Best Historical and Knowledgeable Content here... Know More.

  • +91 8005792734

    Contact Us

  • amita2903.aa@gmail.com

    Support Email

  • Jhunjhunu, Rajasthan

    Address

अभिषेक की पूर्वरात्रि — प्रेम, कर्तव्य और अनजाने संकेतों की गाथा

अभिषेक की पूर्वरात्रि — प्रेम, कर्तव्य और अनजाने संकेतों की गाथा

 

अयोध्या की राजसभा उस दिन अपने गौरव के चरम पर थी। जब सभी सभासद, ऋषि और नगरवासी विदा होकर चले गए, तब महाराज दशरथ गंभीर विचारों में डूब गए। वे केवल एक राजा नहीं थे, बल्कि समय, परिस्थिति और धर्म के सूक्ष्म नियमों को समझने वाले अनुभवी शासक थे। उन्होंने अपने मंत्रियों के साथ गहन मंत्रणा की और अंततः एक निर्णय पर पहुँचे—एक ऐसा निर्णय जो अयोध्या के भविष्य को सदा के लिए बदलने वाला था। उन्होंने कहा, “कल पुष्य नक्षत्र है—सर्वश्रेष्ठ, शुभ और मंगलकारी। इसी पवित्र क्षण में मैं अपने प्रिय पुत्र राम का युवराज के रूप में अभिषेक करूँगा।”

 

इस निर्णय के साथ ही उनके हृदय में उत्साह के साथ-साथ एक अनजाना कंपन भी था।

 

महाराज तुरंत अपने अन्तःपुर में गए और अपने विश्वासी सारथि सुमंत्र को बुलाकर आदेश दिया, “जाओ, राम को फिर से यहाँ बुला लाओ।” सुमंत्र ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार की और शीघ्र ही राम के महल की ओर चल पड़े।

 

जब सुमंत्र पुनः राम के द्वार पर पहुँचे, तो द्वारपालों ने जाकर यह सूचना दी। अचानक इस पुनः आगमन की खबर सुनकर राम के मन में हल्का-सा संदेह जागा—क्या बात हो सकती है जो पिताश्री ने उन्हें फिर बुलाया है? उन्होंने सुमंत्र को भीतर बुलाकर उत्सुकता से पूछा, “आपको फिर से आने की क्या आवश्यकता पड़ी? कृपया स्पष्ट कहिए।”

 

सुमंत्र ने विनम्रता से उत्तर दिया, “महाराज आपसे मिलना चाहते हैं। अब वहाँ जाना या न जाना, यह निर्णय आप स्वयं करें।” यह सुनते ही राम बिना एक क्षण भी विलम्ब किए पिता के दर्शन हेतु चल पड़े।

 

जब राम महल में पहुँचे, तो महाराज दशरथ ने उन्हें प्रेमपूर्वक भीतर बुलाया। राम ने दूर से ही हाथ जोड़कर अपने पिता को प्रणाम किया और उनके चरणों में झुक गए। उस दृश्य में केवल एक पुत्र का आदर नहीं, बल्कि श्रद्धा, विनम्रता और गहरे प्रेम का संगम था। दशरथ ने उन्हें उठाकर अपने हृदय से लगा लिया—मानो वर्षों की सारी ममता उस एक आलिंगन में समाहित हो गई हो।

 

राम को आसन पर बैठाकर दशरथ ने गहरी साँस ली और बोले, “राम, अब मैं वृद्ध हो चुका हूँ। जीवन के सभी सुख भोग चुका हूँ। मैंने यज्ञ किए, दान दिए, और अपने सभी कर्तव्यों का पालन किया। देवताओं, ऋषियों, पितरों—सबके प्रति अपने ऋण से मुक्त हो चुका हूँ।”

 

उनकी आँखों में संतोष था, पर भीतर कहीं एक बेचैनी भी छिपी थी।

 

“तुम मेरे लिए अनमोल हो, मेरे जीवन की सबसे बड़ी प्राप्ति। अब मेरे लिए एक ही कार्य शेष है—तुम्हें युवराज बनाना। मेरी आज्ञा का पालन करना, यही अब तुम्हारा धर्म है।”

 

राम शान्त भाव से सुनते रहे। उनके चेहरे पर न कोई उत्साह का अतिरेक था, न कोई संकोच—सिर्फ कर्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पण।

 

दशरथ आगे बोले, “प्रजा भी तुम्हें अपना राजा बनाना चाहती है। परंतु, राम… इन दिनों मुझे अजीब और भयावह स्वप्न दिखाई दे रहे हैं। आकाश में भयंकर उल्काएँ गिरती हैं, वज्रपात होता है। ज्योतिषी कहते हैं कि मेरे नक्षत्र पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव है। ऐसे संकेत किसी बड़ी विपत्ति का सूचक होते हैं…”

 

उनकी आवाज़ धीमी हो गई, जैसे मृत्यु की आहट को शब्द देने में संकोच हो रहा हो।

 

“इसलिए, जब तक मेरा मन स्थिर है, तुम शीघ्र ही अपना अभिषेक करा लो। मनुष्य का चित्त चंचल होता है—कब क्या बदल जाए, कहा नहीं जा सकता।”

 

उन्होंने आगे समझाया कि अगला दिन अत्यंत शुभ है और उसी दिन अभिषेक होना चाहिए। फिर उन्होंने राम को निर्देश दिया कि वे आज की रात संयमपूर्वक व्रत रखें, सीता के साथ उपवास करें और कुश की शय्या पर विश्राम करें।

 

“और सावधान रहना,” दशरथ ने कहा, “ऐसे शुभ कार्यों में विघ्न भी आते हैं।”

 

फिर उन्होंने एक और बात कही—“जब तक भरत यहाँ नहीं हैं, तब तक यह कार्य पूरा हो जाना चाहिए। यद्यपि भरत धर्मात्मा और तुम्हारे प्रति समर्पित हैं, फिर भी मनुष्य का मन कभी-कभी बदल भी सकता है।”

 

राम ने यह सब अत्यंत विनम्रता से सुना, पिता को प्रणाम किया और अपने महल लौट आए।

 

महल में पहुँचकर उन्होंने सबसे पहले अपनी पत्नी सीता को यह शुभ समाचार देने का विचार किया, परंतु उन्हें वहाँ न पाकर वे सीधे माता कौसल्या के महल की ओर चले गए।

 

वहाँ का दृश्य अत्यंत पवित्र और भावपूर्ण था। कौसल्या रेशमी वस्त्र धारण किए, आँखें बंद किए, देवमंदिर में बैठी थीं। वे पूर्ण मौन में भगवान की आराधना कर रही थीं—अपने पुत्र के उज्ज्वल भविष्य के लिए, उसके राज्याभिषेक की कामना के लिए।

 

उनके पास लक्ष्मण, सुमित्रा और सीता उपस्थित थे। सभी श्रद्धा और प्रेम से उस पवित्र क्षण के साक्षी बने खड़े थे।

 

राम ने धीरे से आगे बढ़कर माता के चरणों में प्रणाम किया और कोमल स्वर में कहा, “माँ, पिताजी ने मुझे प्रजापालन का कार्य सौंपा है। कल मेरा अभिषेक होगा। आज मुझे और सीता को व्रत रखना है। कृपया सभी आवश्यक मंगलबंधन कराइए।”

 

यह सुनते ही कौसल्या की आँखों से आनंद के आँसू बह निकले। उनका कंठ भर आया। उन्होंने राम को आशीर्वाद देते हुए कहा, “बेटा, तुम चिरंजीवी होओ। तुम्हारे मार्ग के सभी विघ्न नष्ट हो जाएँ। तुम्हें राजलक्ष्मी प्राप्त हो और तुम सबको आनंदित करो।”

 

उन्होंने भावुक होकर कहा, “आज मेरे सारे व्रत, उपवास और प्रार्थनाएँ सफल हो गईं। भगवान विष्णु की कृपा से यह दिन आया है।”

 

राम ने विनम्रता से यह सब स्वीकार किया। फिर मुस्कराकर लक्ष्मण की ओर देखा और बोले, “लक्ष्मण, तुम मेरे साथ इस राज्य का संचालन करोगे। तुम मेरे दूसरे आत्मा के समान हो। यह राज्य तुम्हारा भी है।”

 

लक्ष्मण के लिए यह शब्द केवल सम्मान नहीं, बल्कि जीवन का सर्वोच्च पुरस्कार थे।

 

अंत में राम ने दोनों माताओं को प्रणाम किया, सीता को साथ चलने का संकेत दिया, और वे अपने महल की ओर लौट गए—एक ऐसे भविष्य की ओर, जो बाहर से उज्ज्वल दिखता था, पर भीतर कई अनजानी परीक्षाओं को समेटे हुए था।

 

उस रात अयोध्या सोई नहीं थी…

एक ओर उत्सव की तैयारी थी, तो दूसरी ओर भाग्य अपने गूढ़ रहस्य बुन रहा था।

 

 

अपनी समझ परखें

उपर्युक्त कथा के आधार पर निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों में सही उत्तर चुनिए—

 

प्रश्न 1. महाराज दशरथ ने राजसभा के बाद सबसे पहले किससे मंत्रणा की?
A. ऋषियों से
B. प्रजाजनों से
C. मंत्रियों से
D. रानियों से

प्रश्न 2. सुमंत्र के पुनः आगमन पर राम के मन में क्या भाव उत्पन्न हुआ?
A. क्रोध
B. संदेह
C. प्रसन्नता
D. उत्साह

प्रश्न 3. दशरथ ने अपने जीवन के बारे में क्या कहा?
A. अभी बहुत कुछ करना शेष है
B. उन्होंने सब सुख भोग लिए हैं
C. वे राज्य त्यागना चाहते हैं
D. वे वन जाना चाहते हैं

प्रश्न 4. दशरथ के अनुसार उनका कौन-सा कर्तव्य शेष था?
A. यज्ञ करना
B. युद्ध करना
C. राम को युवराज बनाना
D. तीर्थ यात्रा करना

प्रश्न 5. दशरथ को किस प्रकार के स्वप्न दिखाई दे रहे थे?
A. शुभ और आनंददायक
B. साधारण
C. प्रेरणादायक
D. भयावह और अशुभ

प्रश्न 6. ज्योतिषियों ने किस बात की ओर संकेत किया?
A. शत्रुओं की हार
B. वर्षा का आगमन
C. अशुभ ग्रहों का प्रभाव
D. राज्य विस्तार

प्रश्न 7. दशरथ ने शुभ कार्यों के बारे में क्या चेतावनी दी?
A. वे शीघ्र पूरे होते हैं
B. वे कठिन नहीं होते
C. उनमें विघ्न आ सकते हैं
D. वे गुप्त रखने चाहिए

प्रश्न 8. दशरथ ने भरत के विषय में क्या कहा?
A. वे अधर्मी हैं
B. वे राज्य के इच्छुक हैं
C. वे क्रोधी हैं
D. वे धर्मात्मा हैं, पर मन चंचल हो सकता है

प्रश्न 9. महल लौटकर राम सबसे पहले किसे ढूँढने गए?
A. कौसल्या
B. लक्ष्मण
C. सीता
D. सुमित्रा

प्रश्न 10. कौसल्या किसके लिए प्रार्थना कर रही थीं?
A. वर्षा के लिए
B. अपने पुत्र के अभिषेक की सफलता
C. युद्ध विजय के लिए
D. धन-संपत्ति के लिए