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अयोध्या में आनन्द की वापसी और राम-सीता का मधुर गृहस्थ जीवन
जमदग्निकुमार परशुराम के प्रस्थान के बाद वातावरण में जो तनाव छाया हुआ था, वह धीरे-धीरे शांत होने लगा। सबकी दृष्टि श्रीराम पर टिक गयी थी। वे पूर्णतः शांतचित्त, स्थिर और गंभीर थे। उनके मुख पर न कोई गर्व था, न विजय का अहंकार—केवल मर्यादा और संतुलन की दिव्य छाया थी। उन्होंने अत्यन्त विनम्रता से उस अद्भुत धनुष को, जो अपार शक्ति का प्रतीक था, वरुणदेव को समर्पित कर दिया। ऐसा प्रतीत हुआ मानो वे स्वयं ही उस शक्ति से विरक्त होकर संसार को यह संदेश दे रहे हों कि उनका पराक्रम केवल धर्म की रक्षा के लिये है, प्रदर्शन के लिये नहीं।
इसके पश्चात् श्रीराम ने आगे बढ़कर वसिष्ठ आदि महर्षियों को प्रणाम किया। उनके चरणों में झुकते हुए उनके चेहरे पर श्रद्धा और विनय की मधुर आभा दिखाई दे रही थी। ऋषियों ने भी उन्हें आशीर्वाद दिया और उनके तेज से प्रसन्न होकर उन्हें धर्म का आदर्श बताया। उसी समय उन्होंने अपने पिता की ओर देखा—राजा दशरथ का हृदय अभी भी भय और चिंता से व्याकुल था। वे अपने प्रिय पुत्र की ओर असहाय दृष्टि से देख रहे थे। श्रीराम धीरे से उनके समीप गये और कोमल स्वर में बोले कि अब परशुराम चले गये हैं, सब संकट समाप्त हो गया है, अतः उनके नेतृत्व में यह समस्त सेना अयोध्या की ओर लौटे।
यह सुनते ही दशरथ का हृदय जैसे बोझ से मुक्त हो गया। वे अपने को रोक न सके। उन्होंने तुरंत श्रीराम को दोनों भुजाओं में भर लिया, उन्हें अपनी छाती से लगा लिया, और प्रेम से उनके मस्तक को सूँघा—मानो वर्षों बाद खोया हुआ पुत्र वापस मिल गया हो। उनकी आँखों में आनंद के आँसू छलक उठे। उन्हें लगा जैसे वे और उनका पुत्र मृत्यु के मुख से लौट आये हों। उनका हृदय कृतज्ञता और आनंद से भर गया। कुछ क्षण तक वे कुछ बोल ही नहीं सके, केवल अपने पुत्र को देखते रहे।
इसके बाद राजा दशरथ ने सेना को अयोध्या लौटने की आज्ञा दी। विशाल चतुरंगिणी सेना के साथ वे तेज गति से आगे बढ़े। अयोध्या के समीप पहुँचते ही नगर का दृश्य अत्यंत मनोहर दिखाई देने लगा। चारों ओर ध्वजा-पताकाएँ लहरा रही थीं। मार्गों को सजाया गया था, भवनों पर रंगीन तोरण बंधे थे, और विविध वाद्यों की मधुर ध्वनि से सम्पूर्ण नगर गूंज रहा था। नगरवासियों के हृदय में अपार उत्साह उमड़ रहा था—वे अपने प्रिय राजकुमारों और नववधुओं के स्वागत के लिये व्याकुल थे।
सड़कों पर सुगंधित जल का छिड़काव किया गया था। जगह-जगह फूल बिखेरे गये थे। नागरिक मंगलकलश, दीप और विविध शुभ वस्तुएँ लेकर मार्ग के दोनों ओर खड़े थे। उनके मुख पर प्रसन्नता की चमक थी। ब्राह्मणों ने आगे बढ़कर राजा की अगवानी की, स्त्रियाँ मंगलगीत गाने लगीं, और बच्चे उल्लास से नाच उठे। उस समय अयोध्या सचमुच स्वर्ग के समान लग रही थी।
राजा दशरथ अपने तेजस्वी पुत्रों के साथ राजमहल में प्रविष्ट हुए। महल अत्यंत भव्य था—मानो हिमालय का श्वेत वैभव धरती पर उतर आया हो। भीतर प्रवेश करते ही स्वजन और सेवक विविध उपहार लेकर उपस्थित हुए। सबने राजा का अभिनंदन किया। उसी समय महारानी कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी सहित अन्य रानियाँ भी उत्साह से भर उठीं। वे सब नई बहुओं के स्वागत में स्वयं जुट गयीं।
राजपरिवार की स्त्रियों ने सवारी से सीता, ऊर्मिला, माण्डवी और श्रुतकीर्ति को उतारा। मंगलगीत गूँज उठे। नववधुएँ रेशमी वस्त्रों और आभूषणों से सुशोभित थीं। उनके मुख पर लज्जा और आनंद की अद्भुत छटा थी। उन्हें देवमंदिरों में ले जाया गया, जहाँ उन्होंने विधिपूर्वक देवताओं का पूजन किया। फिर उन्होंने आदरपूर्वक अपने सास-ससुर के चरण स्पर्श किये। इसके बाद वे अपने-अपने पतियों के साथ एकांत में जाकर नए जीवन की मधुर शुरुआत करने लगीं। महल में उल्लास, स्नेह और मधुर हँसी की ध्वनि गूँज उठी।
चारों भाई विवाह के बाद भी अपने स्वभाव के अनुसार विनम्र और कर्तव्यपरायण बने रहे। वे अस्त्र-शस्त्र में निपुण थे, परंतु साथ ही पिता की सेवा में सदैव तत्पर रहते। कुछ समय बाद राजा दशरथ ने भरत को बताया कि उनके मामा केकय देश से उन्हें लेने आये हैं और कई दिनों से प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह सुनकर भरत ने शत्रुघ्न के साथ जाने का निश्चय किया। उन्होंने पिता, श्रीराम और माताओं से आज्ञा ली और प्रेमपूर्वक सबको प्रणाम करके प्रस्थान किया। युधाजित् भरत और शत्रुघ्न को लेकर बड़े आनंद से अपने नगर पहुँचे, जिससे वहाँ भी हर्ष फैल गया।
भरत के चले जाने के बाद श्रीराम और लक्ष्मण और भी अधिक तत्परता से पिता की सेवा में लग गये। वे नगरवासियों के कार्यों का ध्यान रखते, न्यायपूर्वक निर्णय करते और सभी के हित का विचार करते। वे अत्यंत संयमी थे। माताओं की आवश्यकताओं का ध्यान रखते, गुरुजनों के कठिन कार्य भी पूर्ण करते। उनके विनम्र व्यवहार से राजा दशरथ, ब्राह्मण, वैश्य और समस्त प्रजा अत्यंत प्रसन्न रहते।
चारों पुत्रों में श्रीराम का यश विशेष रूप से फैलने लगा। उनका शील, विनय, पराक्रम और करुणा सबको आकर्षित करते। जैसे सृष्टि में ब्रह्मा का विशेष महत्व है, वैसे ही राजकुमारों में श्रीराम सबसे अधिक गुणवान और यशस्वी प्रतीत होते थे। उनके हृदय में सदा सीता का स्थान था, और सीता के मन में केवल श्रीराम ही बसे रहते थे। दोनों एक-दूसरे के साथ ऋतुओं के परिवर्तन का आनंद लेते—वसंत के फूलों में, वर्षा की बूंदों में, शरद की चाँदनी में और हेमंत की शीतलता में उनका स्नेह और गहरा होता गया।
सीता श्रीराम को अत्यंत प्रिय थीं। वे केवल सौंदर्य में ही नहीं, बल्कि पातिव्रत्य, विनय और मधुर स्वभाव में भी अद्वितीय थीं। श्रीराम का प्रेम उनके प्रति दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया। सीता भी अपने पति के गुणों से मोहित थीं। वे उनके मन के भावों को बिना कहे समझ लेतीं। उनका रूप देवांगनाओं के समान था, और उनका तेज मूर्तिमती लक्ष्मी जैसा प्रतीत होता था।
दोनों का प्रेम अत्यंत पवित्र और संतुलित था। सीता केवल श्रीराम को ही चाहती थीं और श्रीराम भी केवल उन्हीं में रमे रहते थे। जैसे भगवान विष्णु लक्ष्मी के साथ शोभित होते हैं, उसी प्रकार श्रीराम सीता के साथ अत्यंत दिव्य लगते थे। अयोध्या के महल में उनका यह मधुर और शांत जीवन सभी के लिये आनंद और सौभाग्य का कारण बन गया।