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(४०)
🔥 अहंकार की ज्वाला और कपिल मुनि का दिव्य प्रकोप 🔥
जब सगरपुत्रों के अद्भुत पराक्रम से सम्पूर्ण पृथ्वी काँप उठी और देवताओं के हृदय भय से व्याकुल हो गये, तब वे सब मिलकर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के समीप पहुँचे। उनके मुख पर चिंता की रेखाएँ थीं। वे जानते थे कि सगर के साठ हजार पुत्र अपने बल और अभिमान में अंधे होकर धरती का सीना चीर रहे हैं।
देवताओं की व्यथा सुनकर ब्रह्माजी गंभीर हो गये। उनकी वाणी में करुणा थी, पर साथ ही अटल सत्य की दृढ़ता भी। उन्होंने कहा— “हे देवगण! यह पृथ्वी किसी राजा की नहीं, यह तो विष्णु की धरोहर है। वही लक्ष्मीपति, वही सर्वशक्तिमान प्रभु समय-समय पर लीला करते हैं। इस समय वे ही कपिल मुनि का रूप धारण कर पृथ्वी का भार संभाले हुए हैं। यदि उन परमात्मा की कोपाग्नि प्रज्वलित हुई, तो ये सारे राजकुमार क्षणभर में भस्म हो जाएँगे।”
ब्रह्माजी ने आगे कहा— “पृथ्वी का इस प्रकार विदीर्ण होना कोई नई बात नहीं। प्रत्येक कल्प में यह लीला होती ही है। दूरदर्शी ऋषियों ने पहले ही देख लिया है कि सगरपुत्रों का अंत इसी प्रकार होगा। इसलिए शोक करना व्यर्थ है; जो नियति है, वह होकर ही रहेगी।”
ब्रह्माजी के वचनों से देवताओं के हृदय में शांति आ गई। वे समझ गये कि सब कुछ ईश्वर की योजना के अनुसार हो रहा है। वे जैसे आये थे, वैसे ही संतोष के साथ अपने-अपने लोकों को लौट गये।
उधर सगरपुत्र अपने अभिमान और पराक्रम में डूबे पृथ्वी को खोदते जा रहे थे। उनके शस्त्रों की चोट से धरती कराह उठती थी। जब वे भूमि को विदीर्ण करते, तो वज्रपात जैसा भीषण शब्द गूँजता। पर्वत काँपते, समुद्र विचलित होते और दिशाएँ भयभीत हो उठतीं।
उन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी छान मारी। देव, दानव, राक्षस, पिशाच और नाग—जो भी सामने आया, उनके क्रोध का शिकार बन गया। परंतु यज्ञ का घोड़ा कहीं नहीं मिला। थके, किंतु अब भी अहंकार से भरे वे अपने पिता सगर के पास लौटे और बोले— “पिताजी! हमने सब नष्ट कर दिया, पर घोड़ा नहीं मिला। अब आप ही मार्ग बताइये।”
राजा सगर के हृदय में क्रोध की अग्नि धधक उठी। उन्होंने कठोर स्वर में कहा— “जाओ! फिर से पृथ्वी को खोदो। चोर को ढूँढ़े बिना लौटना मत।”
पिता की आज्ञा उनके लिए आदेश नहीं, मानो युद्ध का शंखनाद था। वे पुनः पृथ्वी को चीरते हुए रसातल की ओर बढ़ चले।
खोदते-खोदते उन्हें एक अद्भुत दृश्य दिखा। एक पर्वत के समान विशाल दिग्गज—विरूपाक्ष—अपने मस्तक पर पृथ्वी को धारण किये खड़ा था। उसका रूप दिव्य था, पर उसका भार असहनीय। जब वह थककर अपना मस्तक हिलाता, तो भूकम्प आ जाता। सगरपुत्र क्षणभर विस्मित रह गये। उन्होंने उसकी परिक्रमा की और आगे बढ़ गये।
दक्षिण दिशा में उन्हें महापद्म नामक दिग्गज मिला, जो पर्वत-सा ऊँचा था। फिर पश्चिम में सौमनस, और उत्तर में हिम के समान श्वेत भद्र। चारों दिशाओं में ये दिग्गज पृथ्वी का भार संभाले खड़े थे। सगरपुत्र हर एक को देखकर आश्चर्य करते, पर उनका हृदय विनम्र नहीं हुआ। वे सम्मान कर आगे बढ़ते, पर भीतर का अभिमान शांत नहीं होता।
अंततः वे पूर्वोत्तर दिशा में पहुँचे। वहाँ वातावरण विलक्षण था—शांत, गंभीर, दिव्य। उसी स्थान पर उन्होंने देखा—एक तेजस्वी मुनि, जिनके चारों ओर दिव्यता की आभा थी। वे थे भगवान् कपिल। समीप ही यज्ञ का घोड़ा शांत भाव से चर रहा था।
घोड़े को देखते ही सगरपुत्रों के हृदय में प्रसन्नता तो हुई, पर विवेक नहीं जागा। उन्होंने बिना विचार किये उस तपस्वी को ही चोर समझ लिया। उनकी आँखें क्रोध से लाल हो उठीं। वे खंती, हल, वृक्षों और पत्थरों को उठाकर चिल्लाने लगे— “ठहरो! तुमने हमारा यज्ञ भंग किया है!”
वह क्षण अत्यंत निर्णायक था। सामने थे स्वयं कपिल—शांत, ध्यानमग्न, सर्वज्ञ। परंतु जब उन राजकुमारों ने उन्हें अपशब्द कहे, उनके तप में विघ्न डाला, तब उस दिव्य मुनि के नेत्रों में अग्नि चमक उठी।
एक गहरी हुंकार उनके मुख से निकली—वह कोई साधारण ध्वनि नहीं थी, वह सृष्टि की आदिशक्ति की गूँज थी। उस हुंकार के साथ ही अग्नि की ज्वाला प्रकट हुई।
क्षणभर में सगर के साठ हजार पुत्र, जो अपने बल और अहंकार पर इतराते थे, राख के ढेर में परिवर्तित हो गये। वहाँ केवल धुआँ था, मौन था, और ईश्वर के न्याय की गंभीरता थी।
यह कथा हमें बताती है—शक्ति यदि विनम्रता से रहित हो, तो विनाश निश्चित है। अहंकार का अंत सदैव अग्नि में होता है, और ईश्वर के सामने सबसे बड़ा बल भी तुच्छ हो जाता है।