+91 8005792734
Contact Us
Contact Us
amita2903.aa@gmail.com
Support Email
Jhunjhunu, Rajasthan
Address
(43)
गंगावतरण: भगीरथ की तपस्या और करुणा से पृथ्वी पर उतरी पवित्र धारा
देवताओं के देव ब्रह्माजी जब अपने लोक को लौट गये, तब राजा भगीरथ का संकल्प और भी दृढ़ हो गया। वे जानते थे कि उनके पूर्वज सगरपुत्रों की मुक्ति केवल गंगा के पवित्र जल से ही संभव है। इसलिए उन्होंने एक अत्यंत कठिन तपस्या का मार्ग चुना। वे पृथ्वी पर केवल अपने अँगूठे के अग्रभाग को टिकाकर खड़े हो गये और पूरे मन, प्राण और श्रद्धा से भगवान शिव की उपासना में लीन हो गये। एक वर्ष तक वे बिना थके, बिना विचलित हुए, उसी तप में डूबे रहे। उनका एक-एक क्षण अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए समर्पित था।
उनकी इस कठोर साधना से अंततः भगवान शिव, जो समस्त लोकों द्वारा पूजित हैं और माता उमा के प्रिय हैं, प्रसन्न हो गये। वे प्रकट हुए और अत्यंत स्नेहपूर्ण स्वर में भगीरथ से बोले—“नरश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी भक्ति और दृढ़ संकल्प से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूरी होगी। गंगा का प्रचंड वेग पृथ्वी सहन नहीं कर सकेगी, इसलिए मैं स्वयं उसे अपने मस्तक पर धारण करूँगा।”
जब शिवजी ने यह वर दे दिया, तब हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री गंगा ने आकाश से उतरने का निश्चय किया। उनका स्वरूप विराट हो उठा। उनका प्रवाह अत्यंत प्रचंड और दुर्धर हो गया। वे आकाश से वेगपूर्वक भगवान शिव के मस्तक पर गिरीं। उस समय गंगा के मन में एक सूक्ष्म अभिमान भी जाग उठा था। उन्हें लगा कि उनके तीव्र वेग के सामने स्वयं शिव भी टिक नहीं सकेंगे और वे उन्हें साथ लेकर पाताल तक बहा ले जाएँगी।
परंतु त्रिनेत्रधारी भगवान शंकर सब कुछ जान रहे थे। गंगा के इस गर्व को देखकर वे कुछ कुपित हो उठे। उन्होंने अपनी विशाल जटाओं को फैलाया और गंगा के समस्त प्रवाह को उन्हीं जटाओं में बाँध लिया। गंगा जब उनके पवित्र मस्तक पर गिरीं, तब उनका वह मस्तक जटाओं के कारण मानो गुफाओं से भरे हुए हिमालय जैसा प्रतीत हो रहा था। गंगा का सारा वेग उसी जटाजाल में उलझ गया। बहुत प्रयत्न करने पर भी वे पृथ्वी पर उतरने का मार्ग नहीं पा सकीं। वे शिव की जटाओं में ही भटकती रह गयीं और अनेक वर्षों तक वहीं बंधी रहीं।
जब भगीरथ ने यह देखा कि गंगा शिव की जटाओं में ही लुप्त हो गयी हैं और पृथ्वी पर नहीं आ पा रहीं, तो उन्होंने फिर से तपस्या आरम्भ की। उनका धैर्य अद्भुत था। वे पुनः शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर साधना में लीन हो गये। उनकी अटल भक्ति से महादेव फिर प्रसन्न हुए।
तब भगवान शिव ने करुणा करके गंगा को अपनी जटाओं से मुक्त किया और उन्हें बिन्दुसरोवर नामक स्थान पर छोड़ दिया। वहाँ पहुँचते ही गंगा सात धाराओं में विभक्त हो गयीं। तीन धाराएँ—ह्लादिनी, पावनी और नलिनी—पूर्व दिशा की ओर प्रवाहित हो गयीं। तीन अन्य धाराएँ—सुचक्षु, सीता और महानदी सिन्धु—पश्चिम दिशा की ओर बह चलीं। सातवीं धारा विशेष थी, क्योंकि वह राजा भगीरथ के पीछे-पीछे चलने लगी। भगीरथ अपने दिव्य रथ पर आगे-आगे चल रहे थे और गंगा उनकी मार्गदर्शिका बनकर उनके पीछे बह रही थीं।
जब गंगा पृथ्वी पर बहने लगीं, तब उनके जल का कलकल नाद चारों ओर गूँज उठा। उनका वेग इतना तीव्र था कि मत्स्य, कच्छप और शिंशुमार जैसे जलचर समूह-के-समूह उस जल में कूदते और उछलते दिखाई देते थे। उस दृश्य से पृथ्वी अत्यंत सुंदर लग रही थी।
देवता, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष और सिद्धगण भी इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए आकाश से उतर आये। वे अपने दिव्य विमानों, घोड़ों और हाथियों पर सवार होकर गंगा की शोभा का दर्शन करने लगे। सभी देवता आश्चर्यचकित होकर खड़े थे। गंगावतरण का यह दिव्य दृश्य देखने के लिए असंख्य तेजस्वी देवता वहाँ एकत्रित हो गये थे।
देवताओं के आभूषणों की चमक से आकाश ऐसा प्रकाशित हो रहा था मानो उसमें एक साथ सैकड़ों सूर्य उदित हो गये हों। गंगा के जल में उछलते हुए मत्स्य और सर्पों की चमक से ऊपर का आकाश बिजली की चपल चमक जैसा प्रतीत हो रहा था। उनके प्रवाह से उठने वाला श्वेत फेन हवा में फैलकर ऐसे दिखता था मानो शरद ऋतु के सफेद बादल या उड़ते हुए हंस हों।
गंगा की धारा कहीं तीव्र वेग से बहती, कहीं टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती, कहीं चौड़ी हो जाती और कहीं ऊँचे स्थान से गिरकर नीचे की ओर बहती। कहीं वह समतल भूमि पर शांत गति से बहती और कहीं अपने ही जल से टकराकर लहरों का अद्भुत खेल रचती। आकाश से शिव के मस्तक पर और वहाँ से पृथ्वी पर उतरता हुआ वह निर्मल जल अत्यंत मनोहारी दिखाई दे रहा था।
पृथ्वी पर रहने वाले ऋषि और गन्धर्व यह सोचकर कि यह जल शिव के मस्तक से होकर आया है, अत्यंत पवित्र है, उसमें आचमन करने लगे। जिन प्राणियों को शाप के कारण आकाश से पृथ्वी पर आना पड़ा था, वे गंगा में स्नान करके अपने पापों से मुक्त हो गये और पुनः अपने दिव्य लोकों को प्राप्त कर सके। गंगा के स्पर्श से सम्पूर्ण जगत में आनंद और पवित्रता फैल गयी।
उधर भगीरथ अपने रथ पर आगे-आगे बढ़ते जा रहे थे और गंगा उनकी राह का अनुसरण कर रही थीं। देवता, ऋषि, दैत्य, दानव, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, नाग और अप्सराएँ—सब प्रसन्न होकर भगीरथ के पीछे-पीछे चल रहे थे। जहाँ-जहाँ भगीरथ जाते, गंगा भी उसी दिशा में बहने लगतीं।
मार्ग में एक स्थान पर महान प्रतापी राजा जह्नु यज्ञ कर रहे थे। गंगा का वेग इतना प्रबल था कि उनका जल यज्ञमण्डप में फैल गया और सब कुछ बहा ले गया। इसे देखकर राजा जह्नु को लगा कि गंगा को अपने वेग का अभिमान हो गया है। वे क्रोधित हो उठे और अपने तपोबल से गंगा की पूरी जलधारा को पी गये। यह दृश्य देखकर सभी देवता और ऋषि अत्यंत विस्मित हो गये।
देवताओं और ऋषियों ने तब राजा जह्नु की स्तुति की और उनसे प्रार्थना की कि वे गंगा को पुनः प्रकट करें। उन्होंने यह भी कहा कि यदि वे ऐसा करेंगे तो गंगा उनकी पुत्री के समान मानी जाएँगी। यह सुनकर जह्नु प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने कानों के छिद्रों से गंगा को फिर से प्रकट कर दिया। तभी से गंगा जाह्नवी, अर्थात् जह्नु की पुत्री, के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
इसके बाद गंगा फिर से भगीरथ के पीछे-पीछे चलने लगीं और अंततः समुद्र तक पहुँचीं। वहाँ से वे रसातल में गयीं, क्योंकि भगीरथ के पूर्वज वहीं भस्म होकर पड़े थे। भगीरथ भी उनके साथ वहाँ पहुँचे और उन्होंने अपने उन पितामहों की भस्मराशि को देखा, जो शाप के कारण नष्ट हो गये थे।
तब गंगा का पवित्र जल उस भस्म पर प्रवाहित हुआ। जैसे ही वह जल सगरपुत्रों की राख को स्पर्श करता गया, वे सब पापमुक्त होकर स्वर्गलोक को प्राप्त हो गये। उस क्षण भगीरथ का वर्षों का तप और कष्ट सफल हो गया। उनके प्रेम, धैर्य और त्याग ने न केवल उनके पूर्वजों का उद्धार किया, बल्कि सम्पूर्ण पृथ्वी को एक अमर और पवित्र धारा का वरदान भी दे दिया—जिसे आज हम श्रद्धा से माँ गंगा के नाम से जानते हैं। 🌊✨