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इक्ष्वाकु वंश में एक दिव्य अवतरण

महाराजा अग्रसेन जीवन दर्शन (भाग–3)

इक्ष्वाकु वंश में एक दिव्य अवतरण

 

एक शुभ प्रभात… (महाराजा अग्रसेन जन्म-काव्य)

अरुण किरण जब नभ पर बिखरी, मंगलमय वह भोर हुई,
प्रतापपुर की पावन धरती, नव आशा से विभोर हुई।
मंद समीर सुगंध बिखेरे, पंछी मधुर स्वर गाने लगे,
मानो देवों के स्वागत में, स्वयं प्रकृति मुस्काने लगे।

धर्ममयी उस पुण्य धरा पर, शुभ घड़ी ने दस्तक दी,
वल्लभसेन के राजमहल में, खुशियों ने फिर झंकार की।
भगवती की पावन गोदी में, दिव्य प्रभा मुस्काई थी,
मानो नव इतिहास रचने, स्वयं नियति ही आई थी।

मुखमंडल था चंद्र समान, तेज अलौकिक झलक रहा,
निर्मल मुस्कान देखकर हर जन, प्रेम-सुधा में भीग रहा।
जिसने देखा वही ठहरकर, उस अनुपम छवि में खो गया,
जैसे जीवन का हर अँधियारा, एक क्षण में ही सो गया।

महलों से जब शुभ समाचार, नगर-नगर में फैल गया,
हर आँगन में हर्ष उमड़कर, मंगल-दीपक खेल गया।
जन-जन के मुख पर मुस्कानें, आँखों में उत्साह नया,
प्रतापपुर का कण-कण बोला— आया युग का सूर्य नया।

यह केवल इक बालक का ही, साधारण अवतार न था,
आने वाले स्वर्णिम युग का, यह प्रथम उजास अपार था।
जिसके जीवन से जग सीखे, सेवा, समता, धर्म महान्,
ऐसे दिव्य अग्रसेन का, शत-शत करता है गुणगान।

आज भी जब यह जन्मकथा, श्रद्धा से हम गाते हैं,
सत्य, करुणा, सेवा का पथ, जीवन में अपनाते हैं।
महापुरुषों का जन्म सदा ही, युग परिवर्तन लाता है,
धर्ममय जीवन जीने वाला, अमर जगत् में हो जाता है।

 

 

भूमिका

भारतीय इतिहास में अनेक ऐसे महान् सम्राट हुए हैं, जिन्होंने केवल अपने राज्य का ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज का भविष्य बदल दिया। उन्हीं महान विभूतियों में एक नाम है—महाराजा अग्रसेन। वे केवल एक पराक्रमी राजा ही नहीं, बल्कि समानता, सहयोग, दया, धर्म और लोककल्याण पर आधारित समाज व्यवस्था के प्रवर्तक भी माने जाते हैं।

अग्रवाल समाज उन्हें अपना आदि पुरुष मानकर श्रद्धापूर्वक स्मरण करता है। उनकी जयंती केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सेवा, त्याग और सामाजिक समरसता के आदर्शों को पुनः स्मरण करने का अवसर होती है।

महाराजा अग्रसेन के जीवन से जुड़ी अनेक कथाएँ समाज में प्रचलित हैं। कुछ कथाएँ प्राचीन ग्रंथों में वर्णित हैं, जबकि कुछ लोकपरंपराओं के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही हैं।

महाराजा अग्रसेन के जन्म का वर्णन अनेक परम्पराओं, वंशावलियों तथा अग्रसेन पुराण में मिलता है। यद्यपि विभिन्न ग्रंथों और लोकपरम्पराओं में कुछ विवरणों में अंतर दिखाई देता है, फिर भी सभी इस बात पर सहमत हैं कि उनका जन्म किसी साधारण राजकुमार के रूप में नहीं, बल्कि समाज के भविष्य को नई दिशा देने वाले महापुरुष के रूप में हुआ था।

यह जन्म-कथा केवल एक राजकुमार के जन्म का वर्णन नहीं करती, बल्कि यह बताती है कि जब धर्म, न्याय और लोकमंगल की आवश्यकता होती है, तब इतिहास ऐसे व्यक्तित्वों को जन्म देता है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श बन जाते हैं।

 

महर्षि जैमिनि द्वारा जनमेजय को सुनाई गई दिव्य कथा

कथा के अनुसार एक अवसर पर सम्राट् जनमेजय धर्म के वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए अत्यन्त उत्सुक थे। उनके मन में अनेक प्रश्न उठ रहे थे कि ऐसा कौन-सा राजा हुआ है जिसने अपने जीवन से मानवता के लिए आदर्श स्थापित किए हों।

तब महर्षि जैमिनि ने कहा कि यदि तुम वास्तव में धर्म, न्याय और लोककल्याण के सर्वोच्च आदर्श को जानना चाहते हो, तो मैं तुम्हें ऐसे महान् सम्राट् की कथा सुनाऊँगा, जिनके समान राजा इस पृथ्वी पर अत्यन्त दुर्लभ हैं। वे थे—महाराजा अग्रसेन

महर्षि के इन वचनों ने जनमेजय के मन में गहरी जिज्ञासा जगा दी। उन्होंने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया—

“भगवन्! मैं उस महान् पुरुष के जीवन के विषय में विस्तार से सुनना चाहता हूँ। कृपया उनके पुण्य कर्मों, उनके आदर्शों और उनके जीवन की प्रेरणादायक कथा का वर्णन कीजिए, जिससे मेरे जीवन में भी धर्म का प्रकाश हो सके।”

यह केवल एक राजा की कथा सुनने की इच्छा नहीं थी, बल्कि धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझने की विनम्र प्रार्थना थी।

शिक्षा

सच्चा ज्ञान उसी व्यक्ति को प्राप्त होता है जिसके भीतर जिज्ञासा के साथ विनम्रता भी होती है। अहंकार ज्ञान के द्वार बंद कर देता है, जबकि विनम्रता उन्हें खोल देती है।

 

इक्ष्वाकु वंश की गौरवशाली परंपरा

महर्षि जैमिनि मुस्कुराए और बोले—

“हे राजन्! महाराजा अग्रसेन जिस इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए, उसकी महिमा का पूर्ण वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। यदि वर्षों तक भी उसके प्रत्येक महान् राजा की कथा कही जाए, तब भी वह समाप्त नहीं होगी।”

इक्ष्वाकु वंश केवल राजसत्ता का प्रतीक नहीं था। यह धर्म, सत्य, त्याग, न्याय और लोककल्याण की अखंड परंपरा का जीवंत स्वरूप था।

इसी गौरवशाली वंश में महाराजा मान्धाता जैसे चक्रवर्ती सम्राट् हुए, जिन्होंने अपने पराक्रम से पृथ्वी को गौरवान्वित किया। महाराजा दिलीप ने गौ-सेवा और धर्मपालन का सर्वोच्च आदर्श स्थापित किया। महाराजा भगीरथ ने अपने कठोर तप से माँ गंगा को पृथ्वी पर लाकर असंभव को संभव कर दिखाया। महाराजा रघु ने सत्य और दानशीलता की ऐसी परंपरा स्थापित की कि आज भी “रघुकुल रीति” का उदाहरण दिया जाता है। इसी वंश में आगे चलकर भगवान् श्रीराम ने मर्यादा, त्याग और आदर्श जीवन का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत किया।

सूर्यवंश की सबसे बड़ी विशेषता केवल उसका वैभव नहीं था, बल्कि उसका धर्म था। इस वंश के राजा अपने राज्य को व्यक्तिगत अधिकार नहीं, बल्कि ईश्वर द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी मानते थे। उनके लिए प्रजा ही परिवार थी और न्याय ही शासन का प्राण था।

ऐसे दिव्य और तेजस्वी वंश में जन्म लेना स्वयं इस बात का संकेत था कि आगे चलकर जन्म लेने वाला बालक भी साधारण नहीं होगा।

शिक्षा

मनुष्य का कुल उसे सम्मान दिला सकता है, किन्तु उसकी वास्तविक पहचान उसके अपने कर्मों से बनती है। महान् वंश में जन्म लेना सौभाग्य है, परन्तु महान् बनना पुरुषार्थ का परिणाम है।

 

महर्षि जैमिनि ने जनमेजय से कहा—

इक्ष्वाकु वंश की गौरवशाली परम्परा समय के साथ आगे बढ़ती रही। इस वंश में अनेक तेजस्वी और धर्मपरायण राजाओं ने जन्म लिया, जिन्होंने अपने सद्गुणों और लोककल्याणकारी कार्यों से सूर्यवंश की कीर्ति को और अधिक उज्ज्वल बनाया।

इसी वंश में महाराजा विश्वसाह हुए। उनके पुत्र महाराजा प्रसेनजित ने अपने पराक्रम और दूरदर्शिता से एक ऐसे दुर्गम नगर का निर्माण कराया, जिसे शत्रुओं के लिए जीतना लगभग असम्भव था। उनके पश्चात् उनके वीर और प्रतापी पुत्र महाराजा बृहत्सेन ने राज्य की प्रतिष्ठा को और अधिक ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

समय बीतता गया और उसी तेजस्वी वंश में एक ऐसे राजा का जन्म हुआ, जिनका नाम था—महाराजा वल्लभसेन

वे केवल सिंहासन पर बैठे हुए शासक नहीं थे, बल्कि अपनी प्रजा के सुख-दुःख को अपना कर्तव्य मानने वाले आदर्श राजा थे। उनके लिए राज्य केवल शासन करने का साधन नहीं, बल्कि प्रजा की सेवा करने का पवित्र उत्तरदायित्व था।

 

प्रतापपुर – प्रकृति और समृद्धि से परिपूर्ण राजधानी

महाराजा वल्लभसेन की राजधानी का नाम था प्रतापपुर

यह कोई साधारण नगर नहीं था। चारों ओर से सुदृढ़ परकोटों से सुरक्षित यह नगर अपनी भव्यता और समृद्धि के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। ऊँचे प्राकारों से सुसज्जित यह नगरी मानो सूर्य की किरणों में स्वर्ण-सी चमकती थी।

प्रतापपुर की सबसे बड़ी विशेषता उसकी प्राकृतिक सुरक्षा थी। नगर तीन दिशाओं से नदी से घिरा हुआ था। इस कारण शत्रुओं के लिए वहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन था। यह केवल सामरिक दृष्टि से ही सुरक्षित नहीं था, बल्कि व्यापार, कृषि और संस्कृति का भी एक महत्वपूर्ण केन्द्र था।

बाज़ारों में समृद्धि थी, खेतों में हरियाली लहलहाती थी और नगर के प्रत्येक मार्ग पर अनुशासन तथा स्वच्छता दिखाई देती थी। प्रजा निडर होकर अपना जीवन व्यतीत करती थी। न्याय इतना निष्पक्ष था कि किसी को अन्याय का भय नहीं रहता था।

महाराजा वल्लभसेन प्रजा की आवश्यकताओं का स्वयं ध्यान रखते थे। वे समय-समय पर नगर और ग्रामों का भ्रमण कर लोगों की समस्याएँ सुनते तथा उनका समाधान करते थे। उनके शासन में धर्म और न्याय दोनों साथ-साथ चलते थे।

वल्लभसेन मानते थे कि—

“राजा का वैभव महलों से नहीं, बल्कि प्रजा के चेहरे पर दिखाई देने वाली मुस्कान से मापा जाना चाहिए।”

यही विचार आगे चलकर सम्राट् अग्रसेन की सम्पूर्ण जीवन-दृष्टि का आधार बना।

 

यद्यपि प्रतापपुर की आधुनिक भौगोलिक पहचान को लेकर विद्वानों में विभिन्न मत हैं, फिर भी अधिकांश परम्पराएँ इसे महाराजा वल्लभसेन की राजधानी के रूप में स्वीकार करती हैं।

 

शिक्षा

महान् व्यक्तित्व कभी अचानक नहीं बनते। उनके पीछे एक महान् परिवार, उच्च संस्कार, धर्मनिष्ठ परम्परा और आदर्श वातावरण होता है। जिस प्रकार उपजाऊ भूमि में श्रेष्ठ बीज फलता-फूलता है, उसी प्रकार श्रेष्ठ संस्कारों में पला-बढ़ा बालक आगे चलकर समाज का मार्गदर्शक बनता है।
राजा वही महान् कहलाता है जो अपने वैभव से नहीं, बल्कि अपनी प्रजा के सुख और सुरक्षा से पहचाना जाए। सत्ता का वास्तविक उद्देश्य सेवा है, स्वार्थ नहीं।

 

महारानी भगवती – करुणा, धर्म और मर्यादा की प्रतिमूर्ति

महाराजा वल्लभसेन की धर्मपत्नी थीं विदर्भ देश की राजकुमारी महारानी भगवती

उनका नाम ही उनके व्यक्तित्व का परिचय था।

वे अत्यन्त सुशील, विनम्र, धर्मनिष्ठ और करुणामयी थीं। राजमहल में रहते हुए भी उनमें कभी अहंकार नहीं आया। राजमहल का प्रत्येक सेवक उन्हें माता के समान सम्मान देता था। वे प्रतिदिन देवपूजन करतीं, ब्राह्मणों और साधु-संतों का सत्कार करतीं तथा निर्धनों की सहायता में सदैव प्रसन्नता अनुभव करती थीं।

महारानी भगवती का हृदय अत्यंत संवेदनशील था।

यदि किसी परिवार में दुःख होता तो वे स्वयं उसके घर तक सहायता पहुँचवाती थीं।

विधवाओं, अनाथों, निर्धनों और रोगियों की सेवा उनके जीवन का नियमित भाग थी।

राजमहल से प्रतिदिन अन्न, वस्त्र और औषधियों का वितरण होता था।

वे मानती थीं—

“जिस राज्य में कोई भूखा सो जाए, वहाँ राजा और रानी का वैभव अधूरा है।”

 

राजा और रानी दोनों ही धर्म, दान और सेवा में समान रुचि रखते थे। उनके जीवन में धन, वैभव, सम्मान और समृद्धि का कोई अभाव नहीं था। सम्पूर्ण राज्य सुखी था, किन्तु उनके हृदय में एक ऐसी रिक्तता थी जिसे कोई वैभव भर नहीं पा रहा था।

उन्हें एक योग्य उत्तराधिकारी की प्रतीक्षा थी।

यद्यपि वे ईश्वर की इच्छा को सर्वोपरि मानते थे, फिर भी उनके मन में यह प्रार्थना रहती कि यदि उन्हें ऐसा पुत्र प्राप्त हो जो केवल उनके वंश का ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज का गौरव बने, तो उनका जीवन धन्य हो जाए।

राजा और रानी ने कभी अधैर्य नहीं दिखाया। उन्होंने तप, पूजा, दान, यज्ञ और सत्कर्मों का मार्ग अपनाया। वे जानते थे कि ईश्वर उचित समय पर ही अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

शिक्षा

जीवन की प्रत्येक इच्छा तुरंत पूरी नहीं होती। धैर्य, विश्वास और सत्कर्म मनुष्य को उस फल तक पहुँचाते हैं, जो केवल अधीरता से कभी प्राप्त नहीं हो सकता।

 

एक महान् आत्मा के आगमन की तैयारी

भारतीय परम्परा में यह माना जाता है कि महान् आत्माएँ उसी घर में जन्म लेती हैं जहाँ माता-पिता का जीवन सात्त्विक, पवित्र और लोकहितकारी हो।

महाराज वल्लभसेन और महारानी भगवती का जीवन भी ऐसा ही था।

उनके आचरण ने उस दिव्य आत्मा के स्वागत के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार कर दिया था, जो आगे चलकर केवल एक राजा ही नहीं, बल्कि समानता, अहिंसा, सहयोग, उद्यम और सामाजिक न्याय का नया युग स्थापित करने वाला था।

 

एक शुभ प्रभात… जिसने इतिहास बदल दिया

समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा।

फिर वह परम मंगलमय दिन आया, जिसका प्रतापपुर की प्रजा वर्षों से इंतज़ार कर रही थी।

आश्विन मास का शुक्ल पक्ष प्रारम्भ हो चुका था। प्रतिपदा की पावन तिथि थी। रविवार का शुभ दिन था। चारों ओर प्रकृति मानो किसी अद्भुत उत्सव की तैयारी कर रही थी।

प्रातःकाल की कोमल अरुणिमा धीरे-धीरे आकाश में फैल रही थी। पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को मंगलमय बना रहा था। मंद-मंद शीतल पवन बह रही थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो सम्पूर्ण प्रकृति किसी दिव्य अतिथि के स्वागत में सज गई हो।

इसी शुभ मुहूर्त में महारानी भगवती ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया।

जन्म लेते ही बालक का मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा की भाँति आभामय दिखाई देता था। उसके मुखमण्डल पर अद्भुत तेज, विलक्षण शान्ति और असाधारण आकर्षण झलक रहा था। उसे देखने वाला प्रत्येक व्यक्ति सहज ही उसकी ओर खिंचा चला जाता था।

महल में आनन्द की लहर दौड़ गई। शंख और नगाड़ों की ध्वनि गूँज उठी। मंदिरों में घंटियाँ बजने लगीं। राजमहल के द्वार सभी के लिए खोल दिए गए।

समाचार पवन की गति से पूरे प्रतापपुर में फैल गया—

“महाराज वल्लभसेन के यहाँ पुत्ररत्न का जन्म हुआ है!”

क्षणभर में सम्पूर्ण नगर उत्सव में डूब गया।

इस प्रसंग से मिलने वाली शिक्षाएँ

  • महान् संतानों का निर्माण केवल जन्म से नहीं, बल्कि माता-पिता के संस्कारों से होता है।
  • आदर्श शासन की नींव न्याय और करुणा पर टिकती है।
  • राजा का सबसे बड़ा धर्म प्रजा का सुख है।
  • धन और वैभव तभी सार्थक हैं जब उनका उपयोग समाज की सेवा में हो।
  • पति-पत्नी यदि धर्म और सदाचार के मार्ग पर साथ चलें तो परिवार और समाज दोनों समृद्ध होते हैं।
  • महान् व्यक्तित्वों के पीछे सदैव महान् संस्कारों का आधार होता है।

 

 

लघु उत्तरीय प्रश्न (उत्तर सीमा: 30 शब्द)

1. महाराजा अग्रसेन को भारतीय इतिहास में किस रूप में स्मरण किया जाता है?
उत्तर: महाराजा अग्रसेन समानता, सहयोग, दया, धर्म, लोककल्याण और आदर्श समाज व्यवस्था के प्रवर्तक महान् सम्राट् के रूप में स्मरण किए जाते हैं।

 

2. अग्रवाल समाज महाराजा अग्रसेन को किस रूप में मानता है?
उत्तर: अग्रवाल समाज महाराजा अग्रसेन को अपना आदिपुरुष मानकर श्रद्धापूर्वक स्मरण करता है तथा उनकी जयंती को सेवा और समरसता का पर्व मानता है।

 

3. प्रस्तुत लेख में महाराजा अग्रसेन की जन्म-कथा का आधार क्या रखा गया है?
उत्तर: लेख में मुख्य आधार प्राचीन ग्रंथों में वर्णित जन्म-कथा है तथा आवश्यक स्थानों पर लोकपरंपराओं का संतुलित समावेश किया गया है।

 

4. महर्षि जैमिनि ने जनमेजय को किस महान् राजा की कथा सुनाने का निर्णय लिया?
उत्तर: महर्षि जैमिनि ने धर्म, न्याय और लोककल्याण के आदर्श सम्राट् महाराजा अग्रसेन की प्रेरणादायक कथा सुनाने का निर्णय लिया।

 

5. जनमेजय ने महर्षि जैमिनि से क्या प्रार्थना की?
उत्तर: जनमेजय ने महाराजा अग्रसेन के पुण्य कर्मों, आदर्शों और धर्ममय जीवन की कथा विस्तार से सुनाने की प्रार्थना की।

 

6. इक्ष्वाकु वंश की सबसे बड़ी विशेषता क्या थी?
उत्तर: इक्ष्वाकु वंश धर्म, सत्य, न्याय, त्याग और लोककल्याण की महान् परम्परा का प्रतीक था।

 

7. इक्ष्वाकु वंश के किन-किन महान् राजाओं का उल्लेख किया गया है?
उत्तर: मान्धाता, दिलीप, भगीरथ, रघु तथा भगवान् श्रीराम जैसे महान् राजाओं का उल्लेख किया गया है।

 

8. महाराजा वल्लभसेन किस प्रकार के शासक थे?
उत्तर: महाराजा वल्लभसेन धर्मनिष्ठ, न्यायप्रिय, प्रजावत्सल और सेवा-भाव से शासन करने वाले आदर्श शासक थे।

 

9. प्रतापपुर नगर की प्राकृतिक सुरक्षा का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर: प्रतापपुर तीन दिशाओं से नदी से घिरा था, जिससे वह शत्रुओं के लिए अत्यन्त दुर्गम और सुरक्षित नगर था।

 

10. महाराजा वल्लभसेन प्रजा की समस्याओं का समाधान कैसे करते थे?
उत्तर: वे स्वयं नगर और ग्रामों का भ्रमण कर प्रजा की समस्याएँ सुनते और उनका न्यायपूर्ण समाधान करते थे।

 

11. महारानी भगवती के प्रमुख गुण कौन-कौन से थे?
उत्तर: महारानी भगवती धर्मनिष्ठ, करुणामयी, विनम्र, दानशील, सेवाभावी तथा मर्यादापूर्ण जीवन जीने वाली आदर्श रानी थीं।

 

12. महारानी भगवती समाज-सेवा किस प्रकार करती थीं?
उत्तर: वे निर्धनों, रोगियों, विधवाओं और अनाथों की सहायता करतीं तथा प्रतिदिन अन्न, वस्त्र और औषधियों का वितरण करवाती थीं।

 

13. महाराजा वल्लभसेन और महारानी भगवती के जीवन में कौन-सी कमी थी?
उत्तर: समस्त वैभव होने पर भी वे एक योग्य उत्तराधिकारी की प्रतीक्षा कर रहे थे।

 

14. पुत्र प्राप्ति के लिए राजा और रानी ने कौन-सा मार्ग अपनाया?
उत्तर: उन्होंने धैर्य रखते हुए पूजा, तप, यज्ञ, दान और सत्कर्मों का मार्ग अपनाया।

 

15. भारतीय परम्परा के अनुसार महान् आत्माएँ कहाँ जन्म लेती हैं?
उत्तर: महान् आत्माएँ सात्त्विक, धर्मपरायण, पवित्र और लोकहितकारी माता-पिता के घर जन्म लेती हैं।

 

16. महाराजा अग्रसेन का जन्म कब हुआ?
उत्तर: महाराजा अग्रसेन का जन्म आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि, रविवार के शुभ मुहूर्त में हुआ।

 

17. महाराजा अग्रसेन के जन्म के समय प्रकृति का स्वरूप कैसा था?
उत्तर: प्रकृति मंगलमय थी; शीतल पवन, पक्षियों का कलरव और उषाकाल की अरुणिमा वातावरण को दिव्य बना रहे थे।

 

18. बालक अग्रसेन के जन्म के समय उनके स्वरूप का वर्णन कैसे किया गया है?
उत्तर: उनका मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा समान तेजस्वी, शान्त और आकर्षक था, जिसे देखकर सभी मोहित हो जाते थे।

 

19. महाराजा अग्रसेन के जन्म का समाचार फैलने पर प्रतापपुर में क्या हुआ?
उत्तर: सम्पूर्ण प्रतापपुर उत्सव में डूब गया। शंख-नगाड़े बजे, मंदिरों में घंटियाँ बजीं और राजमहल में आनंद छा गया।

 

20. इस लेख से हमें क्या प्रमुख शिक्षा मिलती है?
उत्तर: महान् व्यक्तित्व श्रेष्ठ संस्कार, धैर्य, सेवा, धर्म, विनम्रता और लोककल्याण की भावना से निर्मित होते हैं।

 

MCQ Question Paper

1. महर्षि जैमिनि ने जनमेजय को किस महान् राजा की कथा सुनाने का निश्चय किया?

(A) महाराजा हरिश्चंद्र
(B) महाराजा दिलीप
(C) महाराजा अग्रसेन
(D) महाराजा भगीरथ

उत्तर: (C) महाराजा अग्रसेन

 

2. जनमेजय ने महर्षि जैमिनि से किस उद्देश्य से कथा सुनाने का अनुरोध किया?

(A) युद्ध कौशल सीखने के लिए
(B) धन प्राप्त करने के लिए
(C) धर्म और आदर्श जीवन को समझने के लिए
(D) राज्य विस्तार के लिए

उत्तर: (C) धर्म और आदर्श जीवन को समझने के लिए

 

3. महर्षि जैमिनि के अनुसार इक्ष्वाकु वंश की महिमा का पूर्ण वर्णन क्यों कठिन है?

(A) क्योंकि उसके बारे में कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं है।
(B) क्योंकि उसके महान राजाओं की कथाएँ वर्षों में भी समाप्त नहीं हो सकतीं।
(C) क्योंकि वह बहुत छोटा वंश था।
(D) क्योंकि उसके राजा अज्ञात थे।

उत्तर: (B) क्योंकि उसके महान राजाओं की कथाएँ वर्षों में भी समाप्त नहीं हो सकतीं।

 

4. निम्नलिखित में से किस राजा ने गंगा को पृथ्वी पर लाने का महान् कार्य किया?

(A) रघु
(B) दिलीप
(C) भगीरथ
(D) मान्धाता

उत्तर: (C) भगीरथ

 

5. महाराजा प्रसेनजित किस कार्य के लिए प्रसिद्ध बताए गए हैं?

(A) अश्वमेध यज्ञ करने के लिए
(B) अजेय नगर का निर्माण करने के लिए
(C) गंगा लाने के लिए
(D) समुद्र विजय के लिए

उत्तर: (B) अजेय नगर का निर्माण करने के लिए

 

6. महाराजा वल्लभसेन की राजधानी का नाम क्या था?

(A) अयोध्या
(B) प्रतापपुर
(C) हस्तिनापुर
(D) इन्द्रप्रस्थ

उत्तर: (B) प्रतापपुर

 

7. प्रतापपुर की सबसे बड़ी प्राकृतिक सुरक्षा क्या थी?

(A) चारों ओर पर्वत थे।
(B) चारों ओर घना वन था।
(C) तीन दिशाओं से नदी से घिरा हुआ था।
(D) समुद्र से घिरा हुआ था।

उत्तर: (C) तीन दिशाओं से नदी से घिरा हुआ था।

 

8. महाराजा वल्लभसेन राज्य को किस रूप में देखते थे?

(A) वैभव का साधन
(B) विजय का माध्यम
(C) प्रजा की सेवा का उत्तरदायित्व
(D) मनोरंजन का साधन

उत्तर: (C) प्रजा की सेवा का उत्तरदायित्व

 

9. महारानी भगवती किस राज्य की राजकुमारी थीं?

(A) मिथिला
(B) विदर्भ
(C) काशी
(D) अवन्ती

उत्तर: (B) विदर्भ

 

10. महारानी भगवती के जीवन का नियमित भाग क्या था?

(A) युद्धाभ्यास करना
(B) राजदरबार में न्याय करना
(C) निर्धनों की सहायता एवं सेवा करना
(D) शिकार करना

उत्तर: (C) निर्धनों की सहायता एवं सेवा करना

 

11. राजा और रानी के जीवन में किस बात की कमी अनुभव होती थी?

(A) धन की
(B) राज्य की
(C) योग्य उत्तराधिकारी की
(D) सेना की

उत्तर: (C) योग्य उत्तराधिकारी की

 

12. राजा वल्लभसेन और महारानी भगवती ने पुत्र प्राप्ति के लिए कौन-सा मार्ग अपनाया?

(A) युद्ध और विजय
(B) तप, पूजा, दान और सत्कर्म
(C) विदेश यात्रा
(D) नया राज्य बसाना

उत्तर: (B) तप, पूजा, दान और सत्कर्म

 

13. भारतीय परम्परा के अनुसार महान् आत्माएँ कहाँ जन्म लेती हैं?

(A) केवल राजमहलों में
(B) जहाँ अपार धन हो
(C) जहाँ माता-पिता का जीवन सात्त्विक और लोकहितकारी हो
(D) केवल तीर्थस्थलों में

उत्तर: (C) जहाँ माता-पिता का जीवन सात्त्विक और लोकहितकारी हो

 

14. महाराजा अग्रसेन का जन्म किस मास में हुआ?

(A) चैत्र
(B) वैशाख
(C) आश्विन
(D) कार्तिक

उत्तर: (C) आश्विन

 

15. महाराजा अग्रसेन के जन्म के समय कौन-सी तिथि थी?

(A) पूर्णिमा
(B) अमावस्या
(C) शुक्ल पक्ष प्रतिपदा
(D) एकादशी

उत्तर: (C) शुक्ल पक्ष प्रतिपदा

 

16. बालक अग्रसेन के जन्म के समय उनके मुखमण्डल की तुलना किससे की गई है?

(A) सूर्य
(B) कमल
(C) पूर्णिमा के चन्द्रमा
(D) इन्द्रधनुष

उत्तर: (C) पूर्णिमा के चन्द्रमा

 

17. पुत्र जन्म का समाचार फैलते ही प्रतापपुर में क्या वातावरण बन गया?

(A) शोक छा गया।
(B) युद्ध की तैयारी होने लगी।
(C) सम्पूर्ण नगर उत्सव में डूब गया।
(D) लोग नगर छोड़कर चले गए।

उत्तर: (C) सम्पूर्ण नगर उत्सव में डूब गया।

 

18. इस पूरे प्रसंग से मुख्य शिक्षा क्या मिलती है?

(A) केवल धन ही सबसे बड़ा बल है।
(B) महान् व्यक्तित्व श्रेष्ठ संस्कार, धर्म और लोकसेवा से बनते हैं।
(C) केवल राजवंश में जन्म लेना पर्याप्त है।
(D) राज्य विस्तार ही राजा का मुख्य कर्तव्य है।

उत्तर: (B) महान् व्यक्तित्व श्रेष्ठ संस्कार, धर्म और लोकसेवा से बनते हैं।