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चित्रकूट में नवजीवन — वनवास की तपोभूमि और राम की प्रथम पर्णकुटी
रात्रि का अंतिम प्रहर था। वन की नीरवता धीरे-धीरे टूटने लगी थी। पूर्व दिशा में उषा की हल्की लालिमा फैल रही थी। वृक्षों पर बैठे पक्षी जाग चुके थे और उनके मधुर स्वर वन के वातावरण को जीवंत बना रहे थे। उसी समय रघुकुल के शिरोमणि श्रीराम की आँखें खुलीं।
उन्होंने देखा कि लक्ष्मण अभी विश्राम कर रहे हैं। प्रेम और स्नेह से भरकर उन्होंने धीरे से उन्हें जगाया। उनके स्वर में आदेश नहीं, बड़े भाई का वात्सल्य था। उन्होंने कहा कि समय हो गया है, पक्षियों का मधुर कलरव सुनाई दे रहा है, अब आगे बढ़ने का समय आ गया है।
लक्ष्मण तुरंत उठ बैठे। वे सदैव अपने बड़े भाई की सेवा के लिए तत्पर रहते थे। जागते ही उन्होंने अपनी थकान, आलस्य और निद्रा को त्याग दिया। उनके मन में केवल एक ही भावना थी—भैया और भाभी की सेवा।
तीनों ने यमुना के शीतल और पवित्र जल में स्नान किया। स्नान के बाद वे चित्रकूट की ओर जाने वाले मार्ग पर चल पड़े। वह मार्ग ऋषियों और तपस्वियों के चरणों से पवित्र हो चुका था। चारों ओर वन की अनुपम शोभा बिखरी हुई थी।
मार्ग में चलते हुए श्रीराम ने सीता को वन की सुंदरता दिखानी प्रारम्भ की। वे चाहते थे कि वनवास केवल कष्ट का अनुभव न बने, बल्कि प्रकृति के सौंदर्य का भी आनंद मिले।
उन्होंने सामने खिले हुए पलाश के वृक्षों की ओर संकेत किया। लाल-लाल पुष्पों से लदे वे वृक्ष ऐसे प्रतीत होते थे मानो अग्नि की ज्वालाएँ धरती पर उतर आई हों। ऐसा लगता था जैसे किसी ने उन पर पुष्पों की मालाएँ सजा दी हों।
आगे बढ़ते हुए उन्होंने बेल और भिलावे के वृक्ष दिखाए। फलों और फूलों के भार से उनकी शाखाएँ झुक गई थीं। क्योंकि वहाँ सामान्य लोगों का आना-जाना नहीं था, इसलिए वे फल किसी ने तोड़े भी नहीं थे। श्रीराम ने प्रसन्न होकर कहा कि वन में उनके जीवन-निर्वाह के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध है।
फिर उन्होंने लक्ष्मण को वृक्षों पर लटकते मधुमक्खियों के विशाल छत्ते दिखाए। उनमें भरपूर मधु भरा था। वन की यह समृद्धि देखकर ऐसा लगता था मानो प्रकृति स्वयं उनका स्वागत कर रही हो।
जहाँ तक दृष्टि जाती थी, भूमि पुष्पों से ढकी दिखाई देती थी। मंद पवन चलती तो फूलों की वर्षा होने लगती। पपीहा अपनी प्रिय पुकार लगा रहा था और दूर कहीं मोर उसके स्वर का उत्तर देता प्रतीत होता था। पूरा वन संगीत से गूँज रहा था।
कुछ दूर चलने पर चित्रकूट पर्वत के दर्शन हुए। उसका विशाल शिखर आकाश को छूता जान पड़ता था। हाथियों के झुंड वहाँ विचरण कर रहे थे और असंख्य पक्षी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उस दिव्य दृश्य को देखकर श्रीराम के हृदय में विशेष प्रसन्नता जाग उठी।
उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि चित्रकूट का यह प्रदेश अत्यंत पवित्र और रमणीय है। यहाँ की समतल भूमि, घने वृक्ष और शांत वातावरण निवास के लिए अत्यंत उपयुक्त हैं। वे यहाँ सुखपूर्वक रह सकेंगे।
कुछ समय बाद तीनों चित्रकूट पर्वत पर पहुँच गए। वहाँ हर प्रकार के फल, मूल और निर्मल जल की भरपूर व्यवस्था थी। वातावरण में ऐसी शांति थी, जो सीधे हृदय को स्पर्श करती थी।
श्रीराम ने पर्वत को ध्यानपूर्वक देखा और कहा कि यह स्थान वास्तव में रहने योग्य है। यहाँ प्रकृति की समृद्धि भी है और अनेक महात्मा ऋषियों का निवास भी। उनके मन ने निश्चय कर लिया कि अब यही उनका नया आश्रय होगा।
यह निर्णय लेकर वे महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुँचे। विनम्रता से हाथ जोड़कर तीनों ने ऋषिवर को प्रणाम किया। महर्षि वाल्मीकि उन्हें देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने बड़े प्रेम से उनका स्वागत किया और सम्मानपूर्वक बैठाया।
श्रीराम ने अपना परिचय दिया और फिर लक्ष्मण की ओर देखकर कहा कि अब उन्हें अपने रहने के लिए एक पर्णकुटी बनानी चाहिए। उनके स्वर में सरलता थी, किंतु उस सरल वाक्य में वनवास के नए जीवन का आरम्भ छिपा था।
लक्ष्मण ने आदेश मिलते ही कार्य प्रारम्भ कर दिया। वे वन में गए और अनेक प्रकार की मजबूत शाखाएँ तथा लकड़ियाँ एकत्रित कीं। उनके मन में उत्साह था कि वे अपने प्रिय भैया और भाभी के लिए एक सुंदर आश्रय बनाएँगे।
कुछ ही समय में उन्होंने अत्यंत सुंदर पर्णशाला तैयार कर दी। वह बाहर और भीतर से मजबूत थी। ऊपर पत्तों और टहनियों की छत बनाई गई थी, जिससे वर्षा और धूप से रक्षा हो सके। साधारण होते हुए भी वह कुटी प्रेम, परिश्रम और समर्पण की प्रतिमूर्ति बन गई थी।
कुटी तैयार होने पर श्रीराम ने कहा कि किसी भी नए निवास में प्रवेश करने से पहले विधिपूर्वक पूजन करना आवश्यक है। उन्होंने गजकन्द लाने का निर्देश दिया ताकि वास्तु देवताओं का पूजन किया जा सके।
लक्ष्मण तुरंत वन में गए और गजकन्द लेकर लौटे। उन्होंने उसे अग्नि में भली-भाँति पकाया। जब वह तैयार हो गया तो उन्होंने आदरपूर्वक श्रीराम से निवेदन किया कि अब पूजन का शुभ कार्य सम्पन्न किया जाए।
श्रीराम ने स्नान करके शुद्ध भाव से सभी आवश्यक मंत्रों का जप किया। उन्होंने वास्तुयज्ञ, देवपूजन, बलिवैश्वदेव, रुद्रयाग और वैष्णवयाग सम्पन्न किए। प्रत्येक कर्म अत्यंत श्रद्धा और विधि के अनुसार किया गया। वन की उस छोटी-सी पर्णकुटी में भी धर्म और मर्यादा का वही आदर्श दिखाई दे रहा था जो कभी अयोध्या के राजमहलों में था।
पूजन पूर्ण होने के बाद उन्होंने आठों दिशाओं के देवताओं तथा अन्य देवस्थानों के लिए आवश्यक स्थानों की स्थापना की। इस प्रकार वह साधारण कुटिया केवल रहने का स्थान नहीं रही, बल्कि धर्म और पवित्रता का केंद्र बन गई।
अंततः वह शुभ क्षण आया जब सीता, राम और लक्ष्मण ने अपनी नई पर्णकुटी में प्रवेश किया। उस समय उनके मन में अयोध्या के राजमहलों का कोई मोह नहीं था। उनके साथ प्रेम था, धर्म था और परस्पर का अटूट विश्वास था।
कुटी के चारों ओर घना वन था। निकट ही मंदाकिनी नदी अपनी निर्मल धारा के साथ बह रही थी। उसके तटों पर पशु-पक्षियों का मधुर संसार बसा हुआ था। चित्रकूट पर्वत, मंदाकिनी नदी और शांत वन का यह संगम अत्यंत मनोहर था।
इस दिव्य वातावरण में श्रीराम के हृदय को अद्भुत शांति मिली। नगर से दूर वन में आने का जो कष्ट था, वह मानो विलीन हो गया। चित्रकूट अब केवल उनका निवास नहीं था—वह उनके वनवास का पहला घर बन चुका था, जहाँ त्याग के साथ-साथ संतोष, धर्म और आत्मिक आनंद का नया जीवन प्रारम्भ हुआ।