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आनंदमयी यात्रा—अभिषेक की आशा में अग्रसर श्रीराम

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आनंदमयी यात्रा—अभिषेक की आशा में अग्रसर श्रीराम

 

अयोध्या का वह पावन क्षण था, जब राजमहल के भीतर और बाहर एक अद्भुत हलचल थी। महल के अन्तःपुर के द्वार पर असंख्य लोग एकत्र थे—मानो समूची अयोध्या किसी महत्वपूर्ण घटना की प्रतीक्षा में श्वास रोके खड़ी हो। इसी भीड़ को चीरते हुए, पुरातन वृत्तान्तों के ज्ञाता और महाराज दशरथ के विश्वसनीय मंत्री सुमन्त्र गंभीर और उद्देश्यपूर्ण भाव से भीतर प्रवेश करते हैं। उनके चेहरे पर एक विशेष प्रकार की तत्परता थी—जैसे वे केवल एक संदेशवाहक नहीं, बल्कि भाग्य के किसी निर्णायक क्षण के साक्षी बनने जा रहे हों।

 

भीतर का दृश्य अत्यंत भव्य और अनुशासित था। युवा प्रहरी, जिनके नेत्रों में जागरूकता और हृदय में श्रीराम के प्रति अटूट भक्ति थी, हाथों में धनुष-बाण लिए दृढ़ता से खड़े थे। उनके कानों में चमकते स्वर्ण-कुण्डल उनकी वीरता और गरिमा को और बढ़ा रहे थे। वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति के भीतर एक अदृश्य श्रद्धा और समर्पण का भाव स्पष्ट झलक रहा था।

 

ड्योढ़ी में वृद्ध पुरुष बैठे थे—गंभीर, संयमी और उत्तरदायित्व से भरे हुए। उनके गेरुए वस्त्र और हाथों की छड़ियाँ उनके अनुभव और अनुशासन के प्रतीक थे। वे केवल रक्षक नहीं थे, बल्कि अन्तःपुर की मर्यादा के प्रहरी थे। जैसे ही उन्होंने सुमन्त्र को आते देखा, सभी तुरंत सम्मानपूर्वक उठ खड़े हुए। यह केवल आदर नहीं था, बल्कि उस संदेश के प्रति भी श्रद्धा थी जो वे लेकर आए थे।

 

सुमन्त्र ने अत्यंत विनम्रता से उनसे कहा कि वे श्रीराम को सूचित करें कि वे द्वार पर प्रतीक्षा कर रहे हैं। सेवक तुरंत श्रीराम के पास पहुँचे। उस समय का दृश्य अत्यंत मधुर और दिव्य था—श्रीराम अपनी प्रिय पत्नी सीता के साथ विराजमान थे। उनके मुख पर शांति, तेज और सौम्यता का अद्भुत संगम था। सीता जी उनके समीप बैठकर चँवर डुला रही थीं, जैसे स्वयं सेवा का साक्षात् रूप बन गई हों।

 

जब श्रीराम को सुमन्त्र के आगमन का समाचार मिला, उन्होंने तुरंत उन्हें भीतर बुला लिया। सुमन्त्र जब उस कक्ष में पहुँचे, तो उन्होंने जो दृश्य देखा, वह अलौकिक था। श्रीराम स्वर्णमय पलंग पर विराजमान थे, उनके शरीर पर सुगंधित चन्दन का लेप था, जो लालिमा लिए हुए था और उनकी आभा को और दिव्य बना रहा था। वे सचमुच कुबेर के समान शोभायमान लग रहे थे—संपन्नता, तेज और सौंदर्य का अद्भुत संगम।

 

सीता जी उनके पास बैठी थीं—शांत, समर्पित और प्रेम से भरी हुई। वह दृश्य ऐसा था मानो पूर्णिमा का चन्द्रमा अपनी प्रिय रोहिणी नक्षत्र के साथ आकाश में विराजमान हो। सुमन्त्र उस दिव्यता से अभिभूत हो उठे। उन्होंने विनम्रतापूर्वक प्रणाम किया और महाराज दशरथ का संदेश सुनाया—कि वे तुरंत उन्हें देखना चाहते हैं।

 

संदेश सुनकर श्रीराम के मन में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। उन्होंने सीता से अत्यंत स्नेहपूर्वक कहा कि अवश्य ही पिता और माता कैकेयी उनके अभिषेक के विषय में विचार कर रहे होंगे। उनके शब्दों में उत्साह, श्रद्धा और विश्वास था। उन्हें विश्वास था कि माता कैकेयी भी उनके हित में ही सोच रही होंगी और उनके अभिषेक के लिए ही प्रेरित कर रही होंगी।

 

वे बड़े सरल और निष्कपट भाव से अपनी माता कैकेयी की प्रशंसा करते हैं—यह दर्शाता है कि उनके हृदय में किसी के प्रति कोई संदेह या द्वेष नहीं था। उनके मन में केवल प्रेम, विश्वास और कर्तव्य की भावना थी। वे अत्यंत प्रसन्न होकर कहते हैं कि आज ही संभवतः उनका युवराज के रूप में अभिषेक होगा।

 

सीता जी यह सुनकर अत्यंत प्रसन्न होती हैं। उनके हृदय में अपने पति के लिए गर्व और प्रेम उमड़ पड़ता है। वे उनके मंगल की कामना करती हुई उन्हें द्वार तक विदा करने जाती हैं। उनके शब्द आशीर्वाद से भरे होते हैं—वे कामना करती हैं कि श्रीराम न केवल युवराज बनें, बल्कि आगे चलकर राजसूय यज्ञ के माध्यम से सम्राट भी बनें।

 

वे देवताओं से उनकी रक्षा की प्रार्थना करती हैं—पूर्व में इन्द्र, दक्षिण में यमराज, पश्चिम में वरुण और उत्तर में कुबेर। यह केवल आशीर्वाद नहीं था, बल्कि एक पत्नी का अपने पति के लिए पूर्ण समर्पण और शुभकामना का प्रतीक था।

 

श्रीराम जब महल से बाहर निकलते हैं, तो उनका रूप सिंह के समान प्रतीत होता है जो पर्वत की गुफा से निकल रहा हो। बाहर लक्ष्मण पहले से ही हाथ जोड़े खड़े थे—उनकी आँखों में अपने बड़े भाई के प्रति असीम श्रद्धा और प्रेम था।

 

आगे बढ़ते हुए श्रीराम अपने मित्रों और प्रजाजनों से मिलते हैं। वे सभी को संतुष्ट करते हुए आगे बढ़ते हैं और फिर एक भव्य रथ पर आरूढ़ होते हैं। वह रथ अत्यंत दिव्य था—स्वर्ण और मणियों से सुसज्जित, जिसकी चमक आँखों को चकाचौंध कर देती थी। उसकी गर्जना मेघों के समान गम्भीर थी।

 

घोड़े बलवान और तेजस्वी थे, और लक्ष्मण उनके पीछे चँवर लिए बैठे थे—सदैव अपने भ्राता की सेवा और रक्षा के लिए तत्पर।

 

जैसे ही रथ आगे बढ़ता है, अयोध्या की गलियाँ जनसमूह से भर जाती हैं। लोग उत्साह और हर्ष से भर उठते हैं। स्त्रियाँ महलों की खिड़कियों से पुष्पवर्षा करती हैं, वंदीजन स्तुति गाते हैं, और चारों ओर जय-जयकार गूँज उठती है।

 

अयोध्या का प्रत्येक नागरिक उस क्षण को अपने जीवन का सबसे बड़ा उत्सव मान रहा था। वे आपस में कहते हैं कि यदि श्रीराम राजा बनते हैं, तो यह पूरे राज्य के लिए सबसे बड़ा सौभाग्य होगा—क्योंकि उनके शासन में कोई दुखी नहीं रहेगा।

 

राजमार्ग अत्यंत भव्य और सुसज्जित था—रत्नों से भरी दुकानें, स्वच्छ मार्ग, और चारों ओर उमड़ती भीड़। हाथी, घोड़े, रथ—सब कुछ उस उत्सव को और भव्य बना रहे थे।

 

इस प्रकार, श्रीराम उस दिव्य और उत्सवपूर्ण वातावरण में आगे बढ़ते जा रहे थे—बिलकुल उस चन्द्रमा की तरह, जो बादलों के बीच से निकलकर सम्पूर्ण आकाश को आलोकित कर देता है। उनके चेहरे पर शांति, हृदय में विनम्रता और भविष्य के प्रति एक उज्ज्वल आशा थी—परन्तु नियति के गर्भ में क्या छिपा है, यह कोई नहीं जानता था… ✨