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चारों राजकुमारों का दिव्य विवाह-संयोग और जनक-दशरथ का अनुपम धर्मोत्सव
विदेहराज जनक ने जब अत्यंत विनम्रता और आनंद से भरे स्वर में अपनी बात समाप्त की, तब सभा में कुछ क्षणों के लिए गहरी शांति छा गई। सभी की दृष्टि उन दो महान् ऋषियों—वसिष्ठ और विश्वामित्र—की ओर उठ गई। दोनों मुनि राजसभा में बैठे थे, और उनके मुखमंडल पर संतोष की मधुर आभा झलक रही थी। वे जनक की उदारता और धर्मनिष्ठा से अत्यंत प्रसन्न थे। तब दोनों महर्षि धीरे-धीरे उठे और स्नेह से भरे स्वर में उस वीर नरेश से बोले।
उन्होंने कहा—हे नरश्रेष्ठ! इक्ष्वाकु और विदेह—ये दोनों राजवंश अपने तेज, मर्यादा और धर्मपालन के कारण संसार में अद्वितीय हैं। इनकी महिमा का कोई अंत नहीं। इन दोनों वंशों की तुलना करने वाला दूसरा कोई कुल इस पृथ्वी पर नहीं है। जैसे दो महान् पर्वत अपने-अपने स्थान पर अटल खड़े होते हैं, वैसे ही ये दोनों वंश धर्म और मर्यादा के आधारस्तम्भ हैं। आज इन दोनों का संबंध स्थापित होना केवल विवाह नहीं, बल्कि धर्म और आदर्श का मिलन है।
मुनियों ने आगे कहा—यह संबंध हर दृष्टि से उचित और समान है। रूप, गुण, तेज और मर्यादा—सबमें दोनों पक्ष एक-दूसरे के अनुरूप हैं। सीता जैसी सौम्य, शीलवती और तेजस्विनी कन्या श्रीराम के लिए सर्वथा उपयुक्त है, और उर्मिला लक्ष्मण के लिए पूर्णतः अनुरूप है। जैसे चन्द्रमा के साथ उसकी चाँदनी शोभा पाती है, वैसे ही ये राजकुमार और राजकुमारियाँ एक-दूसरे के साथ शोभित होंगे।
इसके बाद विश्वामित्र ने थोड़ी देर ठहरकर और भी गंभीर स्वर में कहा—हे राजन्! मुझे भी कुछ कहना है। आपके छोटे भाई, धर्मज्ञ और विनीत राजा कुशध्वज यहाँ उपस्थित हैं। इन धर्मात्मा नरेश की भी दो कन्याएँ हैं, जो इस पृथ्वी पर अनुपम सुन्दरी और सद्गुणों से युक्त हैं। मेरा विचार है कि इन दोनों कन्याओं का विवाह भी महाराज दशरथ के दो अन्य पुत्र—भरत और बुद्धिमान शत्रुघ्न—के साथ कर दिया जाए। इस प्रकार चारों राजकुमारों का विवाह एक ही कुल में होकर दोनों वंशों का संबंध और भी दृढ़ हो जाएगा।
उन्होंने आगे कहा—राजा दशरथ के ये चारों पुत्र रूप और यौवन से सुशोभित हैं। उनके तेज में देवताओं जैसी दीप्ति है, और पराक्रम में वे लोकपालों के समान हैं। वे धर्म, विनय और शौर्य के अद्भुत संगम हैं। अतः भरत और शत्रुघ्न भी इन योग्य कन्याओं के साथ विवाह करके इस पवित्र बंधन को पूर्ण करें।
मुनियों ने स्नेहपूर्वक जनक को समझाते हुए कहा—हे राजेन्द्र! आप इन दोनों भाइयों को भी कन्यादान करके पूरे इक्ष्वाकुवंश को अपने संबंध में बाँध लीजिए। आप पुण्यात्मा हैं, आपके मन में कोई संकोच या व्यग्रता नहीं आनी चाहिए। यह सोचकर चिंता न करें कि एक ही समय चार विवाहों का भार कैसे निभेगा। यह सब ईश्वर की योजना है, और इससे आपका यश चारों दिशाओं में फैल जाएगा।
जब जनक ने यह वचन सुना, तो उनके हृदय में अपार आनंद उमड़ पड़ा। वे विनम्रता से हाथ जोड़कर दोनों मुनियों के सामने खड़े हो गए। उनकी आँखों में कृतज्ञता और श्रद्धा के आँसू चमक रहे थे। उन्होंने कहा—हे मुनिपुंगवो! मेरा कुल धन्य है, जिसे आप जैसे महान् ऋषि इक्ष्वाकुवंश के योग्य समझकर उसके साथ संबंध जोड़ने की आज्ञा दे रहे हैं। यह मेरे लिए अत्यंत गौरव की बात है।
जनक ने अत्यंत प्रसन्न होकर कहा—जैसा आप कहते हैं, वैसा ही होगा। भरत और शत्रुघ्न, जो सदा साथ रहते हैं, वे कुशध्वज की दोनों कन्याओं को अपनी-अपनी धर्मपत्नी के रूप में स्वीकार करें। और यह भी मेरी इच्छा है कि चारों महाबली राजकुमार एक ही दिन हमारी चारों कन्याओं का पाणिग्रहण करें। इससे हमारा उत्सव और भी भव्य तथा मंगलमय होगा।
फिर उन्होंने विवाह का शुभ समय बताते हुए कहा—आने वाले दो दिन फाल्गुनी नक्षत्र से युक्त हैं। दूसरे दिन उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र होगा, जिसे विवाह के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। मनीषी पुरुष उसी नक्षत्र में वैवाहिक कार्य करना श्रेष्ठ बताते हैं। अतः उसी दिन चारों विवाह संपन्न हों।
यह कहकर जनक अत्यंत विनम्र भाव से उठ खड़े हुए और बोले—आप लोगों ने कन्याओं का विवाह निश्चित करके मेरे लिए महान् धर्म का कार्य कर दिया। मैं स्वयं को आपका शिष्य मानता हूँ। कृपया इन श्रेष्ठ आसनों पर विराजमान हों। उन्होंने आगे कहा—जैसी आपके लिए राजा दशरथ की अयोध्या है, वैसी ही यह मिथिला भी आपकी है। आप यहाँ पूर्ण अधिकार से रहें और हमें उचित आज्ञा देते रहें।
जनक की विनम्रता और श्रद्धा देखकर राजा दशरथ अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने स्नेह से भरे स्वर में कहा—हे मिथिलेश्वर! आप दोनों भाइयों के गुण असंख्य हैं। आपने ऋषियों और राजाओं का जो सत्कार किया है, वह अत्यंत प्रशंसनीय है। आप मंगल के भागी हों।
दशरथ ने आगे कहा—अब हम अपने विश्राम स्थान को जाएँगे। वहाँ जाकर मैं विधिपूर्वक नान्दीमुख श्राद्ध करूँगा, जिससे इस विवाह का कार्य और भी मंगलमय हो। यह कहकर उन्होंने जनक से अनुमति ली और विश्वामित्र तथा वसिष्ठ को आगे करके अपने आवास की ओर चले गए।
अपने डेरे पर पहुँचकर राजा दशरथ ने अत्यंत श्रद्धा से आभ्युदयिक श्राद्ध किया। वे मन ही मन अपने पूर्वजों का स्मरण कर रहे थे और उनसे आशीर्वाद मांग रहे थे कि यह विवाह उत्सव सफल और मंगलमय हो। रात बीतने पर प्रातःकाल उन्होंने उठकर गोदान का महान् कार्य आरम्भ किया।
उन्होंने अपने प्रत्येक पुत्र के मंगल के लिए धर्मानुसार एक-एक लाख गौएँ ब्राह्मणों को दान कीं। वे गौएँ अत्यंत सुन्दर थीं। उनके सींग सोने से मढ़े हुए थे, उनके साथ बछड़े थे, और दुग्ध के लिए काँसे के पात्र भी दिए गए। यह दृश्य अत्यंत भव्य था—चारों ओर गौओं की पंक्तियाँ, ब्राह्मणों का समूह, और राजा दशरथ का उदार दान।
इस प्रकार पुत्रवत्सल राजा दशरथ ने चार लाख गौओं का दान किया। साथ ही उन्होंने बहुत-सा धन भी ब्राह्मणों को दिया। यह दान केवल वैभव का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि पुत्रों के मंगल और धर्म की स्थापना का पवित्र संकल्प था।
गोदान पूर्ण होने के बाद राजा दशरथ अपने चारों पुत्रों से घिरे बैठे थे। उनके चारों ओर राजकुमारों की तेजस्विता चमक रही थी। उस समय उनका स्वरूप ऐसा लग रहा था मानो प्रजापति ब्रह्मा स्वयं लोकपालों से घिरे बैठे हों। सभा में शांति, प्रसन्नता और दिव्य उत्साह का वातावरण छा गया था। चारों ओर यही अनुभूति हो रही थी कि यह केवल विवाह नहीं, बल्कि दो महान् वंशों का दिव्य मिलन है, जो युगों तक आदर्श के रूप में स्मरण किया जाएगा। ✨