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अभिषेक की प्रतीक्षा और एक अनकहा तूफ़ान
अयोध्या नगरी उस दिन असाधारण उल्लास से भरी हुई थी। रात बीत चुकी थी, और प्रातःकाल की स्वर्णिम आभा धीरे-धीरे राजमहल के प्रांगण को प्रकाशित कर रही थी। वेदों के ज्ञाता, यज्ञ-विधान में पारंगत ब्राह्मण और राजपुरोहित अपनी रात्रि की साधना पूर्ण कर, राजा की आज्ञा के अनुसार राजद्वार पर आकर खड़े हो चुके थे। उनके चेहरों पर गंभीरता के साथ एक दिव्य प्रसन्नता झलक रही थी—आज कोई साधारण दिन नहीं था।
उधर, राज्य के मंत्री, सेना के प्रमुख अधिकारी, और अयोध्या के प्रतिष्ठित सेठ-साहूकार भी हर्ष और गर्व से भरे हुए वहाँ एकत्र हो रहे थे। उनके मन में केवल एक ही विचार था—आज श्रीराम का राज्याभिषेक होगा। यह केवल एक राजकीय आयोजन नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और आदर्श का उत्सव था।
जैसे ही सूर्य की प्रथम किरणें आकाश में फैलीं और शुभ पुष्य नक्षत्र का योग आया, समस्त वातावरण पवित्रता से भर उठा। उसी क्षण श्रीराम के जन्म का कर्क लग्न भी उपस्थित हुआ—मानो स्वयं प्रकृति भी इस महत्त्वपूर्ण अवसर के लिए तैयार हो। श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने अत्यंत सावधानी और श्रद्धा से अभिषेक की समस्त सामग्री एकत्र की और उसे यथास्थान सजा दिया।
सोने के कलश, जिनमें पवित्र जल भरा था, सूर्य की किरणों में चमक रहे थे। भद्रपीठ को सुंदरता से सजाया गया था, जिस पर बैठकर श्रीराम अभिषेक ग्रहण करने वाले थे। व्याघ्रचर्म से ढके रथ और गंगायमुना के संगम से लाया गया पवित्र जल—हर वस्तु इस समारोह की गरिमा को बढ़ा रही थी।
केवल यही नहीं, देश-विदेश की अनेक पवित्र नदियों, सरोवरों और समुद्रों का जल भी वहाँ एकत्र किया गया था। दूध, दही, घी, मधु, लावा, कुश, पुष्प—हर एक वस्तु धार्मिक विधि के अनुसार सजाई गई थी। आठ सुंदर कन्याएँ, जो मंगल का प्रतीक थीं, वहाँ उपस्थित थीं। मदमस्त गजराज और हरे-भरे वृक्षों की पत्तियों से ढके स्वर्ण-रजत कलश उस स्थान को स्वर्ग जैसा बना रहे थे।
श्वेत चँवर, जो चन्द्रमा की किरणों जैसा उज्ज्वल था, और चमकीला छत्र, जो सूर्य की आभा फैला रहा था, श्रीराम की राजसी महिमा का प्रतीक बनकर सुसज्जित थे। श्वेत वृषभ और अश्व भी वहाँ खड़े थे, मानो इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनने को तत्पर हों।
चारों ओर वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनि गूँज रही थी। वंदीजन और मागध लोग स्तुति-गान कर रहे थे। ऐसा प्रतीत होता था मानो सम्पूर्ण अयोध्या एक ही भाव में डूबी हुई है—आनंद, गर्व और श्रद्धा का भाव।
किन्तु धीरे-धीरे एक विचित्र स्थिति उत्पन्न होने लगी। समय बीत रहा था, सूर्य ऊपर चढ़ चुका था, परन्तु महाराज दशरथ अभी तक राजद्वार पर नहीं आए थे। उपस्थित जनों में हल्की चिंता की लहर दौड़ गई। वे आपस में चर्चा करने लगे—“महाराज कहाँ हैं? कौन जाकर उन्हें हमारे आगमन की सूचना देगा?”
तभी सुमन्त्र, जो राजा के विश्वसनीय सारथि और मंत्री थे, आगे बढ़े। उनके चेहरे पर शांति और आत्मविश्वास था। उन्होंने सभी को आश्वस्त करते हुए कहा कि वे स्वयं महाराज की आज्ञा से श्रीराम को बुलाने जा रहे हैं। साथ ही उन्होंने वहाँ उपस्थित सभी जनों का कुशल-क्षेम भी पूछा—यह उनके विनम्र स्वभाव का परिचायक था।
इतना कहकर सुमन्त्र राजमहल के भीतर प्रवेश कर गए। यह स्थान उनके लिए सदा खुला रहता था। उन्होंने भीतर जाकर रघुकुल की महिमा का गुणगान किया और धीरे-धीरे राजा के शयनकक्ष के समीप पहुँच गए। वहाँ खड़े होकर उन्होंने अत्यंत मधुर और सम्मानपूर्ण शब्दों में राजा की स्तुति करनी शुरू की।
उन्होंने देवताओं से राजा की विजय की कामना की—सूर्य, चन्द्रमा, शिव, इन्द्र—सभी से। फिर उन्होंने कोमल स्वर में कहा कि रात्रि समाप्त हो चुकी है, नया दिन आ गया है, और अब समय है कि राजा अपने कर्तव्यों का पालन करें। उन्होंने यह भी बताया कि सभी ब्राह्मण, मंत्री और नगरवासी बाहर प्रतीक्षा कर रहे हैं।
सुमन्त्र की वाणी में श्रद्धा और कर्तव्य दोनों का अद्भुत संगम था। उनकी बातों को सुनकर राजा दशरथ जाग उठे। लेकिन उनके मन में एक व्याकुलता थी, जो उनके शब्दों में स्पष्ट झलक रही थी। उन्होंने तुरंत सुमन्त्र से पूछा—“मैंने तुम्हें श्रीराम को बुलाने के लिए कहा था, फिर तुमने अब तक ऐसा क्यों नहीं किया? क्या कारण है कि मेरी आज्ञा का पालन नहीं हुआ?”
उनकी आवाज़ में एक अधीरता थी, जैसे कोई भीतर ही भीतर किसी चिंता से ग्रस्त हो। उन्होंने पुनः आदेश दिया कि श्रीराम को तुरंत बुलाया जाए।
सुमन्त्र ने सिर झुकाकर राजा की आज्ञा को स्वीकार किया। उनके मन में यह कार्य अत्यंत प्रिय था—वे जानते थे कि यह केवल एक आदेश नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक क्षण की शुरुआत है।
वे राजमहल से बाहर निकले और ध्वजा-पताकाओं से सजे हुए राजमार्ग पर आगे बढ़ने लगे। उनके हृदय में आनंद की लहरें उठ रही थीं। रास्ते में उन्हें हर ओर से एक ही चर्चा सुनाई दे रही थी—“आज श्रीराम का राज्याभिषेक होगा!” लोगों के चेहरे खुशी से दमक रहे थे, और पूरा वातावरण उत्सवमय था।
लेकिन इस उत्सव के पीछे एक अनजाना रहस्य, एक मौन तूफ़ान भी आकार ले रहा था—जिससे अभी कोई अनभिज्ञ था…
जब सुमन्त्र राजमार्ग पर आगे बढ़ते हुए उस दिशा में पहुँचे जहाँ श्रीराम का महल स्थित था, तब उनकी दृष्टि एक ऐसे दृश्य पर पड़ी जिसने उनके हृदय को विस्मय और आनंद से भर दिया। सामने श्रीराम का भवन खड़ा था—श्वेत प्रकाश से नहाया हुआ, मानो हिमाच्छादित कैलास पर्वत स्वयं पृथ्वी पर उतर आया हो। उसकी आभा इतनी दिव्य थी कि उसे देखकर ऐसा लगता था जैसे इन्द्र का स्वर्गिक महल भी उसके सामने फीका पड़ जाए।
महल का विशाल द्वार भव्य किवाड़ों से बंद था, पर भीतर जाने के लिए एक छोटा सा द्वार खुला हुआ था—मानो उस दिव्यता में प्रवेश का मार्ग केवल विनम्रता से ही संभव हो। चारों ओर सैकड़ों वेदिकाएँ बनी हुई थीं, जो उस भवन की गरिमा को और भी बढ़ा रही थीं। यह कोई साधारण राजमहल नहीं था, यह धर्म, मर्यादा और आदर्श का प्रतीक था।
महल का अग्रभाग सोने की अद्भुत प्रतिमाओं से सुसज्जित था। द्वारों पर जड़े हुए मणि और मूंगे सूर्य की किरणों में चमक रहे थे, जैसे असंख्य तारे पृथ्वी पर उतर आए हों। पूरा भवन शरद ऋतु के निर्मल बादलों की भाँति उज्ज्वल और शांत था, और उसकी शोभा मेरु पर्वत की गुफाओं जैसी गूढ़ और भव्य लग रही थी।
सुगंधित चन्दन और अगर की महक वातावरण में घुली हुई थी, जो मन को शांति और प्रसन्नता से भर देती थी। महल की दीवारों में जड़ी हुई मोतियों और रत्नों की चमक चारों ओर एक अलौकिक प्रकाश फैला रही थी। ऐसा प्रतीत होता था जैसे स्वयं समृद्धि और सौंदर्य ने यहाँ अपना निवास बना लिया हो।
उस महल के चारों ओर पक्षियों का मधुर कलरव गूँज रहा था—सारस, मयूर और अन्य सुंदर पक्षी मानो इस उत्सव में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे। उनकी चहचहाहट वातावरण में जीवंतता भर रही थी, और हर एक ध्वनि जैसे यह कह रही थी—“आज का दिन अत्यंत शुभ है।”
दीवारों पर उकेरी गई नक्काशी और सोने से बनी अद्भुत मूर्तियाँ उस भवन की कलात्मकता को दर्शा रही थीं। हर एक आकृति इतनी सजीव थी कि मानो अभी बोल उठेगी। वह महल केवल देखने योग्य नहीं था, बल्कि अनुभव करने योग्य था—एक ऐसा अनुभव जो मन और आत्मा दोनों को छू ले।
सुमन्त्र उस दिव्यता को निहारते हुए आगे बढ़े। उनके हृदय में एक अनोखी भावनाओं की लहर उठ रही थी—गर्व, प्रेम और श्रद्धा की। उन्होंने देखा कि असंख्य लोग हाथ जोड़े वहाँ खड़े हैं, श्रीराम के दर्शन के लिए आतुर। उनके चेहरों पर भक्ति और उत्साह स्पष्ट झलक रहा था।
जनपदों से आए हुए लोग विविध प्रकार के उपहार लेकर उपस्थित थे। कोई पुष्प लाया था, कोई स्वर्णाभूषण, तो कोई अपने हृदय की श्रद्धा। उनके मुख पर प्रसन्नता थी, आँखों में चमक थी, और मन में केवल एक ही आकांक्षा—श्रीराम के राज्याभिषेक का साक्षी बनना।
महल की ऊँचाई और भव्यता ऐसी थी जैसे कोई विशाल मेघखंड आकाश में तैर रहा हो। उसकी दीवारों में जड़े रत्न सूर्य के प्रकाश में चमकते हुए मानो इंद्रधनुष रच रहे थे। सेवकों की चहल-पहल, रथों की आवाजाही, और लोगों की भीड़—सब मिलकर उस स्थान को जीवंत बना रहे थे।
सुमन्त्र अपने रथ में सवार होकर उस भीड़ के बीच से आगे बढ़ते हुए महल के समीप पहुँचे। उनके रथ के घोड़े सजे हुए थे, और उनका आगमन स्वयं एक आकर्षण का केंद्र बन गया था। नगरवासी उन्हें देखते ही आनंदित हो उठते—मानो वे जानते हों कि अब वह क्षण निकट है जब श्रीराम को बुलाया जाएगा।
जैसे ही सुमन्त्र महल के और निकट पहुँचे, उनके शरीर में रोमांच छा गया। उनके रोंगटे खड़े हो गए—इतना हर्ष, इतना गर्व, और इतनी श्रद्धा एक साथ उनके भीतर उमड़ रही थी। यह केवल एक कर्तव्य नहीं था, यह उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण था।
महल के द्वारों को पार करते हुए, वे अनेक सुंदर ड्योढ़ियों से होकर गुजरे। हर एक स्थान पर श्रीराम के सेवक और अनुयायी उपस्थित थे—सभी के चेहरे पर उत्साह और समर्पण की झलक थी। वे सब अपने-अपने कार्यों में लगे हुए थे, पर उनके मन में एक ही धुन थी—“आज श्रीराम का अभिषेक होगा।”
अंदर पहुँचकर सुमन्त्र ने लोगों की बातें सुनीं—हर कोई श्रीराम के लिए मंगलकामनाएँ कर रहा था। कोई उनके गुणों की चर्चा कर रहा था, तो कोई उनके भविष्य के राज्य की कल्पना कर रहा था। वह वातावरण इतना सकारात्मक और पवित्र था कि सुमन्त्र का मन भावविभोर हो उठा।
महल के द्वार पर उन्होंने एक अद्भुत दृश्य देखा—लाखों लोग, अपनी सवारियों से उतरकर, हाथों में उपहार लिए खड़े थे। इतनी भीड़ थी कि वहाँ खड़े होने की जगह भी मुश्किल से मिल रही थी, पर किसी के चेहरे पर थकान नहीं थी—केवल उत्साह और प्रेम था।
तभी उनकी दृष्टि एक विशाल गजराज पर पड़ी—शत्रुञ्जय। वह हाथी अत्यंत बलशाली और प्रभावशाली था, उसके मस्तक से मद की धारा बह रही थी। वह किसी पर्वत के समान स्थिर और भव्य लग रहा था। उसका नाम ही नहीं, उसका स्वरूप भी शत्रुओं को पराजित करने वाला था।
सुमन्त्र ने वहाँ राजदरबार के प्रमुख मंत्रियों को भी देखा—सभी सुन्दर वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित, अपने-अपने रथों और हाथियों के साथ उपस्थित थे। वे सभी इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनने को तैयार थे।
उन सबको पार करते हुए सुमन्त्र अंततः श्रीराम के अंतःपुर में प्रवेश कर गए। उनका प्रवेश ऐसा था जैसे कोई निर्भय मगरमच्छ रत्नों से भरे समुद्र में प्रवेश करता है—बिना किसी रोक-टोक, पूरी निश्चिंतता और अधिकार के साथ।
वह महल, जो विमान के समान ऊँचा और भव्य था, रत्नों से भरा हुआ था और उसकी शोभा अवर्णनीय थी। सुमन्त्र उस दिव्यता के बीच खड़े थे—एक ऐसे क्षण के साक्षी, जो इतिहास में अमर होने वाला था।
पर इस दिव्य उत्सव के बीच, कहीं न कहीं एक अदृश्य परिवर्तन की आहट भी थी…