सीता के मन में किसी वस्तु की लालसा नहीं थी।
अनसूया ने फिर स्नेहपूर्वक कहा, “मिथिलेशकुमारी! तुमने अभी जो बातें कहीं, वे अत्यंत उचित और धर्मपूर्ण हैं। तुम्हारे विचारों ने मुझे बहुत संतोष दिया है। इसलिए अब तुम मुझे बताओ कि मैं तुम्हारे लिए ऐसा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ जिससे तुम्हें प्रसन्नता मिले।”
सीता मंद-मंद मुस्कराईं। उनके चेहरे पर संकोच और विनम्रता दोनों दिखाई दे रहे थे। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “माताजी! आपने अपने स्नेहभरे वचनों से ही मेरा सबसे प्रिय कार्य कर दिया है। आपने मुझे जो प्रेम, आशीर्वाद और अपनापन दिया है, उसके बाद मुझे और किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है।”
सीता की इस निष्काम भावना को देखकर अनसूया का हृदय और भी प्रसन्न हो गया। उन्हें लगा कि सीता के भीतर वास्तव में किसी प्रकार का लोभ नहीं है। वे बोलीं, “सीते! तुम्हारी इस निर्लोभता ने मुझे बहुत प्रसन्न किया है। तुम्हारे मन में किसी वस्तु की इच्छा न होते हुए भी मैं तुम्हें अपनी ओर से कुछ देना चाहती हूँ।”
इसके बाद अनसूया ने अपने पास रखे दिव्य वस्त्र, सुंदर हार, आभूषण, सुगंधित अंगराग और बहुमूल्य अनुलेपन सीता के सामने रख दिए।
उन वस्तुओं की चमक से आश्रम का वातावरण जैसे और भी सुंदर हो उठा। लेकिन सीता के लिए उन वस्तुओं का मूल्य उनकी चमक या सुंदरता में नहीं था। वे उन्हें अनसूया के प्रेम और आशीर्वाद के प्रतीक के रूप में देख रही थीं।
अनसूया ने स्नेहपूर्वक कहा, “विदेहनन्दिनि! ये दिव्य वस्त्र, आभूषण, हार, अंगराग और अनुलेपन मैं तुम्हें प्रेमपूर्वक देती हूँ। इन्हें स्वीकार करो। ये तुम्हारे सौंदर्य और गरिमा के अनुरूप हैं और तुम्हारी शोभा बढ़ाएँगे।”
फिर उन्होंने विशेष रूप से उस दिव्य अंगराग की ओर संकेत करते हुए कहा, “जनककिशोरी! जब तुम इस दिव्य अंगराग को धारण करोगी, तब अपने पति श्रीराम की शोभा उसी प्रकार बढ़ाओगी जैसे देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु की शोभा बढ़ाती हैं।”
सीता ने अत्यंत श्रद्धा से उन उपहारों को स्वीकार किया। उनके लिए ये वस्तुएँ केवल श्रृंगार की सामग्री नहीं थीं; वे अनसूया माता के स्नेह, आशीर्वाद और वात्सल्य से भरी हुई थीं।
धीर और विनम्र स्वभाव वाली सीता ने उन दिव्य वस्त्रों, आभूषणों और हार को अत्यंत सम्मानपूर्वक ग्रहण किया। फिर दोनों हाथ जोड़कर वे अनसूया के समीप बैठ गईं। उनके मन में उस महान तपस्विनी के प्रति श्रद्धा और भी गहरी हो चुकी थी।
कुछ समय तक दोनों के बीच प्रेम और आत्मीयता का वातावरण बना रहा। वन की शांति के बीच अनसूया सीता को बड़े स्नेह से देख रही थीं। उन्हें लग रहा था कि उनके सामने केवल मिथिला की राजकुमारी ही नहीं, बल्कि धर्म और पतिव्रता की एक अद्भुत प्रतिमूर्ति बैठी है।
तभी अनसूया के मन में एक जिज्ञासा जागी। उन्होंने सोचा कि इस महान राघव ने सीता को किस प्रकार स्वयंवर में प्राप्त किया होगा। वे उस प्रसंग को विस्तार से सुनना चाहती थीं।
अनसूया ने प्रेमपूर्वक सीता से कहा, “सीते! मैंने यह बात सुनी है कि यशस्वी राघवेन्द्र श्रीराम ने तुम्हें स्वयंवर में प्राप्त किया था। तुम्हारे विवाह की यह कथा मेरे लिए अत्यंत रोचक और प्रिय होगी।”
फिर वे उत्सुकता से बोलीं, “मिथिलेशनन्दिनि! मैं उस पूरे प्रसंग को विस्तार से सुनना चाहती हूँ। स्वयंवर में क्या हुआ, किस प्रकार सब घटनाएँ घटीं और श्रीराम ने तुम्हें किस प्रकार प्राप्त किया—जो कुछ जिस प्रकार हुआ, वह सब मुझे बताओ।”
अनसूया की आज्ञा सुनकर सीता ने विनम्रतापूर्वक उनकी ओर देखा। उनके मन में अपने जीवन की पुरानी स्मृतियाँ धीरे-धीरे जागने लगीं। सामने बैठी अनसूया माता की आँखों में भी उस कथा को सुनने की उत्सुकता थी।
सीता ने हाथ जोड़कर कहा, “माताजी, सुनिए…”
और यहीं से सीता अपने जीवन की उस महत्वपूर्ण कथा को सुनाने के लिए तैयार हुईं—वह कथा, जिसमें उनके जीवन के अगले अध्याय का आरम्भ छिपा था। अब वे अनसूया को अपने जीवन की उन पुरानी घटनाओं के बारे में बताने वाली थीं, जिनसे उनका श्रीराम के साथ विवाह और उनके जीवन की आगे की यात्रा जुड़ी हुई थी।
प्रश्न-उत्तर
1. अनसूया के उपदेश की सीता ने किस प्रकार प्रशंसा की?
उत्तर: सीता ने अनसूया के उपदेश की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि वे संसार की श्रेष्ठ स्त्रियों में हैं और उनके वचन अत्यंत ज्ञानपूर्ण हैं।
2. सीता ने पति के संबंध में अपनी क्या भावना व्यक्त की?
उत्तर: सीता ने कहा कि पति गुणहीन, चरित्रहीन या निर्धन भी होते, तब भी वे बिना दुविधा उनकी सेवा और कर्तव्य का पालन करतीं।
3. सीता ने श्रीराम के किन गुणों का वर्णन किया?
उत्तर: सीता ने श्रीराम को परम दयालु, जितेन्द्रिय, दृढ़ अनुराग रखने वाला, धर्मात्मा और माता-पिता के समान प्रिय बताया।
4. श्रीराम अपनी माता कौसल्या और दशरथ की अन्य रानियों के साथ कैसा व्यवहार करते थे?
उत्तर: श्रीराम माता कौसल्या सहित दशरथ की सभी रानियों के साथ समान आदर और सम्मान का व्यवहार करते थे तथा उन्हें माताओं के समान मानते थे।
5. श्रीराम दशरथ की अन्य रानियों को माताओं के समान क्यों मानते थे?
उत्तर: श्रीराम पितृवत्सल और धर्मज्ञ थे। इसलिए वे महाराज दशरथ द्वारा प्रेमदृष्टि से देखी गई सभी स्त्रियों का माता के समान सम्मान करते थे।
6. वन जाते समय कौसल्या ने सीता को क्या दिया था?
उत्तर: वन जाते समय माता कौसल्या ने सीता को कर्तव्य और धर्म का उपदेश दिया था, जिसे सीता ने अपने हृदय में स्थिरता से सँजोया।
7. सीता को विवाह के समय मिली शिक्षा क्यों स्मरण थी?
उत्तर: विवाह के समय अग्नि के समीप माता ने सीता को जो शिक्षा दी थी, वह उनके हृदय में गहराई से अंकित थी और वे उसे भूली नहीं थीं।
8. सीता ने स्त्री के लिए सबसे बड़ा तप किसे माना?
उत्तर: सीता ने कहा कि स्त्री के लिए पति की सेवा ही प्रमुख तप है और इसके अतिरिक्त किसी दूसरे तप का विधान नहीं माना गया है।
9. सीता ने पातिव्रत्य-धर्म समझाने के लिए किन स्त्रियों का उदाहरण दिया?
उत्तर: सीता ने पातिव्रत्य-धर्म की महिमा बताने के लिए सत्यवान की पत्नी सावित्री, अनसूया और स्वर्ग की देवी रोहिणी का उदाहरण दिया।
10. सावित्री को स्वर्गलोक में सम्मान क्यों प्राप्त हुआ?
उत्तर: सावित्री ने अपने पति सत्यवान की सेवा और निष्ठापूर्वक पातिव्रत्य-धर्म का पालन किया, जिसके प्रभाव से वे स्वर्गलोक में पूजित हुईं।
11. रोहिणी के संबंध में सीता ने क्या कहा?
उत्तर: सीता ने कहा कि रोहिणी पतिसेवा के प्रभाव से चन्द्रमा से इतनी जुड़ी हैं कि उन्हें एक मुहूर्त के लिए भी अलग नहीं देखा जाता।
12. सीता के वचन सुनकर अनसूया को कैसा अनुभव हुआ?
उत्तर: सीता के धर्मपूर्ण और पातिव्रत्य से जुड़े वचन सुनकर अनसूया अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने स्नेहपूर्वक सीता का मस्तक सूँघकर उनका हर्ष बढ़ाया।
13. अनसूया ने सीता को वर माँगने के लिए क्यों कहा?
उत्तर: अनसूया ने अपनी दीर्घ तपस्या से प्राप्त तपोबल के आधार पर प्रसन्न होकर सीता से अपनी इच्छा के अनुसार कोई वर माँगने को कहा।
14. सीता ने अनसूया द्वारा वर माँगने की बात सुनकर क्या उत्तर दिया?
उत्तर: सीता ने विनम्रतापूर्वक कहा कि अनसूया ने अपने प्रेमपूर्ण वचनों से ही उनका सारा प्रिय कार्य कर दिया है, इसलिए उन्हें और कुछ नहीं चाहिए।
15. सीता की निर्लोभता देखकर अनसूया ने क्या निर्णय लिया?
उत्तर: सीता की निर्लोभता से प्रसन्न होकर अनसूया ने उनके लिए अपने तपोबल और स्नेह के अनुरूप दिव्य वस्त्राभूषण देने का निश्चय किया।
16. अनसूया ने सीता को कौन-कौन सी वस्तुएँ उपहार में दीं?
उत्तर: अनसूया ने सीता को सुंदर दिव्य हार, वस्त्र, आभूषण, अंगराग और बहुमूल्य अनुलेपन प्रेमपूर्वक उपहार में दिए।
17. अनसूया ने दिव्य अंगराग की तुलना किससे की?
उत्तर: अनसूया ने कहा कि दिव्य अंगराग धारण करके सीता अपने पति श्रीराम की शोभा उसी प्रकार बढ़ाएँगी जैसे लक्ष्मी भगवान विष्णु की।
18. सीता ने अनसूया के दिए उपहारों को किस भाव से स्वीकार किया?
उत्तर: सीता ने अनसूया के वस्त्र, आभूषण, हार और अंगराग को उनकी प्रसन्नता का उत्तम उपहार मानकर श्रद्धा, विनम्रता और प्रेम से स्वीकार किया।
19. उपहार स्वीकार करने के बाद सीता ने क्या किया?
उत्तर: उपहार स्वीकार करने के बाद सीता ने दोनों हाथ जोड़कर तपोधना अनसूया की सेवा में उनके निकट बैठकर अपना सम्मान और श्रद्धा प्रकट की।
20. अनसूया ने सीता से स्वयंवर की कथा सुनाने के लिए क्यों कहा?
उत्तर: अनसूया ने सुना था कि श्रीराम ने सीता को स्वयंवर में प्राप्त किया था, इसलिए वे उस घटना का पूरा वृत्तांत विस्तारपूर्वक सुनना चाहती थीं।
21. अनसूया ने सीता से स्वयंवर के बारे में क्या जानना चाहा?
उत्तर: अनसूया स्वयंवर में घटित सभी घटनाओं को विस्तार से जानना चाहती थीं और उन्होंने सीता से सब कुछ उसी क्रम में बताने का आग्रह किया।
22. अनसूया की आज्ञा मिलने पर सीता ने क्या किया?
उत्तर: अनसूया की आज्ञा मिलने पर सीता ने विनम्रतापूर्वक उन्हें संबोधित किया और “माताजी, सुनिए” कहकर अपने जीवन की कथा सुनाना आरम्भ किया।