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🌼 अश्वमेध यज्ञ : विधि, वैभव और वंश-वृद्धि का महामंगल विधान🌼
वर्ष भर तक अश्व ने भूमण्डल का विधिवत् भ्रमण किया। जब वह सकुशल लौट आया, तब सरयू नदी के उत्तर तट पर महाराज दशरथ ने अपने जीवन के सबसे महान और पुण्यदायी अनुष्ठान—अश्वमेध यज्ञ—का आरम्भ किया। यह केवल एक राजकीय कर्मकाण्ड नहीं था, बल्कि धर्म, मर्यादा, लोककल्याण और वंश-वृद्धि का विराट संकल्प था।
इस महायज्ञ में महर्षि ऋष्यशृंग को अग्रणी बनाकर श्रेष्ठतम ब्राह्मणों ने यज्ञीय कर्म आरम्भ किए। ये सभी ब्राह्मण वेदों के पारंगत विद्वान थे—उन्हें प्रत्येक कर्म का क्रम, समय और विधि कण्ठस्थ थी। कोई भी आहुति, कोई भी क्रिया बिना शास्त्रीय मर्यादा के नहीं होती थी। प्रवर्ग्य, उपसद, अतिदेश से प्राप्त कर्म—सब कुछ कल्पसूत्र, मीमांसा और विधिशास्त्र के अनुसार सम्पन्न हो रहा था।
यज्ञ के प्रत्येक सवन—प्रातः, मध्याह्न और तृतीय—को अत्यन्त सावधानी और उल्लास के साथ किया गया। इन्द्र सहित समस्त देवताओं का आवाहन मधुर सामगान और शुद्ध स्वरों से सम्पन्न हुआ। मंत्रोच्चारण में न कोई त्रुटि थी, न कहीं कोई अधूरापन। यह यज्ञ इसलिए भी अद्भुत था क्योंकि यहाँ भूल की कोई सम्भावना ही नहीं छोड़ी गई थी—हर कर्म मंत्रपूर्वक, स्मृति और श्रुति दोनों के अनुरूप हो रहा था।
यज्ञ-भूमि में अद्भुत दृश्य था। कहीं थकान नहीं, कहीं भूख-प्यास नहीं। ऋत्विज् हों या उनके शिष्य, तपस्वी हों या श्रमण—सभी तृप्त थे। प्रतिदिन अन्न के पर्वत जैसे ढेर लगते थे। बूढ़े, रोगी, स्त्रियाँ और बच्चे—सबको समान रूप से उत्तम, स्वादिष्ट भोजन मिलता था। ऐसा भोजन, जिसकी प्रशंसा करते हुए लोग यही कहते—“हम पूर्णतः तृप्त हो गए, महाराज का कल्याण हो।”
यज्ञ के क्रम में जब यूपों की स्थापना का समय आया, तब यज्ञमण्डप का दृश्य अत्यन्त दिव्य हो उठा।
सबसे पहले बेल वृक्ष की लकड़ी से बने छः यूप स्थापित किए गए। उनके साथ-साथ खैर वृक्ष के भी उतने ही यूप गाड़े गए। इसके अतिरिक्त पलाश वृक्ष के यूप भी बनाए गए, जो बेल की लकड़ी से बने यूपों के साथ समान रूप से खड़े किए गए थे।
अश्वमेध यज्ञ के लिए बहेड़े (विभीतक) वृक्ष का एक विशेष यूप भी विहित था। इसके साथ ही देवदारु वृक्ष से बने दो यूप स्थापित किए गए, जिन्हें दोनों भुजाएँ फैलाने पर जितनी दूरी होती है, उतने अन्तर पर रखा गया। इन सब यूपों की संख्या, दूरी और दिशा—सब कुछ शास्त्रसम्मत था।
इन सभी यूपों का निर्माण यज्ञकुशल, कल्पसूत्र और ब्राह्मणग्रन्थों के ज्ञाता ब्राह्मणों के निर्देशन में हुआ था। यज्ञ की शोभा बढ़ाने के लिए प्रत्येक यूप में स्वर्ण जड़ित किया गया, जिससे वे सूर्यकिरणों में चमकते हुए अत्यन्त मनोहर प्रतीत होते थे।
इन इक्कीस यूपों की ऊँचाई इक्कीस अरत्नि (लगभग पाँच सौ चार अंगुल) रखी गई थी। प्रत्येक यूप को इक्कीस वस्त्रों से पृथक्-पृथक् अलंकृत किया गया था। वे सभी यूप आठ कोणों से युक्त, चिकनी सतह वाले और अत्यन्त सुदृढ़ थे।
उन पर पुष्प और चन्दन से पूजन किया गया। यज्ञमण्डप में वे यूप ऐसे दीप्तिमान् लग रहे थे, जैसे आकाश में सप्तर्षि अपनी दिव्य आभा से शोभायमान हों।
अग्नि की स्थापना भी असाधारण थी—गरुड़ के समान आकृति वाली, स्वर्णिम पंखों से युक्त, अठारह प्रस्तारों से सम्पन्न। यह दृश्य स्वयं धर्म और दिव्यता का प्रतीक था।
यज्ञ के अंगभूत कर्मों में शास्त्रविहित पशु, पक्षी और जलचर देवताओं के उद्देश्य से नियत यूपों में बाँधे गए।उस समय तीन सौ पशु तथा स्वयं अश्वरत्न को भी विधिपूर्वक संस्कारित किया गया। महारानी कौसल्या ने धर्मभाव से उसका संस्कार किया और रात्रि भर उसके समीप निवास किया—यह कर्म त्याग, मर्यादा और राजधर्म की चरम अभिव्यक्ति था।
इसके बाद परम संयमी और कर्मकुशल ऋत्विजों ने अश्वकन्द के गूदे को निकालकर शास्त्रोक्त विधि से पकाया। उस गूदे की आहुति दी गई। महाराज दशरथ ने पापनाश के उद्देश्य से ठीक समय पर आकर उस आहुति के धुएँ की गन्ध को ग्रहण किया।
इसके पश्चात् सोलह ऋत्विज ब्राह्मणों ने अश्वमेध के सभी अंगभूत हवनीय पदार्थों की विधिवत् आहुति दी।
अन्य यज्ञों में जहाँ हवि पलाश की शाखाओं में रखकर दी जाती है, वहीं अश्वमेध यज्ञ में हविष्य बेंत की चटाई में रखकर देने का विशेष विधान था।
कल्पसूत्र और ब्राह्मणग्रन्थों के अनुसार अश्वमेध के तीन सवनीय दिन होते हैं—
पहला दिन अग्निष्टोम (चतुष्टोम),
दूसरा दिन उक्थ्य,
और तीसरा दिन अतिरात्र कहलाता है।
अश्वमेध के उत्तरकाल में ज्योतिष्टोम, आयुष्टोम, दो बार अतिरात्र यज्ञ, अभिजित्, विश्वजित् तथा आप्तोर्याम जैसे महाक्रतु सम्पन्न हुए, जिससे यह यज्ञ सम्पूर्ण रूप से पूर्ण और सिद्ध हुआ।
इसके पश्चात् महाराज दशरथ ने दक्षिणा में पृथ्वी तक दान कर दी। परन्तु वेदज्ञ ब्राह्मणों ने विनम्रता से कहा कि पृथ्वी का शासन केवल आप ही कर सकते हैं; हमें तो धन, गौ, सुवर्ण और रत्न पर्याप्त हैं।
तब महाराज ने हर्षपूर्वक असंख्य गौएँ, स्वर्ण-रजत मुद्राएँ और अमूल्य धन प्रदान किया। जो कुछ भी बचा, वह भी उन्होंने दान कर दिया—यहाँ तक कि अन्त में आए एक दरिद्र ब्राह्मण को अपने हाथ का आभूषण उतारकर दे दिया। दान की इस पराकाष्ठा ने महाराज को रघुकुल की परम्परा का साक्षात् प्रतीक बना दिया।
जब सभी ब्राह्मण संतुष्ट हो गए, तब महाराज दशरथ ने अत्यन्त विनम्रता से उन्हें प्रणाम किया। ब्राह्मणों ने भी हृदय से उन्हें आशीर्वाद दिया। यज्ञ का पुण्यफल प्राप्त कर महाराज का हृदय आनंद से भर उठा—यह यज्ञ उनके पापों का नाश करने वाला और स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त करने वाला था।
अन्त में महाराज ने महर्षि ऋष्यशृंग से प्रार्थना की कि अब वह कर्म किया जाए जो उनके कुल की वृद्धि करे। महर्षि ने मधुर वाणी में वरदान दिया—“राजन्! आपके चार तेजस्वी पुत्र होंगे, जो इस कुल का भार वहन करेंगे।” यह सुनकर महाराज दशरथ का हृदय कृतज्ञता और हर्ष से भर गया, और उन्होंने पुनः पुत्रप्राप्ति हेतु अनुष्ठान करने का निवेदन किया।
इस प्रकार अश्वमेध यज्ञ न केवल एक यज्ञ रहा, बल्कि त्याग, धर्म, दान, शास्त्रनिष्ठा और वंश-वृद्धि का अमर आदर्श बन गया।