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“अश्व की खोज और पृथ्वी का करुण क्रंदन”
जब महर्षि विश्वामित्र ने अपनी दिव्य वाणी से कथा का एक भाग समाप्त किया, तब श्रीराम के हृदय में एक अद्भुत उल्लास उमड़ पड़ा। उनके नेत्रों में जिज्ञासा की मधुर चमक थी। वे केवल श्रोता नहीं थे—वे उस कथा को जी रहे थे। विनम्र स्वर में उन्होंने मुनि से कहा, “ब्रह्मन्! आपकी कृपा से मैं यह कथा सुन रहा हूँ, परंतु मेरा मन अभी तृप्त नहीं हुआ। कृपा करके बताइए, मेरे पूर्वज महाराज सगर ने वह महान् यज्ञ किस प्रकार किया था? उस यज्ञ की कथा मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ।”
राम के इन मधुर और आदरपूर्ण वचनों को सुनकर विश्वामित्र के हृदय में अपार स्नेह उमड़ आया। उन्हें यह देखकर कौतूहल हुआ कि राम ठीक वही पूछ रहे हैं, जिसे वे स्वयं आगे कहने वाले थे। वे जोर से हँस पड़े—वह हँसी उपहास की नहीं, बल्कि आनंद और आत्मीयता की थी। हँसते हुए उन्होंने कहा, “राम! अब तुम महात्मा सगर के यज्ञ की अद्भुत कथा सुनो।”
उन्होंने उस पवित्र भूमि का वर्णन किया जहाँ वह यज्ञ सम्पन्न हुआ था—एक ओर हिमवान, जो शंकर के श्वशुर के रूप में विख्यात है, और दूसरी ओर विन्ध्याचल। दोनों पर्वत ऐसे खड़े थे मानो दो महायोद्धा एक-दूसरे को निहार रहे हों। उनके मध्य आर्यावर्त की वह पुण्यभूमि थी, जहाँ उस महान् यज्ञ का आयोजन हुआ। वह भूमि इतनी पावन मानी जाती थी कि यज्ञ के लिए उसे सर्वश्रेष्ठ समझा जाता था।
राजा सगर ने अपने यज्ञीय अश्व की रक्षा का भार अपने पौत्र, वीर और धनुर्धर अंशुमान को सौंपा था। अंशुमान ने यह उत्तरदायित्व आदरपूर्वक स्वीकार किया। यज्ञ प्रारम्भ हुआ। वेदमंत्रों की पवित्र ध्वनि आकाश में गूँजने लगी। वातावरण श्रद्धा और तप से भर गया।
परंतु नियति को कुछ और ही स्वीकार था।
पर्व के दिन, जब सब यज्ञकर्म में लीन थे, देवराज इन्द्र ने राक्षस का रूप धारण किया और चुपचाप यज्ञीय अश्व को चुरा लिया। किसी को कुछ पता न चला। परंतु शीघ्र ही ऋत्विजों की दृष्टि उस ओर गई और वे घबराकर राजा सगर के पास पहुँचे। उनके स्वर में भय और चिंता स्पष्ट थी। उन्होंने कहा, “राजन्! आज पर्व के पवित्र दिन कोई इस अश्व को वेग से ले जा रहा है। यदि अश्व न मिला, तो यज्ञ में विघ्न पड़ेगा और यह हम सबके लिए अमंगलकारी होगा। कृपा कर चोर का वध कर अश्व को वापस लाएँ।”
राजा सगर का मुख गंभीर हो उठा। वे यज्ञदीक्षा में बँधे थे, अतः स्वयं नहीं जा सकते थे। उन्होंने अपने साठ हजार बलशाली पुत्रों को बुलाया। उनका स्वर दृढ़ था, पर भीतर चिंता की लहर भी थी। उन्होंने कहा, “वीर पुत्रों! यह यज्ञ महान् महात्माओं द्वारा सम्पन्न हो रहा है। यहाँ राक्षसों की पहुँच संभव नहीं। यह कार्य अवश्य किसी देवतुल्य शक्तिशाली द्वारा किया गया होगा। तुम सब जाओ और इस समुद्र-पर्यंत पृथ्वी को छान डालो। एक-एक योजन भूमि बाँटकर खोज करो। जब तक अश्व का पता न लगे, तब तक पृथ्वी को खोदते रहो। मेरा एक ही लक्ष्य है—अश्व के चोर को ढूँढ़ निकालना।”
पिता की आज्ञा उनके लिए धर्म थी। वे मन-ही-मन उत्साह से भर उठे। उन्हें लगा मानो एक महान् अभियान उनका इंतजार कर रहा हो। वे पृथ्वी पर चारों दिशाओं में फैल गए। उन्होंने संपूर्ण भूमि का चक्कर लगाया, पर अश्व का कहीं पता न चला।
तब उन्होंने प्रत्येक के हिस्से में एक-एक योजन भूमि बाँटी और अपनी भुजाओं से धरती को खोदना आरम्भ किया। उनकी भुजाएँ वज्र के समान कठोर थीं। जब वे धरती पर प्रहार करते, तो ऐसा प्रतीत होता मानो वज्र गिर रहा हो।
धरती कराह उठी।
वज्रतुल्य शूलों और कठोर हलों से विदीर्ण होती हुई वसुधा मानो आर्तनाद करने लगी। उसके भीतर रहने वाले नाग, असुर, राक्षस और असंख्य जीव भयभीत होकर चीत्कार करने लगे। उनका करुण क्रंदन दिशाओं में गूँज उठा। सगर के पुत्रों की शक्ति अपार थी, पर उनके प्रहारों से असंख्य प्राणियों का विनाश हो रहा था।
उन्होंने साठ हजार योजन भूमि खोद डाली। ऐसा प्रतीत होता था मानो वे रसातल तक पहुँच जाना चाहते हों। पर्वतों से युक्त जम्बूद्वीप की धरती जगह-जगह फट गई। राजकुमार चारों ओर चक्कर लगाने लगे, पर उनका उत्साह अब एक उग्र जिद में बदल चुका था।
देवता यह सब देखकर व्याकुल हो उठे। गन्धर्व, असुर और नाग—सभी के हृदय में भय समा गया। वे चिंतित होकर ब्रह्माजी के पास पहुँचे। उनके मुख पर विषाद था, आँखों में चिंता। उन्होंने ब्रह्माजी से कहा, “भगवन्! सगर के पुत्र पृथ्वी को खोदे डाल रहे हैं। वे अनेक महात्माओं और जलचर जीवों का वध कर रहे हैं। वे हर प्राणी को अश्व-चोर समझकर हिंसा कर रहे हैं। यह समस्त लोकों के लिए संकट बनता जा रहा है।”
उनकी वाणी में भय भी था और करुण विनती भी। समस्त सृष्टि मानो उस उग्र अभियान से काँप रही थी।
और इस प्रकार, एक यज्ञ की रक्षा के संकल्प ने पृथ्वी को हिला दिया—मानव के पराक्रम और अधीरता के बीच करुणा की पुकार गूँज उठी।