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कौसल्या का करुण विलाप — राम-वियोग में तड़पता मातृहृदय

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कौसल्या का करुण विलाप — राम-वियोग में तड़पता मातृहृदय

अयोध्या का राजमहल उस समय शोक का समुद्र बन चुका था। महाराज दशरथ शय्या पर पड़े थे। उनका शरीर राजसी था, परंतु मन टूट चुका था। राम-वियोग ने उनके प्राणों की शक्ति छीन ली थी। उनकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। वे बार-बार राम का नाम लेते और फिर मूर्छित हो जाते।

उसी समय महारानी कौसल्या भी अपने पति को इस दशा में देखकर और अधिक व्यथित हो उठीं। उनका अपना हृदय तो पहले ही पुत्र-वियोग की अग्नि में जल रहा था, अब पति का यह दुःख देखकर उनका धैर्य भी टूट गया। वे अश्रुपूर्ण नेत्रों से दशरथ को देखती हुई करुण स्वर में बोलने लगीं।

कौसल्या ने कहा—“महाराज! कैकेयी ने अपना विष पूरी तरह राम पर उँड़ेल दिया है। जिस प्रकार कोई सर्प अपनी पुरानी केंचुल छोड़कर नया शरीर धारण कर लेता है और फिर निर्भय होकर विचरण करता है, उसी प्रकार कैकेयी भी अब अपने मार्ग की सबसे बड़ी बाधा को हटाकर निश्चिंत हो गई होगी। अब उसे किसी का भय नहीं रहा। उसने अपना उद्देश्य प्राप्त कर लिया है, इसलिए वह प्रसन्न और स्वच्छंद होकर महल में घूमती होगी, जबकि हम सब शोक में डूबे हैं।”

वे कुछ क्षण रुकीं। उनके मन में कैकेयी के प्रति पीड़ा और आक्रोश उमड़ पड़ा।

उन्होंने कहा—“जैसे घर में रहने वाला कोई विषैला सर्प हर समय भय उत्पन्न करता रहता है, वैसे ही अब कैकेयी मेरे जीवन का भय और दुःख बन गई है। उसने राम को वन भेजकर अपनी इच्छा पूरी कर ली है। अब वह हर समय मुझे मेरे दुःख का स्मरण कराती रहेगी। उसका प्रत्येक दर्शन मुझे यह याद दिलाएगा कि उसी के कारण मेरा पुत्र मुझसे दूर हुआ है।”

फिर कौसल्या का स्वर और भी करुण हो गया।

“यदि राम इसी अयोध्या में रहते, चाहे उन्हें भीख माँगकर जीवन बिताना पड़ता… यदि उन्हें राजसिंहासन न मिलता… यदि वे कैकेयी के पुत्र भरत के सेवक बनकर भी रहते… तब भी मैं प्रसन्न रहती। क्योंकि उस स्थिति में मैं प्रतिदिन अपने पुत्र का मुख तो देख पाती। मुझे राज्य, वैभव और सम्मान की कोई इच्छा नहीं थी। मेरी सबसे बड़ी संपत्ति तो मेरा राम था। कैकेयी ने वनवास का वरदान केवल इसलिए माँगा कि मैं अपने पुत्र के दर्शन से भी वंचित हो जाऊँ।”

कौसल्या की आँखों में आँसू भर आये।

उन्होंने कहा—“उसने वही किया है, जैसे कोई यज्ञ करने वाला पुरोहित देवताओं का अधिकार छीनकर उनका भाग राक्षसों को दे दे। राम का स्थान अयोध्या के सिंहासन पर था। वे इस राज्य के स्वाभाविक अधिकारी थे। परंतु कैकेयी ने उन्हें उनके अधिकार से वंचित कर दिया और किसी दूसरे को वह स्थान देने का प्रयत्न किया।”

फिर उनके मन में वन की ओर जाते राम का दृश्य उभर आया।

“मुझे ऐसा लगता है कि इस समय मेरे राम अपनी गंभीर और मन्द गति से वन की ओर बढ़ रहे होंगे। उनके साथ सीता होगी और लक्ष्मण भी। वे तीनों धीरे-धीरे अयोध्या की सीमाओं को पार कर रहे होंगे। मेरा वीर पुत्र, जिसकी भुजाएँ गजराज की सूँड के समान बलशाली हैं, आज वन की अनजान राहों पर चल रहा होगा।”

कौसल्या का कंठ भर आया।

“महाराज! राम, लक्ष्मण और सीता ने जीवन में कभी कष्ट नहीं देखा। वे राजमहल में पले-बढ़े। उन्हें कभी अभाव का सामना नहीं करना पड़ा। लेकिन आज आपकी दुर्बलता और कैकेयी की कठोर माँग के कारण वे घने जंगलों में भटक रहे हैं। न जाने वहाँ उन्हें कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा होगा।”

उनकी कल्पना वन के जीवन में पहुँच गई।

“वे तीनों अभी युवावस्था में हैं। यह समय उनके जीवन के सुख भोगने का था। उन्हें रत्नों, सुंदर वस्त्रों और राजसी सुविधाओं से घिरा होना चाहिए था। लेकिन आज वे फल-मूल खाकर जीवन बिताने को विवश हैं। जिन हाथों ने कभी साधारण भोजन तक नहीं छुआ, वे आज वन के कंद-मूल खोज रहे होंगे।”

यह सोचकर कौसल्या की आँखों से अश्रुधारा बह निकली।

उन्होंने आकाश की ओर देखते हुए कहा—“क्या वह दिन फिर कभी आएगा जब मैं अपने शोक से मुक्त हो सकूँगी? क्या मैं फिर कभी राम, सीता और लक्ष्मण को वन से लौटकर अपने सामने खड़े देख पाऊँगी? क्या मेरा यह दुःख कभी समाप्त होगा?”

फिर उनके मन में भविष्य का एक सुंदर स्वप्न जाग उठा।

“क्या वह शुभ क्षण आएगा जब कोई दौड़ता हुआ आकर कहेगा—‘राम लौट आये! लक्ष्मण लौट आये!’ और यह समाचार सुनते ही पूरी अयोध्या आनंद से भर उठेगी? घर-घर ध्वजाएँ फहरेंगी, गलियाँ सज जाएँगी और लोग नाचते-गाते हुए अपने प्रिय राजकुमार का स्वागत करेंगे।”

वे उस कल्पना में और डूब गईं।

“जिस प्रकार पूर्णिमा के दिन समुद्र अपनी लहरों से उमड़ पड़ता है, उसी प्रकार पूरी अयोध्या हर्ष से भर जाएगी। लोगों की आँखों में आँसू होंगे, पर वे दुःख के नहीं, आनंद के आँसू होंगे।”

अब उनके सामने एक और दृश्य उभरा।

“मैं देख रही हूँ कि राम रथ पर बैठे हैं। उनके आगे सीता विराजमान हैं। जैसे कोई शक्तिशाली साँड़ अपनी प्रिय गाय को आगे रखकर चलता है, वैसे ही राम अपनी प्रिय पत्नी का सम्मान करते हुए अयोध्या में प्रवेश कर रहे हैं।”

कौसल्या का हृदय उस स्वप्न में डूब गया।

“राजमार्गों पर हजारों लोग खड़े होंगे। वे मेरे दोनों पुत्रों—राम और लक्ष्मण—पर खीलों और पुष्पों की वर्षा करेंगे। बच्चे, वृद्ध, स्त्रियाँ, सभी उनके स्वागत में उमड़ पड़ेंगे।”

उन्होंने आगे कहा—

“राम और लक्ष्मण अपने दिव्य शस्त्र धारण किए होंगे। उनके कंधों पर धनुष होगा, कमर में तलवारें होंगी। उनके कानों में चमकते कुण्डल होंगे। वे पर्वत-शिखरों की भाँति तेजस्वी और अडिग दिखाई देंगे। जब वे मेरे सामने आएँगे, तब मेरे नेत्रों की प्यास बुझेगी।”

फिर उन्होंने अयोध्या के उत्सव का चित्र खींचा—

“ब्राह्मणों की कन्याएँ हाथों में पुष्प और फल लेकर मंगलगीत गाएँगी। वे आनंदपूर्वक नगर की परिक्रमा करेंगी और समस्त अयोध्या उत्सव में डूब जाएगी।”

कौसल्या की आँखों में राम का आदर्श स्वरूप झलक उठा।

“राम केवल मेरे पुत्र नहीं हैं। वे धर्म के आधार हैं। वे ज्ञान, विनय और तेज में देवताओं के समान हैं। जिस प्रकार समय पर होने वाली वर्षा सम्पूर्ण पृथ्वी का पालन करती है, उसी प्रकार राम भी अपनी प्रजा का पालन करते हैं। क्या वह दिन फिर आएगा जब वे लौटकर अयोध्या का भार सँभालेंगे?”

इतना कहते-कहते उनका मन अपने ही दुःख के कारण खोजने लगा।

वे बोलीं—“निश्चय ही मैंने किसी पूर्व जन्म में कोई भयंकर पाप किया होगा। शायद मैंने उन गायों को उनके बछड़ों से अलग कर दिया होगा, जो अपने बच्चों को दूध पिलाने जा रही थीं। अन्यथा मुझे यह असहनीय दुःख क्यों मिलता?”

फिर उन्होंने अपने वर्तमान दुःख की तुलना एक गाय से की।

“जिस प्रकार कोई सिंह किसी गाय के छोटे बछड़े को उससे छीन ले और वह असहाय होकर विलाप करती रह जाए, उसी प्रकार कैकेयी ने मेरे राम को मुझसे छीन लिया है। मैं उसी वत्सला गाय की भाँति तड़प रही हूँ।”

अब उनका धैर्य पूर्णतः समाप्त हो गया।

“राम गुणों की खान हैं। वे समस्त शास्त्रों के ज्ञाता हैं। वे मेरे एकमात्र पुत्र हैं। उनके बिना मैं जीवित नहीं रह सकती।”

उनकी साँसें भारी होने लगीं।

“मैं राम और लक्ष्मण को देखे बिना कैसे जीवित रहूँ? मेरे शरीर में अब जीवन धारण करने की शक्ति नहीं बची।”

अंत में कौसल्या ने अपने हृदय की ज्वाला व्यक्त की—

“जिस प्रकार ग्रीष्मकाल में प्रचंड सूर्य अपनी तपती किरणों से पृथ्वी को जला देता है, उसी प्रकार यह पुत्र-वियोग की अग्नि मुझे भीतर से भस्म कर रही है। यह आग बाहर दिखाई नहीं देती, पर मेरे हृदय के प्रत्येक कण को जलाए जा रही है।”

इतना कहकर कौसल्या मौन हो गईं। उनके आँसू निरंतर बह रहे थे। राजमहल का वातावरण और भी करुण हो उठा। एक ओर पुत्र-वियोग में टूटे दशरथ थे, दूसरी ओर मातृत्व की वेदना में डूबी कौसल्या। अयोध्या का वैभव उस समय निष्प्राण था, क्योंकि उसके प्राणस्वरूप राम वन की ओर जा चुके थे, और उनके पीछे छूटे हृदय केवल प्रतीक्षा, स्मृति और आँसुओं के सहारे जीवित थे।