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कौसल्या का विलाप और सुमन्त्र का सांत्वना-संदेश
अयोध्या के राजमहल में उस समय ऐसा शोक छाया हुआ था, मानो स्वयं सुख ने उस नगरी का साथ छोड़ दिया हो। राजा दशरथ पुत्र-वियोग की अग्नि में जल रहे थे और उनके विलाप ने पूरे महल को करुणा से भर दिया था। उसी बीच, जब महारानी कौसल्या ने सुमन्त्र के मुख से वन में गए श्रीराम, सीता और लक्ष्मण की बातें सुनीं, तो उनका धैर्य टूट गया।
उनका शरीर काँपने लगा। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो किसी अदृश्य पीड़ा ने उन्हें अपने वश में कर लिया हो। उनके नेत्रों के आगे अंधकार छा गया और वे अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ीं।
कुछ क्षणों बाद जब उन्हें थोड़ा होश आया, तो वे अश्रुपूरित नेत्रों से सुमन्त्र की ओर देखने लगीं। उनके कंठ से टूटी हुई आवाज़ निकली—
“सुमन्त्र! मुझे वहाँ ले चलो, जहाँ मेरे राम हैं। जहाँ सीता और लक्ष्मण हैं, वहीं मेरा जीवन है। उनके बिना मैं अब एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती।”
उनके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
“रथ तैयार करो और मुझे दण्डकारण्य पहुँचा दो। यदि मैं अपने पुत्र के पास नहीं जा सकी, तो मेरे लिए इस जीवन का कोई अर्थ नहीं है। मैं यमलोक चली जाऊँगी, पर राम के बिना नहीं रह सकती।”
महारानी के हृदयविदारक शब्द सुनकर सुमन्त्र का अपना हृदय भी भर आया। उनकी आँखें नम हो गईं। उन्होंने हाथ जोड़कर विनम्र स्वर में कहा—
“महारानी, कृपया इस शोक को त्याग दीजिए। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि श्रीराम वन में दुःखी नहीं हैं। वे अपने धर्म के पालन में दृढ़ हैं और अपने कर्तव्य को प्रसन्न मन से निभा रहे हैं।”
सुमन्त्र ने आगे कहा—
“लक्ष्मण भी अत्यंत प्रसन्न हैं। वे बड़े प्रेम और श्रद्धा से अपने अग्रज की सेवा कर रहे हैं। उनके लिए यही सबसे बड़ा सौभाग्य है।”
फिर उन्होंने सीता का स्मरण करते हुए कहा—
“माता, जनकनंदिनी सीता का मन तो पूर्ण रूप से श्रीराम में ही लीन है। जहाँ राम हैं, वहीं उनका संसार है। इसलिए निर्जन वन भी उन्हें घर जैसा प्रतीत होता है। उनके चेहरे पर भय या दुःख की कोई छाया नहीं दिखाई देती।”
सुमन्त्र को याद आया कि यात्रा के दौरान सीता कितनी सहज और उत्सुक थीं।
वे मुस्कुराते हुए मार्ग में पड़ने वाले गाँवों, नदियों, पर्वतों और वृक्षों के बारे में पूछती रहती थीं। उन्हें देखकर ऐसा लगता था मानो वे वनवास के लिए नहीं, बल्कि किसी मनोरम यात्रा पर निकली हों।
वे कभी किसी नदी की धारा को निहारतीं, कभी किसी वृक्ष के बारे में जानना चाहतीं। उनके मन में भय का नामोनिशान नहीं था।
सुमन्त्र ने कौसल्या को समझाया—
“माता, श्रीराम और लक्ष्मण को अपने समीप देखकर सीता को ऐसा अनुभव होता है मानो वे अयोध्या से थोड़ी ही दूर किसी उपवन में घूमने आई हों।”
वे कुछ क्षणों के लिए रुके। उन्हें स्मरण आया कि मार्ग में सीता ने कैकेयी के विषय में कुछ कहा था, पर उन्होंने उस प्रसंग को वहीं छोड़ देना उचित समझा।
वे तुरंत मधुर स्वर में बोले—
“महारानी, कठिन यात्रा, तेज़ हवा, धूप और वन के भयावह दृश्य भी सीता की आभा को तनिक भी कम नहीं कर पाए हैं। उनका मुख आज भी पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान उज्ज्वल और प्रसन्न है।”
“उनके चरण आज भी कमल की पंखुड़ियों के समान कोमल और लाल हैं। उन्होंने अपने प्रिय राम की प्रसन्नता के लिए अपने आभूषणों का त्याग नहीं किया है। उनके नूपुरों की मधुर झंकार वन की नीरवता को संगीत से भर देती है।”
सुमन्त्र की आँखों में उस दृश्य की स्मृति चमक उठी।
“वे अत्यंत सुंदर गति से चलती हैं। उनके कदमों की आहट सुनकर ऐसा लगता है मानो वन में हंसों का कलरव गूँज रहा हो।”
उन्होंने आगे कहा—
“माता, वे श्रीराम के पराक्रम और संरक्षण पर पूर्ण विश्वास करती हैं। इसलिए हाथी, सिंह या बाघ जैसे भयंकर वन्य जीवों को देखकर भी उनके मन में भय उत्पन्न नहीं होता।”
सुमन्त्र ने कौसल्या के निकट बैठकर अत्यंत कोमल स्वर में कहा—
“आप श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के लिए चिंता न करें। वे तीनों प्रसन्नचित्त हैं और महर्षियों के मार्ग पर अटल होकर चल रहे हैं। वन में फल और मूल का सेवन करते हुए वे महाराज की प्रतिज्ञा को पूर्ण कर रहे हैं।”
“उनका यह त्याग, यह धर्मपालन और यह आदर्श चरित्र युगों-युगों तक संसार के लिए प्रेरणा बना रहेगा।”
सुमन्त्र के सांत्वना भरे शब्दों में स्नेह था, विश्वास था और आशा भी थी। वे चाहते थे कि महारानी का दुःख कुछ कम हो जाए।
किन्तु माँ का हृदय तर्क नहीं सुनता।
कौसल्या के लिए राम केवल अयोध्या के युवराज नहीं थे; वे उनके प्राण थे।
सुमन्त्र के समझाने पर भी उनका विलाप नहीं रुका। वे बार-बार करुण स्वर में पुकार उठतीं—
“हा मेरे प्यारे राम!”
“हा पुत्र!”
“हा रघुनन्दन!”
उनकी प्रत्येक पुकार महल की दीवारों से टकराकर लौटती और पूरे वातावरण को और अधिक शोकमय बना देती।
उस रात अयोध्या का राजमहल मौन था, पर उस मौन के भीतर एक माँ के टूटते हृदय की वेदना स्पष्ट सुनाई दे रही थी।