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(33)
अयोध्या का विलाप — वनपथ पर बढ़ते श्रीराम, सीता और लक्ष्मण
अयोध्या उस दिन वैसी नहीं थी जैसी सदैव रहती थी।
राजमार्गों पर न उत्सव था, न वाद्योंकी ध्वनि, न राजतिलककी प्रसन्नता।
पूरा नगर मानो किसी अदृश्य दुःखके भारसे दब गया था।
सुबहका प्रकाश महलोंपर अवश्य पड़ रहा था, पर लोगोंके हृदयोंमें अन्धकार छा गया था।
राजमहलके भीतर एक महान् निर्णय हो चुका था—धर्मकी रक्षा हेतु श्रीराम वनको जानेवाले थे।
विदेहनन्दिनी सीता अपने प्रभुके साथ थीं और लक्ष्मण अपने बड़े भाईकी सेवा हेतु संकल्पित होकर साथ खड़े थे।
तीनोंने वनगमनसे पहले ब्राह्मणोंको अत्यन्त विनय और श्रद्धासे धन, वस्त्र, गौएँ और अनेक उपहार दान किये।
दान देते समय श्रीरामके मुखपर वैसी ही शान्ति थी जैसी किसी तपस्वीके मुखपर होती है।
न उनके नेत्रोंमें क्रोध था, न किसीके प्रति शिकायत।
ऐसा लगता था मानो वे राज्य नहीं, अपने भीतरका समस्त मोह त्याग रहे हों।
सीताजीने भी अपने कोमल हाथोंसे पूजित चन्दन, पुष्प और मंगलद्रव्योंसे धनुष-बाणोंको अलंकृत किया।
वे अस्त्र अब युद्धके उपकरण नहीं, धर्मयात्राके साथी प्रतीत हो रहे थे।
दो सेवक उन दिव्य आयुधोंको लिये पीछे चल रहे थे।
उन धनुषोंपर फूलोंकी मालाएँ थीं, जिनसे ऐसा लग रहा था मानो स्वयं अयोध्या उन्हें विदा देनेके लिये सजाकर भेज रही हो।
जब श्रीराम, सीता और लक्ष्मण राजभवनसे बाहर निकले, तब नगरमें यह समाचार वज्रपातकी तरह फैल गया।
लोग अपने-अपने घरोंसे दौड़ पड़े।
राजमार्ग देखते-ही-देखते जनसमूहसे भर गये।
किसीको विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिन श्रीरामका राज्याभिषेक होनेवाला था, वे आज वनको जा रहे हैं।
महलोंकी ऊँची छतोंपर स्त्रियाँ खड़ी थीं।
किसीकी आँखोंमें आँसू थे, कोई अपने बाल बिखेरकर विलाप कर रही थी, कोई स्तब्ध होकर दूरसे देख रही थी।
अयोध्याके धनवान् लोग, जो कभी राजदरबारकी शोभा हुआ करते थे, आज असहाय दर्शक बन गये थे।
वे ऊँचे प्रासादोंपर चढ़कर उस दृश्यको देख रहे थे और भीतर-ही-भीतर टूट रहे थे।
सड़कें इतनी भर गयी थीं कि चलना कठिन हो गया।
लोग केवल एक बार श्रीरामको देखनेके लिये व्याकुल थे।
कुछ लोग बच्चोंको कन्धोंपर उठाकर दिखा रहे थे—
“देखो, यही हैं हमारे राम… धर्मके लिये सब कुछ छोड़ देनेवाले राम…”
जब लोगोंकी दृष्टि श्रीरामपर पड़ी, तब उनका दुःख और बढ़ गया।
आज न उनके आगे हाथियोंकी पंक्तियाँ थीं, न रथ, न सेना, न ध्वज।
वे पैदल चल रहे थे—साधारण मनुष्यकी भाँति।
पीछे लक्ष्मण थे और उनके साथ सीता।
लोग आपसमें करुण स्वरमें कहने लगे—
“हाय! यही वे राम हैं जिनके पीछे कभी विशाल सेना चला करती थी।
आज वे अकेले जा रहे हैं।
राज्यका स्वामी आज वनका पथिक बन गया!”
एक वृद्ध ब्राह्मण रोते हुए बोला—
“यह कैसा समय आ गया?
जो स्वयं सुखोंके भण्डार थे, जिन्होंने कभी किसीको दुःख नहीं दिया, वे आज केवल पितृवचनकी रक्षा हेतु सब त्याग रहे हैं।
यदि वे चाहें तो एक क्षणमें यह निर्णय बदल सकता है; पर धर्मकी मर्यादा इनके लिये राज्यसे भी बढ़कर है।”
तभी किसी स्त्रीकी दृष्टि सीताजीपर पड़ी।
वह काँपते स्वरमें बोली—
“अरे! यह तो जनकनन्दिनी सीता हैं।
जिन्हें देवता भी सीधे नहीं देख पाते थे, वे आज धूलभरी सड़कोंपर चल रही हैं!”
सीता उस समय अत्यन्त शान्त थीं।
उनके चरण धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे, पर हर कदम अयोध्याके हृदयपर चोट कर रहा था।
वे राजमहलकी सुख-सुविधाओंमें पली थीं।
उनके अंगोंपर चन्दन, सुगन्धित लेप और दिव्य वस्त्र सुशोभित रहते थे।
पर आज लोगोंको यही चिन्ता खाये जा रही थी कि वनकी वर्षा, धूप और शीत इन कोमल अंगोंको कैसे सहन होगी।
कुछ लोग क्रोधसे भर उठे।
वे कहने लगे—
“निश्चय ही महाराज दशरथ किसी मोह या पिशाचके वशमें हो गये हैं।
अन्यथा कौन पिता ऐसे पुत्रको वन भेज सकता है?”
दूसरा व्यक्ति बोला—
“यदि पुत्र गुणहीन हो तब भी माता-पिता उसे घरसे निकालनेका साहस नहीं करते।
और यहाँ तो राम जैसे पुत्रको वनवास दिया जा रहा है, जिनके चरित्रसे सम्पूर्ण संसार मोहित है!”
फिर लोग श्रीरामके गुणोंका स्मरण करने लगे।
कोई कहता—
“राममें क्रूरता नहीं है।”
दूसरा कहता—
“वे दयाके सागर हैं।”
तीसरा बोला—
“उनसे अधिक शीलवान् कौन है?”
चौथा कह उठा—
“उनका मन और इन्द्रियाँ सदैव संयमित रहती हैं।”
उनका दुःख अब केवल व्यक्तिगत नहीं रहा था।
उन्हें लग रहा था मानो सम्पूर्ण अयोध्या उजड़ रही हो।
वे कहने लगे—
“जैसे गर्मीमें जलाशय सूख जाये तो उसके भीतरके जीव तड़प उठते हैं, वैसे ही रामके राज्याभिषेकमें विघ्न पड़नेसे सारी प्रजा व्याकुल हो गयी है।”
एक वृद्ध किसान बोला—
“राम इस संसारके मूल हैं।
यदि वृक्षकी जड़ काट दी जाये तो शाखाएँ, पत्ते, फूल और फल सब सूख जाते हैं।
राम दुःखी हैं, इसलिये पूरा जगत् दुःखी हो उठा है।”
धीरे-धीरे जनसमूहके भीतर एक और भावना उठी—त्यागकी।
लोगोंने निश्चय करना आरम्भ कर दिया कि वे भी रामके साथ वन जायेंगे।
एक युवक उत्साहसे बोला—
“जब लक्ष्मण अपने भाईके साथ जा सकते हैं, तो हम क्यों नहीं?”
दूसरा बोला—
“हम अपने घर, खेत, बगीचे सब छोड़ देंगे।
राम जहाँ रहेंगे, वही अयोध्या होगी।”
लोगोंका प्रेम अब विद्रोहकी सीमा छूने लगा।
वे कहने लगे—
“हम अपने घरोंकी गड़ी हुई निधियाँ निकाल लेंगे।
घर सूने छोड़ देंगे।
न वहाँ अग्नि जलेगी, न यज्ञ होगा, न पूजा।
धूल भर जायेगी उन घरोंमें।
यदि कैकेयीको राज्य चाहिये, तो वह ऐसे उजड़े नगरपर राज्य करे!”
किसी स्त्रीने रोते हुए कहा—
“हमारे लिये नगरका क्या मूल्य, यदि राम ही यहाँ नहीं हैं?”
लोगोंकी कल्पनाएँ और भी तीव्र हो गयीं।
वे कहने लगे—
“जिस वनमें राम जायेंगे, वही नगर बन जायेगा।
और यह अयोध्या, रामके बिना वनके समान सूनी हो जायेगी।”
वे सोचने लगे—
“वनके पशु भी रामके तेजसे भयभीत होकर दूर चले जायेंगे।
सिंह, हाथी, सर्प—सब उनके चरणोंके आगे झुक जायेंगे।”
अन्तमें सबने मानो सामूहिक प्रण कर लिया—
“हम रामके साथ वनमें रहेंगे।
उनके दुःखमें दुःखी होंगे, उनके सुखमें सुखी।
कैकेयी चाहे इस राज्यपर अधिकार कर ले; पर हमारा हृदय तो रामके साथ जायेगा।”
यह सब सुनते हुए भी श्रीरामके मुखपर कोई विकार नहीं आया।
वे न क्रोधित हुए, न विचलित।
उनका चेहरा वैसा ही स्थिर था जैसे पर्वतपर खड़ा हुआ सिंह।
वे सबकी बातें सुन रहे थे, पर उनका मन केवल धर्मपर स्थिर था।
फिर वे पुनः कैकेयीके श्वेत भवनकी ओर बढ़े।
वह भवन कैलास पर्वतके समान उज्ज्वल दिखाई देता था, पर भीतर शोककी छाया फैली थी।
राजभवनमें प्रवेश करते ही उन्होंने देखा—सुमन्त्र अत्यन्त दुःखी खड़े हैं।
उनकी आँखें लाल थीं, मुख मुरझा गया था।
वे समझ नहीं पा रहे थे कि यह सब कैसे हो गया।
वहाँ उपस्थित अयोध्यावासी शोकसे टूट चुके थे।
पर श्रीरामके शरीरपर दुःखका कोई चिह्न नहीं था।
वे ऐसे आगे बढ़ रहे थे मानो किसी उत्सवमें जा रहे हों।
उनके भीतर केवल एक भावना थी—
“पिताकी आज्ञाका पालन करना है।”
वे धीरे-धीरे उस कक्षकी ओर बढ़े जहाँ महाराज दशरथ शोकसे व्याकुल पड़े थे।
परन्तु भीतर जानेसे पहले वे रुके।
उन्होंने सुमन्त्रकी ओर देखा और अत्यन्त विनम्र स्वरमें कहा—
“आप महाराजको मेरे आगमनकी सूचना दे दें।”
उन शब्दोंमें न शिकायत थी, न पीड़ा।
केवल मर्यादा थी।
केवल धर्म था।
केवल राम थे।