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अहल्या की भूल और भगवान राम की करुणा
मिथिला की ओर जाते समय एक अत्यंत मार्मिक और शिक्षाप्रद घटना घटती है। जब महामुनि विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को साथ लेकर आगे बढ़ रहे थे, तब मार्ग में उनका आगमन राजा सुमति के राज्य में हुआ। वहाँ पहुँचकर सबने एक-दूसरे का कुशल-मंगल पूछा और आदरपूर्वक बातचीत करने लगे। उस समय राजा सुमति की दृष्टि उन दोनों राजकुमारों पर पड़ी। वे दोनों तेजस्वी युवकों को देखकर आश्चर्यचकित रह गए। उनके मन में कौतूहल जाग उठा कि ये अद्भुत तेज वाले कुमार आखिर हैं कौन।
राजा सुमति ने अत्यंत विनम्रता से मुनि विश्वामित्र से कहा कि ये दोनों बालक देखने में साधारण मनुष्य जैसे नहीं लगते। उनके चेहरे पर देवताओं जैसा तेज है और उनका पराक्रम भी किसी दिव्य वीर के समान प्रतीत होता है। उनकी चाल में हाथी की गंभीरता और सिंह की वीरता झलकती है। वे दोनों इतने बलवान और प्रभावशाली लगते हैं मानो जंगल के राजा सिंह और शक्तिशाली साँड़ हों।
राजा ने आगे कहा कि इन दोनों कुमारों की आँखें बड़े-बड़े खिले हुए कमल के समान सुंदर हैं। उनके हाथों में धनुष, तरकस और तलवार जैसे श्रेष्ठ आयुध सुशोभित हो रहे हैं। उनका रूप इतना मनोहर है कि मानो देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमार भी उनके सौंदर्य के सामने लज्जित हो जाएँ। वे दोनों युवावस्था की दहलीज़ पर खड़े ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे स्वर्ग से दो देवकुमार किसी विशेष उद्देश्य से पृथ्वी पर उतर आए हों।
राजा सुमति का आश्चर्य और बढ़ गया। उन्होंने विश्वामित्र से जिज्ञासा करते हुए कहा कि जैसे आकाश में सूर्य और चंद्रमा मिलकर आकाश की शोभा बढ़ाते हैं, वैसे ही ये दोनों कुमार इस भूमि की शोभा बढ़ा रहे हैं। उनके शरीर की बनावट, उनकी चाल-ढाल और उनके भाव-भंगिमा तक एक-दूसरे से इतनी मिलती-जुलती है कि लगता है मानो वे एक ही आत्मा के दो रूप हों।
राजा ने विनम्रतापूर्वक पूछा कि इतने श्रेष्ठ अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए ये दोनों महान वीर इस कठिन और दुर्गम मार्ग से पैदल क्यों आ रहे हैं। वे यह सब विस्तार से जानना चाहते थे।
राजा के इन प्रश्नों को सुनकर विश्वामित्र मुस्कराए और उन्होंने पूरा वृत्तांत कहना आरंभ किया। उन्होंने बताया कि ये दोनों अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र हैं—श्रीराम और लक्ष्मण। वे उन्हें अपने साथ इसलिए लाए हैं ताकि सिद्धाश्रम में तपस्वियों को परेशान करने वाले भयानक राक्षसों का नाश कर सकें। विश्वामित्र ने विस्तार से बताया कि कैसे इन दोनों राजकुमारों ने अपनी वीरता से उन दुष्ट राक्षसों का अंत किया और ऋषियों के यज्ञ की रक्षा की।
यह सब सुनकर राजा सुमति आश्चर्य और आनंद से भर गए। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इतने कम आयु के बालक इतने महान पराक्रम के स्वामी हो सकते हैं। उन्होंने उन्हें अत्यंत आदर और प्रेम से अतिथि के रूप में स्वीकार किया। राजा ने पूरे विधि-विधान से उनका सत्कार किया, जैसे कोई अपने घर आए देवताओं का स्वागत करता है।
राजा सुमति के प्रेमपूर्ण आतिथ्य से प्रसन्न होकर श्रीराम और लक्ष्मण वहाँ एक रात ठहरे। अगले दिन प्रातःकाल जब सूर्य की पहली किरणें धरती को आलोकित करने लगीं, तब वे सभी मिथिला की ओर प्रस्थान कर गए।
कुछ समय बाद जब वे मिथिला पहुँचे तो वहाँ की अद्भुत सुंदरता देखकर सभी ऋषि-मुनि आनंदित हो उठे। जनकपुरी की शोभा इतनी अद्वितीय थी कि सभी साधु और महर्षि उसकी प्रशंसा करते नहीं थक रहे थे।
मिथिला के एक उपवन में आगे बढ़ते हुए श्रीराम की दृष्टि एक पुराने आश्रम पर पड़ी। वह स्थान अत्यंत सुंदर था, वृक्षों और प्रकृति से भरा हुआ था, किंतु वहाँ एक अजीब सी नीरवता थी। आश्रम तो था, पर वहाँ कोई मुनि या साधक दिखाई नहीं देता था। उस स्थान की वीरानी श्रीराम के मन में प्रश्न उत्पन्न कर रही थी।
उन्होंने विनम्रता से मुनि विश्वामित्र से पूछा कि यह स्थान तो देखने में आश्रम जैसा लगता है, पर यहाँ कोई भी तपस्वी क्यों नहीं दिखाई देता। क्या पहले यहाँ कोई महात्मा रहते थे?
श्रीराम की जिज्ञासा सुनकर विश्वामित्र गंभीर हो गए। उन्होंने कहा कि यह स्थान कभी अत्यंत पवित्र और दिव्य आश्रम हुआ करता था। यहाँ महर्षि गौतम निवास करते थे। यह स्थान इतना पवित्र था कि देवता भी इसकी पूजा और प्रशंसा किया करते थे।
विश्वामित्र ने आगे बताया कि महर्षि गौतम अपनी पत्नी अहल्या के साथ इसी आश्रम में रहते थे। अहल्या अत्यंत सुंदर और तेजस्विनी स्त्री थीं। दोनों पति-पत्नी यहाँ वर्षों तक तपस्या और धर्माचरण में लगे रहे।
एक दिन ऐसा हुआ कि महर्षि गौतम किसी कार्य से आश्रम से बाहर गए हुए थे। उसी समय देवराज इन्द्र की दृष्टि अहल्या पर पड़ी। अहल्या के सौंदर्य से मोहित होकर इन्द्र के मन में पापपूर्ण विचार उत्पन्न हुआ। उन्होंने एक छलपूर्ण योजना बनाई। उन्होंने महर्षि गौतम का ही रूप धारण कर लिया और उसी वेष में आश्रम में प्रवेश किया।
अहल्या के सामने पहुँचकर इन्द्र ने उनसे मधुर वाणी में कहा कि सुंदर स्त्रियाँ और कामना रखने वाले पुरुष अवसर की प्रतीक्षा नहीं करते। उन्होंने संकेत किया कि वे उनके साथ मिलन करना चाहते हैं।
अहल्या ने तुरंत पहचान लिया कि यह उनके पति नहीं बल्कि स्वयं देवराज इन्द्र हैं। फिर भी उनके मन में एक विचित्र कौतूहल और अहंकार उत्पन्न हुआ कि स्वयं देवराज इन्द्र उन्हें चाहते हैं। उसी भ्रम और दुर्बुद्धि के कारण उन्होंने उस अनुचित प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
उस पापपूर्ण मिलन के बाद अहल्या ने इन्द्र से कहा कि वे अब तुरंत यहाँ से चले जाएँ, क्योंकि यदि महर्षि गौतम लौट आए तो उनका क्रोध अत्यंत भयंकर होगा। उन्होंने इन्द्र से अपनी और उनकी रक्षा करने का आग्रह किया।
इन्द्र हँसते हुए बोले कि वे भी संतुष्ट हो गए हैं और अब जैसे आए थे वैसे ही चले जाएँगे।
किन्तु जब इन्द्र आश्रम की कुटिया से बाहर निकले, तभी उन्हें दूर से महर्षि गौतम आते हुए दिखाई दिए। उनके हाथ में समिधाएँ थीं और उनका शरीर तीर्थ के जल से भीगा हुआ था। उनका तेज ऐसा था मानो प्रज्वलित अग्नि धधक रही हो।
महर्षि गौतम को सामने देखकर इन्द्र का हृदय भय से काँप उठा। उनका चेहरा पीला पड़ गया। वे समझ गए कि अब उनका छल छिप नहीं सकेगा।
महर्षि गौतम ने इन्द्र को अपने ही वेष में देखकर तुरंत सब समझ लिया। उनका हृदय क्रोध से भर उठा। उन्होंने कठोर वाणी में कहा कि हे दुष्ट! तूने मेरा रूप धारण करके ऐसा घोर पाप किया है जो कभी क्षमा योग्य नहीं है।
क्रोध से भरे हुए महर्षि गौतम ने इन्द्र को शाप दिया कि इस पाप के कारण तू अपने पुरुषत्व से वंचित हो जाएगा।
जैसे ही गौतम ने यह शाप दिया, उसी क्षण इन्द्र के अंडकोष पृथ्वी पर गिर पड़े और वे अत्यंत लज्जित और दुखी हो गए।
इन्द्र को दंड देने के बाद गौतम का क्रोध अपनी पत्नी अहल्या पर भी फूट पड़ा। उन्होंने कहा कि तूने भी अधर्म का मार्ग अपनाया है। इसलिए तू इस आश्रम में हजारों वर्षों तक अदृश्य होकर पड़े रहने का कष्ट भोगेगी। तू केवल वायु का सेवन करेगी और राख में पड़ी रहेगी। कोई भी तुझे देख नहीं सकेगा।
फिर गौतम ने एक आशा की किरण भी दी। उन्होंने कहा कि जब अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम इस वन में आएँगे और तेरे आश्रम में प्रवेश करेंगे, तब उनके चरणों के स्पर्श से तू पवित्र हो जाएगी। जब तू उनका आतिथ्य-सत्कार करेगी तब तेरे सारे पाप और मोह नष्ट हो जाएँगे और तू फिर से अपना दिव्य शरीर प्राप्त करके मेरे पास लौट सकेगी।
ऐसा कहकर महर्षि गौतम उस आश्रम को छोड़कर हिमालय के एक पवित्र शिखर पर चले गए, जहाँ वे सिद्धों और चारणों के बीच रहकर कठोर तपस्या करने लगे।
इस प्रकार यह आश्रम, जो कभी दिव्यता और तपस्या का केंद्र था, एक दुखद घटना के कारण सुनसान और वीरान हो गया। परन्तु उसी स्थान पर भविष्य में भगवान राम के चरणों से मुक्ति और करुणा का अद्भुत प्रकाश प्रकट होने वाला था।