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इंगुदी-वृक्ष के नीचे भरत का हृदय-विलाप

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इंगुदी-वृक्ष के नीचे भरत का हृदय-विलाप

निषादराज गुह की एक-एक बात सुनते हुए भरत का हृदय पहले ही दुःख से भर चुका था। अब वे अपने मन्त्रियों और समस्त माताओं को साथ लेकर उस स्थान पर पहुँचे, जहाँ इंगुदी-वृक्ष की जड़ के पास श्रीराम ने पहली रात विश्राम किया था। जैसे ही उनकी दृष्टि उस स्थान पर पड़ी, वे ठिठक गए। उनकी आँखें उस भूमि को ऐसे निहारने लगीं मानो वहाँ स्वयं श्रीराम की छवि अंकित हो। वे झुककर उस शय्या का निरीक्षण करने लगे, जहाँ कभी उनके आराध्य बड़े भाई ने विश्राम किया था।

भरत ने काँपते हुए स्वर में माताओं से कहा—“माताओं! यही वह पवित्र स्थान है, जहाँ प्रभु श्रीराम ने धरती को अपनी शय्या बनाया था। देखिए, ये कुश अभी भी उनके शरीर के स्पर्श से दबे हुए हैं। इन्हीं पर उन्होंने पूरी रात बिताई थी।” उनके शब्दों में श्रद्धा भी थी और करुणा भी। उस स्थान को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे धरती ने उस रात का स्मरण आज भी सँजोकर रखा हो।

भरत का हृदय यह स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था कि महाराज दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र, समस्त राजकुल के गौरव, महान बुद्धिमान और धर्मात्मा श्रीराम इस प्रकार कठोर भूमि पर सोए होंगे। वे बार-बार सोचते—“ऐसे राजकुमार, जिनके लिए हर सुख उपलब्ध था, क्या सचमुच इस प्रकार कष्ट सह रहे हैं?” यह विचार ही उनके लिए असहनीय था।

उनकी आँखों के सामने अयोध्या का राजमहल घूमने लगा। उन्हें स्मरण आया कि श्रीराम तो सदैव मुलायम मृगचर्म और उत्तम बिछौनों से सजे पलंग पर विश्राम करते थे। उनके लिए हर प्रकार की सुविधा रहती थी। वही श्रीराम आज इस कठोर धरती पर कैसे सो पाए होंगे? यह कल्पना ही भरत के हृदय को भीतर तक चीर रही थी।

फिर उनके मन में राजमहलों की भव्यता उभर आई। वे महल, जिनकी फर्श सोने और चाँदी से अलंकृत थी, जहाँ चन्दन और अगुरु की सुगन्ध सदा वातावरण में फैली रहती थी, जहाँ पुष्पों की मनोहर सजावट होती थी, जहाँ तोतों का मधुर कलरव गूँजता था, जहाँ शीतलता और सुगन्ध का अद्भुत संगम रहता था, जहाँ दीवारें स्वर्ण से सुसज्जित थीं और जिनकी ऊँचाई मानो मेरु पर्वत को चुनौती देती थी। उन्हीं महलों में रहने वाले श्रीराम आज वन की कठोर भूमि पर सो रहे हैं—यह सोचते ही भरत का कलेजा फटने लगा।

भरत को वे प्रभात भी याद आने लगे जब श्रीराम को जगाने के लिए राजमहल में मधुर गीत गूँजते थे। वीणाओं, मृदंगों और वाद्यों की ध्वनि वातावरण को पवित्र बना देती थी। वन्दीजन और सूत-मागध उनकी स्तुति करते हुए उन्हें जगाते थे। जिनके जागने का प्रत्येक क्षण उत्सव बन जाता था, वे आज इस निर्जन वन में बिना किसी सेवा और सम्मान के धरती पर विश्राम कर रहे हैं। यह सोचकर भरत का मन शोक से भर उठा।

उनकी बुद्धि इस दृश्य को स्वीकार नहीं कर पा रही थी। वे बार-बार स्वयं से पूछते—“क्या यह वास्तव में हो रहा है? क्या यह कोई भ्रम है? क्या मैं कोई भयानक स्वप्न देख रहा हूँ?” उनका मन सत्य और असत्य के बीच डगमगा रहा था। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसा भी संभव है।

फिर उन्होंने गहरी साँस लेते हुए कहा—“निश्चय ही काल से अधिक शक्तिशाली कोई नहीं। यदि स्वयं धर्म के स्वरूप श्रीराम को भी ऐसी कठिनाई सहनी पड़ी है, तो यह केवल काल की ही लीला है। उसके आगे किसी का बल नहीं चलता।”

इतना कहकर उनकी दृष्टि सीता माता की ओर चली गई। उन्होंने मन-ही-मन सोचा—“विदेहराज जनक की लाड़ली पुत्री, महाराज दशरथ की प्रिय पुत्रवधू, राजमहलों की रानी सीता भी आज इसी धरती पर सो रही हैं।” यह विचार उनके दुःख को और भी गहरा कर गया।

भरत धीरे-धीरे उस शय्या के निकट पहुँचे। उन्होंने भूमि को स्पर्श करते हुए कहा—“यही मेरे बड़े भाई की शय्या है। यहीं उन्होंने करवटें बदली होंगी। इस कठोर भूमि ने उनके शरीर का भार सहा होगा। देखिए, उनके शरीर के स्पर्श से दबे हुए तिनके आज भी वैसे ही पड़े हैं।” मानो वह भूमि उनके लिए किसी तीर्थ से भी अधिक पवित्र हो गई थी।

उसी समय उनकी दृष्टि कुछ चमकते हुए स्वर्णकणों पर पड़ी। भरत ने भावुक होकर कहा—“लगता है, सीता माता अपने आभूषण उतारने का भी ध्यान न रख सकीं। वे जैसे थीं, वैसे ही इस शय्या पर विश्राम कर गईं। इन्हीं आभूषणों के छोटे-छोटे स्वर्णकण आज भी यहाँ बिखरे पड़े हैं।”

थोड़ी ही दूर रेशम के कुछ चमकते हुए तंतु दिखाई दिए। भरत ने उन्हें अत्यन्त श्रद्धा से देखा और बोले—“यह अवश्य माता सीता की चादर के धागे हैं। रात में करवट बदलते समय उनकी चादर यहाँ कहीं उलझ गई होगी। ये रेशमी तंतु आज भी उस घटना के मौन साक्षी बने हुए हैं।”

इन सब चिन्हों को देखकर भरत के मन में एक गहरा भाव उत्पन्न हुआ। उन्होंने कहा—“सच्ची पतिव्रता स्त्री के लिए सुख बिछौनों में नहीं, अपने पति के साथ रहने में होता है। चाहे शय्या फूलों की हो या कठोर पत्थरों की, यदि पति साथ हों तो वही सबसे सुखद होती है। इसी कारण कोमल और राजमहलों में पली-बढ़ी सीता माता ने भी इस वनवास को दुःख नहीं माना।”

यह कहते-कहते भरत का धैर्य टूट गया। वे विलाप करने लगे—“धिक्कार है मेरे जीवन को! मैं कितना अभागा और पापी हूँ कि मेरे कारण श्रीराम और सीता को अनाथों की तरह इस कठोर भूमि पर सोना पड़ा। यदि मैं पहले ही सब कुछ रोक पाता, तो आज यह दिन कभी न आता।”

भरत की आँखों के सामने श्रीराम का तेजस्वी स्वरूप आ गया। वे बोले—“जो चक्रवर्ती सम्राट के कुल में जन्मे, जिनका श्याम शरीर नीलकमल के समान सुन्दर है, जिनकी लालिमा लिए आँखें सबको मोह लेती हैं, जो समस्त संसार को सुख देने वाले हैं और जो केवल सुख भोगने के ही अधिकारी हैं, वे आज अपने प्रिय राज्य का त्याग कर इस कठोर भूमि पर शयन कर रहे हैं। इससे अधिक दुःखद दृश्य और क्या हो सकता है?”

इसके बाद उनका ध्यान लक्ष्मण की ओर गया। वे बोले—“सचमुच लक्ष्मण धन्य हैं। संकट की इस घड़ी में उन्होंने अपने बड़े भाई का साथ नहीं छोड़ा। वे हर पल उनकी सेवा में लगे हैं। ऐसा सौभाग्य विरले ही किसी को मिलता है।”

फिर भरत ने सीता माता का स्मरण किया और कहा—“माता सीता भी धन्य हैं, जिन्होंने अपने पति का साथ किसी भी परिस्थिति में नहीं छोड़ा। और हम… हम सब उनसे बिछुड़ गए हैं। अब तो यह भी नहीं जानते कि जब हम उनके पास जाएँगे, तब वे हमारी सेवा स्वीकार करेंगे या नहीं।”

भरत को लगा जैसे संसार का आधार ही छिन गया हो। उन्होंने कहा—“पिताश्री स्वर्ग चले गए, श्रीराम वन को चले गए। अब यह सम्पूर्ण पृथ्वी मुझे ऐसी नौका जैसी लगती है, जिसका नाविक खो गया हो। सब कुछ होते हुए भी सब कुछ सूना प्रतीत होता है।”

उन्होंने आगे कहा—“फिर भी आश्चर्य देखिए। श्रीराम वन में रहते हुए भी उनके पराक्रम का ऐसा प्रभाव है कि कोई शत्रु इस पृथ्वी पर बुरी दृष्टि डालने का साहस नहीं करता। उनका केवल नाम ही सम्पूर्ण राज्य की रक्षा कर रहा है।”

भरत ने अयोध्या की वर्तमान दशा का वर्णन करते हुए अत्यन्त दुःखी स्वर में कहा—“आज नगर की रक्षा व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो चुकी है। हाथी-घोड़े खुले घूम रहे हैं। द्वार खुले पड़े हैं। सेना में उत्साह नहीं है। रक्षक उदास हैं। नगर मानो असहाय हो गया है। फिर भी कोई शत्रु आक्रमण करने का साहस नहीं करता, क्योंकि सब जानते हैं कि श्रीराम का तेज और पराक्रम आज भी अयोध्या की रक्षा कर रहा है।”

इसके बाद भरत ने वहीं एक महान संकल्प लिया। उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा—“आज से मैं भी भूमि पर या तिनकों पर ही सोऊँगा। फल-मूल ही खाऊँगा। वल्कल वस्त्र पहनूँगा और जटाएँ धारण करूँगा। जब तक मेरे प्रभु वन में कष्ट सहेंगे, तब तक मैं भी सुख का एक क्षण भी स्वीकार नहीं करूँगा।”

फिर उन्होंने निश्चय किया—“वनवास के जितने वर्ष शेष हैं, वे मैं स्वयं वन में बिताऊँगा। इससे श्रीराम की प्रतिज्ञा भी अक्षुण्ण रहेगी और वे अयोध्या लौटकर अपने अधिकार का राज्य सँभालेंगे।”

उन्होंने आगे कहा—“शत्रुघ्न मेरे साथ वन में रहेंगे और मेरे बड़े भाई श्रीराम, लक्ष्मण के साथ अयोध्या का पालन करेंगे। यही उचित व्यवस्था है।”

भरत की आँखों में आशा की एक किरण जगी। उन्होंने कल्पना की कि अयोध्या के ब्राह्मण पुनः श्रीराम का राजतिलक कर रहे हैं। उनके मुख से प्रार्थना निकली—“हे देवताओं! यदि मेरे जीवन में कोई पुण्य शेष है, तो मेरे इस मनोरथ को अवश्य पूर्ण कीजिए।”

अन्त में भरत ने अपना अटल निश्चय प्रकट किया। उन्होंने कहा—“मैं श्रीराम के चरणों में गिरकर उनसे बार-बार विनती करूँगा। यदि वे मेरी लाख प्रार्थनाओं के बाद भी अयोध्या लौटने के लिए तैयार न हुए, तो मैं भी उनके साथ इसी वन में रहूँगा। वे मुझे कभी अपने से दूर नहीं करेंगे। उनके चरणों की सेवा ही अब मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य है।”