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कौशिकी की करुण गाथा और विश्वामित्र का गौरव

 

विवाह के पश्चात जब राजा ब्रह्मदत्त अपने राज्य को लौट गए, तब महाराज कुशनाभ के जीवन में एक गहरी शून्यता व्याप्त हो गई। उनकी अनेक कन्याएँ थीं, किंतु कोई पुत्र नहीं था जो उनके वंश की मर्यादा और कीर्ति को आगे बढ़ा सके। राजमहल के विशाल प्रांगण में रहते हुए भी उनके हृदय में एक रिक्तता थी। अंततः उन्होंने निश्चय किया कि वे श्रेष्ठ पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ का अनुष्ठान करेंगे। समस्त विधि-विधान से यज्ञ आरंभ हुआ। वेद-मंत्रों की ध्वनि से वातावरण पवित्र हो उठा और देवताओं को साक्षी मानकर कुशनाभ ने अपनी कामना प्रकट की।

 

उसी समय परम उदार ब्रह्मकुमार महाराज कुश प्रकट हुए। उनका तेज अद्भुत था, वाणी में आशीर्वाद की मधुरता थी। उन्होंने स्नेह से कुशनाभ को संबोधित करते हुए कहा कि उन्हें अपने समान ही एक परम धर्मात्मा पुत्र प्राप्त होगा—गाधि नाम से प्रसिद्ध। वही पुत्र उनके वंश की कीर्ति को अक्षय बनाएगा। यह वरदान देकर राजर्षि कुश आकाश मार्ग से सनातन ब्रह्मलोक को प्रस्थान कर गए। उनके प्रस्थान के बाद भी उनके शब्दों की पवित्र गूँज लंबे समय तक यज्ञशाला में सुनाई देती रही।

 

कुछ काल पश्चात महाराज कुशनाभ के यहाँ एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ—गाधि। राज्य में उत्सव छा गया। ऐसा प्रतीत होता था मानो स्वयं धर्म ने मानव रूप धारण कर लिया हो। वही गाधि आगे चलकर एक महान वंश की आधारशिला बने। उनके पुत्र थे—कौशिक, जिन्हें संसार ने आगे चलकर विश्वामित्र के नाम से जाना।

 

विश्वामित्र ने जब यह कथा सुनाई, तब उनकी वाणी में गर्व नहीं, बल्कि गहरी विनम्रता थी। उन्होंने बताया कि वे कुश के कुल में उत्पन्न होने के कारण ‘कौशिक’ कहलाते हैं। उनके स्वर में अपने पूर्वजों के प्रति आदर झलकता था।

 

फिर उनका मन अपनी ज्येष्ठ भगिनी की स्मृति से भीग उठा। वह थीं सत्यवती—व्रत और पतिव्रत-धर्म की प्रतिमूर्ति। उनका विवाह महर्षि ऋचीक से हुआ था। पति के प्रति पूर्ण समर्पण और तपस्या से पूर्ण जीवन के कारण वे देह सहित स्वर्गलोक को गईं। परंतु उनका त्याग यहीं समाप्त नहीं हुआ। लोकहित के लिए उन्होंने पुनः पृथ्वी पर अवतार लिया—एक पुण्यसलिला के रूप में। वही दिव्य धारा आज कौशिकी नदी के रूप में प्रवाहित होती है।

 

विश्वामित्र की आँखों में बहन के प्रति अपार स्नेह झलक आया। उन्होंने कहा कि उनकी बहन हिमालय की गोद में नदीरूप से बहती हुई समस्त प्राणियों का कल्याण कर रही है। वही महानदी कौशिकी उनके कुल की कीर्ति को भी प्रकाशित करती है। बहन के प्रति प्रेम के कारण ही वे हिमालय के समीप उसी के तट पर नियमपूर्वक निवास करते थे। वहाँ का वातावरण तप, शांति और पवित्रता से भरा रहता था।

 

किन्तु यज्ञ-सिद्धि की आवश्यकता से उन्हें बहन का सान्निध्य छोड़कर सिद्धाश्रम आना पड़ा। उन्होंने स्नेहभरे स्वर में श्रीराम से कहा कि अब उनके तेज के प्रभाव से वह यज्ञ-सिद्धि पूर्ण हो चुकी है। यह कहते समय उनके हृदय में कृतज्ञता का भाव स्पष्ट झलक रहा था।

 

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शोणभद्र तटवर्ती देश का परिचय देते हुए उन्होंने अपने वंश की उत्पत्ति का वर्णन केवल इसलिए किया, क्योंकि श्रीराम ने जिज्ञासा प्रकट की थी। कथा कहते-कहते आधी रात बीत चुकी थी। उन्होंने प्रेमपूर्वक श्रीराम से कहा कि अब विश्राम कर लें, क्योंकि अधिक जागरण यात्रा में विघ्न डाल सकता है।

 

उस समय का दृश्य अत्यंत मोहक था। वृक्ष स्थिर खड़े थे, मानो प्रकृति स्वयं ध्यानमग्न हो। पशु-पक्षी अपने-अपने आश्रयों में शांत थे। रात्रि का अंधकार दिशाओं को अपने आंचल में समेट चुका था। धीरे-धीरे संध्या विलीन हो गई और आकाश असंख्य तारों से भर उठा। वह दृश्य ऐसा प्रतीत होता था मानो सहस्र नेत्रों वाला इन्द्र स्वयं नभ में प्रकट हो गया हो। शीतल किरणों से युक्त चंद्रमा उदित होकर प्राणियों के हृदय में शांति और आनंद भर रहा था।

 

रात्रिचर प्राणी—यक्ष, राक्षस और पिशाच—भी अपने स्वभाव के अनुसार विचरण कर रहे थे, परंतु आश्रम के पवित्र वातावरण में किसी प्रकार का भय नहीं था।

 

जब विश्वामित्र मौन हुए, तब उपस्थित मुनियों ने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि कुशवंश सदा से धर्मपरायण रहा है और उस वंश में विश्वामित्र सर्वश्रेष्ठ महात्मा हैं। उनकी वाणी में श्रद्धा और आदर था। उन्होंने यह भी कहा कि सरिताओं में श्रेष्ठ कौशिकी उनके कुल की कीर्ति को जग में प्रकाशित करती है।

 

प्रशंसा सुनकर भी विश्वामित्र के मुख पर अहंकार का लेश नहीं था। वे अस्त होते सूर्य की भाँति शांत और गंभीर होकर निद्रा में लीन हो गए। श्रीराम और लक्ष्मण ने भी यह अद्भुत कथा सुनकर विस्मय अनुभव किया। उन्होंने मुनिश्रेष्ठ की सराहना की और फिर शांत भाव से विश्राम किया।

 

उस रात्रि का वातावरण केवल विश्राम का नहीं, बल्कि परंपरा, त्याग, स्नेह और धर्म की महागाथा का साक्षी था—जहाँ एक भाई अपनी बहन के प्रेम में हिमालय के तट पर निवास करता है, जहाँ एक पिता पुत्रेष्टि यज्ञ से वंश की कीर्ति सुनिश्चित करता है, और जहाँ एक महान ऋषि अपने तेज से संसार को आलोकित करता है।