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क्षमा की विजय और सौ कन्याओं का पुनर्जन्म
राजा कुशनाभ की सभा में उस दिन एक विचित्र मौन छाया हुआ था। सौ राजकन्याएँ अपने पिता के सम्मुख खड़ी थीं—विनम्र, संयमी और भीतर से आहत। जैसे ही बुद्धिमान् महाराज कुशनाभ ने उनसे स्नेहपूर्वक पूछा, वे सभी एक साथ आगे बढ़ीं, उनके नेत्र नम थे। उन्होंने अपने पिता के चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया। उनके स्वर में पीड़ा थी, परंतु मर्यादा भी उतनी ही दृढ़ थी।
उन्होंने बताया कि सर्वत्र विचरण करने वाले वायुदेव ने अधर्म का मार्ग अपनाकर उन पर बलपूर्वक अधिकार करना चाहा। उनकी दृष्टि धर्म से हट चुकी थी। कन्याओं ने अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया था—“देव! हमारे पिता जीवित हैं, हम स्वतंत्र नहीं हैं। आप यदि हमें वरण करना चाहते हैं तो पहले हमारे पिता से अनुमति लें। यदि वे हमें आपको सौंप देंगे, तभी हम आपकी होंगी।” यह उत्तर मर्यादा, कुल-गरिमा और धर्म की रक्षा से भरा था।
परंतु वायुदेव का मन काम और पाप से आच्छादित था। उन्होंने कन्याओं की धर्मयुक्त वाणी नहीं सुनी। जब वे सब बहनें एक स्वर में धर्म की बात कह रही थीं, तब भी उन्होंने क्रोधित होकर उन्हें शापित किया। उनके कोमल शरीरों को पीड़ा दी, उन्हें कुब्ज बना दिया। वे निर्दोष थीं, फिर भी बिना अपराध के दंडित हुईं।
राजा कुशनाभ ने यह सब सुना। उनके हृदय में क्षणभर के लिए वेदना उठी, परंतु उनके मुख पर धर्म की स्थिरता थी। उन्होंने अपनी सौ कन्याओं को स्नेह से देखा और कहा—“पुत्रियो! जो कार्य महापुरुषों के लिए भी कठिन है, वह तुमने कर दिखाया। तुमने क्षमा धारण की। तुमने कुल की मर्यादा को सर्वोपरि रखा और मन में कामभाव को स्थान नहीं दिया। यह तुम्हारा महान् तप है।”
उन्होंने आगे कहा कि स्त्री हो या पुरुष, क्षमा ही उसका सच्चा आभूषण है। तुम सब में जो सहिष्णुता है, वह देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। क्षमा ही दान है, वही सत्य है, वही यज्ञ है, वही यश और धर्म है। यह समस्त जगत् क्षमा पर ही टिका है। उनके शब्दों ने कन्याओं के घायल हृदय पर मरहम का काम किया।
राजा ने उन्हें अंतःपुर में विश्राम करने की आज्ञा दी, पर स्वयं शांत नहीं बैठे। वे मंत्रियों के साथ बैठकर विचार करने लगे कि इन कन्याओं का विवाह किस योग्य वर से, किस देश और किस समय किया जाए। उनका मन केवल एक बात पर स्थिर था—इनकी गरिमा और सुख की रक्षा।
उसी समय एक महातेजस्वी मुनि, चूली, वेदोक्त तप में लीन थे। वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे, आत्मसंयम की मूर्ति। उनके आश्रम में सोमदा नामक एक गन्धर्वकुमारी सेवा में लगी रहती थी। वह ऊर्मिला की पुत्री थी और प्रतिदिन विनम्रतापूर्वक मुनि की सेवा करती, धर्म में स्थित रहती। उसकी निष्ठा और समर्पण से मुनि अत्यंत प्रसन्न हुए।
एक शुभ अवसर पर चूली मुनि ने उससे कहा—“मैं तुमसे संतुष्ट हूँ, वर माँगो।” सोमदा ने मधुर वाणी में निवेदन किया कि वह ब्रह्मतेज से युक्त, धर्मात्मा पुत्र चाहती है। उसने स्पष्ट कहा कि उसका कोई पति नहीं है, न होगा; वह केवल मुनि के ब्राह्म बल से पुत्र प्राप्त करना चाहती है।
मुनि ने अपने तपबल से उसे एक मानस पुत्र प्रदान किया—संकल्प से उत्पन्न, तेजस्वी और धर्मपरायण। उसका नाम ब्रह्मदत्त रखा गया।
कालांतर में वही ब्रह्मदत्त काम्पिल्या नगरी में राजा बने। वे लक्ष्मी और तेज से सम्पन्न थे, जैसे अमरावती में इन्द्र निवास करते हों। जब राजा कुशनाभ को उनके गुणों का समाचार मिला, तो उन्होंने निश्चय किया कि अपनी सौ कन्याओं का विवाह उसी योग्य, धर्मात्मा राजा से करेंगे।
ब्रह्मदत्त को आदरपूर्वक आमंत्रित किया गया। वे आए, और अत्यंत पवित्र विधि से एक-एक कर उन सभी कन्याओं का पाणिग्रहण किया। विवाह का वह क्षण अद्भुत था। जैसे ही ब्रह्मदत्त के हाथों का स्पर्श कन्याओं के हाथों से हुआ, उनके शरीर से कुब्जता का दोष दूर हो गया। वे पुनः नीरोग, सुंदर और तेजस्विनी हो उठीं। मानो क्षमा की अग्नि ने उनके शाप को भस्म कर दिया हो।
वायुदेव, जो वातरोग के रूप में उन पर स्थित थे, उन्हें छोड़कर चले गए। यह दृश्य देखकर राजा कुशनाभ का हृदय हर्ष से भर उठा। उनकी आँखों में आँसू थे—पीड़ा के नहीं, बल्कि संतोष और कृतज्ञता के।
विवाह सम्पन्न होने पर कुशनाभ ने ब्रह्मदत्त को पत्नियों और पुरोहितों सहित ससम्मान विदा किया। सोमदा ने भी अपने पुत्र और उसकी योग्य पत्नियों को देखकर हर्ष अनुभव किया। उसने एक-एक राजकन्या को हृदय से लगाया, उनका अभिनन्दन किया और कुशनाभ की धर्मनिष्ठा की सराहना करते हुए वहाँ से प्रस्थान किया।
इस प्रकार क्षमा, धैर्य और धर्म ने अधर्म पर विजय पाई। सौ कन्याओं की वेदना ने अंततः उन्हें और भी उज्ज्वल बना दिया। यह कथा सिखाती है कि जब हृदय में मर्यादा और क्षमा का दीप प्रज्वलित रहता है, तब सबसे बड़ा शाप भी अंततः आशीर्वाद में बदल जाता है।