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कौसल्या का विलाप — राम-वियोग में टूटता अयोध्या का हृदय
अयोध्या का राजमहल उस दिन स्वर्ण, रत्न और वैभव से नहीं, बल्कि गहन शोक और असहनीय पीड़ा से भरा हुआ था। जिन गलियारों में कभी वीणा और मृदंग की मधुर ध्वनियाँ गूँजती थीं, वहाँ अब सिसकियों का स्वर सुनाई दे रहा था। राजमहल के दीपक जल रहे थे, परन्तु उनके प्रकाश में भी मानो अंधकार ही छाया हुआ था।
महारानी कौसल्या की आँखें निरंतर बहते आँसुओं से लाल हो चुकी थीं। उनका हृदय बार-बार उसी दिशा में दौड़ जाता, जिस ओर उनके प्रिय पुत्र राम, लक्ष्मण और सीता वन की ओर चले गए थे।
वे महाराज दशरथ के सामने बैठी थीं, किन्तु उनके शब्दों में पत्नी का कोमल स्नेह नहीं, बल्कि एक माँ का अथाह दुःख और पीड़ा बोल रही थी।
कंपित स्वर में उन्होंने कहा, “महाराज! संसार आपको दयालु, उदार और सत्यव्रती राजा के रूप में जानता है। तीनों लोकों में आपकी कीर्ति फैली हुई है। लोग कहते हैं कि रघुकुल के नरेश कभी कठोर नहीं होते। लेकिन आज मैं सोचती हूँ कि क्या आपने एक बार भी यह विचार किया कि राजमहल के सुखों में पले-बढ़े आपके पुत्र वन के कठोर जीवन को कैसे सहन करेंगे?”
उनकी आँखों के सामने सीता का कोमल चेहरा उभर आया।
“वह जनकनंदिनी सीता, जो अभी युवावस्था की दहलीज़ पर है, जिसने कभी कष्ट का स्पर्श तक नहीं किया, जो राजमहलों की सुख-सुविधाओं में पली है—वह जंगल की जलती धूप, कड़ाके की सर्दी और मूसलाधार वर्षा कैसे सहेगी?”
कौसल्या की वाणी भर्रा गई।
“जिसने सदा स्वादिष्ट भोजन किया, विविध व्यंजनों का आस्वाद लिया, वह अब जंगल के साधारण तिन्नी के चावल का सूखा भात कैसे खाएगी? जो प्रतिदिन मंगलगीत, वीणा और शंख की मधुर ध्वनि सुनकर जागती थी, वह अब रात के सन्नाटे में सिंहों और हिंसक पशुओं की भयावह गर्जना कैसे सह पाएगी?”
उनके हृदय में राम की छवि उभर आई।
“जो राम अयोध्या के लिए उत्सव के समान थे, जिनके दर्शन मात्र से प्रजा का हृदय प्रसन्न हो उठता था, वे आज कठोर भूमि पर कैसे सोते होंगे? उनकी बलवान भुजाएँ, जो प्रजा की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहती थीं, क्या आज वही उनकी शय्या का तकिया बनी होंगी?”
कौसल्या का मन अपने पुत्र के मुखकमल की स्मृतियों में खो गया।
“उनका वह सुंदर मुख, जिसकी आभा खिले हुए कमल के समान थी, जिनकी साँसों से कमल की-सी सुगंध आती थी, जिनकी आँखें करुणा और प्रेम से भरी रहती थीं—मैं उसे फिर कब देख पाऊँगी?”
वे फूट-फूटकर रो पड़ीं।
“मेरा हृदय अवश्य लोहे का बना है। यदि ऐसा न होता, तो राम के वियोग में अब तक इसके हजारों टुकड़े हो चुके होते।”
अब उनके स्वर में वेदना के साथ आक्रोश भी घुल गया।
“आपने बिना कुछ सोचे-समझे कैकेयी के कहने पर अपने ही पुत्रों को वन भेज दिया। जो सुख भोगने के योग्य थे, वे आज वन-वन भटक रहे हैं।”
कौसल्या के मन में भविष्य की चिंता उठी।
“यदि चौदह वर्ष बाद राम लौटेंगे भी, तो क्या भरत उन्हें राज्य लौटा देंगे? और यदि लौटा भी दें, तो क्या राम उसे स्वीकार करेंगे?”
उन्होंने एक गहरी साँस ली और समझाने लगीं—
“जैसे श्राद्ध में यदि श्रेष्ठ और विद्वान ब्राह्मणों से पहले अन्य लोगों को भोजन करा दिया जाए, तो वे अपमानित होकर बाद में परोसा गया अमृत भी स्वीकार नहीं करते; वैसे ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ पुत्र अपने छोटे भाई द्वारा भोगे हुए राज्य को कैसे ग्रहण करेंगे?”
“जैसे एक बलवान सिंह किसी दूसरे पशु का छोड़ा हुआ शिकार नहीं खाता, वैसे ही पुरुषसिंह राम दूसरों द्वारा भोगे गए राज्य को कभी स्वीकार नहीं करेंगे।”
“जैसे यज्ञ में प्रयुक्त सामग्री एक बार उपयोग के बाद पुनः दूसरे यज्ञ के योग्य नहीं रहती, उसी प्रकार एक बार किसी और के द्वारा भोगा गया राज्य राम के लिए स्वीकार्य नहीं होगा।”
कौसल्या जानती थीं कि राम के लिए धर्म और स्वाभिमान सबसे ऊपर हैं।
“वे समस्त पृथ्वी को जीत सकते हैं। यदि चाहें तो अपने बाणों से समुद्रों को भी सुखा सकते हैं। समस्त संसार मिलकर भी उनके हृदय में भय उत्पन्न नहीं कर सकता। फिर भी उन्होंने राज्य इसलिए नहीं लिया, क्योंकि वे अधर्म का स्पर्श तक नहीं करना चाहते। जो स्वयं संसार को धर्म का मार्ग दिखाते हैं, वे भला अधर्म कैसे कर सकते हैं?”
उन्होंने दशरथ की ओर देखा। उनकी आँखों में पीड़ा के साथ एक गहरा प्रश्न था।
“आपने ऐसे धर्मनिष्ठ पुत्र को वन भेज दिया। क्या यही धर्म है? क्या वेदों में जिन ऋषियों ने धर्म का साक्षात्कार किया, उन्होंने यही शिक्षा दी थी?”
अब कौसल्या का दुःख और भी व्यक्तिगत हो गया।
“एक स्त्री का सबसे बड़ा सहारा उसका पति होता है। दूसरा सहारा उसका पुत्र और तीसरा उसके बन्धु-बान्धव। लेकिन आज मेरा कोई सहारा नहीं बचा। आप तो कैकेयी के वश में हैं, मेरा पुत्र वन चला गया और मेरे बन्धु भी दूर हैं।”
वे धीरे से बोलीं, “मैं आपकी सेवा छोड़कर राम के पीछे वन नहीं जा सकती, पर उनके बिना यहाँ जीवित भी नहीं रह सकती।”
फिर उन्होंने चारों ओर दृष्टि डाली।
“आपने केवल राम को ही वन नहीं भेजा, आपने पूरे राज्य को शोक में डुबो दिया है। अयोध्या की प्रजा, मंत्री, सेवक—सबके हृदय टूट गए हैं। इस नगर की प्रसन्नता समाप्त हो गई है। यदि कोई प्रसन्न है, तो केवल भरत और कैकेयी।”
कौसल्या के ये कठोर वचन सुनकर महाराज दशरथ का हृदय विदीर्ण हो उठा। वे पहले ही राम-वियोग की अग्नि में जल रहे थे, और अब कौसल्या के शब्द उस अग्नि में घी के समान पड़ रहे थे।
उनकी आँखों के सामने राम का मुस्कुराता चेहरा घूमने लगा। उनका शरीर काँप उठा। वे करुण स्वर में पुकार उठे—“हा राम!”
और अगले ही क्षण वे मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।
जब उन्हें होश आया, तो उनका मन अतीत की ओर चला गया। वर्षों पहले किया गया एक भयंकर अपराध उनकी स्मृति में जाग उठा। उन्हें लगा मानो आज का यह असहनीय दुःख उसी पुराने कर्म का फल बनकर उनके सामने खड़ा हो गया हो।
राजमहल में शोक की छाया और गहरी हो गई। बाहर अयोध्या रो रही थी, और भीतर एक पिता अपने अपराधबोध तथा पुत्र-वियोग की ज्वाला में धीरे-धीरे टूट रहा था।