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गंगा को पृथ्वी पर लाने का अटूट संकल्प

 

 

राजा सगर के देह त्यागने के बाद राज्य शोक में डूब गया। प्रजाजनों ने एकमत होकर परम धर्मात्मा अंशुमान को राजगद्दी पर बैठाने की इच्छा प्रकट की। अंशुमान केवल प्रतापी ही नहीं, बल्कि प्रजा के दुःख को अपना दुःख मानने वाले राजा थे। उनके राज्य में न्याय, करुणा और धर्म का प्रकाश फैला हुआ था। उनके पुत्र दिलीप भी उसी तेज और सद्गुणों से सम्पन्न थे।

 

समय बीतने पर अंशुमान ने संसार के मोह को त्यागने का निश्चय किया। उन्होंने अपने योग्य पुत्र दिलीप को राज्य सौंप दिया और हिमालय की रमणीय, शांत शिखरों की ओर प्रस्थान किया। वहाँ, बर्फ से ढकी चोटियों और दिव्य निस्तब्धता के बीच, उन्होंने कठोर तपस्या आरम्भ की। वर्षों नहीं, सहस्रों वर्षों तक वे तप में लीन रहे। बत्तीस हजार वर्षों की दीर्घ साधना के बाद, तप के तेज से प्रकाशित होकर उन्होंने वहीं अपने शरीर का त्याग किया और स्वर्गलोक को प्राप्त हुए।

 

इधर राजा दिलीप के हृदय में एक गहरी वेदना थी। उन्हें अपने पितामहों के वध का वृत्तांत ज्ञात था। यह सोचकर उनका मन अशांत रहता कि उनके पूर्वजों की आत्माएँ अभी तक मुक्ति की प्रतीक्षा कर रही हैं। वे दिन-रात चिंतन करते—कैसे गंगाजी को पृथ्वी पर लाया जाए? कैसे उनके पवित्र जल से पितरों को जलांजलि दी जाए? कैसे उनका उद्धार हो? यह प्रश्न उनके मन को हर पल मथता रहता।

 

इन्हीं चिंताओं के बीच, धर्मपरायण राजा दिलीप को एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई—भगीरथ। यह पुत्र मानो ईश्वर की ओर से एक आशा का दीपक था। दिलीप ने दीर्घकाल तक राज्य किया, अनेक यज्ञ संपन्न किए, धर्म की मर्यादा को बनाए रखा। फिर भी, पितरों के उद्धार का उपाय न खोज पाने का दुःख उनके भीतर कहीं गहराई में चुभता रहा। अंततः रोग से पीड़ित होकर उन्होंने संसार से विदा ली। अपने पुण्य कर्मों के प्रभाव से वे इन्द्रलोक को प्राप्त हुए, पर जाते-जाते अपने पुत्र भगीरथ के हाथों में राज्य सौंप गए।

 

भगीरथ के जीवन का लक्ष्य स्पष्ट था। उनके कोई संतान नहीं थी, फिर भी उन्होंने व्यक्तिगत सुख की चिंता न कर एक महान संकल्प लिया—गंगाजी को पृथ्वी पर लाकर अपने पूर्वजों का उद्धार करना। उन्होंने राज्य की जिम्मेदारी मंत्रियों को सौंपी और स्वयं गोकर्ण तीर्थ में कठोर तपस्या के लिए चले गए।

 

उनकी तपस्या असाधारण थी। वे दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर, पंचाग्नि के बीच खड़े होकर साधना करते। एक-एक महीने में केवल एक बार आहार ग्रहण करते। इन्द्रियों को पूर्णतः वश में रखकर वे निरंतर ध्यान में लीन रहते। इस प्रकार एक हजार वर्षों तक उन्होंने अटूट धैर्य और अडिग विश्वास के साथ तप किया। उनका शरीर क्षीण होता गया, पर संकल्प और भी प्रखर होता गया।

 

अंततः उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं ब्रह्माजी देवताओं सहित उनके समक्ष प्रकट हुए। उस दिव्य क्षण में आकाश प्रकाश से भर गया। ब्रह्माजी ने स्नेहपूर्ण वाणी में कहा कि वे भगीरथ की तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हैं और उन्हें कोई वर माँगने का अधिकार है।

 

भगीरथ ने अत्यन्त विनम्रता के साथ अपने दोनों हाथ जोड़ लिये। उनकी आँखें भक्ति, करुणा और गहरी तड़प से भरी हुई थीं। उनके हृदय में अपने पूर्वजों के उद्धार की तीव्र आकांक्षा उमड़ रही थी, और उसी भाव-विभोर अवस्था में वे प्रभु के सामने नतमस्तक खड़े थे। उन्होंने विनम्र स्वर में प्रार्थना की—यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो सगर के सभी पुत्रों को मेरे हाथों गंगाजी का पवित्र जल प्राप्त हो। उनकी भस्म गंगाजल से भीग जाए और उन्हें अक्षय स्वर्गलोक की प्राप्ति हो। साथ ही, उन्होंने अपने वंश की निरंतरता की कामना भी की, कि इक्ष्वाकुवंश कभी नष्ट न हो।

 

भगीरथ की करुणा और निस्वार्थ भाव से ब्रह्माजी अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने आशीर्वाद दिया कि उनका महान मनोरथ पूर्ण होगा। पर साथ ही उन्होंने एक गूढ़ सत्य बताया—गंगा, जो हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री है, स्वर्ग से पृथ्वी पर जब उतरेगी तो उसका वेग इतना प्रचंड होगा कि पृथ्वी उसे सहन नहीं कर पाएगी। केवल भगवान शंकर ही ऐसे हैं जो अपने जटाजूट में उसे धारण कर सकते हैं।

 

ब्रह्माजी ने भगीरथ को निर्देश दिया कि वे भगवान शंकर को प्रसन्न करें। फिर उन्होंने गंगाजी से भी भगीरथ पर अनुग्रह करने का निवेदन किया। यह कहकर ब्रह्माजी देवताओं और मरुद्गणों सहित स्वर्गलोक को लौट गए।

 

उस क्षण भगीरथ के हृदय में आशा की एक नई किरण जाग उठी। मार्ग कठिन था, पर अब दिशा स्पष्ट थी। उनका संकल्प और भी दृढ़ हो गया। वे जानते थे कि यह केवल एक नदी को पृथ्वी पर लाने का प्रयास नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के उद्धार, अपने वंश की मर्यादा और समस्त मानवता के कल्याण का पवित्र अभियान है।