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🌸 ऋष्यशृंग का आगमन और इक्ष्वाकु वंश का पुनरुत्थान

 

अयोध्या के राजसिंहासन पर विराजमान महाराज दशरथ बाहर से जितने वैभवशाली थे, भीतर से उतने ही व्यथित।

तीनों लोकों में उनका यश था, पर गोद सूनी थी।

वंश आगे बढ़े—इस चिंता ने उनके हृदय को जकड़ रखा था।

 

राजसभा में उस दिन सन्नाटा था।

तभी महामंत्री सुमन्त्र ने विनम्र स्वर में कहा—

“राजेन्द्र! यदि आज्ञा हो तो मैं आपसे वह उपाय कहूँ,

जो स्वयं देवताओं में श्रेष्ठ बुद्धिमान

भगवान सनत्कुमार ने प्राचीन काल में ऋषियों को बताया था।”

 

दशरथ ने उत्सुकता से कहा—

“सुमन्त्र! मेरे हित की बात हो तो अवश्य कहो।”

 

सुमन्त्र बोले—

“सत्ययुग में सनत्कुमार जी ने कहा था कि

इक्ष्वाकु वंश में दशरथ नाम के एक परम धार्मिक,

सत्यप्रतिज्ञ और धर्मनिष्ठ राजा होंगे।

उनकी अंगदेश के राजा से गहरी मित्रता होगी।

 

उसी राजा दशरथ की एक परम सौभाग्यशालिनी कन्या होगी—

नाम होगा शान्ता।

उसे अंगदेश के राजा रोमपाद ने

पुत्री रूप में गोद लिया होगा।

 

और शान्ता का विवाह

ब्रह्मतेज से युक्त मुनिकुमार

ऋष्यशृंग से होगा।”

 

सभा में सब ध्यानमग्न थे।

सुमन्त्र आगे बोले—

“समय आने पर

महाराज दशरथ

राजा रोमपाद के पास जाकर कहेंगे—

‘धर्मात्मन्!

मैं संतानहीन हूँ।

यदि आपकी आज्ञा हो

तो शान्ता के पति

ऋष्यशृंग मुनि

मेरे यहाँ आकर

यज्ञ सम्पन्न करा दें।

उस यज्ञ से मुझे पुत्र प्राप्ति होगी

और मेरे वंश की रक्षा हो जाएगी।’”

 

राजा रोमपाद

इस प्रस्ताव पर मन ही मन विचार करेंगे।

शान्ता का सौभाग्य,

ऋष्यशृंग का ब्रह्मतेज

और दशरथ की धर्मनिष्ठा—

तीनों को तौलकर

वे प्रसन्नता से

ऋष्यशृंग को दशरथ के साथ भेज देंगे।

 

सुमन्त्र बोले—

“ऋष्यशृंग को पाकर

राजा दशरथ की सारी चिंता नष्ट हो जाएगी।

वे प्रसन्नचित्त होकर

यज्ञ का अनुष्ठान करेंगे।

 

धर्मज्ञ दशरथ

हाथ जोड़कर

ऋष्यशृंग से

यज्ञ, पुत्र और स्वर्ग—

तीनों का वरण करेंगे

और उन ब्रह्मर्षि से

अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर लेंगे।”

 

सभा में एक दिव्य मौन छा गया।

सुमन्त्र ने आगे कहा—

“राजा के चार पुत्र होंगे—

अप्रमेय पराक्रमी,

वंश की मर्यादा बढ़ाने वाले

और समस्त संसार में विख्यात।”

 

यह कथा सुनकर

राजा दशरथ का मुखमंडल खिल उठा।

यह कोई कल्पना नहीं थी—

यह सनत्कुमार की वाणी थी।

 

सुमन्त्र ने अंत में कहा—

“इसलिए पुरुषसिंह महाराज!

आप स्वयं सेना और सवारियों सहित

अंगदेश जाकर

ऋष्यशृंग मुनिकुमार को

सत्कारपूर्वक यहाँ ले आइए।”

 

दशरथ का हृदय आनंद से भर गया।

उन्होंने तुरंत

गुरु वसिष्ठ को यह कथा सुनाई।

गुरु की आज्ञा लेकर

रानियों, मंत्रियों और सेवकों सहित

अंगदेश के लिए प्रस्थान किया।

 

मार्ग में

वन, उपवन, पर्वत और नदियाँ आईं।

राजा धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहे—

मानो समय स्वयं

रामावतार की तैयारी कर रहा हो।

 

अंततः वे उस देश में पहुँचे

जहाँ मुनिकुमार ऋष्यशृंग निवास करते थे।

वहाँ उन्होंने देखा—

राजा रोमपाद के पास

ऋष्यशृंग विराजमान हैं,

अग्नि के समान तेजस्वी।

 

राजा रोमपाद ने

मित्रता के नाते

दशरथ का

शास्त्रोक्त विधि से पूजन किया

और ऋष्यशृंग से

उनका परिचय कराया।

 

ऋष्यशृंग ने भी

राजा दशरथ का सम्मान किया।

 

इस प्रकार आदर-सत्कार पाकर

दशरथ कुछ दिन

अंगदेश में ठहरे।

 

फिर उन्होंने विनम्रता से कहा—

“प्रजापालक मित्र!

मेरे नगर में

एक महान आवश्यक कार्य उपस्थित हुआ है।

आपकी पुत्री शान्ता

अपने पति के साथ

अयोध्या पधारें।”

 

राजा रोमपाद ने

“बहुत अच्छा” कहकर

आज्ञा दी

और ऋष्यशृंग से कहा—

“विप्रवर!

आप शान्ता के साथ

महाराज दशरथ के यहाँ जाइए।”

 

ऋष्यशृंग ने

“तथास्तु” कहा।

 

विदा के समय

दशरथ और रोमपाद

स्नेहपूर्वक गले मिले।

दो धर्मात्मा राजाओं का

यह आलिंगन

ईश्वरीय योजना की स्वीकृति था।

 

दशरथ ने दूत भेजकर

अयोध्या को सजाने का आदेश दिया।

सड़कों पर जल छिड़का गया,

धूप-ध्वजा-पताकाएँ सजाई गईं।

 

वाद्यों की मंगल ध्वनि के साथ

ऋष्यशृंग को आगे रखकर

राजा दशरथ

नगर में प्रविष्ट हुए।

 

नगरवासियों ने

उनका स्वागत ऐसे किया

जैसे देवताओं ने

वामन भगवान का किया हो।

 

अंतःपुर में

ऋष्यशृंग का पूजन हुआ।

राजा ने उन्हें पाकर

अपने को कृतार्थ माना।

 

शान्ता को

पति के साथ देखकर

अंतःपुर की रानियाँ

आनंदमग्न हो उठीं।

 

कुछ काल तक

शान्ता

ऋष्यशृंग के साथ

अयोध्या में सुखपूर्वक रहीं।

 

और यहीं

श्रीराम जन्म की

भूमिका पूर्ण हुई।

 

अब यज्ञ निश्चित था।

अब अवतार अटल था।

अब मर्यादा पुरुषोत्तम

धरती पर आने वाले थे।

 

🌸🚩 जय श्रीराम 🚩🌸