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अयोध्या में प्रेम और आशा का स्वर्णिम प्रभात

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अयोध्या में प्रेम और आशा का स्वर्णिम प्रभात

 

 

अयोध्या नगरी उस दिन मानो स्वयं स्वर्ग का रूप धारण कर चुकी थी। हर दिशा में उत्सव की लहर थी, और इस उत्सव के केंद्र में थे मर्यादा और सौम्यता के प्रतीक श्रीराम।

 

वे रथ पर विराजमान थे—शांत, तेजस्वी, और अपने स्वभाव के अनुरूप विनम्र। उनके चेहरे पर न कोई अभिमान था, न कोई उतावलापन—बस एक मधुर संतुलन, जो हर किसी के हृदय को आकर्षित कर रहा था। जैसे ही उनका रथ राजमार्ग पर आगे बढ़ा, उन्होंने देखा कि पूरा नगर मानो उनके स्वागत में सज गया है। ऊँचे-ऊँचे भवन श्वेत बादलों की तरह चमक रहे थे, और हर घर, हर चौक, हर द्वार ध्वजाओं और पताकाओं से लहरा रहा था। वातावरण में अगुरु धूप की सुगंध ऐसी घुली थी कि मानो हवा भी पवित्र हो गई हो।

 

राजमार्ग केवल एक मार्ग नहीं रह गया था—वह एक जीवंत उत्सव बन चुका था। वहाँ की शोभा देखते ही बनती थी। उत्तम चन्दन, सुगंधित धूप, महीन वस्त्र, रेशमी कपड़े, अनमोल रत्न और मोतियों के ढेर—सब कुछ इस तरह सजा था जैसे पृथ्वी अपनी समस्त सम्पदा श्रीराम के चरणों में अर्पित कर रही हो। चारों ओर पुष्पों की वर्षा हो रही थी, भोग और प्रसाद के विविध प्रकार के पदार्थ रखे थे, और चौराहों पर विधिवत पूजा हो रही थी—दही, अक्षत, लावा, चन्दन, धूप—सब कुछ श्रद्धा से अर्पित किया जा रहा था।

 

उस क्षण, रथ पर बैठे हुए श्रीराम ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो स्वयं देवराज इन्द्र स्वर्ग से उतरकर इस दिव्य दृश्य का अवलोकन कर रहे हों।

 

जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते, उनके सुहृद—मित्र, प्रजा, और शुभचिंतक—उन पर आशीर्वादों की वर्षा करते जाते। कोई उनके दीर्घायु होने की कामना करता, तो कोई उनके राज्य में सुख-शांति की। श्रीराम हर एक की बात ध्यान से सुनते, और अपनी विनम्र दृष्टि से उनका सम्मान करते—जैसे हर व्यक्ति उनके लिए विशेष हो।

 

लोगों के हृदयों में जो प्रेम था, वह अब शब्दों में बहने लगा। वे कहने लगे—“हे रघुनंदन! जिस पवित्र मार्ग पर आपके पूर्वज चले हैं, उसी पर चलते हुए आज आप युवराज बनें और हमारा पालन करें।” उनके शब्दों में केवल आशा नहीं थी, बल्कि पीढ़ियों का विश्वास था।

 

फिर आपस में लोग भावुक होकर कहने लगे—“हमने आपके पिता और पूर्वजों के राज्य में सुख पाया है, लेकिन हमें विश्वास है कि आपके राज्य में हम उससे भी अधिक आनंद और सुरक्षा पाएँगे।” उनके मन में श्रीराम के प्रति जो श्रद्धा थी, वह किसी साधारण राजा के लिए नहीं हो सकती थी—वह तो एक आदर्श के लिए थी।

 

कुछ लोग तो इतने भावविभोर हो उठे कि कहने लगे—“यदि हम एक बार श्रीराम को राज्याभिषेक के लिए जाते देख लें, उनके दर्शन कर लें, तो हमें इस संसार के भोग या मोक्ष की भी आवश्यकता नहीं रहेगी।” यह केवल भक्ति नहीं थी—यह पूर्ण समर्पण था।

 

वे आगे कहते—“यदि तेजस्वी श्रीराम का अभिषेक हो जाए, तो इससे अधिक प्रिय हमारे लिए कुछ भी नहीं हो सकता।” यह सुनकर भी श्रीराम का हृदय अहंकार से नहीं, बल्कि करुणा और जिम्मेदारी से भरता जा रहा था।

 

रथ आगे बढ़ता रहा, और लोग उन्हें निहारते रहे। कोई भी अपनी दृष्टि उनसे हटा नहीं पा रहा था। ऐसा लगता था मानो समय ठहर गया हो, और सबकी आँखें केवल उसी एक छवि में खो गई हों। जब वे आगे निकल जाते, तब भी लोगों का मन उन्हीं के साथ चला जाता—जैसे कोई मोहिनी शक्ति उन्हें बाँधे हुए हो।

 

और सच तो यह था कि उस समय जो व्यक्ति श्रीराम को नहीं देख पाता, या जिनकी दृष्टि श्रीराम से नहीं मिलती—वह स्वयं को दुर्भाग्यशाली समझता। उसे लगता मानो उसने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य खो दिया हो।

 

श्रीराम का हृदय अत्यंत करुणामय था। वे समाज के हर वर्ग—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—सभी पर समान दया रखते थे। वे केवल राजा नहीं थे, वे एक ऐसे संरक्षक थे जिनमें हर किसी को अपना हित दिखाई देता था। इसीलिए सम्पूर्ण प्रजा उनके प्रति भक्तिभाव रखती थी।

 

मार्ग में आते हुए वे हर चौराहे, देवस्थान, चैत्य वृक्ष और मंदिर को अपने दाहिने रखते हुए आगे बढ़ते—यह उनके धर्म और मर्यादा का सूक्ष्म लेकिन गहरा प्रतीक था।

 

आखिरकार, वे उस भव्य राजमहल के समीप पहुँचे जहाँ उनके पिता दशरथ निवास करते थे। वह महल किसी साधारण भवन जैसा नहीं था—वह मानो स्वर्ग का एक अंश था। उसकी ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ कैलास पर्वत की चोटियों जैसी चमक रही थीं। रत्नों से जड़ी दीवारें, श्वेत आभा से प्रकाशित क्रीड़ागृह—सब कुछ इतना भव्य था कि ऐसा लगता था मानो आकाश भी उसकी ऊँचाई को छूने की कोशिश कर रहा हो।

 

श्रीराम उस महल के सामने पहुँचे—उनका तेज और भी अधिक निखर आया था। वे अपने रथ को महल की पहली तीन ड्योढ़ियों तक ले गये, जहाँ वीर धनुर्धर पहरा दे रहे थे। फिर वे रथ से उतरकर शेष ड्योढ़ियाँ पैदल पार करने लगे—यह उनके विनम्र स्वभाव का परिचायक था।

 

अंततः वे महल के भीतर प्रवेश कर गए। उनके साथ आए सभी लोग वहीं रुक गए—वे जानते थे कि अब यह एक पुत्र और पिता का निजी मिलन है।

 

बाहर खड़े लोग प्रतीक्षा करने लगे—उनकी आँखें महल के द्वार पर टिकी थीं। उनका हृदय उत्सुकता से भरा था। वे उसी तरह प्रतीक्षा कर रहे थे जैसे समुद्र चन्द्रमा के उदय की प्रतीक्षा करता है—गंभीर, शांत, लेकिन भीतर से गहराई तक आंदोलित।

 

उस दिन अयोध्या में केवल एक राजकुमार का आगमन नहीं हो रहा था—वह एक ऐसे युग का प्रारंभ था, जिसमें प्रेम, धर्म और आदर्श का राज्य स्थापित होने वाला था।