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चित्रकूट से ऋषियों का प्रस्थान और श्रीराम का संकल्प
भरत के अयोध्या लौट जाने के बाद श्रीराम, सीता और लक्ष्मण चित्रकूट के वन में रहकर अपना जीवन व्यतीत करने लगे। वन का वातावरण शांत था। चारों ओर हरियाली, वृक्षों की छाया, पक्षियों का मधुर कलरव और तपस्वियों के आश्रम थे। श्रीराम के आगमन से वहाँ रहने वाले ऋषि-मुनियों को भी एक प्रकार का सहारा और सुरक्षा का अनुभव होता था।
लेकिन कुछ समय बाद श्रीराम ने आश्रम के वातावरण में एक विचित्र परिवर्तन अनुभव किया। जो तपस्वी पहले उन्हें देखकर प्रसन्न हो जाते थे, उनके चेहरों पर अब चिंता और बेचैनी दिखाई देने लगी। वे आपस में धीरे-धीरे बातें करते, कभी श्रीराम की ओर देखते और फिर एक-दूसरे को संकेत करते। ऐसा लगता था मानो वे श्रीराम से कुछ कहना चाहते हों, लेकिन किसी संकोच या भय के कारण सीधे कुछ कह नहीं पा रहे हों।
उनकी इस बेचैनी को देखकर श्रीराम के मन में चिंता उत्पन्न हुई। वे सोचने लगे—“आखिर ऐसी क्या बात हो गई है? कहीं मेरी ओर से कोई भूल तो नहीं हो गई? क्या मेरे कारण इन तपस्वियों को कोई कष्ट पहुँचा है?”
श्रीराम ने अनुमान लगाने के बजाय स्वयं सत्य जानना उचित समझा। वे हाथ जोड़कर आश्रम के कुलपति महर्षि के पास पहुँचे। उनके स्वर में विनम्रता और मन में सच्ची चिंता थी। उन्होंने पूछा, “भगवन्! क्या मेरे व्यवहार में ऐसा कुछ दिखाई देता है जो पूर्वज राजाओं के योग्य न हो? क्या मेरे स्वभाव में कोई दोष या विकार दिखाई पड़ा है, जिसके कारण ये तपस्वी दुखी और चिंतित हैं?”
श्रीराम यहीं नहीं रुके। उन्होंने अपने प्रिय छोटे भाई लक्ष्मण के विषय में भी पूछा। उन्होंने कहा, “क्या लक्ष्मण ने असावधानी या प्रमाद के कारण ऐसा कोई अनुचित कार्य कर दिया है, जो ऋषियों को बुरा लगा हो?”
फिर श्रीराम ने सीता के विषय में भी बड़ी विनम्रता से पूछा। उन्होंने कहा, “सीता तो पहले आप सभी की अर्घ्य, पाद्य आदि से सेवा करती रही हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि अब वह मेरी सेवा में अधिक लगी रहने के कारण आप लोगों की उचित सेवा नहीं कर पा रही हैं?”
श्रीराम की बातें सुनकर यह स्पष्ट हो गया कि वे अपने प्रति किसी भी प्रकार की शिकायत को गंभीरता से लेते थे। उनमें राजकुमार होने का अहंकार नहीं था। वे यह मानकर नहीं चल रहे थे कि सबको उनकी बात स्वीकार करनी ही चाहिए। बल्कि वे स्वयं अपनी और अपने परिवार की कमियों को जानने के लिए तैयार थे।
तब एक महर्षि, जो आयु से भी वृद्ध थे और वर्षों की कठोर तपस्या के कारण भी अत्यंत अनुभवी हो चुके थे, श्रीराम के सामने आए। वे सभी प्राणियों पर दया करने वाले थे। श्रीराम के प्रति उनके मन में स्नेह और सम्मान था, इसलिए वे कुछ भावुक होकर बोले, “तात! सीता जैसी कल्याणमयी और सबके हित में लगी रहने वाली स्त्री तपस्वियों के प्रति अपने स्वभाव से कभी विमुख हो ही नहीं सकती। आपकी चिंता का कारण सीता या लक्ष्मण नहीं हैं।”
ऋषि ने फिर उस वास्तविक समस्या को बताया, जिसने पूरे आश्रम को भय और चिंता से भर दिया था।
उन्होंने कहा, “तात! असली कारण राक्षस हैं। आपके यहाँ रहने के कारण राक्षसों का भय और भी बढ़ गया है। वे सोचते हैं कि अब इस वन में आपका निवास है, इसलिए वे तपस्वियों को पहले से अधिक परेशान करने लगे हैं।”
उन्होंने विशेष रूप से खर नामक राक्षस का उल्लेख किया। खर रावण का छोटा भाई था और जनस्थान में रहने वाले अनेक तपस्वियों को पहले ही बहुत सताता था। वह अत्यंत क्रूर, घमंडी, हिंसक और अपनी शक्ति के कारण घमंड से भरा हुआ था। उसे यह बिल्कुल पसंद नहीं था कि कोई उसके क्षेत्र में निर्भय होकर रहे। श्रीराम का वहाँ आकर रहना उसके लिए और भी असहनीय हो गया था।
ऋषि ने बताया कि जबसे श्रीराम चित्रकूट में रहने लगे हैं, तबसे राक्षसों का अत्याचार बढ़ गया है। वे कभी भयानक और विकृत रूप धारण करके आश्रमों के सामने आ जाते, तो कभी तपस्वियों को अपवित्र वस्तुओं से परेशान करते। उनका उद्देश्य केवल डर पैदा करना और ऋषियों की तपस्या भंग करना था।
वे राक्षस कभी अचानक किसी आश्रम में घुस आते और छिपकर बैठे रहते। जैसे ही उन्हें कोई असावधान या कमजोर तपस्वी दिखाई देता, वे उसे परेशान करते और उसका जीवन संकट में डाल देते। इस प्रकार वे आश्रमों में भय का वातावरण बनाए रखते और तपस्वियों को चैन से साधना नहीं करने देते।
ऋषि ने आगे बताया कि जब तपस्वी यज्ञ और हवन आरंभ करते, तब राक्षस उनकी धार्मिक क्रियाओं को भी नष्ट करने लगते। वे यज्ञ में उपयोग होने वाली सामग्री को इधर-उधर फेंक देते, पवित्र अग्नि को पानी डालकर बुझा देते और कलशों को तोड़ देते। इस प्रकार वे केवल तपस्वियों को ही नहीं, बल्कि उनके यज्ञ, साधना और धार्मिक जीवन को भी बाधित करते थे।
इन अत्याचारों से ऋषि इतने परेशान हो चुके थे कि उन्होंने अंततः चित्रकूट छोड़ने का निर्णय कर लिया था। महर्षि ने श्रीराम से कहा, “तात! हम इन दुष्ट राक्षसों के कारण यह आश्रम छोड़ना चाहते हैं। इससे पहले कि वे हमारे साथ और अधिक हिंसा करें, हम किसी दूसरे सुरक्षित स्थान पर चले जाना चाहते हैं।”
उन्होंने श्रीराम को बताया कि यहाँ से कुछ ही दूरी पर एक सुंदर और विचित्र वन है, जहाँ फल-मूल की बहुतायत है। वहाँ अश्वमुनि का आश्रम है। वे अन्य ऋषियों के साथ वहीं जाकर रहने का विचार कर रहे हैं। उनके शब्दों में आश्रम छोड़ने का दुख भी था और राक्षसों से सुरक्षा की चिंता भी।
फिर उस महर्षि ने श्रीराम से अत्यंत आत्मीयता से कहा, “तात! यदि खर आपके प्रति भी कोई अनुचित व्यवहार करे, उससे पहले ही यदि आप उचित समझें तो हमारे साथ यहाँ से चल दीजिए।”
उनकी चिंता केवल अपने लिए नहीं थी। वे श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के लिए भी चिंतित थे। उन्होंने कहा कि यद्यपि श्रीराम अत्यंत सावधान हैं और राक्षसों का दमन करने में समर्थ हैं, फिर भी इस समय पत्नी सीता के साथ इस आश्रम में रहना उनके लिए भी चिंता और दुःख का कारण बन सकता है।
ऋषियों की बातें सुनकर श्रीराम का हृदय भर आया। वे उन तपस्वियों को रोकना चाहते थे। उनके मन में उनके प्रति गहरा सम्मान और स्नेह था। उन्होंने उन्हें समझाने और आश्वस्त करने का प्रयास किया, लेकिन राक्षसों के अत्याचार से भयभीत और चिंतित ऋषियों ने अपना निर्णय कर लिया था। श्रीराम अपनी सान्त्वनापूर्ण बातों से उन्हें रोक नहीं सके।
अंततः वे ऋषि अपने कुलपति महर्षि का सम्मान करके, श्रीराम से अनुमति लेकर और उन्हें सांत्वना देकर आश्रम से विदा होने लगे। श्रीराम ने भी उनके निर्णय का सम्मान किया। वे उन्हें रोकने के लिए बलपूर्वक कोई आग्रह नहीं कर सकते थे, क्योंकि ऋषियों की सुरक्षा और शांति उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण थी।
ऋषियों के जाने का समय आया तो श्रीराम स्वयं उनके पीछे-पीछे कुछ दूर तक गए। उन्होंने उन्हें सम्मानपूर्वक विदा किया। फिर कुलपति ऋषि को प्रणाम किया और उन ऋषियों से आशीर्वाद तथा कर्तव्य संबंधी उपदेश लेकर वापस अपने आश्रम की ओर लौट आए।
ऋषियों के चले जाने के बाद चित्रकूट का वह आश्रम पहले जैसा नहीं रहा। जहाँ पहले तपस्वियों की उपस्थिति से वातावरण जीवंत और शांत रहता था, वहाँ अब एक प्रकार का सन्नाटा छा गया था। फिर भी श्रीराम ने उस स्थान को छोड़ा नहीं।
उन्होंने न तो राक्षसों के भय से अपना आश्रम छोड़ा और न ही ऋषियों के चले जाने के कारण अपना संकल्प बदला। वे वहीं रहने लगे। उनके मन में यह भावना और भी दृढ़ हो गई कि जो ऋषि उनकी उपस्थिति में स्वयं को सुरक्षित समझते थे, उनकी रक्षा करना उनका धर्म है।
श्रीराम का चरित्र स्वयं तपस्वियों जैसा पवित्र और संयमित था। उनके भीतर करुणा, धैर्य, साहस और धर्म की रक्षा करने की अद्भुत शक्ति थी। इसलिए कुछ ऐसे तपस्वी भी थे जिन्हें श्रीराम पर पूरा विश्वास था। उन्होंने दूसरे आश्रम में जाने के बजाय श्रीराम का ही साथ बनाए रखा।
उनका विश्वास था कि जिस श्रीराम के हृदय में धर्म और करुणा है, वे संकट के समय साधु-संतों और निर्दोष लोगों की रक्षा अवश्य करेंगे। इस विश्वास ने श्रीराम के प्रति उनके प्रेम और श्रद्धा को और भी गहरा कर दिया।
इस प्रकार चित्रकूट की उस घटना ने श्रीराम के जीवन में एक नया संकल्प जन्म दिया—धर्म की रक्षा करना, भयभीत ऋषियों को सुरक्षा देना और अधर्म तथा अत्याचार के सामने कभी पीछे न हटना।
प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. चित्रकूट के आश्रम में तपस्वी मुनि क्यों चिंतित दिखाई दे रहे थे?
उत्तर: राक्षसों के अत्याचार से तपस्वी चिंतित थे। वे उनकी तपस्या भंग करते, यज्ञ सामग्री नष्ट करते और आश्रम छोड़ने के लिए विवश करते थे।
प्रश्न 2. तपस्वियों की बेचैनी देखकर श्रीराम के मन में क्या शंका उत्पन्न हुई?
उत्तर: श्रीराम को शंका हुई कि शायद उनसे, लक्ष्मण से या सीता से कोई अनुचित आचरण हो गया है, जिसके कारण तपस्वी उनसे दुखी हैं।
प्रश्न 3. श्रीराम ने सीता के संबंध में महर्षि से क्या पूछा?
उत्तर: श्रीराम ने पूछा कि क्या उनकी सेवा में व्यस्त रहने के कारण सीता तपस्वियों की पहले जैसी उचित सेवा नहीं कर पा रही हैं।
प्रश्न 4. खर कौन था और उसका स्वभाव कैसा था?
उत्तर: खर रावण का छोटा भाई था। वह अत्यंत क्रूर, घमंडी, नरभक्षी, विजयोन्मत्त और ढीठ राक्षस था तथा तपस्वियों को सताता था।
प्रश्न 5. राक्षस तपस्वियों को किस प्रकार परेशान करते थे?
उत्तर: राक्षस भयानक रूप धारण कर तपस्वियों को डराते, अपवित्र वस्तुओं से परेशान करते और आश्रमों में छिपकर असावधान तपस्वियों को सताते थे।
प्रश्न 6. राक्षस यज्ञ और हवन में किस प्रकार बाधा डालते थे?
उत्तर: राक्षस यज्ञ-सामग्री इधर-उधर फेंक देते, पवित्र अग्नि में पानी डालकर उसे बुझा देते और कलशों को तोड़ देते थे।
प्रश्न 7. तपस्वियों ने चित्रकूट छोड़ने का निर्णय क्यों लिया?
उत्तर: राक्षसों के लगातार अत्याचार और तपस्या में बाधा के कारण तपस्वी भयभीत हो गए थे। इसलिए उन्होंने सुरक्षित स्थान पर जाने का निर्णय लिया।
प्रश्न 8. तपस्वी चित्रकूट छोड़कर कहाँ जाना चाहते थे?
उत्तर: तपस्वी चित्रकूट से कुछ दूर स्थित एक ऐसे वन में जाना चाहते थे, जहाँ फल-मूल की अधिकता थी और अश्वमुनि का आश्रम था।
प्रश्न 9. महर्षि ने श्रीराम को चित्रकूट छोड़ने की सलाह क्यों दी?
उत्तर: महर्षि को डर था कि खर राक्षस श्रीराम को भी परेशान कर सकता है। इसलिए उन्होंने श्रीराम को सुरक्षित स्थान पर जाने की सलाह दी।
प्रश्न 10. श्रीराम तपस्वियों को चित्रकूट में क्यों रोक नहीं सके?
उत्तर: श्रीराम ने उन्हें रोकने और सांत्वना देने का प्रयास किया, लेकिन राक्षसों से अत्यधिक परेशान तपस्वियों ने अन्यत्र जाने का निर्णय कर लिया था।
प्रश्न 11. तपस्वियों के चले जाने के बाद श्रीराम ने क्या किया?
उत्तर: श्रीराम ने तपस्वियों को स्वयं विदा किया, कुलपति ऋषि को प्रणाम किया, उनका उपदेश सुना और फिर अपने आश्रम में लौट आए।
प्रश्न 12. कुछ तपस्वियों ने श्रीराम का साथ क्यों नहीं छोड़ा?
उत्तर: कुछ तपस्वियों को श्रीराम की शक्ति और धर्मपरायणता पर पूरा विश्वास था। उन्हें विश्वास था कि श्रीराम उनकी रक्षा करने में समर्थ हैं।
प्रश्न 13. इस प्रसंग से श्रीराम के चरित्र की कौन-सी विशेषताएँ प्रकट होती हैं?
उत्तर: इस प्रसंग से श्रीराम की विनम्रता, करुणा, धर्मनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता, साहस और ऋषि-मुनियों की रक्षा करने की भावना प्रकट होती है।