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“कामधेनु शबला और विश्वामित्र-वसिष्ठ का प्रसंग”


वन का वातावरण अत्यन्त शांत और पवित्र था। महान तपस्वी महर्षि वसिष्ठ के आश्रम में सादगी और आध्यात्मिक तेज एक साथ दिखाई देता था। उसी समय शक्तिशाली राजा विश्वामित्र अपनी विशाल सेना, रानियों, पुरोहितों और मंत्रियों के साथ वहाँ पहुँचे। महर्षि वसिष्ठ ने उनका अत्यन्त आदर और प्रेम से स्वागत किया।

 

महर्षि वसिष्ठ के आश्रम में रहनेवाली दिव्य कामधेनु शबला कामधेनु साधारण गाय नहीं थी। वह देवताओं द्वारा प्रदत्त एक अद्भुत और चमत्कारी शक्ति से सम्पन्न थी। जैसे ही वसिष्ठ ने उसे आदेश दिया कि अतिथियों के लिए उत्तम भोजन की व्यवस्था करो, वैसे ही शबला ने अपनी दिव्य शक्ति से अद्भुत चमत्कार प्रकट कर दिया।

 

क्षणभर में आश्रम का साधारण वातावरण मानो स्वर्गीय भोजशाला में बदल गया। जहाँ पहले सादगी थी, वहाँ अब असंख्य प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन प्रकट होने लगे। मीठी ईख, सुगन्धित मधु, लावा और अनेक प्रकार के दुर्लभ पेय पदार्थ जैसे मैरेय, उत्तम आसव और मधुर पानक रस उपस्थित हो गये। इन सबकी सुगन्ध वातावरण में फैल गई और पूरी सेना के मन को प्रसन्न कर दिया।

 

थोड़ी ही देर में गरम-गरम भात के ऐसे विशाल ढेर लग गये जो मानो छोटे-छोटे पर्वतों के समान प्रतीत हो रहे थे। स्वादिष्ट दाल और मुँह में घुल जानेवाली खीर भी तैयार हो गई। चारों ओर दूध, दही और घी की इतनी अधिकता थी कि ऐसा लगता था मानो उनकी नदियाँ बह रही हों। आश्रम का हर कोना समृद्धि और उदारता से भर गया था।

 

विविध प्रकार के सुस्वादु रस, खाण्डव और असंख्य स्वादिष्ट व्यंजनों से भरी हुई चाँदी की हजारों थालियाँ सज गईं। वह दृश्य अत्यन्त अद्भुत और मनोहारी था। इतने विशाल और वैभवपूर्ण भोज की कल्पना किसी ने नहीं की थी, विशेषकर एक साधारण आश्रम में।

 

महर्षि वसिष्ठ ने अत्यन्त स्नेह और आदर के साथ राजा विश्वामित्र की पूरी सेना को भोजन कराया। वह सेना अत्यन्त बलवान और विशाल थी, जिसमें असंख्य पराक्रमी और हृष्ट-पुष्ट सैनिक थे। परन्तु सबको इतना उत्तम और दिव्य भोजन मिला कि वे पूर्णतः तृप्त और प्रसन्न हो गये। उनके चेहरे पर संतोष और आनंद स्पष्ट दिखाई दे रहा था।

 

स्वयं राजा विश्वामित्र भी उस समय अपनी रानियों, ब्राह्मणों और पुरोहितों के साथ अत्यन्त प्रसन्न और संतुष्ट हो गये। इतना अद्भुत सत्कार और आतिथ्य देखकर वे आश्चर्यचकित भी थे और आनंदित भी। उनके साथ आए मंत्री, अमात्य और सेवक भी महर्षि वसिष्ठ के इस महान सत्कार से अत्यन्त प्रभावित हुए।

 

जब सब लोग तृप्त होकर विश्राम करने लगे, तब राजा विश्वामित्र अत्यन्त प्रसन्न होकर महर्षि वसिष्ठ के पास आये। उनके मन में अब एक नई इच्छा जाग चुकी थी। उन्होंने विनम्रता से कहा कि हे ब्रह्मन्! आप तो स्वयं मेरे पूजनीय हैं, फिर भी आपने मेरा इतना आदर किया और इतने प्रेम से मेरा स्वागत किया। आपके इस व्यवहार ने मेरे हृदय को अत्यन्त प्रसन्न कर दिया है।

 

इसके बाद उन्होंने थोड़ी गंभीरता से अपनी बात आगे बढ़ाई। उन्होंने कहा कि मैं आपसे एक विनती करना चाहता हूँ। आपकी यह चितकबरी गाय अत्यन्त अद्भुत और अनमोल है। यह साधारण गाय नहीं, बल्कि एक अमूल्य रत्न के समान है। और रत्नों का स्वामी तो राजा ही होता है। इसलिए आप मुझसे एक लाख गौएँ ले लीजिये और बदले में यह शबला गाय मुझे दे दीजिये। उन्होंने यह भी कहा कि धर्म की दृष्टि से भी यह वस्तु राजा के अधिकार में ही होनी चाहिए।

 

राजा की यह बात सुनकर महर्षि वसिष्ठ शांत और गंभीर स्वर में उत्तर देने लगे। उनके चेहरे पर करुणा और स्थिरता थी, परन्तु उनके शब्दों में दृढ़ता भी स्पष्ट थी। उन्होंने कहा कि हे राजन्! यदि आप मुझे एक लाख नहीं, बल्कि सौ करोड़ गौएँ भी दे दें, या चाँदी और धन के बड़े-बड़े ढेर दे दें, तब भी मैं इस शबला गाय को नहीं दे सकता। यह गाय मेरे जीवन का अविभाज्य अंग है और मुझसे अलग नहीं हो सकती।

 

महर्षि वसिष्ठ ने आगे समझाते हुए कहा कि जैसे किसी महान और मनस्वी पुरुष की अमर कीर्ति उससे कभी अलग नहीं हो सकती, उसी प्रकार यह शबला गाय भी सदा मेरे साथ ही रहती है। मेरे सारे धार्मिक कार्य, यज्ञ और जीवन-निर्वाह इसी पर निर्भर हैं।

 

उन्होंने कहा कि मेरे अग्निहोत्र, बलि, होम, स्वाहा और वषट्‌कार जैसे सभी वैदिक कर्म इसी कामधेनु के कारण संभव होते हैं। मेरे आश्रम का सम्पूर्ण जीवन और व्यवस्था इसी गाय पर आधारित है। यह केवल एक पशु नहीं है, बल्कि मेरे जीवन, मेरे धर्म और मेरे तप का आधार है।

 

वसिष्ठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह गाय ही मेरा सर्वस्व है। यही मुझे हर प्रकार से संतुष्ट करती है और मेरे समस्त धार्मिक कार्यों का मूल आधार है। इसलिए अनेक कारणों से मैं इसे किसी को भी नहीं दे सकता।

 

महर्षि वसिष्ठ के इन दृढ़ और स्पष्ट शब्दों को सुनकर राजा विश्वामित्र के मन में क्रोध की ज्वाला भड़क उठी। वे अत्यन्त प्रभावशाली और अभिमानी राजा थे। उन्हें यह स्वीकार करना कठिन लग रहा था कि एक साधु उनकी इच्छा को अस्वीकार कर दे।

 

क्रोध से भरे हुए विश्वामित्र ने पुनः प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि यदि एक लाख गौएँ पर्याप्त नहीं हैं, तो मैं आपको चौदह हजार ऐसे हाथी देता हूँ जिनके गले के आभूषण, रस्सियाँ और अंकुश सब सोने के बने होंगे। वे हाथी अत्यन्त भव्य और शक्तिशाली होंगे।

 

उन्होंने आगे कहा कि इसके अतिरिक्त मैं आपको आठ सौ सुवर्णमय रथ भी दूँगा। उन रथों में सोने के घुँघरू लगे होंगे और प्रत्येक रथ में चार-चार श्वेत घोड़े जुते होंगे। साथ ही मैं आपको उत्तम जाति और श्रेष्ठ देश में उत्पन्न ग्यारह हजार तेजस्वी घोड़े भी दूँगा।

 

इतना ही नहीं, उन्होंने और भी अधिक लालच देते हुए कहा कि मैं आपको नयी अवस्था की एक करोड़ गौएँ भी दे सकता हूँ। आप जितना धन, रत्न या सुवर्ण चाहें, मैं सब देने को तैयार हूँ। बस आप यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये।

 

किन्तु महर्षि वसिष्ठ का मन अटल था। उन्होंने अत्यन्त शांत किंतु दृढ़ स्वर में कहा कि हे राजन्! मैं यह गाय किसी भी स्थिति में आपको नहीं दे सकता। यह मेरे लिए केवल धन या संपत्ति नहीं है।

 

उन्होंने कहा कि यही मेरा सबसे बड़ा रत्न है, यही मेरा वास्तविक धन है, यही मेरा सर्वस्व है और यही मेरा जीवन है। मेरे सभी यज्ञ—दर्श, पौर्णमास और अन्य महान अनुष्ठान—इसी के कारण सम्पन्न होते हैं।

 

वसिष्ठ ने अन्त में अत्यन्त दृढ़ता से कहा कि मेरे सभी शुभ कर्मों का मूल यही गाय है। इसलिए इस विषय में अधिक चर्चा करना व्यर्थ है। मैं इस कामधेनु को किसी भी परिस्थिति में नहीं दे सकता।

 

इस प्रकार एक ओर राजा का अभिमान और वैभव था, और दूसरी ओर एक तपस्वी का धर्म, त्याग और अडिग निश्चय। यही प्रसंग आगे चलकर विश्वामित्र के जीवन में एक महान परिवर्तन का कारण बना।